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गुरुदत्त: रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

चौदहवीं का चांद उनकी आखिरी हिट फिल्म रही और 'सांझ और सवेरा' आखिरी प्रदर्शित फिल्म

Satya Vyas Updated On: Jul 09, 2017 02:58 PM IST

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गुरुदत्त: रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

प्रोजेक्टर पर कागज के फूल चल रही है. एक वृद्ध कलाकार शॉल ओढ़े हुए अजन्ता पिक्चर्स का गेट खोलकर भीतर दाखिल होता है. अचानक ही वह एक फ्रेम में आकर रुक जाता है. नामावली प्रारम्भ हो जाती है. नामावली खत्म होने के पहले दृश्य में ही जब वह कलाकार मुड़ता है तो झक सफेद बालों में बूढ़े का गेटअप लिए गुरुदत्त दिखाई देते हैं.

आज 9 जुलाई है. मैं सोच में पड़ जाता हूं कि आज गुरुदत्त जीवित होते तो 92 वर्ष के होते. क्या वह ऐसे ही दिखते! खैर, जवाब भी खुद को ही देता हूं. कुछ कलाकार लम्हों में सदियां जीने के लिए आते हैं. गुरुदत्त उनमें से ही एक थे.

गुरुदत्त का जन्म बंगलुरु में वसुथ कुमार शिवशंकर पादुकोण और वासंती पादुकोण के घर हुआ था. उनके माता-पिता कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले के एक गांव पैनबूर में बस गए थे. उनके पिता शुरू में एक हेडमास्टर थे और फिर एक बैंक कर्मचारी तथा उनकी मां वासंती, हालांकि शुरू में एक गृहिणी रहीं जो बाद में एक स्कूल में पढ़ाने लगी थीं.

गुरु दत्त की का बचपन मुश्किल रहा था. वित्तीय कठिनाइयों के साथ-साथ माता-पिता के बीच तनावपूर्ण संबंध थे और अपने सात महीने के भाई शशिधर की मृत्यु ने उन्हें कटु अनुभव ही दिये थे जो उनकी फिल्मों में आसानी से परिलक्षित हुए.

गुरुदत्त एक अच्छे छात्र थे, लेकिन वित्तीय परेशानियों के कारण कॉलेज में न जा सके. इसके बजाय, वह प्रसिद्ध रविशंकर के बड़े भाई उदय शंकर की कला मंडली में शामिल हुए और नृत्य के गुर सीखें, अपने इसी गुण के कारण उन्हें शुरुआती दिनों में फिल्म 'हम एक हैं' में सहायक नृत्य निर्देशक का भी काम मिला. इन्हीं दिनों में उन्हे प्रभात फिल्म कंपनी में तीन वर्ष के करार पर रखा तो गया मगर करार 1947 में खत्म हुआ और गुरुदत्त एक बार फिर बेरोजगार हो गए. लेकिन इस समय के दौरान उन्होंने लगभग आत्मकथात्मक प्यासा लिखी.

गुरुदत्त को पहला बड़ा ब्रेक उनके मित्र देव आनंद साहब ने दिया. फिल्म थी बाज़ी. फिल्म सफल रही. बाद उसके गुरुदत्त ने पीछे नहीं देखा. अगली दो फिल्में जाल और बाज ने ठीकठाक व्यवसाय तो नहीं किया मगर गुरुदत्त को नवोदित निर्देशकों में स्थापित जरूर कर दिया. बाज़ के लिए उपयुक्त अभिनेता न मिल पाने के कारण दत्त स्वयं अभिनय को आगे आए.

1953 में गुरुदत्त जब स्वयं संघर्षरत थे तब उन्होने स्थापित गायिका गीता रॉय से विवाह किया. गुरुदत्त का वैवाहिक संबंध खुशनुमा नहीं रहा और वहीदा रहमान से उनके प्रेम सम्बन्धों की भी चर्चा खबरों का हिस्सा बनी. वहीदा को हिन्दी फिल्मों में लाने का श्रेय भी गुरु दत्त को ही था.

मिस्टर एंड मिसेस 55 में हालांकि दत्त ने विनोदी अभिनय भी दिखाया था मगर अवसादी स्क्रिप्ट उनके ज्यादा करीब होते थे. अवसादी किरदारों में गुरुदत्त निखर कर आते थे. प्यासा, कागज के फूल इसके क्लासिक उदाहरण हैं. मगर कागज के फूल की असफलता ने गुरुदत्त को तोड़ दिया. वह इस निर्णय पर आए कि अब कभी निर्देशन नहीं करेंगे.

इसलिए जब अगली फिल्म साहिब बीबी और ग़ुलाम के निर्देशन की बारी आई तो उन्होने यह भार अपने प्रिय स्क्रिप्ट राइटर और मित्र अबरार अलवी को चुना. अबरार ने पहले तो शशि कपूर से बात की. जब तारीखों को समस्या आई तो फिर गुरुदत्त आगे आए.

अबकी दफा अबरार ने सीधा कहा कि फिल्म का नायक भूतनाथ ग्रामीण है और उसमे आत्मविश्वाश कि कमी है. आपके मूंछों से आपका आत्मविश्वास झलकता है. यदि आप अपनी मूंछें हटा सकते हैं तो आप भूतनाथ का किरदार निभा सकते हैं. अबरार याद करते हुए बताते हैं कि उसके बाद दत्त ने कभी मूंछें नहीं रखीं.

चौदहवीं का चांद उनकी आखिरी हिट फिल्म रही और 'सांझ और सवेरा' आखिरी प्रदर्शित फिल्म. 1964 के अक्टूबर महीने में गुरुदत्त की सोनारिल नामक नींद की गोली के अत्यधिक डोज़ लेने के कारण मृत्यु हो गयी. बातें उड़ीं और खूब उड़ीं. कभी गीता से उनकी कहासुनी को कारण बताया गया तो कभी वहीदा के साथ असफल प्रेम संबंध को. मगर दत्त के पुत्र अरुण दत्त सारे अफवाहों को खारिज करते हुए इसे एक दुर्घटना बताया.

बक़ौल अरुण शराब और अत्यधिक नींद की गोलियों का मिश्रण उनके लिए घटक साबित हुआ. कारण जो भी रहा हो. गुरुदत्त असमय दुनिया छोड़ गए थे. वह एक ऐसी ख़लिश छोड़ गए जो सिने प्रेमियों को सालती ही रहती है.

गुरुदत्त कुछ फिल्में अधूरी छोड़ गये थे जिनमें के आसिफ की लव एंड गॉड तथा पिकनिक थी. जो गुरुदत्त के मृत्यु के बाद या तो दूसरे नायकों के साथ पर जैसे तैसे पूरी हुई या फिर अधूरी ही रही.

कैफी आज़मी ने गुरुदत्त कि मृत्यु पर लिखा;

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

माना कि उजालों ने तुम्हें दाग दिए थे

बे रात ढले शमा बुझाता नहीं कोई

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