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मन की आंखों से तैयार संगीत से दुनिया जीतने वाले कलाकार की कहानी

संगीत के संपूर्ण कलाकार रवींद्र जैन के जन्मदिन पर विशेष

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Feb 28, 2018 09:01 AM IST

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मन की आंखों से तैयार संगीत से दुनिया जीतने वाले कलाकार की कहानी

तन के हिस्से में सिर्फ दो आंखे, मन के हिस्से में हजार होती हैं

तन की आंखें तो सो भी जाती हैं मन की आंखे कभी ना सोती हैं

चांद सूरज के जो हों खुद मोहताज भीख मांगों ना उन उजालों की

बंद आंखों से ऐसे काम करो आंख खुल जाए आंख वालों की.

इन चार लाइनों में एक महान कलाकार के जीवन की कहानी है. उसकी चुनौतियां हैं. उन चुनौतियों पर हासिल की गई जीत है. ये कहानी है कलाकार रवींद्र जैन की. जो उन्होंने खुद अपने एक इंटरव्यू में सुनाई थी. गीतकार, गायक, संगीत निर्देशन, संगीत का ऐसा कौन सा पहलू था जिसमें रवींद्र जैन की जान ना बसती हो. ऊपरवाले ने आंखों में रोशनी नहीं दी पर रवींद्र जैन की शख्सियत में वो हुनर दिया कि उन्हें दुनिया हमेशा याद रखती है. 28 फरवरी 1944 को अलीगढ़ में जन्में रवींद्र जैन अपने माता पिता के सात बच्चों में तीसरे नंबर पर थे. पिता संस्कृत के विद्वान थे. जाहिर है बच्चे को श्लोक और भजन की सीख बचपन से ही मिलने लगी. रवींद्र जैन कम उम्र में ही संगीत सीखने लगे.

रवींद्र जैन जब 15-16 साल के थे तो वो कलकत्ता (अब कोलकाता) गए. ये तब कि बात है जब साठ का दशक शुरू होने ही वाला था. उस वक्त एक से बढ़कर एक दिग्गज कलाकार फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हुआ करते थे. बंगाली फिल्मों में भी एसडी बर्मन जैसे कलाकारों की धूम थी. रवींद्र जैन यूं भी बर्मन दादा के बड़े मुरीद थे. उन्हें बर्मन दादा के संगीत का भाव पक्ष बहुत पसंद था. उस दौर में बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद अमीर खां जैसे कलाकार भी लोकप्रियता की चरम पर थे.

इधर हिंदी फिल्मों में भी दिग्गज गायकों की टोली थी. रवींद्र जैन भी दिल से गायक ही बनना चाहते थे लेकिन हालात ने उन्हें गायक की बजाए संगीत का एक संपूर्ण कलाकार बना दिया. उन्होंने अपनी गायकी को थोड़ा पीछे रखकर संगीत निर्देशक और गीतकार के तौर पर भी काम करना शुरू कर दिया. रवींद्र जैन कहते भी थे कि उस दौर में पार्श्वगायन में बहुत कठिन मुकाबला था इसलिए उन्होंने संगीत निर्देशन को ज्यादा अहमियत दी.

बर्मन दादा के प्रति उनका लगाव इस कदर था कि उनकी शुरुआती फिल्मों के संगीत में बर्मन दादा के संगीत की छाप मिलती है. जो रवींद्र जैन मानते भी थे. वो साफ कहते थे कि सौदागर जैसी फिल्म में उनके संगीत पर बर्मन दादा की छाप थी. इस फिल्म की एक और बड़ी कहानी है.

दरअसल, ये रवींद्र जैन के बम्बई (अब मुंबई) के दिनों की बात है. कलकत्ता से वो मुंबई ‘शिफ्ट’ हो चुके थे. फिल्मों में काम मिलने की शुरूआत भी हो गई थी. फिल्म ‘सौदागर’ के लिए उन्हें सुधेंदु राय ने साइन किया. राय इससे पहले बिमल राय की कालजयी फिल्म ‘सुजाता’, ‘मधुमती’ और ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों के आर्ट डायरेक्टर थे. बाद में उन्होंने सुभाष घई के साथ भी कई बड़ी फिल्मों में आर्ट डायरेक्शन किया.

खैर, रवींद्र जैन ने फिल्म सौदागर के लिए अद्भुत संगीत तैयार किया. ‘सजना है मुझे सजना के लिए’, ‘हर हसीं चीज का मै तलबगार हूं’ और ‘तेरा मेरा साथ रहे जैसे’ गाने जबरदस्त हिट हुए. ऐसा कहते हैं कि इसी फिल्म के संगीत को तैयार करने के दौरान रवींद्र जैन के पिता का निधन हुआ. रवींद्र जैन को जब ये खबर दी गई तो वो संगीत निर्देशन के किसी काम में उलझे हुए थे.

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अपने काम और जिम्मेदारी को लेकर ये उनका समर्पण ही था कि उन्होंने पहले उस काम को पूरा किया उसके बाद स्टूडियो से गए. अगले करीब एक दशक में रवींद्र जैन की कई हिट फिल्में आईं. ‘चितचोर’, ‘गीत गाता चल’, ‘अंखियों के झरोखे से’, ‘चोर मचाए शोर’ जैसी फिल्मों ने सत्तर के दशक में रवींद्र जैन को अलग ही पहचान दिलाई. इसी दौर में ‘राजश्री प्रोडक्शन’ जैसी बड़ी कंपनी के साथ उनकी नजदीकियां रहीं.

ये कहानी फिल्म ‘चितचोर’ की है. रवींद्र जैन इस फिल्म में अमोल पालेकर के लिए एक नई आवाज चाहते थे. उन्होंने येसुदास को सुना. रवींद्र जैन को लगा कि उन्हें हिंदुस्तान की नई आवाज मिल गई है. रवींद्र जैन ने ही येसुदास की आवाज बासु चटर्जी को सुनाई, जो फिल्म के डायरेक्टर थे. येसुदास की आवाज हर किसी को भा गई. जिसका नतीजा ‘जब दीप जले आना’ और ‘गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा’ जैसे खूबसूरत गाने तैयार हुए.

दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म के गीतकार भी रवींद्र जैन ही थे. 80 के दशक में रवींद्र जैन को पहली बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. फिल्म थी-राम तेरी गंगा मैली. शोमैन राजकपूर के निर्देशन में बनी इस फिल्म को जबरदस्त कामयाबी मिली थी.

इसके बाद फिल्मों के साथ-साथ सीरियल की दुनिया में भी रवींद्र जैन के कदम पड़े. याद कीजिए रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण का वो दौर जब पूरा हिंदुस्तान एक अलग ही रंग में रंगा था. ये रामायण की कहानी, रामानंद सागर के निर्देशन और रवींद्र जैन की गायकी का ही कमाल था कि लोगों ने रामायण धारावाहिक को आस्था और श्रद्धा के अलग ही नजरिए से देखा.

तमाम ऐसे किस्से उस दौर में मशहूर हुए जिसमें पता चला कि लोग अगरबत्ती जलाकर, नहा-धोकर और जूते चप्पल दूर रखकर वो सीरियल देखा करते थे. रवींद्र जैन ने रामायण के अलावा और भी कई सांस्कृतिक किताबों पर काम किया. इसमें सामवेद, श्रीमद्भागवतगीता और कुरान जैसी कृतियां प्रमुख हैं.

वो कहा भी करते थे कि फिल्में तो आती-जाती हैं लेकिन सांस्कृतिक कृतियों पर किया गया काम हमेशा के लिए रहता है. कम ही लोग जानते हैं कि रवींद्र जैन ने बच्चों के लिए कई एनीमेशन फिल्मों का संगीत भी तैयार किया था. इतना कुछ करने के बाद भी रवींद्र जैन की जमीन से जुड़े कलाकार के तौर पर ही पहचान रही. वो कहते भी थे...

ज्ञान दे पर ज्ञान कितना है ना इसका ज्ञान दे

ज्ञान का यदि ज्ञान दे तो उसपे मत अभिमान दे

और उसपे यदि अभिमान दे औरों का गुणगान दे

शारदे स्वर साधकों को सिद्धी का वरदान दे

सिद्धी का ये वरदान रवींद्र जैन के साथ हमेशा रहा. उनके गीत संगीत को करोड़ों हिंदुस्तानियों का प्यार मिला. मान सम्मान मिला. 2015 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया. 2015 में ही रवींद्र जैन ने 71 साल की उम्र में इस संदेश के साथ दुनिया को अलविदा कहा- बंद आंखों से ऐसे काम करो आंख खुल जाए आंख वालों की.

इस बात में कोई दो राय नहीं कि बंद आंखों से तैयार किया गया रवींद्र जैन का संगीत आने वाले कई दौर के संगीतकारों की आंखे खोलने के लिए काफी है.

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