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रांगेय राघव: तमिल मूल का था हिंदी का यह 'शेक्सपीयर'

सिर्फ 39 साल की उम्र में रांगेय राघव ने इतनी सारी साहित्यिक रचनाएं लिखीं कि उनके बारे में यह किंवदंति बन गई थी कि वो दोनों हाथों से लिखा करते थे

Updated On: Jan 17, 2018 02:35 PM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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रांगेय राघव: तमिल मूल का था हिंदी का यह 'शेक्सपीयर'

यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि जिसे 'हिंदी साहित्य का शेक्सपीयर' कहा जाता है वो मूलतः  तमिल भाषी था. यह बात और है कि उसका जन्म हिंदी प्रदेश में हुआ लेकिन उसकी मातृभाषा तमिल थी और उसने अपना पूरा जीवन हिंदी साहित्य के प्रगति में लगा दिया. यह शख्स महज 39 साल जिंदा रहा और 38 उपन्यास लिखे. यही नहीं कहानी, आलोचना, रिपोतार्ज, कविता से लेकर हिंदी साहित्य का शायद ही ऐसा कोई इलाका रहा हो जिसमें इस लेखक ने अपना हाथ न आजमाया हो.

हम हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार और हिंदी के शेक्सपीयर के नाम से विख्यात रांगेय राघव की बात कर रहे हैं. इनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य था, जिसे साहित्य लिखने के लिए उन्होंने बदलकर रांगेय राघव कर लिया था. रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा में हुआ था. महज 13 साल की ही उम्र से उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था.

अतीत को पुनर्निमित करने वाले उपन्यासकार

रांगेय राघव मार्क्सवादी थे और इतिहास और संस्कृति में उनकी काफी रुचि थी. जिस वक्त रांगेय राघव ने लिखना शुरू किया  था उस वक्त ऐतिहासिक उपन्यासों का काफी जोर था. लेकिन इस तरह के अधिकतर ऐतिहासिक उपन्यासों के साथ यह दिक्कत थी कि इनमें से अधिकतर में हिंदू-पुनरुत्थानवादी भावना की छाया थी. इनमें इतिहास से अधिक गल्प पर जोर था. रांगेय राघव इस बात को लेकर सजग थे. उन्होंने उन साहित्यकारों के साहित्य को आदर्श बनाया जो ऐतिहासिक और धार्मिक चरित्रों और कथाओं को अपनी रचना का अंग बनाते हुए भी अपने को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से मुक्त रखा.

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अपनी प्रसिद्ध पुस्तक प्राचीन ब्राह्मण कहानियां की प्रस्तावना में रांगेय राघव लिखते है, 'आर्य परंपराओं का अनेक अनार्य परंपराओं से मिलन हुआ है. भारत की पुरातन कहानियों में हमें अनेक परंपराओं के प्रभाव मिलते हैं. महाभारत के युद्ध के बाद हिंदू धर्म में वैष्णव और शिव चिंतन की धारा बही और इन दोनों संप्रदायों ने पुरातन ब्राह्मण परंपराओं को अपनी-अपनी तरह स्वीकार किया. इसी कारण से वेद और उपनिषद् में वर्णित पौराणिक चरित्रों के वर्णन में बदलाव देखने को मिलता है. और बाद के लेखन में हमें अधिक मानवीय भावों की छाया देखने को मिलती है. मैं ये महसूस करता हूं कि मेरे से पहले के लेखकों ने अपने विश्वास और धारणाओं के आलोक में मुख्य पात्रों का वर्णन किया है और ऊंचे मानवीय आदर्श खड़े किए हैं और अपने पात्रों को सांप्रदायिकता से बचाए रखा है इसलिए मैंने पुरातन भारतीय चिंतन को पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है.'

रांगेय राघव के लिए इतिहास या पौराणिक कथाएं अतीत की कोई जड़ वस्तु नहीं थीं. वे इनमें प्रगतिशील तत्वों की खोज करते हैं और इसे एक मानवीय स्वरूप देते हैं. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति के ऊपर उन्होंने 'मुर्दों का टीला' नामक उपन्यास लिखा. रांगेय राघव अपने उपन्यासों में अपनी प्रगतिशील दृष्टिकोण से अतीत को पुनर्निमित करते हैं.

स्त्री और आमजन की पीड़ा को दिया स्वर

रांगेय राघव के ऐतिहासिक उपन्यासों की एक और खासियत यह है कि उनके अधिकतर ऐतिहासिक और चरित उपन्यास उन चरित्रों से जुड़ी महिलाओं के नाम पर लिखे गए हैं. जैसे 'भारती का सपूत' जो भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी पर आधारित है, 'लखिमा की आंखें' जो विद्यापति के जीवन पर आधारित है, 'मेरी भव बाधा हरो'  कवि बिहारी के जीवन पर आधारित है, 'रत्ना की बात' जो तुलसी के जीवन पर आधारित है, 'लोई का ताना' जो कबीर- जीवन पर आधारित है, 'धूनी का धुआं' जो गोरखनाथ के जीवन पर कृति है, 'यशोधरा जीत गई' जो गौतम बुद्ध पर लिखा गया है, 'देवकी का बेटा' जो कृष्ण के जीवन पर आधारित है.

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रांगेय राघव ने इन ऐतिहासिक या पौराणिक पात्रों को एक स्त्री के नजरिए से देखने की कोशिश की जबकि उस वक्त हिंदी साहित्य में आधुनिक स्त्री विमर्श का पदार्पण भी ठीक से नहीं हुआ था. रांगेय राघव की कहानी 'गदल' भी आधुनिक स्त्री विमर्श की कसौटी पर खरा उतरता है. इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह कृष्णा सोबती के प्रसिद्ध उपन्यास 'मित्रो मरजानी' की पूर्वपीठिका हो.

रांगेय राघव ने शहरी जीवन पर आंचलिक उपन्यास भी लिखे. 'कब तक पुकारूं' और 'धरती मेरा घर' में उन्होंने नटों और लौह पीटों नटों के कबीलाई समाज का जिक्र किया है.

अद्भुत मार्क्सवादी

रांगेय राघव मार्क्सवाद से प्रभावित थे लेकिन उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता लेने से इनकार कर दिया. इसके बावजूद उन्हें साम्यवाद और मार्क्सवाद का रचना में मजाक उड़ाया जाना पसंद नहीं था. उन्होंने बड़े ही सलीके से भगवतीचरण वर्मा के 'टेढ़े-मेढ़े रास्ते' नामक उपन्यास, जिसमें मार्क्सवाद की आलोचना की गई थी, का जवाब 'सीधा-सादा-रास्ता' नामक उपन्यास लिखकर दिया था. इसी बंगाल अकाल पर उनका लिखा उपन्यास 'विषादमठ' बंकिमचंद्र के 'आनंदमठ' का जवाब था. रांगेय राघव का पहला उपन्यास 'घरौंदे' था, जो कॉलेज कैंपस के जीवन पर लिखा गया था. कॉलेज कैंपस के जीवन पर आज भी हिंदी में बहुत कम उपन्यास लिखे जाते हैं.

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रांगेय राघव ही वो व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदी समाज को शेक्सपीयर की रचनाओं से अवगत करवाया. उन्होंने शेक्सपीयर के 10 नाटकों का हिंदी में ऐसा अनुवाद किया जो आज भी शेक्सपीयर के नाटकों के हिंदी अनुवादों में श्रेष्ठ माने जाते हैं. रांगेय राघव को इसी वजह से 'हिंदी का शेक्सपीयर' भी कहा जाता है.

कभी-कभी यह मानना मुश्किल लगता है कि सिर्फ 39 साल की उम्र में रांगेय राघव ने इतनी सारी साहित्यिक रचनाएं हिंदी साहित्य को दे दीं. इस वजह से उनके बारे में यह किंवदंती बन गई थी कि वे दोनों हाथों से लिखा करते थे. उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, इतिहास-संस्कृति, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, अनुवाद, चित्रकारी आदि सभी विषयों पर जमकर लिखा.

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