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सीता को घर से बाहर निकालने में सिर्फ राम को दोष मत दीजिए

सीता को वन भेजना ऐसा प्रसंग है जिससे गोस्वामी तुलसीदास भी बच कर निकल गए

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Sep 30, 2017 12:17 PM IST

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सीता को घर से बाहर निकालने में सिर्फ राम को दोष मत दीजिए

विजयादशमी राम की रावण पर जीत का उत्सव है. इसके कुछ दिन बाद दीपावली आएगी, जिसका मिथकीय महत्व है राम का 14 साल के बाद घर वापस आना. एक महाकाव्य की सुखद परिपूर्ति. आम भाषा में कहें तो कहानी का क्लाइमैक्स जिसके बाद कई साल तक राम राज्य रहता है और सभी जन नाना प्रकार के सुखों का भोग करते हुए गोलोक वासी होते हैं. मगर आम भाषा में ही कह सकते हैं कि रामायण की कहानी यहां खत्म नहीं होती, पिक्चर अभी बाकी रहती है दोस्त.

राम धोबी के कहने पर सीता को घर से बाहर निकाल देते हैं. वो भी तब जब वो गर्भवती होती हैं. यहां पर आकर कई लोग सवाल उठा देते हैं कि राम मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे हुए? किसी दूसरे के कहने पर पत्नी को घर से निकालने वाला, कैसे एक आदर्श पुरुष कहा जाए? मेरा मानना है कि राम ने सीता को अगर अयोध्या से निकाल दिया तो इसमें राम को दोषी करार देना ठीक नहीं. ठहरिए, उत्तेजित या खुश होने की जरूरत नहीं है, बात को थोड़ा कायदे से समझते हैं.

कौन सी रामायण को मानें

हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह ही दुनिया में रामायण की संख्या भी अनंत है. सब में अपने-अपने हिसाब से मॉडिफिकेशन हैं. मसलन जैन कथा में ईश्वर अहिंसक और ब्रह्मचारी होता है तो उनकी राम कथा में राम और सीता भाई बहन हैं, साथ ही राम रावण को मारते भी नहीं है. लक्ष्मण और रावण एक दूसरे में समाहित हो जाते हैं. इसी तरह प्रसंग मिलता है कि उन्नीसवीं शताब्दी की राम लीलाओं में अंग्रेज फिरंगी राक्षस रावण की तरफ से लड़ने आता है.

खैर, हम कुल तीन राम कथाओं की बात करते हैं. सबसे पहली वाल्मीकि रामायण, जिसे द ओरिजनल रामायण कहा जा सकता है. दूसरी तुलसी की रामचरित मानस, जिसका प्रभाव सबसे ज्यादा है और तीसरी रामानंद सागर का टीवी सीरियल रामायण जिसने दो बड़े काम किए.

रामायण के दुनिया भर के वर्जन को मिलाकर एक मिश्रण बनाया और राम कथा की अधकचरी जानकारी रखने वाले लोगों के दिमाग में कई ऐसी बातें बैठा दीं जो मूल रामायण या तुलसी की मानस में थी ही नहीं. कहने की जरूरत नहीं कि इस नैरेटिव का 90 के दशक में बड़ा राजनीतिक फायदा भी लोगों को मिला.

मूल मुद्दे पर आने से पहले आपको बता दें कि वाल्मीकि रामायण में कहीं लक्ष्मण रेखा का जिक्र नहीं है. तुलसी की मानस में भी मंदोदरी एक जगह हल्का सा जिक्र करती हैं, मगर जैसा प्रसंग आपने देख रखा है वैसा कहीं नहीं है. इसी तरह से मूल रामकथा में अहिल्या इंद्र पर मोहित होकर अपनी मर्जी से इंद्र से संबंध बनाती हैं. वाल्मीकि से 90 के दशक तक आते-आते समाज की सांस्कृतिक चेतना ऐसी हो चुकी थी कि राम किसी ऐसी स्त्री का उद्धार नहीं कर सकते जो एडल्ट्री में शामिल हुई हो, इसीलिए छल से भोग करने वाली कहानी अधिक लोकप्रिय हुई.

राम का सीता को घर से निकालना

तुलसी दास की मानस के बारे में आलोचक मिश्र बंधुओं ने मिश्र बंधु विनोद में लिखा है कि तुलसी की राम कथा में कोई स्त्री तभी सम्मानित है जब वो राम के साथ है या राम के लिए सम्मानीय है. इसके अलावा कोई भी हो उसके लिए कुछ भी बहुत अच्छा नहीं लिखा गया है. हो सकता है कि गोस्वामी जी रत्नावली के दिए ताने को अंततक भुला न पाए हों और अवचेतन में वो कहीं न कहीं उनकी लेखनी में बना रहता है.

उदाहरण के लिए भरत जब मामा के यहां से वापस आते हैं और राम को वन भेज देने की पूरी कथा सुनते हैं, उसके बाद उनकी कैकेयी से बातचीत किसी भी तरह से सही नहीं है. अगर भारतीय संस्कृति के अनुसार मां के चरणों में स्वर्ग होता है के चश्मे से देखें तो बिल्कुल भी नहीं. मगर गोस्वामी जी की रामकथा में सीता वन में नहीं जाती हैं. मध्यकाल में राम को महानायक बनाने के उपक्रम में लगे गोस्वामी जी राम की राजगद्दी के बाद बच कर निकल जाते हैं.

दरअसल वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामायण के समय में जो कई सौ सालों का अंतर है उसमें समाज के मूल्य काफी बदल जाते हैं. तुलसी राम से ये तो कहलवा देते हैं कि पूजिए विप्र शील गुन हीना, शूद्र न गुण गण ग्यान प्रवीणा. मतलब ब्राह्मण किसी भी गुण के बिना पूज्य है और शूद्र सारे गुणों के साथ भी तिरस्कृत. किंतु वो राम के हाथों शंबूक का वध नहीं करवा पाते हैं. इसी तरह से टीवी सीरियल में बड़ी चतुराई से ये सारे प्रसंग हटा दिए जाते हैं.

वाल्मीकि रामायण में दोनों हैं. शंबूक का वध भी और सीता का घर से बाहर जाना भी. उत्तर राम कथा को दक्षिणपंथ के कई विद्वान बाद में मिलाया हुआ भी कहते हैं. ऐसे दावों को काटने और मानने के कई तर्क हैं उनमें न पड़कर राम सीता और इस सारी कहानी को जरा मानवीय नजरिए से देखते हैं. एक राजपरिवार की कहानी, जिसमें सियासत है, 14 साल बाद घर वापस आया बेटा है. और तमाम बाते हैं.

इस खानदान में जब राम अयोध्या से वन जाते हैं तो भरत, सारी रानियां, मंत्री-संत्री पूरी सेना और न जाने कौन-कौन चित्रकूट की ओर चल पड़ता है कि राम पिता जी की आज्ञा छोड़ो, वापस चलो. सब राम को वापस ले जाना चाहते हैं. घर का सबसे बड़ा, सबसे लायक बेटा वापस चले.

लेकिन जब सीता को राम निकाल देते हैं तो कोई नहीं आता. कोई रानी, सेवक, भाभी को मां समान मानने वाले देवर कोई भी सीता को मनाने, वापस लाने जाता हो ऐसी कोई कथा कहीं नहीं मिलती. कहीं ऐसा तो नहीं कि सबके मन में वही चल रहा हो जो धोबी ने किया और राम ने किया. कहीं राम पुरुषसत्ता को संतुष्ट करने वाले नायक की जगह अपनी पत्नी को दुनिया भर के तानों से यूथिनेसिया जैसा कुछ दे रहे पति हों.

अपनी नायिका के लिए दुनिया से लड़ने वाले इस महाकाव्य के मिथकीय महानायक के दिमाग में इस घटना के समय क्या चल रहा था, किसी को नहीं पता पर राम कथा के बाकी सारे नायकों की चुप्पी हमारे समाज के चरित्र का वो चेहरा दिखाती है जो खुद एक घटना का सारा बारूद जमा करता है और अंत में किसी एक पर मुलम्मा चढ़ा कर खुद मुक्त हो जाता है. इस बार विजयादशमी पर जब मन के रावण को खत्म करने की बात कीजिएगा तो समाज के तमाम नायकों पर भी एक नजर डालने की कोशिश कीजिएगा.

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