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कबीर जैसे फक्कड़ स्वभाव के थे लोकबंधु राजनारायण

कुलीन परिवार में पैदा होने के बावजूद गरीबों के लिए पूरे जीवन तन-मन-धन से समर्पित रहे लोकबंधु राजनारायण

Dr. Arun Kumar Updated On: Nov 23, 2017 08:59 AM IST

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कबीर जैसे फक्कड़ स्वभाव के थे लोकबंधु राजनारायण

एक कुलीन परिवार में पैदा होने के बावजूद गरीबों के लिए तन-मन-धन से समर्पित रहने वाले, अपनी छोड़ हमेशा गरीबों की चिंता करने वाले और समरस समाज की स्थापना को लेकर सतत प्रयास करने वाले जनप्रिय लोकबंधु राजनारायण को याद कर आज भी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं.

80 के दशक में मैं राजनारायण के ज्यादा करीब आया. तीन मूर्ति लेन से लेकर लक्ष्मीबाई नगर में उनके आवास में मिलता रहा. अंतिम सांस तक वो गरीबों के हित के लिए ही चिंतन करते रहे. साहस के वे अप्रतिम योद्धा थे. उनकी हर भेंट मेरे लिए ज्ञानवर्धन का काम करती थी.

ऐसे प्रखर समाजवादी नेता राजनारायण की जन्म शताब्दी 23 नवंबर को है तो उनकी यादें ताजा करने और उनके संघर्ष और जीवन से नई पीढ़ी को अवगत कराने का इससे बेहतर अवसर और कुछ नहीं हो सकता. सौ साल पहले 23 नवंबर 1917 को वाराणसी के पास मोतीकोट में राजनारायण जी का जन्म हुआ था. गांव में ही स्कूली शिक्षा-दीक्षा लेने वाले राजनारायण जी गांव के ही मंदिर में रोज संध्या काल रामचरितमानस का सस्वर पाठ भी करते थे और उसकी व्याख्या भी करते थे.

यानी राम राज्य का आदर्श इन्हें रूचिकर लग रहा था. छात्र जीवन से ही इनके भीतर बेहतर शासन देने के मकसद से राम राज्य की परिकल्पना थी, जिसमें शोषण-मुक्त समाज और अभाव मुक्त समाज हो. इसे वो व्यवहार में भी देखना चाहते थे.

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बीएचयू (प्रतीकात्मक तस्वीर)

स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्विद्दालय में 1939 से 1944 तक पढ़ाई की. इस दौरान राजनारायण जी काशी हिंदू विश्वविद्दालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए. स्वतंत्रता आंदोलन का ज्वार उनके मन में उस वक्त जागृत हो रहा था. बतौर छात्र संघ अध्यक्ष उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को धारदार बनाने में हर कोशिश की.

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उस वक्त ब्रिटिश पुलिस ने उनके खिलाफ जिंदा या मुर्दा गिरफ्तार करने का हुक्म भी जारी कर दिया. इन पर उस जमाने में पांच हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया गया था. उनके अदम्य साहस और कुशल नेतृत्व में यह आंदोलन गति पकड़ने लगा. लेकिन, इसी दौरान 1942 में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

यह काल-खंड उनके लिए संक्रमण का काल था. एक तरफ काशी नरेश उन्हें उत्तराधिकारी के रूप में गोद लेना चाहते थे और दूसरी तरफ राष्ट्र को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने की चुनौती थी. लेकिन, यह व्यक्ति तो पैदा ही हुआ था राष्ट्र को दिशा देने के लिए. राजनारायण जी सुनहरे भविष्य में अपना भविष्य नहीं देखकर उन कठिन चुनौतियों की राह पर चल पड़े.

1946 में राजनारायण जी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव चुने गए. ये डॉक्टर लोहिया को मानने वाले महत्वपूर्ण लोगों में से एक थे. 9 जून 1951 में जब सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई तो इसके संयोजक बनाए गए.

समाजवाद उनके जीवन में रच-बस गया और ये एक बड़े समाजवादी नेता के रूप में राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरकर आए. 1952-1957 और 1957 से 1962 तक राजनारायण जी उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे. उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रतिपक्ष के प्रथम नेता के तौर पर उन्होंने अमिट छाप छोड़ी. आजादी के बाद लोकतंत्र में लोकभाव की स्थापना कैसे हो, इसको प्रतिपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने मूर्त रूप दिया.

डॉ लोहिया ने तो उनके बारे में यहां तक कहा था कि राजनारायण के जीते जी इस देश में लोकतंत्र मर नहीं सकता. 1966 से 1972 और 1974 से 1977 तक दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे राजनारायण ने संसदीय जीवन के मूल्यों को बखूबी निभाया. दो बार लोकसभा सांसद के तौर पर भी उन्होंने भारतीय संसदीय मूल्यों को नई ऊंचाई दी.

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डॉ. राम मनोहर लोहिया

लेकिन, जनहित में संसदीय मर्यादाओं को तोड़ने में राजनारायण ने कभी संकोच नहीं किया. जनता के हित को सर्वोपरि मानने वाले राजनारायण हमेशा लीक से अलग हट कर चलने वाले राजनेताओं में शुमार किए जाते रहे. यह प्रारंभिक दौर से ही कांग्रेस के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार और वंशवाद के चलन का विरोध करते रहे.

आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले राजनारायण श्रीमति इंदिरा गांधी को भ्रष्टाचार एवं वंशवाद की जननी के रूप में मानते थे. 1972 में श्रीमति गांधी के खिलाफ रायबरेली से चुनाव लड़ा. लेकिन, सत्ता का दुरुपयोग कर उन्हें चुनाव में हरा दिया गया. चुनावी धांधली के खिलाफ उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका डाली. अपने खिलाफ में चुनाव याचिका डालने के बाद इंदिरा गांधी ने राजनारायण को काफी प्रलोभन और प्रस्ताव दिया. लेकिन, कबीर की तरह के फक्कड़ राजनारायण प्रलोभन में आने वाले कहां थे?

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12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया. इंदिरा गांधी इस फैसले से विचलित हो गईं और मुठ्ठी में सत्ता रखने की उनकी कोशिश में इस अहंकार ने उन्हें एक अविवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए उद्वेलित किया. भारतीय संसदीय व्यवस्था में यह पहली अलोकतांत्रिक दुर्घटना थी और आपातकाल लागू कर दिया गया. पूरे देश में इस काले कानून के खिलाफ जनता से लेकर जनतांत्रिक मूल्यों के संवाहक नेताओं में आक्रोश फैल गया. रातों-रात नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं.

जयप्रकाश नारायण से लेकर चंद्रशेखर, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, नानाजी देश मुख, मोरारजी देसाई, और लालकृष्ण आडवाणी, सुब्रमण्यम स्वामी, जगजीवन राम, राम बहादुर राय सरीखे नेताओं और पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया गया. राजनारायण भी 26 जून 1975 को पटना में गिरफ्तार कर लिए गए. गजब का कहर पूरे देश में बरप पड़ा. कांग्रेस के कुछ चाटुकार नेताओं ने कह डाला कि ‘इंदिरा इज इंडिया’ और ‘इंडिया इज इंदिरा.’

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जयप्रकाश नारायण

राजनारायण इस आपातकाल में धूमकेतु की तरह उभरे. राजनारायण आपातकाल और इसकी चुनौतियां के पर्यायवाची बनकर उभरे. जनआंदोलन पूरे देश में तेज हो गया. नौजवानों की टोली सिर पर कफन बांधे पूरे देश में जेल में बंद नेताओं के आह्वान पर कूद पड़ी. उनकी गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन, आंदोलन रुकने का नाम नहीं ले रहा था.

अंतत: इंदिरा गांधी को ये बात समझ में आ गई ‘जनता ही जनार्दन’ है और आपातकाल को हटा दिया गया. देश में नए चुनाव की घोषणा हुई. रायबरेली से राजनारायण ने इंदिरा गांधी को 1977 के चुनाव में पराजित किया और पूरे देश में लोकशाही की स्थापना हुई. यह भी कहा जाने लगा कि राजनारायण ने इंदिरा गांधी को कोर्ट में और वोट में हराकर देश में एक नए इतिहास का सूत्रपात किया.

अब समझ में आता है कि 17 वर्ष की उम्र में इस नौजवान ने काशीनरेश के उस प्रस्ताव को ठुकरा कर आजादी के महासमर में कूदने का क्यों फैसला किया? उन्हें तो जीना था आमजन के लिए. आपातकाल के इस धूमकेतु ने राष्ट्रीय क्षितिज पर गैर-कांग्रेसवाद की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई. जनता पार्टी की सरकार हो या आज एनडीए की दो सरकारें, इसकी बुनियाद का श्रेय अगर किसी व्यक्ति को जाता है तो उसका नाम राजनारायण है.

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1977 में मोरारजी देसाई सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने राजनारायण भले ही सरकार में मंत्री थे, लेकिन, इसका स्वभाव प्रतिपक्ष का ही रहा. अपनी सरकार के खिलाफ निर्णय लेने में भी ये हिचकते नहीं थे. पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के हनुमान के रूप में भी जाने जाते थे. लेकिन, उनका भी विरोध करने में झिझक नहीं रखते थे. राजनारायण का 30 सितंबर में 1986 में निधन हो गया. इनके अंतिम संस्कार में वाराणसी में भी गरीबों का जनसैलाब था, जनता के जनार्दन के ही रूप में इनकी अंतिम सवारी निकली.

मोरारजी देसाई (scoopwhoop)

जय प्रकाश नारायण

आज के संदर्भ में राजनारायण को सामने रखने की जरूरत है. नई पीढ़ी को इनसे सीखना चाहिए. भारतीय संस्कृति वैराग्य को अपना आदर्श मानती है. फक्कड़ स्वभाव का राजनारायण अपने जीवन से बहुत कुछ दे गए हैं. उनकी स्वयं की यह पंक्ति ‘गरीबों की रोटी के लिए मुझे अपना जीवन भी उत्सर्ग करना पड़े तो वह कम होगा आज भी प्रासंगिक है.’

पूरे देश में उनके जन्म शताब्दी वर्ष के जरिए इसे हम छात्रों से लेकर खेत-खलिहान तक उनके संदेश को पहुंचाएंगे और एक नए भारत के निर्माण का संकल्प लेंगे.

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आज कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की चुनौतियों से जूझ रहे हैं. देश के अंदर, देश के बाहर, पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर राष्ट्र निर्माण में संघर्ष करना पड़ रहा है. इस कठिन दौर में राजनारायण को मानने वाले लोग राष्ट्र निर्माण के इस दौर में प्रधानमंत्री को नई उर्जा दें इससे एक मजबूत राष्ट्र जो अंतत: गरीबों के हित में एक नया संकल्प लेकर आगे बढ रहा है. उसे ताकत दें. लोकबंधु राजनारायण को उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर शत-शत नमन.

(लेखक बिहार में जहानाबाद से आरएलएसपी सांसद हैं)

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