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राज नारायण जन्मशती: इस असली आम आदमी ने इंदिरा को भी सिखाया था सबक

कोई कितना भी ऊंचा और ताकतवर है- उद्देश्य पुकार रहा हो तो वे ऐसे लोगों से भिड़ जाते थे और अक्सर उनका मकसद आम आदमी से जुड़ा हुआ होता था

Updated On: Feb 24, 2018 09:22 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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राज नारायण जन्मशती: इस असली आम आदमी ने इंदिरा को भी सिखाया था सबक

हरी पगड़ी और भारी भरकम देह उनकी शख्सियत की पहचान थी. राज नारायण कोई साधारण नेता नहीं थे. अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए वे एक ऐसे दुश्मन की तरह थे जिसे देखते ही सामने वाले का कलेजा कांप जाए. सन् सत्तर और अस्सी के दशक में कइयों ने अपने अनुभव से सीखा कि इस नेता की राह में आड़े आना किसी भूल से कम नहीं.

ऐसा ही एक सख्त सबक 1974 में इंदिरा गांधी ने भी सीखा. तब इलाहाबाद हाइकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने सांसद के रूप में उनके निर्वाचन को अवैध करार दिया था. इस मामले में अदालत में अर्जी राज नारायण ने लगाई थी. उन्हें मजबूरन देश में इमरजेंसी लगानी पड़ी और बाद के वक्त में उन्हें गहरा पछतावा हुआ कि जिस व्यक्ति को वे गंवई दबंग मानकर खारिज करती आई थीं उससे दुश्मनी मोल लेना इतना महंगा पड़ा.

दबंग तो वे थे- शब्द के सटीक अर्थों में दबंग थे राज नारायण. किसी पहलवान की सी काया वाले राज नारायण हर वक्त दो-दो हाथ करने को तैयार रहते थे. कोई कितना भी ऊंचा और ताकतवर है- उद्देश्य पुकार रहा हो तो वे ऐसे लोगों से भिड़ जाते थे. और अक्सर उनका मकसद आम आदमी से जुड़ा हुआ होता था. अन्ना हजारे के आंदोलन को अपनी मुट्ठी में कर ‘आम आदमी’ के मुहावरे को एक पार्टी में बदलने वाले अरविंद केजरीवाल से बहुत पहले यह राज नारायण की शख्शियत थी जिससे आम आदमी के सरोकार झांकते थे.

ऊपर से सख्त भीतर से मुलायम

बतौर पत्रकार जनसभाओं में गाहे-बगाहे मुझे उनकी झलक मिल जाया करती थी. उनसे बातचीत का मौका मुझे नहीं मिला कभी. लेकिन मैंने उनके बारे में इतनी कथा-कहानियां सुन रखी हैं कि मुझे लगता है, काश! उनसे मेरी मुलाकात हुई होती. जो लोग उनके नजदीक रहे वे ऐसी कहानियां बड़े चाव और मोह भरे भाव से सुनाते हैं. और, इन कहानियों से पता चलता है कि राज नारायण ऊपर से भले अक्खड़ जान पड़ें लेकिन उनके भीतर करुणा, दया और हंसी-मजाक का एक सोता बहता रहता था. साथ ही, उनकी कुछ सहज मानवीय कमजोरियां भी थीं.

ऐसा ही एक किस्सा एक धरने के बारे में है. अपनी जानी-पहचानी शैली में उन्होंने दोस्तों और समर्थकों से कहा कि यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के वाराणसी वाले निवास (औरंगाबाद वाले इलाके में) पर धरना-प्रदर्शन करना है. सुबह से लेकर शाम तक वे धरने पर बैठते. फिर कमलापति त्रिपाठी संदेशवाहक के हाथों रुपया भेजकर कहलवाते कि ‘आज के लिए बहुत हुआ, कुछ खा-पी ले और आराम करे ताकि अगले दिन के धरने के लिए कुछ ताकत मिल जाए.’ राजनारायण अपने समर्थकों के सामने ही राजी-खुशी वो रुपया ले लेते थे फिर जो कोई चाहे उसे साथ लेकर भोज के लिए निकल पड़ते थे लेकिन अगले दिन उनका धरना बदस्तूर जारी रहता था.

उनकी दरियादिली का एक किस्सा और सुनिए. सन् 1977 के चुनाव में राज नारायण ने इंदिरा गांधी को रायबरेली में हरा दिया. इसके बाद समाजवादी कार्यकर्ताओं का एक उत्साही जत्था दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी के सरकारी निवास पर आ धमका. इन लोगों ने मांग रखी कि आपको अभी के अभी सरकारी निवास खाली करना होगा. राजनारायण उस वक्त रायबरेली में थे. वाकये की खबर मिली तो उन्होंने जत्थे के नेता को फोन किया, कार्यकर्ताओं से कहा कि फौरन से पेश्तर उस जगह से हट जाओ. जत्थे के नेता से उन्होंने कहा था- 'मैंने उन्हें कानून की अदालत में हराया है और जनता की अदालत में भी. एक हारे हुए सेनापति को अब और ज्यादा अपमानित करने की जरूरत नहीं.'

FORMER CANADIAN PM PIERRE TRUDEAU WITH INDIRA GANDHI FILE PHOTO.

ऐसी कहानियां बहुत हैं. राज नारायण के एक नजदीकी सहयोगी बताते हैं कि एक दफे एक उद्योगपति उनसे मिलने आया और उसने 10 हजार रुपए का एक पैकेट थमाया. राज नारायण ने तुरंत-फुरंत पैकेट से साढ़े नौ हजार रुपए निकाले और अपने सहयोगियों के बीच बांट दिया. किसी को कुछ ज्यादा रकम मिली तो किसी को कुछ कम लेकिन रकम सबको उनकी जरूरत के हिसाब से मिली. बाकी पांच सौ रुपए उन्होंने अपने पास रख लिए ताकि उससे दोस्तों के साथ दावत उड़ाई जा सके.

यह खिलंदड़ाना बरताव उनकी शख्सियत का हिस्सा था और छुटपन से ही उन्होंने ऐसा मिजाज पाया था. बात सियासत की हो तो वे शायद ही कभी अपनी फिक्र करते थे. आज दिन तक किसी को उनके परिवार और उसकी राजनीति के बारे में नहीं पता. एक सच्चे समाजवादी की तरह उन्होंने सार्वजनिक जीवन में अपने परिवार से दूरी बनाए रखी. समाजवाद के तथाकथित रहनुमाओं लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और उनकी जमात के लोगों की तुलना में राजनारायण की यह खासियत एकदम अलग जान पड़ती है.

लोगों की भलाई के लिए डालते थे संसद की कार्रवाई में बाधा

मुझे वे दिन अच्छी तरह याद है जब राज नारायण को संसद से इस भय से बाहर कर दिया जाता था कि कहीं कोई बखेड़ा ना खड़ा कर दें और संसद की कार्यवाही इस चक्कर में बाधित ना हो. वे संसद की कार्यवाही में बाधा पहुंचाने के आदी थे, एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने एक नई परिपाटी ही डाल दी. लेकिन ध्यान रहे कि लोगों के भलाई के मकसद से ही वे संसद की कार्यवाही में बाधा डालते थे. पुराने वक्त के नेता बड़े मोहभाव से बताते हैं कि राज नारायण जनता के मुद्दे कुछ इस तरह उठाते थे कि उसे आम आदमी बहुत आसानी से समझ लेता था.

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साल 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई और राज नारायण एक बार फिर से फूटमत पैदा करने वाले ऐसे नेता बनकर उभरे जिसने पार्टी तोड़ने में अहम भूमिका निभाई. मोरारजी देसाई से अलग्योझा करने वाले अपने दोस्त चौधरी चरण सिंह के समर्थन में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पर हमला बोला और जो कोई उनकी इस राह में आया वो उनकी कहर का शिकार हुआ.

Morarji Desai

मोरारजी देसाई

जस्टिस एच.आर.खन्ना की आत्मकथा नाइदर रोजेज नॉर थार्न्स में जिक्र आता है कि राज नारायण ने चरणसिंह की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई. अब इसे राज नारायण का हद दर्जे का भोलापन ही कहा जाएगा जो उन्होंने उस इंदिरा गांधी पर विश्वास किया जो मन ही मन उनसे और चौधरी चरण सिंह के प्रति वैरभाव से भरी बैठी थीं. जाहिर है, राजनीति का वह प्रयोग कुछ दिनों का ही मेहमान साबित हुआ, इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस लिया और चौधरी चरण सिंह की सरकार गिर गई. जनता पार्टी के नाम से सियासत में जो नया प्रयोग सामने आया था वह मुंह के बल गिर पड़ा.

साल 1986 यानी मृत्यु से तुरंत पहले के दिन राज नारायण के लिए बड़ी विपदा में गुजरे. मेरे सहकर्मी और निडर फोटोग्राफर स्वर्गीय संजीव प्रेमी ने एक दफे मुझे बताया था कि लखनऊ के हजरतगंज इलाके में उनकी नजर राज नारायण पर पड़ी. राज नारायण सड़क के बीचों-बीच डिवाइडर पर अकेले बैठे थे. उनकी सहायता करने वाला आदमी गाड़ी लाने के ख्याल से उन्हें उसी जगह अकेला छोड़कर चला गया था. बगैर सहायक के राज नारायण उस जगह से एक कदम भी चल पाने में असमर्थ थे. संजीव प्रेमी उस व्यक्ति के भाग्य की विडंबना को अपने कैमरे में कैद करने के लिए दौड़े जिसने एक बार पूरे भारत के भाग्य को आकार दिया था और उसकी यह कोशिश अच्छाई के लिए ज्यादा थी, बुराई के लिए बहुत कम.

(राज नारायण की जन्मशताब्दी के मौके पर यह आलेख इस हफ्ते नेहरु मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के एक सेमिनार में प्रस्तुत किया गया था)

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