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क्यों करीब 24 घंटे बाद राज कपूर ने दी थी एक गाने को मंजूरी

शोमैन राजकपूर के जन्मदिन पर खास

Updated On: Dec 14, 2018 08:39 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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क्यों करीब 24 घंटे बाद राज कपूर ने दी थी एक गाने को मंजूरी

साल 1951 की बात है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के शोमैन राजकपूर के करियर का शुरुआती दौर था. इससे पहले उन्होंने तीन चार हिट फिल्में दी थीं, जिनमें आग, अंदाज, बरसात जैसी फिल्मों का नाम लिया जा सकता है. पचास के दशक में वो फिल्म बना रहे थे-आवारा.

फिल्म के संगीत की रिकॉर्डिंग का समय था. उनके टोली के संगीतकार शंकर जयकिशन ये जिम्मेदारी निभा रहे थे. फिल्म में एक गाना था-घर आया मेरा परदेसी. उस गाने की रिकॉर्डिंग होनी थी. पार्श्वगायिका लता मंगेशकर और मन्ना डे के साथ स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के लिए पूरी टीम इकट्ठा हो गई.

खुद राज कपूर भी वहां मौजूद थे. राज कपूर हमेशा अपनी फिल्मों के गाने की रिकॉर्डिंग के समय मौजूद रहने की कोशिश करते थे. खैर, गाने की रिकॉर्डिंग शुरू हुई. सुबह के करीब 9 बजे का वक्त था. हर किसी को उम्मीद थी कि तीन चार घंटे में काम खत्म हो जाएगा. गाना रिकॉर्ड तो हो गया लेकिन राज कपूर को उसमें कुछ कमी लग रही थी.

उन्होंने दोबारा रिकॉर्डिंग के लिए कहा. एक के बाद एक रिकॉर्डिंग के ‘टेक’ होते चले गए लेकिन राज कपूर संतुष्ट नहीं थे. आखिरकार रात हो गई. संगीतकारों से लेकर गायक तक सब थक गए थे. राज कपूर की ताजगी बरकरार थी. उन्होंने अपनी तरफ से अब तक गाने को मंजूरी नहीं थी.

आपको जानकर हैरानी होगी कि ये मंजूरी अगली सुबह तड़के करीब तीन बजे के पार जाकर मिली. यानि करीब चौबीस घंटे बाद राज कपूर को उस गाने में वो बात समझ आई जो वो चाहते थे. आज उस गाने की लोकप्रियता के बारे में कुछ बताने की जरूरत नहीं है.

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दरअसल, राज कपूर उस दौर के उन कलाकारों में रहे जिन्हें अपनी फिल्म के संगीत पक्ष से बहुत प्यार था. आज से सत्तर साल पहले वो ये बात समझ चुके थे कि फिल्म की कामयाबी में उसका संगीत पक्ष कितना प्रमुख होता है. उन्हें ये समझ थी कि हिंदुस्तान में जब आदमी टिकट खरीदकर सिनेमा हॉल में जाता है तो उसे कहानी के साथ साथ गीत संगीत की भी दरकार रहती है.

इसीलिए उन्होंने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए गीतों का सहारा लिया. आज फिल्म इंडस्ट्री में अलग अलग कलाकारों के ‘कैंप’ को काफी हद तक नकारात्मक भाव से देखा जाता है लेकिन 50 के दशक में राज कपूर का अपना एक कैंप था. जिसमें शंकर जयकिशन बतौर संगीतकार थे.

गीतों को लिखने की जिम्मेदारी हसरत जयपुरी और शैलेंद्र जैसे गीतकारों की थी. मुकेश लंबे समय तक फिल्मी परदे पर राज कपूर की आवाज थे. महिला स्वर के लिए लता मंगेशकर थीं. इन नामों में एक से बढ़कर एक हुनरमंद थे. हर कोई अपनी कला में माहिर. यही वजह है कि राज कपूर की अगुवाई में इस टोली ने लंबे समय तक फिल्म इंडस्ट्री में एक के बाद एक कामयाब फिल्में दीं. जिसमें बरसात, आह, आवारा, श्री 420, चोरी चोरी, संगम, जिस देश में गंगा बहती है, तीसरी कसम और मेरा नाम जोकर जैसी फिल्में शामिल हैं.

इन फिल्मों की कामयाबी में राज कपूर या उनकी अभिनेत्रियों की अदाकारी, फिल्म की कहानी के अलावा किसी भी फिल्म का संगीत याद कर लीजिए. आपके लिए उस फिल्म का सबसे पसंदीदा गाना चुनना मुश्किल हो जाएगा. यही राज कपूर की फिल्मों की खासियत है. कम ही लोग जानते हैं कि राज कपूर वायलिन के साथ साथ पियानो, मेंडोलिन और तबला बजाना भी जानते थे.

जाहिर है दिग्गज से दिग्गज संगीतकार के लिए उन पर अपना संगीत थोपना आसान नहीं था. उलटे वो कभी कभार संगीतकारों से मजे ले लिया करते थे. शंकर जयकिशन के अलावा बाद के दिनों में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और रवींद्र जैन जैसे संगीतकारों ने भी राज कपूर की फिल्मों के लिए संगीत दिया.

राज कपूर की फिल्मों के लोकप्रिय गानों में कई गाने आपको ऐसे मिलेंगे जो शुद्ध शास्त्रीय रागों की जमीन पर तैयार किए गए थे. इनमें से एक राग था- राग भैरवी. यूं भी राग भैरवी उन रागों में से है जिसमें सबसे ज्यादा फिल्मी गीत कंपोज किए गए हैं. राज कपूर के पसंदीदा रागों में भी ये राग था.

राग भैरवी की जमीन पर तैयार किए गए और राज कपूर पर फिल्माए गए गानों में ‘दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा’ और ‘रमैया वस्ता वैया’ तुरंत याद आ जाते हैं. दोस्त दोस्त ना रहा में राग शिवरंजनी की भी गमक मिलती है. इसके अलावा भी शास्त्रीय रागों में भैरव और केदार जैसे रागों पर आधारित गाने राज कपूर की फिल्मों में मिलते हैं.

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राज कपूर मौजमस्ती वाले इंसान थे. संगीत में उनका दिल बसता था. 60 के दशक में उनकी फिल्म छलिया के गाने डम डम डिगा डिगा को सुनकर झूमते हुए गिर पड़ने का उनका किस्सा बड़ा मशहूर है.

इस फिल्म का संगीत कल्याण जी आनंद जी ने दिया था. निजी जिंदगी में वो नरगिस के साथ अपने रिश्तों को लेकर चर्चा में रहे. दरअसल, फिल्मी परदे के अलावा नरगिस काफी समय तक उनकी जोड़ीदार भी रहीं. लेकिन ये रिश्ता अपनी परिणति तक नहीं पहुंचा. ये भी विचित्र संयोग ही था कि दोनों कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गए.

Nargis,_Raj_Kapoor_and_Dilip_Kumar_in_scene_from_Andaz

खैर, इस बात में कोई दो राय नहीं कि राज कपूर ने कपूर खानदान की परंपरा को अलग मुकाम पर पहुंचाया. उन्हें 11 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. 3 बार उन्होंने राष्ट्रीय अवॉर्ड हासिल किया. उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से पद्मभूषण से नवाजा गया. बेहद प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड भी उन्हें दिया गया.

ये संयोग है कि मुझे पाकिस्तान के उस शहर में जाने का मौका मिला था जहां राज कपूर पैदा हुए थे. वो शहर पेशावर था. बाद में मैं चीन भी गया जहां आज भी राज कपूर के गाने सुने और गाए जाते हैं. सोवियत संघ में एक समय राज कपूर की लोकप्रियता चरम पर मानी जाती थी. ये राज कपूर की ‘लिगेसी’ ही है कि आज भी फिल्म इंडस्ट्री में कपूर खानदान को सम्मान से देखा जाता है. इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि बतौर फिल्मकार राज कपूर ने अपने समय से आगे का सिनेमा बनाया.

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