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जन्मदिन विशेष: बदलते तेवरों से कांग्रेस की दशा-दिशा बदलते राहुल

कांग्रेस की कल जैसी हालत थी, वैसी ही आज भी है. बदले हैं तो सिर्फ राहुल गांधी. अब ये बदलाव कांग्रेस को आने वाला कल कैसा दिखाता है यह अभी भविष्य की परतों में छिपा है

FP Staff Updated On: Jun 19, 2018 08:31 AM IST

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जन्मदिन विशेष: बदलते तेवरों से कांग्रेस की दशा-दिशा बदलते राहुल

भारतीयों की एक दिलचस्प आदत है. इन्हें वही नेता पसंद आता है जो लच्छेदार भाषण दे सके. लुभावनी बातों, वादों, कटाक्ष...तेवर...इन सबकी वजह से ही देसी मतदाता खुद को किसी भी नेता से जोड़ पाते हैं. कांग्रेस की राजनीति को धार देने की कोशिश में जुटे राहुल गांधी की कोशिश कुछ यही है. राहुल उम्र के 48वें पड़ाव पर पहुंच चुके हैं. उनके सामने नई चुनौतियां हैं. उन्हें खुद को न सिर्फ बेहतर नेता साबित करना है बल्कि कांग्रेस में नई जान भी फूंकना है.

अपने बयानों की वजह से राहुल गांधी को कई बार निशाना बनाया गया है. हाल ही में कोका कोला कंपनी के संस्थापक को लेकर दिए गए बयान की भी काफी खिल्ली उड़ी. वैसे इस तरह की गलतियां पीएम मोदी भी अपने कई भाषणों में कर चुके हैं लेकिन धारदार भाषण की वजह से पीएम मोदी की गलतियां ढक जाती हैं. राहुल गांधी भी कुछ ऐसा ही करने की राह पर हैं. गुजरात चुनाव से पहले उनके भाषणों में वो धार नहीं दिखती जो इन चुनावों और उसके बाद दिखे. गुजरात और कर्नाटक चुनाव में दिए गए उनके भाषणों ने उनकी नई छवि गढ़ने की शुरुआत की है. अभी तक अपने तमाम बयानों के लिए आलोचनाओं का शिकार हुए राहुल गांधी के लिए भी यह अनुभव भी अलग होगा. राहुल गांधी ने अपने भाषणों में जिस तरह से केंद्र को आड़े हाथों ले रहे हैं वह पहले से अलग है.

आखिर ऐसा क्या कह रहे हैं राहुल?

यह कहना गलत नहीं होगा कि कई राहुल गांधी के भाषण में नरेंद्र मोदी का अंदाज नजर आता है. नरेंद्र मोदी जिस तरह से आम लोगों के सामने अपनी बात रखते हैं, वह लाजवाब होता है. बात चाहे नोटबंदी की हो या जीएसटी की, नरेंद्र मोदी जब बोलते हैं तो जनता को उनकी हर बात सही लगती है. देसी टच, मजाकिया लहजा और कटाक्ष...नरेंद्र मोदी के इसी अंदाज को कुछ हद तक राहुल गांधी ने भी खुद में उतारने का प्रयास किया है. जैसे गुजरात चुनाव के दौरान उन्होंने जीएसटी को 'गब्बर सिंह टैक्स' कहकर इसे लोगों की आम जुबान पर चढ़ा दिया.

ऐसा नहीं है कि वो इसमें पूरी तरह कामयाब हो गए हैं. लेकिन एक परिपक्व और मंझे नेता के रूप में राहुल ने भाषण में शुरुआत कर ही डाली है. राहुल गांधी कई बार अपने भाषण की शुरुआत करते ही यह साफ करते हैं वह अंग्रेजी और हिंदी में बोलेंगे. अंग्रेजी इसलिए ताकि दक्षिण भारतीय नेता उनकी बात समझ पाएं, जिन्हें हिंदी नहीं आती. और हिंदी इसलिए ताकि आम जनता तक उनकी बात पहुंच सके.

मोदी और बीजेपी की नेताओं की तरह वे अब अपने भाषणों में हिंदू मिथकों, देवताओं, कहानियों आदि का सहारा लेने लगे हैं. उदाहरण के लिए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने बीजेपी की तुलना कौरव और कांग्रेस की तुलना पांडव से करते हुए की. उन्होंने कहा कि हर हाल में कांग्रेस सच्चाई के लिए लड़ती रहेगी. इसके साथ उन्होंने यह भी जता दिया कि 2019 उनके लिए महाभारत की लड़ाई और वे इसे हारना पसंद नहीं करेंगे. यही नहीं कर्नाटक चुनाव के दौरान उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीएम पद पर भी दावा ठोंककर यह दिखा दिया वो अपने-आप को कम नहीं आंकते हैं.

कमजोर नेता के इमेज को तोड़ने में लगे हैं राहुल

यह बात इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि अब राहुल पीएम मोदी के मुकाबले वो जनता की नजर में कमजोर नहीं दिखना चाहते और बिना कमजोर नेता के इमेज को तोड़े बगैर वो बीजेपी और पीएम मोदी को टक्कर नहीं दे सकेंगे.

यूपीए सरकार जब शासन में थी तब कोलगेट, 2जी जैसे कई घोटाले हुए. घोटालों की वजह कांग्रेस को बार-बार आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ा है. नरेंद्र मोदी ने भी कई बार अपने भाषणों में कहा है कि 'मैं ना खाऊंगा ना खाने दूंगा.' भ्रष्टाचार कांग्रेस की कमजोर कड़ी रही है लेकिन राहुल गांधी ने अब इस मामले में भी झुकते हुए नजर नहीं आ रहे हैं.

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नीरव मोदी, ललित मोदी का वो अक्सर अपने भाषणों में जिक्र करते हुए बीजेपी को भी कटघरे में खड़ा करते हैं. खासकर कांग्रेस महाधिवेशन में अध्यक्ष के तौर पर बोलते हुए राहुल गांधी ने जिस दृढ़ता के साथ यह भरोसा दिलाया कि वह सच्चाई के लिए लड़ेंगे, वो अंदाज पहले से अलग था.

एक खास बात राहुल गांधी के भाषण में नजर आती है जो आमतौर पर किसी नेता के भाषण में नहीं होता. वे अपने अधिकतर भाषणों में कहा करते हैं कि, 'हम अपनी गलतियों से सीखते हैं जबकि, बीजेपी नहीं.' इसके साथ-साथ हाल ही में उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी आडवाणी को गुरु तो कहते हैं लेकिन उनका सम्मान नहीं करते.

राहुल गांधी ने पूरी बहस को एक नई दिशा दे दी है. छह महीने पहले तक भी कांग्रेस के बारे में यह कहा जाता था कि कांग्रेस कहीं टक्कर में नहीं है. अभी तक के नतीजे तो कांग्रेस के लिए निराशाजनक ही हैं. आगे क्या होगा यह भी किसी को पता नहीं है. लेकिन राहुल गांधी ने ताल ठोंककर 2019 में जीत का दावा जरूर कर दिया है और इसके लिए वे विपक्ष का महागठबंधन बनाने को तैयार हैं. यही वजह रही कि कर्नाटक में अपनों का विरोध झेलकर भी उन्होंने जेडीएस से गठबंधन करने में गुरेज नहीं किया.

कांग्रेस की कल जैसी हालत थी, वैसी ही आज भी है. बदले हैं तो सिर्फ राहुल गांधी. अब ये बदलाव कांग्रेस को आने वाला कल कैसा दिखाता है यह अभी भविष्य की परतों में छिपा है.

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