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आधा गांव, महाभारत, गोलमाल और कर्ज: बतौर लेखक राही मासूम रजा की बराबरी नहीं

राही मासूम रजा हिंदुस्तानी लेखकों की जमात के उन चंद लोगों में से रहे जिन्हें साहित्य के साथ साथ टीवी स्क्रीन के लेखन में भी खूब सराहना मिली

Updated On: Mar 15, 2018 08:38 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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आधा गांव, महाभारत, गोलमाल और कर्ज: बतौर लेखक राही मासूम रजा की बराबरी नहीं

समूचे हिंदुस्तान में एक पीढ़ी ऐसी है जो राही मासूम रजा को एतिहासिक उपन्यास ‘आधा गांव’ के लिए जानती हैं. एक पीढ़ी ऐसी है जो उन्हें अत्यंत लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘महाभारत’ के लिए जानती है. कई लोग उन्हें ‘गोलमाल’, ‘कर्ज’, ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ जैसी सुपरहिट फिल्मों की वजह से जानते हैं, किसी ने उनका धारावाहिक ‘नीम का पेड़’ देखा है... और बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके होंठों पर अक्सर उनका लिखा वो गीत रहता है जिसे जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज ने और अमर कर दिया. वो गीत था- ‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद’.

सोचकर देखें तो ताज्जुब होता है कि ये सारे आयाम और ये सारे काम किसी एक शख्स के हैं. उस करिश्माई शख्स के जिसकी कलम ने उसे आज भी समूचे हिंदुस्तान में जीवित रखा है. उस शख्स के जिसने जिस चीज पर हाथ रखा वो कामयाबी की भाषा में  सोना हो गई. राही मासूम रजा, 1992 में सिर्फ 64 साल की उम्र में दुनिया छोड़कर चले गए थे.

बंटवारे की याद

साल 1927 की बात है. उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में राही मासूम रजा का जन्म हुआ था. वहीं पढ़े-लिखे. बचपन में बीमारी के चलते पढ़ाई छोड़नी पड़ी लेकिन हार नहीं मानी और बड़े हुए तो अलीगढ़ आए. वहां पढ़ाई लिखाई पूरी की. बीस बरस के थे जब आजादी और देश का बंटवारा देखा. उस बंटवारे की तस्वीरें दिल में ताजा रह गईं.

मन-मस्तिष्क से इतने ‘मेच्योर’ हो चुके थे कि कुछ भी भूले नहीं. वो साठ का दशक जब उनकी कलम ने उन यादों को कागज पर उतारा और आधा गांव लिखा, जो आज भी हिंदी साहित्य के सबसे प्रचलित उपन्यासों में से एक है. आज भी इस उपन्यास का सामाजिक ताना-बाना लोग नहीं भूले.

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हिंदुस्तान आजादी के बाद सांप्रदायिकता की आग में जल रहा था. देश में हिंदू-मुसलमानों के रिश्तों की जमीनी हकीकत तेजी से बदल रही थी. मुस्लिम लीग की राजनीति अपने चरम पर थी. राही मासूम रजा ने ये सारी घटनाएं अपने इर्द गिर्द घटती देखी होंगी. उस पृष्ठभूमि में जब आम मुसलमान ऊहापोह से भरे थे, ये बात गरम की गई कि हर मुसलमान पाकिस्तान जाना चाहता है. ऐसे ही मुद्दों को आवाज देने वाले इस उपन्यास के साथ साथ इसकी भाषा भी चर्चा में रही, जो उस समय के हिसाब से काफी ‘बोल्ड’ थी. जिसे लेकर काफी ऊंगलियां उठाई गई थीं. उपन्यास में इस्तेमाल की गई गालियों को लेकर बाद में राही मासूम रजा ने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि उन्होंने अपने पात्रों की भाषा वही रखी है जो वो बोलते हैं.

आपको बहुत सारे लोग ऐसे भी मिल जाएंगे जिनके सामने इस उपन्यास का नाम लीजिए तो वो उपन्यास के पन्ने याद दिला देंगे. मसलन- जब बाबर के राममंदिर गिराने की बात आई तो क्या हुआ या जब मुसलमान गांव छोड़कर जा रहे थे तो ठाकुरों ने क्या कहा. इस उपन्यास के अलावा भी राही मासूम रजा ने करीब आधा दर्जन उपन्यास और लिखे. जिन पर आधा गांव की लोकप्रियता भारी पड़ी और इसी उपन्यास को उनके सिग्नेचर उपन्यास के तौर पर देखा, पढ़ा और जाना गया. राही मासूम रजा के अन्य उपन्यासों में दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और कटरा बी आरजू चर्चित रहे हैं.

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आधागांव के बाद

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राही मासूम रजा के लिए साठ का दशक आधा गांव के लिए था तो सत्तर के दशक में उन्होंने कई कामयाब फिल्मों के लिए लिखा. 1977 में रिलीज फिल्म आलाप में उन्होंने कहानी और गाने लिखे. एक साल बाद ही उनकी लिखी फिल्म गोलमाल आई. जिसकी लोकप्रियता के बारे में कुछ भी लिखना कम होगा. ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी उस फिल्म के रिलीज हुए आज 40 से ज्यादा साल हो गए पर उसके एक एक सीन तक लोगों को याद हैं.

सामाजिक मुद्दे से अलग अगले ही साल उन्होंने सुभाष घई की फिल्म ‘कर्ज’ के लिए लिखा. जो ‘टिपिकल बॉलीवुड’ फिल्म थी. 80 और 90 का दशक लेखक राही मासूम रजा की लिखी कई यादगार और हिट फिल्मों का गवाह बना. इस दौरान ही छोटे परदे पर उन्होंने बीआर चोपड़ा और रवि चोपड़ा के लिए ऐतिहासिक कृति महाभारत की पटकथा लिखी.

ये वो दौर था जब रामायण की लोकप्रियता का फायदा सीरियल महाभारत को मिला. हिंदुस्तान के शहर-शहर, गांव-गांव में इस सीरियल को लोगों ने देखा और राही मासूम रजा के कलम की एक और तस्वीर सभी के सामने आई. 90 के दशक में लोगों ने राही मासूम रजा के कलम से निकली कहानी पर बना सीरियल ‘नीम का पेड़’ देखा. पंकज कपूर के अभिनय और जगजीत सिंह के गाए ‘टाइटिल गीत’ ने उस सीरियल की लोकप्रियता को बुलंदी तक पहुंचाया. ‘मुंह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन, आवाजों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन’ ये बोल मरहूम शायर निदा फाजली के लिखे हुए थे.

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राही मासूम रजा हिंदुस्तानी लेखकों की जमात के उन चंद लोगों में से रहे जिन्हें साहित्य के साथ साथ टीवी स्क्रीन के लेखन में भी खूब सराहना मिली. ऐसे लेखकों में कमलेश्वर और मनोहर श्याम जोशी की याद आती है. कमलेश्वर ने भी हिंदी साहित्य को कितने पाकिस्तान जैसी रचना दी तो टीवी स्क्रीन को चंद्रकांता, युग जैसे धारावाहिक और ‘आंधी’, ‘पति पत्नी और वो’ जैसी फिल्में. मनोहर श्याम जोशी को भी कसप, कुरू कुरू स्वाहा, हमजात जैसी रचनाओं के अलावा हम लोग, बुनियाद,  कक्का जी कहिन और मुंगेरी लाल के हसीन सपने जैसे सीरियल की वजह से भी जाना गया.

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दिलचस्प बात ये है कि इन सभी का जन्म 7-8 साल के अंतराल में हुआ था और सभी के सभी लगभग एक ही काल में अपनी अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे. राही मासूम रज़ा की कलम ने हमेशा कट्टरता का विरोध किया. उन्होंने अपने देश की उस मिट्टी को दिल में समेटा जिसमें एक दूसरे के लिए प्यार था. उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर अपनी कलम से हमला किया. उनकी एक कविता इस बात की तरफ इशारा करती है वो कहां तक संदेश देना चाहते थे.

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं

और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके

कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ

मेरा भी एक संदेश है.

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है

मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको

और उस योगी से कह दो-महादेव

अब इस गंगा को वापस ले लो

यह जलील तुर्कों के बदन में गढा गया

लहू बनकर दौड़ रही है.

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