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कौन थे हिंदी फिल्म संगीत में येसुदास को नई पहचान दिलाने वाले संगीतकार

बतौर गायक राजकमल की येसुदास से अच्छी ‘अंडरस्टैंडिंग’ थी. कहा जाता है कि हिंदी फिल्मी संगीत में राजकमल के जरिए येसुदास को एक नई पहचान मिली

Updated On: Feb 18, 2018 08:01 PM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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कौन थे हिंदी फिल्म संगीत में येसुदास को नई पहचान दिलाने वाले संगीतकार

साल 1981 की बात है. निर्देशक सई परांजपे एक फिल्म का निर्देशन कर रही थीं. फिल्म का नाम था 'चश्मेबद्दूर'. बाद में यह फिल्म भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की कभी ना भुलाई जाने वाली फिल्मों में से एक साबित हुई. इस फिल्म को इससे जुड़े तमाम किस्सों की वजह से आज भी याद किया जाता है. इस फिल्म के साथ ही दीप्ति नवल और फारूख़ शेख़ की जोड़ी फिल्मी परदे पर खूब पसंद की गई.

फिल्म चश्मेबद्दूर ने सिल्वर जुबिली मनाई. इस फिल्म में दीप्ति नवल ने वॉशिंग पाउडर बेचने वाली एक सेल्स गर्ल का रोल निभाया था. उस वॉशिंग पाउडर का नाम था 'चमको'. उनका यह रोल लोगों ने इतना पसंद किया कि काफी समय बाद तक जब लोग उनका ऑटोग्राफ लेते थे तो कहते थे कि ऑटोग्राफ के नीचे 'मिस चमको' लिख दीजिए. खैर, फिल्म में सई परांजपे ने उस दौर के किसी भी बड़े नामी गिरामी व्यक्ति को नहीं जोड़ा था. कलाकार से लेकर संगीत निर्देशक तक हर कोई सामान्य नाम वाला ही था. बावजूद इसके उनकी इस फिल्म को अपार कामयाबी मिली थी.

deepti naval

दीप्ति नवल

इस फिल्म के लिए सई परांजपे ने संगीत बनाने की जिम्मेदारी राजकमल को दी थी. राजकमल ने उस वक्त तक ‘सावन को आने दो’ जैसी लोकप्रिय फिल्म का संगीत दिया था. बतौर गायक राजकमल की येसुदास से अच्छी ‘अंडरस्टैंडिंग’ थी. ‘सावन को आने दो’ के कई गाने भी उन्होंने येसुदास से ही गवाए थे. यह भी कहा जाता है कि हिंदी फिल्मी संगीत में राजकमल के जरिए येसुदास को एक नई पहचान मिली. ऐसे में जब फिल्म चश्मेबद्दूर के लिए राजकमल ने संगीत तैयार किया तो उसमें भी उन्होंने येसुदास से गाने गवाए. इसी फिल्म का एक गाना आपको सुनाते हैं जो बेहद हिट हुआ. वैसे कुछ लोग इस गाने को राग मधमात सारंग की जमीन पर भी मानते हैं लेकिन ज्यादातर कलाकारों ने इसे राग मेघ की जमीन पर तैयार किया गया गाना माना है.

इस गाने को येसुदास के साथ हेमंती शुक्ला ने गाया था. यूं तो हेमंती बंगाली गायिका थीं लेकिन उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी कुछ गिने-चुने गाने गाए थे. ‘कहां से आए बदरा’ ऐसा ही एक गाना है. फिल्म में इस गाने की पृष्ठभूमि भी कमाल की है. फिल्म चश्मेबद्दूर में फारूख़ शेख़ और दीप्ति नवल को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. यह गाना फिल्म में तब रखा गया है जब किसी गलतफहमी की वजह से फारूख़ शेख़ और दीप्ति नवल एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं. दीप्ति नवल फिल्म में शास्त्रीय संगीत सीखने वाली एक स्टूडेंट भी हैं. वो फिल्म में सरगम संगीत विद्यालय नाम की संस्था में बाकायदा शास्त्रीय संगीत सीख रही हैं. अभिनेता फारुख़ शेख़ के साथ बातचीत में वो बताती भी हैं कि उन्होंने नया राग सीखा है.

छोटे परदे के बड़े अभिनेता विनोद नागपाल ने दीप्ति नवल के संगीत गुरू का रोल किया है. जाहिर है इस फिल्म की मांग थी कि इसमें शास्त्रीय संगीत पर आधारित गाने डाले जाएं. संगीत निर्देशक राजकमल ने फिल्म में दो गाने शास्त्रीय रागों की जमीन पर तैयार किए. दोनों ही गाने येसुदास और हेमंती शुक्ला ने गाए थे. जिसमें से एक गाना ‘कहां से आए बदरा’ हम आपको सुना चुके हैं. जिसे राजकमल ने राग मेघ की जमीन पर तैयार किया था.

हम आज राग मेघ की ही बात करेंगे लेकिन चूंकि किस्सा निकला है तो आपको बता दें कि इस फिल्म का एक और गाना ‘काली घोड़ी द्वार खड़ी’ को संगीत निर्देशक राजकमल ने राग काफी के आधार पर तैयार किया था. आपको वो गाना भी सुनाते हैं उसके बाद अपना आज का राग मेघ.

राग मेघ फिल्मी दुनिया में ज्यादा प्रचलित रागों में नहीं है. इस राग के आधार पर हिंदी फिल्मों में बहुत गिने-चुने गाने ही मिलते हैं. कुछ गजलें जरूर हैं जो इस राग के आधार पर कंपोज की गई हैं. आपको उस्ताद मेहंदी हसन और गुलाम अली खान की गाई ग़ज़लें सुनाते हैं जो राग मेघ पर ही कंपोज की गई हैं. गुलाम अली ख़ान की गजल आगा बिस्मिल की लिखी हुई है, जिसे वो अपनी पसंदीदा ग़ज़लों में शुमार करते हैं. ‘महफिल में बार बार किसी पर नजर गई’ गुलाम अली की गाई यह ग़ज़ल भी सुनिए.

आइए अब आपको राग मेघ के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. राग मेघ काफी थाट का राग है. जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इस राग का बारिश से गहरा रिश्ता है. इस राग का वादी स्वर स और संवादी स्वर प होता है. वादी संवादी स्वर के बारे में हम आपको बता चुके हैं कि किसी भी राग में वादी और संवादी स्वर की अहमियत वही होती है जो शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर की होती है. आइए अब आपको राग मेघ का आरोह-अवरोह बताते हैं. आरोह - सा म रे म प नि नि सां अवरोह - सां नि प म रे, ग म रे सा

अपने इस कॉलम में हम आपको हमेशा एक शास्त्रीय राग की कहानी सुनाते हैं. उसके शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं और साथ-साथ दुनिया भर में मशहूर उन कलाकारों के वीडियो क्लिप दिखाते हैं जिन्होंने उस राग को गाया और बजाया है. आपको पद्मभूषण से सम्मानित बनारस घराने के शास्त्रीय गायक पंडित राजन साजन मिश्र का गाया राग मेघ सुनाते हैं. इस क्लिप में उनके साथ पंडित धर्मनाथ मिश्र हारमोनियम पर और जाने माने तबला वादक पंडित कुमार बोस संगत कर रहे हैं.

शास्त्रीय अदायगी में दूसरा वीडियो हम आपको रामपुर सहसवां घराने के दिग्गज कलाकार उस्ताद राशिद ख़ान का गाया राग मेघ सुनाते हैं.

आज के राग की कहानी को खत्म करें इससे पहले आपको संतूर के विश्वविख्यात कलाकार पंडित शिव कुमार शर्मा का बजाया राग मेघ सुनाते हैं। संतूर को पूरी दुनिया में एक अलग पहचान दिलाने के लिए पंडित शिव कुमार शर्मा को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया है। आप ये भी जान लें कि पंडित शिव कुमार शर्मा जाने माने बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ मिलकर कई लाजवाब हिंदी फिल्मों का संगीत भी दे चुके हैं। इस जोड़ी को फिल्मी दुनिया में शिव-हरि के नाम से जाना जाता था। जिन्होंने कभी कभी, सिलसिला, लम्हें जैसी यश चोपड़ा की कभी ना भुलाई जाने वाली फिल्मों का संगीत दिया है।

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