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क्या है बतौर अभिनेता शम्मी कपूर की पहली फिल्म के संगीत के बनने की कहानी?

राग मुल्तानी का फिल्मी संगीत में कम ही इस्तेमाल हुआ है. बावजूद इसके दिग्गज संगीतकार नौशाद साहब के संगीत में लोकसंगीत के साथ-साथ शुद्ध शास्त्रीय संगीत की बड़ी छाप देखने को मिलती है

Updated On: May 06, 2018 09:13 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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क्या है बतौर अभिनेता शम्मी कपूर की पहली फिल्म के संगीत के बनने की कहानी?
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साल 1953 की बात है. डायरेक्टर महेश कौल एक फिल्म बना रहे थे. फिल्म का टाइटल था- जीवन ज्योति. पचास के दशक में महेश कौल हिंदी फिल्मी दुनिया के सशक्त नाम बन चुके थे. यह अलग बात है कि उन्होंने अपना फिल्मी सफर गीतकार और डायलॉग लेखक के तौर पर किया था. बाद में वो एक्टिंग और डायरेक्शन दोनों किया करते थे. चालीस के दशक में उन्होंने अशोक कुमार के साथ फिल्मों में अभिनय भी किया था. बाद में उन्होंने जाने-माने निर्माता-निर्देशक और अभिनेता गुरूदत्त के साथ भी काम किया था.

खैर, जीवन ज्योति के पहले महेश कौल को उनकी फिल्म नौजवान के लिए काफी तारीफ मिली थी. इस फिल्म में नलिनी जयवंत और प्रेमनाथ ने अभिनय किया था. फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने तैयार किया था. इस फिल्म में एक गीत ऐसा था जो बताते ही आप उसे गुनगुनाना शुरू कर देंगे. आइए पहले आपको बर्मन दा का बनाया वो गाना सुनाते हैं, उसके बाद महेश कौल की फिल्म, उसके संगीत और आज के राग की तरफ रूख करेंगे.

इस गीत की कामयाबी के बाद फिल्म जीवन ज्योति के लिए महेश कौल और सचिन देव बर्मन यानी एस डी दादा एक साथ काम कर रहे थे. जीवन ज्योति के लिए ‘स्टारकास्ट’ चुनते वक्त की एक और कहानी बेहद दिलचस्प है. दरअसल यह उस जमाने के हरदिल अजीज अभिनेता शम्मी कपूर की पहली फिल्म थी. शम्मी कपूर के अभिनय का अंदाज ऐसा था कि उन्हें हर उम्र के लोग पसंद करते थे. फिल्म जीवन ज्योति के लिए एक गाना तय हुआ, जिसके बोल थे- लग गई अखियां ओ मेरे बालम.

इस गीत को गीता दत्त और मोहम्मद रफी को गाना था. गाना मौज-मस्ती वाला था. इस गाने की ‘फिल्मांकन’ भी मौज-मस्ती वाली ही थी. कुछ-कुछ नौटंकी के अंदाज वाली. यह एसडी बर्मन की काबिलियत ही थी कि उन्होंने इस गाने को शुद्ध शास्त्रीय राग मुल्तानी की जमीन पर तैयार किया. अमूमन फिल्मी संगीत में इस राग का इस्तेमाल कम ही संगीत निर्देशक करते थे. लेकिन एक बार गाना तैयार हुआ तो सभी को बहुत पसंद आया. दरअसल बर्मन दादा ने बड़ी ही खूबसूरती से मुल्तानी के सुरों को दादरा ताल में बैठा दिया था. आप भी इस गाने को सुनिए.

जैसा कि हमने आपको बताया कि राग मुल्तानी का इस्तेमाल फिल्मी संगीत में कम ही हुआ है. बावजूद इसके कुछ उदाहरण मिल जाते हैं. ऐसा ही एक उदाहरण दिग्गज संगीतकार नौशाद साहब का है. नौशाद साहब के संगीत में भी लोकसंगीत के साथ-साथ शुद्ध शास्त्रीय संगीत की बड़ी छाप देखने को मिलती है. यह साल 1954 की बात है. डायरेक्टर एम सादिक फिल्म बना रहे थे- शबाब. इस फिल्म में भारत भूषण और नूतन ने अभिनय किया था.

नौशाद साहब उस्ताद अमीर खां के बड़े मुरीद थे. उनकी हर वक्त कोशिश रहती थी कि वो बड़े-बड़े शास्त्रीय गायकों से फिल्मी गाने भी गवाएं. जिसके कई किस्से बड़े मशहूर हैं और हम आपको इसी कॉलम में सुना भी चुके हैं. खैर, नौशाद साहब ने इस फिल्म के एक गाने के लिए अमीर खां साहब को तैयार कर लिया. अमीर खां साहब ने वो गाना गाया था, हालांकि वो फिल्मी गाना कम और तीन ताल में निबद्ध मुल्तानी की बंदिश ज्यादा है. आप भी इस बंदिश को सुनिए. इसके बोल हैं- दया कर हे गिरिधर गोपाल.

आइए अब आपको राग मुल्तानी के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. राग मुल्तानी शुद्ध शास्त्रीय गायकी वाला राग है. इसका इस्तेमाल लाइट म्यूज़िक में बहुत ही कम मिलता है. राग मुल्तानी की उत्पत्ति तोड़ी थाट से मानी गई है. इसमें ‘रे’ ‘ग’ ‘ध’ स्वर कोमल लगते हैं और मध्यम तीव्र लगता है. वादी स्वर पंचम है, संवादी षडज है. वादी और संवादी स्वर के बारे में हम आपको बताते रहे हैं कि इन स्वरों को किसी भी शास्त्रीय राग में बड़ा महत्व होता है. बिल्कुल वैसा ही जैसे शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर का. राग मुल्तानी के आरोह में ‘रे’ और ‘ध’ नहीं लगते लेकिन अवरोह में सातों स्वर लगते हैं, इसलिए इसकी जाति है औडव-संपूर्ण. राग मुल्तानी को गाने का समय है दिन का चौथा पहर है. आइए आपको राग मुल्तानी का आरोह अवरोह बताते हैं.

आरोह- ऩि सा म॑ ग म॑ प, नि सां अवरोह- सां नि ध प, म॑ ग म॑ ग, रे सा पकड़- ऩि सा म॑ ग s म॑ प, म॑ ग म॑ s ग रे सा

मुल्तानी राग की चाल थोड़ी वक्र है. आम तौर पर इसमें आलाप और तान मंद्र निषाद से शुरू करते हैं. ऩी और सा के बाद कोमल गंधार पर जाने के लिए म॑ का कण लेकर आते हैं. यह राग मंद्र, मध्य और तार तीनों सप्तकों में गाया जाता है. इस राग में विलंबित खयाल, द्रुत खयाल, ध्रुपद और तराना गाए जाते हैं. राग मुल्तानी के बारे में और विस्तार से जानने के लिए आप राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी का तैयार किया गया यह वीडियो भी देख सकते हैं.

इस कॉलम में हम हमेशा किसी भी राग पर आधारित फिल्मी गानों और उसके शास्त्रीय पक्ष को बताने के बाद आपको कुछ विश्वविख्यात कलाकारों का वीडियो दिखाते हैं. यह वीडियो देखकर आप इस बात का भी अंदाजा लगा सकते हैं कि किसी भी शास्त्रीय राग को जब पूरी गंभीरता के साथ शास्त्रीय गायक मंच पर प्रस्तुत करते हैं तो माहौल कितना अलग होता है. आज हम राग मुल्तानी की बात कर रहे हैं, इसलिए आपको दो बड़े कलाकारों का गाया राग मुल्तानी सुनाते हैं. पहला वीडियो पंडित भीमसेन जोशी का है. पंडित भीमसेन जोशी किराना घराने के प्रतिष्ठित कलाकार थे. उन्हें 'भारत रत्न' से भी सम्मानित किया गया था. दूसरा वीडियो बेहद प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक पंडित उल्हास कशालकर का है.

गायकी के बाद वादन पक्ष को समझने के लिए हम आपको दिखाते हैं रूद्रवीणा के विश्व भर में सम्मानित कलाकार उस्ताद असद अली खान का बजाया राग मुल्तानी. उस्ताद असद अली खान को भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था.

आज की राग की कहानी यहीं तक. अगले हफ्ते एक और नए राग के साथ आपसे मुलाकात होगी.

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