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क्या है उस गाने की कहानी जिसके साथ मुकेश ने शुरू किया था अपना करियर?

कुंदन लाल सहगल मुकेश को बहुत प्यार करते थे. यही वजह थी कि मुकेश ने जब हिंदी फिल्मों में गाना शुरू किया तो वो के एल सहगल की नकल किया करते थे

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Apr 22, 2018 09:27 AM IST

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क्या है उस गाने की कहानी जिसके साथ मुकेश ने शुरू किया था अपना करियर?

आज रागदारी की कहानी एक ऐसे महान गायक अभिनेता से जुड़ी हुई है जिनका हाल ही में जन्मदिन भी था. हमने फ़र्स्टपोस्ट पर आपको उस विराट कलाकार की जिंदगी के छुए-अनछुए पहलुओं से वाकिफ भी कराया था. हम बात कर रहे हैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के शुरूआती सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल की. यह के एल सहगल की काबिलियत, उनकी शख्सियत और दीवानगी ही थी कि उस दौर में हर कोई उनका मुरीद था. नौशाद साहब से लेकर लता मंगेशकर तक. लता मंगेशकर तो अपनी बचत के पैसों को जोड़-जोड़ कर खरीदा रेडियो इसलिए वापस कर आई थीं क्योंकि उस रेडियो पर उन्हें सबसे पहले सहगल साहब की मौत की खबर मिली थी.

कुंदन लाल सहगल मुकेश को बहुत प्यार करते थे. यही वजह थी कि मुकेश ने जब हिंदी फिल्मों में गाना शुरू किया तो वो के एल सहगल की नकल किया करते थे. 1945 में रिलीज फिल्म पहली नजर से मुकेश ने अपने प्लेबैक गायकी का करियर शुरू किया था. उस फिल्म में संगीत अनिल बिस्वास का था. अनिल बिस्वास ने गीतकार आह सीतापुरी के लिखे गीत ‘दिल जलता है तो जलने दे’ के लिए मुकेश को मौका दिया. मुकेश का गाया वो गीत आप भी सुनिए, यह फर्क करना मुश्किल है कि गाना मुकेश ने गाया है या के एल सहगल ने. इस गीत को संगीतकार अनिल बिस्वास ने हिंदी फिल्मों में बेहद लोकप्रिय शास्त्रीय राग दरबारी कांहड़ा पर आधारित रखा था.

इस गाने के अलावा भी मुकेश के शुरुआती करियर का बड़ा समय के एल सहगल की गायकी की छांव में ही बीता. मुकेश दर्द भरे नगमों के लिए संगीतकारों की पसंद बनते जा रहे थे. के एल सहगल की भी पहचान ऐसी ही थी. ऐसे में मुकेश भी चाहे अनचाहे खुद को सहगल की ‘स्टाइल’ से बाहर नहीं निकाल पा रहे थे. मुकेश को तोहफे में दिया गया सहगल साहब का हारमोनियम एक तरह से उन्हें अपना उत्तराधिकारी बताना भी था.

1951 में रिलीज हुई बेहद लोकप्रिय फिल्म- आवारा का यह गीत सुनिए. यह गीत राज कपूर पर फिल्माया गया था. इसके संगीतकार शंकर जयकिशन थे, राग दरबारी कांहडा ही था. और मुकेश की गायकी का अंदाज भी सहगल साहब की तरह ही था.  

दरअसल, दरबारी कांहड़ा एक ऐसा राग है जिसे संगीतकारों ने जमकर इस्तेमाल किया है. हिंदी फिल्मों में दर्जनों गाने होंगे जो इसी राग को आधार बनाकर कंपोज किए गए. 1960 में रिलीज ऐतिहासिक फिल्म मुगल-ए-आजम का सुपरहिट गाना 'मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए' भी इसी राग पर आधारित था. इसका संगीत नौशाद ने तैयार किया था. 1964 में रिलीज हुई फिल्म- आप की परछाईयां में संगीतकार मदन मोहन का संगीतबद्ध गाना 'अगर मुझसे मोहब्बत है, मुझे सब अपने गम दे दो', अगले साल यानी 1965 में रिलीज फिल्म- एक संपेरा, एक लुटेरा का 'हम तुमसे जुदा होके मर जाएंगे रो-रोके', कल्याण जी आनंद जी के संगीत निर्देशन में 1969 में रिलीज फिल्म-विश्वास का गाना 'चांदी की दीवार ना तोड़ी', 1982 में रिलीज फिल्म- नमक हलाल का गाना 'पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी', भी इसी राग पर आधारित था. इस अलग तरह के गाने को लोकप्रिय संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने कंपोज किया था. बाद में 1991 में नदीम श्रवण के संगीत निर्देशन में रिलीज फिल्म- साजन का 'देखा है पहली बार साजन की आंखों में प्यार', भी राग दरबारी कांहडा पर आधारित था. आइए इसमें से कुछ गाने आपको भी सुनाते हैं.

तमाम हिंदी फिल्मों के अलावा गुलाम अली की जानी-मानी गजल 'हंगामा क्यों है बरपा', भी इसी राग में कंपोज की गई है.

आइए अब आपको राग दरबारी कांहडा के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. इस राग की रचना आसावरी थाट से मानी गई है. राग दरबारी कांहडा में ‘ग’ ‘ध’ और ‘नी’ हमेशा कोमल लगते हैं. इस राग की जाति वक्र संपूर्ण होती है. इस राग को गाने बजाने का समय मध्य रात्रि है. राग दरबारी कांहडा में वादी स्वर ‘रे’ और संवादी स्वर ‘प’ है. हम लगातार आपको यह बताते आए हैं कि किसी भी राग में वादी और संवादी स्वर का वही महत्व होता है जो शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर का होता है. इन्हीं स्वरों के प्रयोग से कलाकार राग को दिखाता है.

ऐसा माना जाता है कि कर्नाट राग का नाम ही बाद में बनते बिगड़ते कांहडा हो गया. इस राग के बारे में एक किस्सा यह भी मशहूर है एक बार तानसेन ने यह राग सम्राट अकबर को सुनाया. अकबर को यह राग बहुत पसंद आया. उन्होंने इसे तानसेन से कई बार सुना. तब तक इस राग को कर्नाट राग ही कहा जाता था लेकिन उस रोज से इसका नाम राग दरबारी कांहडा पड़ गया. कांहडा के 18 प्रकार शास्त्रीय संगीत में गाए बजाए जाते हैं, जिन सभी का आधार राग दरबारी कांहडा ही है. आइए अब आपको इस राग का आरोह अवरोह बताते हैं।

आरोह- सा, रे (म) S म रे सा, म प, (नी) ध (नी) सां

अवरोह- सां S नी प, म प (म) म रे सा

इस राग की बारीकियों को समझने के लिए आप एनसीईआरटी का यह वीडियो देख सकते हैं, जिसमें राग दरबारी कांहडा के बारे में विस्तार से बताया गया है.

राग दरबारी कांहडा शास्त्रीय कलाकारों का भी पसंदीदा राग रहा है. किसी भी राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझाने के लिए हम हमेशा आपको ऐसे वीडियो दिखाते हैं जो विश्वविख्यात कलाकारों की प्रस्तुतियां होती हैं. आज आपको ग्वालियर घराने के बेहद सम्मानीय कलाकार पंडित डीवी पलुस्कर का गाया राग दरबारी कांहडा सुनाते हैं.

वादन की दुनिया में भारत ने एक से बढ़कर एक कलाकार संगीत को दिए हैं. ऐसे कलाकार जिन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक अलग पहचान दिलाई है. राग दरबारी कांहडा को हम आपको दो ऐसे कलाकारों के वाद्ययंत्रों के जरिए सुनाते हैं जिन्हें पूरी दुनिया में अपने संगीत के दम पर बहुत प्यार और सम्मान हासिल हुआ है. आइए सुनते हैं सितार सम्राट उस्ताद विलायत खान और सरोद के विख्यात कलाकार उस्ताद अली अकबर खा का बजाया राग दरबारी कांहडा.

आज की राग की कहानी में इतना ही। अगले रविवार एक नया राग और उसकी कई कहानियां लेकर हाजिर होंगे।

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