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रफी की गायकी, नौशाद का संगीत और दिलीप कुमार का अभिनय... एक बेहतरीन गाने की अनसुनी कहानी

कारदार साहब को तमाम ऐसे फनकारों को फिल्म इंडस्ट्री में मौका देने का श्रेय जाता है जिन्होंने बहुत नाम कमाया. इसमें महान संगीतकार नौशाद, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और कलाकार सुरैया का नाम लिया जाता है

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Nov 19, 2017 09:38 AM IST

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रफी की गायकी, नौशाद का संगीत और दिलीप कुमार का अभिनय... एक बेहतरीन गाने की अनसुनी कहानी

अब्दुल रशीद कारदार हिंदी सिनेमा की बड़ी शख्सियतों में से एक थे. आजादी के पहले पाकिस्तान के सिनेमा को स्थापित करने में भी उनका बड़ा रोल था. उन्हें ए आर कारदार के नाम से ज्यादा मशहूरियत मिली.

दरअसल, कारदार साहब कैलीग्राफी करते थे. दुनिया की तमाम बड़ी फिल्मों के पोस्टर उन्होंने तैयार किए थे. जाहिर है अपनी इस कला की वजह से वो आए दिन बड़े-बड़े फिल्मकारों से मिलते रहते थे. उनका एक और परिचय यह भी है कि वो पाकिस्तान के महान क्रिकेटर ए एच कारदार के सौतेले भाई भी थे. खैर, 1930 में कोलकाता आने के बाद 30 और 40 के दशक में वो पूरी तरह फिल्म निर्माण से जुड़ गए थे.

कारदार साहब को तमाम ऐसे फनकारों को फिल्म इंडस्ट्री में मौका देने का श्रेय जाता है जिन्होंने बाद में बहुत नाम कमाया. इसमें महान संगीतकार नौशाद, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और कलाकार सुरैया का नाम लिया जाता है. कहा तो यह भी जाता है कि मोहम्मद रफी को पहली बार जिस गाने के लिए सबसे ज्यादा सराहा गया वो गाना भी कारदार साहब की फिल्म-दुलारी का था. वो गाना था- सुहानी रात ढल चुकी. इस तरह रफी साहब की लोकप्रियता में भी उनका बड़ा रोल रहा.

साल 1966 की बात है, ए आर कारदार एक फिल्म बना रहे थे- दिल दिया दर्द लिया. इस फिल्म में उन्होंने दिलीप कुमार और वहीदा रहमान को बतौर हीरो-हीरोईन लिया था. दिलीप कुमार इससे पहले अपनी ‘ट्रेजेडी किंग’ की इमेज से बाहर आने के लिए कुछ हल्की-फुल्की फिल्में भी कर चुके थे. ऐसे में इस फिल्म में उनके लिए एक गाना खास तौर पर तैयार किया गया. गीतकार थे शकील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद.

इस गाने में दिलीप कुमार ने अपने जाने-पहचाने और बेहद लोकप्रिय ‘ट्रेजेडी किंग’ के ‘लुक’ और अभिनय से इस गाने को जबरदस्त हिट करा दिया. असल में फिल्म के शौकीन उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ के तौर पर पसंद भी बहुत करते थे. आपको वो गाना सुनाते हैं उसके बाद कहानी को आगे बढ़ाएंगे.

इस गाने की शुरूआत में हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर और दिलीप कुमार के बीच का संवाद उनकी अभिनय क्षमता को दिखाता है. वैसे इस गाने की कहानी को आगे बढ़ाने से पहले यह बताते चलें कि इस फिल्म में दिलीप कुमार कारदार साहब के साथ सह-निर्देशक यानी को-डायरेक्टर भी थे लेकिन ऐसी चर्चा है कि इस बात को कम ही प्रचारित प्रसारित किया गया. खैर, कोई ‘सागर दिल को बहलाता नहीं’ गाने को लिखते और कंपोज करते वक्त हर किसी के दिमाग में दिलीप कुमार थे, लिहाजा संगीतकार नौशाद ने इस गाने के लिए एक ऐसी राग को आधार बनाया जो ऐसे संजीदा गानों पर पहले कम ही इस्तेमाल हुई थी. वो राग थी- कलावती.

इस गाने के बीच-बीच में एक और राग जनसम्मोहिनी का असर भी दिखाई देता है. फिल्मी गानों के इतिहास में इस राग पर कई जानी-मानी कव्वालियां कंपोज की गई थीं, लेकिन इतना संजीदा गाना बनाना अपने आप में एक अलग ही प्रयोग था. जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. इससे पहले राग कलावती का कव्वालियों में काफी इस्तेमाल हुआ था. साल 1960 में ही रिलीज फिल्म बरसात की रात में इसी राग को संगीतकार रोशन ने बड़ी ही खूबसूरती से एक कव्वाली में इस्तेमाल किया. कव्वाली के बोल थे- ना तो कारवां की तलाश है.

इस कव्वाली को मोहम्मद रफी, मन्ना डे, आशा भोंसले समेत कई अन्य कलाकारों ने गाया था. जो आज भी हिंदी फिल्म इतिहास की बेहतरीन कव्वालियों में से एक हैं. इसके बाद 1970 में आई फिल्म खिलौना की एक कव्वाली भी बहुत पसंद की गई. इसके बोल थे- सनम तू बेवफा के नाम से मशहूर हो जाए. इस बार भी कव्वाली का आधार राग कलावती ही थी, संगीतकार थे- लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और गायिका- लता मंगेशकर.

एक और कव्वाली का जिक्र करना यहां बहुत जरूरी है. 1977 में रिलीज फिल्म हम किसी से कम नहीं में संगीतकार आर डी बर्मन ने ‘है अगर दुश्मन-दुश्मन जमाना गम नहीं’ जैसी लोकप्रिय कव्वाली कंपोज की थी, जिसे आशा भोंसले और मोहम्मद रफी ने गाया था. आइए आपको कुछ कव्वालियां सुनाते हैं.

राग कलावती के आधार पर इसके अलावा और भी हिंदी फिल्मों के गाने कंपोज किए गए. जिसमें 1962 में रिलीज फिल्म दरवाजा का ‘पिया नहीं आए’, 1964 में रिलीज फिल्म चित्रलेखा का ‘काहे तरसाए जियरा’ काफी लोकप्रिय हुआ था. इस गाने को उषा मंगेशकर और आशा भोंसले ने गाया था. संगीतकार थे रोशन. फिल्म सुर संगम (1985) का गाना 'मायका पिया बुलावे' भी इसी फेहरिस्त में शामिल है. नए जमाने के संगीतकारों में ए आर रहमान ने इस राग को आधार बनाकर फिल्म स्वदेश में एक गाना कंपोज किया था. 2004 में रिलीज हुई फिल्म स्वदेश में ‘ये तारा वो तारा’ गाना राग कलावती पर ही आधारित था, जिसे उदित नारायण ने गाया था. आइए इसमें से भी कुछ गाने आपको सुनाते हैं.

एक और दिलचस्प वीडियो देखिए जिसमें जाने-माने गायक सुरेश वाडेकर ने राग कलावती को आधार बनाकर हनुमान चालीसा गाई है. साथ ही आपको एक और वीडियो दिखाते हैं जिसमें उस्ताद नुसरत फतेह अली खान भी राग कलावती में ‘तन-मन-धन’ नाम की कंपोजीशन गा रहे हैं.

आइए अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. राग कलावती खमाज थाट का राग है. इस राग में ‘ग’ वादी और ‘ध’ संवादी स्वर हैं. इस राग में ‘रे’ और ‘म’ नहीं लगता है इसलिए इस राग की जाति औडव-औडव है. राग कलावती को गाने बजाने का समय रात का दूसरा पहर है. आइए इस राग का आरोह-अवरोह और मुख्य स्वर समूह को जान लेते हैं.

आरोह- सा, ग, प, ध, नी, ध, सां अवरोह- सां, नी, ध प, ग, सा मुख्य स्वर- ग प ध नी ध प ग सा

राग के शास्त्रीय पक्ष को जानने के बाद आइए आपको दिखाते हैं कि शास्त्रीय संगीत के विश्व विख्यात कलाकारों ने इस राग को कैसे निभाया है. प्रभा आत्रे का गाया राग कलावती सुनिए. साथ ही सुनिए संतूर के विश्व विख्यात कलाकार पंडित शिव कुमार शर्मा का बजाया राग कलावती.

अगली बार एक और नई राग और उसकी कहानियों के साथ हाजिर होंगे.

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