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किस राग को सुनाने की फरमाइश पर भर आई थीं शुभा मुद्गल की आंखें?

मुद्गल जब मैहर के स्टेशन पहुंची तो वहां उन्हें रिसीव करने के लिए आयोजकों की तरफ से कोई नहीं आया था, रात के करीब नौ बज रहे थे, ट्रेन से उतरने वालों में सिर्फ शायद शुभा मुद्गल ही थीं

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Nov 26, 2017 11:21 AM IST

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किस राग को सुनाने की फरमाइश पर भर आई थीं शुभा मुद्गल की आंखें?

साल 1990 के आस पास की बात है. जानी मानी शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल को एक कार्यक्रम के लिए मैहर जाना था. मैहर मध्यप्रदेश में है. वहां हर साल एक संगीत समारोह हुआ करता था. पूरी दुनिया में मैहर की एक बहुत बड़ी पहचान जाने माने सरोद वादक उस्ताद अलाउद्दीन खान हैं. शुभा मुद्गल की इस कहानी को आगे बढ़ाए इससे पहले आपको बताते चलें कि बाबा के नाम से मशहूर उस्ताद अलाउद्दीन खान ने ही मैहर घराने की नींव रखी थी.

1971 में पद्मविभूषण से सम्मानित उस्ताद अलाउद्दीन खान सरोद वादक अली अकबर खान और अन्नपूर्णा देवी के पिता थे. उनके शिष्यों में पंडित रविशंकर, पन्नालाल घोष और निखिल बनर्जी जैसे विश्वविख्यात कलाकारों का नाम शामिल है. आज के राग की चर्चा करें उससे पहले आपको मैहर और बाबा अलाउद्दीन खान के रिश्तों पर फिल्म डिविजन की बनाई एक फिल्म आपको दिखाते हैं. चलिए वापस लौटते हैं शुभा मुद्गल पर. मैहर में उनके कार्यक्रम से ठीक पहले शुभा मुद्गल का एक कार्यक्रम मुंबई में था. उन्होंने आयोजकों से बताया कि वो मुंबई से सीधा मैहर आएंगी. ये फ्लाइट और ईमेल वाला जमाना नहीं था. ज्यादातर यात्राएं ट्रेन से होती थीं और संदेशों के आदान प्रदान के लिए चिट्ठियां और तार का इस्तेमाल किया जाता था. शुभा मुद्गल ने अपनी यात्रा और ट्रेन की जानकारी आयोजकों को चिट्ठी से दे दी थी. इसके बाद भी आयोजकों से भूल हो गई.

शुभा मुद्गल जब मैहर के स्टेशन पहुंची तो वहां उन्हें ‘रिसीव’ करने के लिए आयोजकों की तरफ से कोई नहीं आया था. रात के करीब नौ बज रहे थे. स्टेशन पर कोई हलचल नहीं थी. उस ट्रेन से उतरने वालों में सिर्फ शायद शुभा मुद्गल ही थीं. उस समय तक शुभा मुद्गल की पहचान सिर्फ एक विशुद्ध शास्त्रीय गायिका के तौर पर थी.

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उन्होंने ‘अली मोरे अंगना’ या ‘अबकी सावन ऐसे बरसे’ जैसे गाने तब तक नहीं गाए थे. लिहाजा सड़क चलते हर कोई उन्हें पहचान ले ऐसा नहीं होता था. खैर, शुभा मुद्गल स्टेशन पर उतर तो गईं लेकिन आगे क्या करना है उन्हें नहीं समझ आ रहा था. उन दिनों मोबाइल का जमाना भी नहीं था. शुभा अकेले थीं तो उन्हें थोड़ा डर भी लग रहा था. तभी वहां एक कर्मचारी दिखाई दिया जो झाडूं लगा रहा था. वो खुद से ही शुभा मुद्गल के पास आए, नमस्कार किया और पूछा कि क्या वो कार्यक्रम के सिलसिले में आई हैं. शुभा मुद्गल ने इस सवाल के जवाब में हामी भरी. झाडू लगाने वाले कर्मचारी ने शुभा मुद्गल से कहा कि वो बिल्कुल निश्चिंत रहे और स्टेशन मास्टर के कमरे में बैठें इतनी देर में वो आयोजकों तक सूचना पहुंचा देंगे.

शुभा मुद्गल स्टेशन मास्टर के कमरे में बैठ गईं. इतनी देर में झाडू लगाने वाले सज्जन ने उनके लिए चाय भी मंगा दी और आयोजकों तक खबर भी भिजवा दी. शुभा मुद्गल को समझ नहीं आ रहा था कि वो सज्जन जो इतनी मदद कर रहे हैं, आतिथ्य दिखा रहे हैं उसे वे स्वीकार करें या नहीं. उनके दिमाग में ये उधेड़बुन चल ही रही थी कि आयोजकों की तरफ से कुछ लोग आ गए. उन लोगों ने अपनी सफाई में कहा कि वे ये सोचे बैठे थे कि शुभा मुदगल दिल्ली से आएंगी.

बहरहाल जब आयोजकों के साथ शुभा मुद्गल वहां से निकलने लगीं तो वो सज्जन वहीं खड़े थे. शुभा जी ने उनसे कहा कि वो उन्हें कैसे धन्यवाद दें. इसके जवाब में उस कर्मचारी ने जो कहा उससे शुभा मुद्गल की आंखों में आंसू आ गए. दरअसल, उन्होंने बड़े आदर के साथ शुभा जी के वहां आने का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि आप यहां आईं यही बड़ी बात है. बस एक गुजारिश थी कि परज बहुत दिनों से नहीं सुना है. कल वो ही सुना दीजिएगा.

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शुभा मुद्गल हक्की बक्की रह गई. वो सोचने लगीं कि उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब ने क्या काम किया होगा कि स्टेशन पर काम करने वाले का भी कहना है कि परज सुना दीजिएगा. तो चलिए राग परज की कहानी को और आगे बढ़ाने से पहले आपको राग परज सुनाते हैं. कलाकार हैं जाने माने शास्त्रीय गायक पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर

आइए अब आपको राग परज के शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. राग परज की उत्पत्ति पूर्वी थाट से मानी जाती है. इस राग में ‘रे’ और ‘ध’ दोनों स्वर कोमल लगता है. इस राग में दोनों ‘म’ यानी शुद्ध ‘म’ और तीव्र ‘म’ दोनो लगते हैं. बाकी के सभी स्वर शुद्ध इस्तेमाल किए जाते हैं. शुद्ध ‘म’ का इस्तेमाल केवल दो ‘ग’ के बीच में किया जाता है. इस राग के आरोह में ‘रे’ और ‘प’ नहीं लगता है. अवरोह में सातों स्वर प्रयोग किए जाते हैं. इस राग की जाति औडव संपूर्ण है. इस राग का वादी स्वर ‘स’ और संवादी स्वर ‘प’ है. हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि किसी भी राग में वादी और संवादी स्वर की भूमिका शतरंज के खेल में बादशाह और वजीर की भूमिका जैसी होती है. इस राग को गाने बजाने का समय रात का अंतिम पहर है. आइए आपको राग परज के आरोह अवरोह और पकड़ के बारे में बता देते हैं.

आरोह- ऩी सा ग, म(तीव्र) प ध प, म (तीव्र) ध नी सां अवरोह- सा नी ध प, म (तीव्र) प ध प, ग म ग, म (तीव्र) ग रे सा पकड़- सां, नी ध प, म (तीव्र) प ध प, ग म ग

इस राग के बारे में और विस्तार से जानने के लिए एनसीईआरटी का ये वीडियो देखिए. अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय अंदाज को दिखाते हैं. इस वीडियो में आपको विश्वविख्यात शास्त्रीय गायक पंडित वसंतराव देशपांडे की राग परज में गाई ठुमरी सुना रहे हैं, बोल हैं- लाल आए. पंडित वसंतराव देशपांडे ने शास्त्रीय गायकी के कई घरानों से संगीत की तालीम ली थी. दूसरा वीडियो उस्ताद मुश्ताक अली खान का है, जो सितार के बहुत बड़े कलाकार थे. उनका बजाया राग परज भी सुनिए.

रागदारी में अगली बार एक और राग, उस राग की कहानी के साथ आपसे मुलाकात होगी.

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