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रागदारी: किस राग में छुपा है दो महान कलाकारों की दोस्ती का राज

आज की कहानी पंडित भीमसेन जोशी के एक राग को लेकर प्यार की है. लेकिन इस कहानी का रास्ता एक सवाल के साथ शुरू होता है, क्या आप ग्वालियर के सरोद घर के बारे में जानते हैं

Updated On: Dec 17, 2017 09:23 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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रागदारी: किस राग में छुपा है दो महान कलाकारों की दोस्ती का राज

आज की कहानी पंडित भीमसेन जोशी के एक राग को लेकर प्यार की है. लेकिन इस कहानी का रास्ता एक सवाल के साथ शुरू होता है, क्या आप ग्वालियर के सरोद घर के बारे में जानते हैं? ग्वालियर का सरोद घर किसी जमाने में विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान का घर हुआ करता था.

इसी घर में उस्ताद अमजद अली खान का जन्म हुआ था. उनके बचपन का नाम माशूक अली खान हुआ करता था. बाद में एक रोज उनके यहां एक साधु आए जिन्होंने उनका नाम बदलकर अमजद कर दिया. उनका ये नया नाम अमजद अली खान भी इसी घर में रखा गया था. बाद में बहुत से लोगों ने उस घर को लेकर उस्ताद अमजद अली खान से कहा कि वे उसे होटल बना दें, गेस्ट हाउस बना दें, इससे उन्हें बहुत सारे पैसे मिल जाएंगें, लेकिन उस्ताद अमजद अली खान ने ऐसा नहीं किया.

ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि उसी घर में उस्ताद जी शिक्षा दीक्षा हुई थी. इस वीडियो में उस्ताद अमजद अली खान सरोद घर के बारे में बता रहे हैं.

आज के राग का किस्सा दरअसल इसी सरोद घर से जुड़ा हुआ है. हुआ यूं कि पंडित भीमसेन जोशी एक बार वहां गाने के लिए आए हुए थे. पंडित भीमसेन जोशी भी उस घर में रह चुके थे. उन्होंने ये बात वहां उस महफिल में सबके सामने बताई. उन्होंने बताया कि वो उस्ताद हफीज अली खान यानी उस्ताद अमजद अली खान के अब्बा से गायकी सीखा करते थे.

इस घर के प्रति और उस्ताद अमजद अली खान के प्रति स्नेह की जड़ में छुपे हुए थे कुछ राग. दरअसल, अगर आप भीमसेन जी के कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग देखेंगे तो पाएंगे कि वो ज्यादातर कार्यक्रमों में पूरिया गाते थे या फिर मारवा. यूं तो उन्होंने गायकी उस्ताद हफीज अली खान के अलावा और भी कलाकारों से सीखी थी लेकिन इन दो रागों को सिखाने का श्रेय वो हमेशा उस्ताद हफीज अली खान को दिया करते थे.

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राग पूरिया और राग मारवा मिलते जुलते सुर के राग हैं, लेकिन दोनों का ‘कैरेक्टर’ अलग-अलग है. कहते हैं कि जो शास्त्रीय संगीतकार गाने-बजाने में इन दोनों रागों के बीच फर्क कर सकता है, उसे शास्त्रीय संगीतकार माना जाना चाहिए. राग पूरिया की बात हम अपने इस कॉलम में पहले ही कर चुके हैं इसलिए आज राग मारवा की कहानी.

इस कहानी को आगे बढ़ाए इससे पहले आपको बता दें कि उस्ताद अमजद अली खान जब भी पूना जाते थे, तो पंडित भीमसेन जोशी उनका हाथ पकड़ कर उन्हें स्टेज पर ले जाते थे. सामने 25,000 लोगों की भीड़ हैं. वहां स्टेज पर जाकर भीमसेन जी कहते थे, आप लोग जानते हैं कि ये कौन है? ये मेरे गुरु भाई हैं. खैर, ये तो सिर्फ एक प्रसंग था. आइए आपको पंडित भीमसेन जोशी का गाया राग मारवा सुनाते हैं.

फिल्मी संगीत में भी राग मारवा का इस्तेमाल किया गया है. इसमें साल 1966 में रिलीज फिल्म साज और आवाज का गाना-पायलिया बावरी बाजे  इसी राग पर आधारित था. इसके अलावा साल 1970 में रिलीज फिल्म ट्रक ड्राइवर में लता मंगेशकर का गाया- कान्हा रे कान्हा तूने लाखों रास रसाए  गाना पसंद किया गया था. इसी साल रिलीज फिल्म-मेरे हमसफर का गाना मेरा परदेसी ना आया  भी राग मारवा पर ही आधारित है. इस राग के एक और रंग को संगीतकार रवींद्र जैन ने फिल्म कोतवाल साहब में दिखाया. आशा भोंसले की आवाज में गाए गए इस गीत के बोल भी रवींद्र जैन ने ही लिखे थे, साथी रे भूल ना जाना मेरा प्यार. आइए इसमें से कुछ गाने आपको सुनाते हैं.

इन गानों के अलावा इसी राग पर आधारित एक और गीत जो लता मंगेशकर का गया हुआ है वो लोगों ने काफी पसंद किया। उस गाने के बोल थे- सांझ भई घर आ जा रे...

आइए अब आपको राग मारवा के शास्त्रीय पक्ष के बारे में जानकारी देते हैं. राग मारवा की उत्पत्ति मारवा थाट से ही हुई है इसीलिए इसे मारवा थाट का आश्रय राग कहा जाता है. इस राग में कोमल ‘रे’ और तीव्र ‘म’ के अलावा सभी स्वर शुद्ध लगते हैं. इस राग में पंचम यानी ‘प’ नहीं लगाया जाता है इसलिए राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वर लगते हैं.

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ऐसे में इस राग की जाति षाढव-षाढव है. इस राग का वादी स्वर ‘रे’ है और संवादी स्वर ‘ध’ है. इस राग को गाने बजाने का समय दिन का चौथा प्रहर है. इस राग की सुंदरता ‘रे’ ‘ग’ और ‘ध’ स्वर पर आधारित है. जैसा कि हमने आपको शुरू में बताया था ये राग पूरिया के बहुत करीब है. राग सोहनी भी इस राग के करीब का राग है. इन तीनों ही रागों में मिलते जुलते स्वर लगते हैं. राग का चलन इनके अंतर को बताता है. आइए अब आपको राग मारवा के आरोह-अवरोह के बारे में भी जानकारी देते हैं.

आरोह- नी रे ग म (तीव्र) ध नी रे सां

अवरोह- रे नी ध म (तीव्र) ग रे सा

पकड़- ग म (तीव्र) ध, ध म (तीव्र) ग, रे सा

इस राग के बारे में और विस्तार से जानने के लिए एनसीईआरटी का बनाया ये वीडियो देखिए

इस कॉलम के अंत में हम आपको हमेशा राग की शास्त्रीय अदायगी के वीडियो दिखाते हैं. आज राग मारवा की बात हो रही है तो उस्ताद अमीर खां और किशोरी अमोनकर जी का गाया राग मारवा सुनाते हैं. आपको बता दें कि उस्ताद अमीर खां का ताल्लुक शास्त्रीय गायकी के इंदौर घराने से और किशोरी अमोनकर का जयपुर अतरौली घराने से ताल्लुक था. राग मारवा को यूं तो बड़े-बड़े सिद्ध गायकों ने गाया है, लेकिन उस्ताद अमीर खान का गाया राग मारवा सबसे ज्यादा मशहूर और लोकप्रिय है.

राग के वादन पक्ष के लिए आपको विश्वविख्यात सारंगी वादक पंडित राम नारायण का बजाया राग मारवा सुनाते हैं.

राग मारवा की कहानी में इतना ही, अगले हफ्ते एक नए राग के साथ फिर हाजिर होंगे.

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