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वो दुर्लभ राग जिसने हिंदी सिनेमा को कुछ बेहद मीठे गाने दिए

संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी राज कपूर के लिए संगीत तैयार करते वक्त कोई भी जोखिम लेने से नहीं चूकती थी

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Dec 03, 2017 09:17 AM IST

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वो दुर्लभ राग जिसने हिंदी सिनेमा को कुछ बेहद मीठे गाने दिए

राज कपूर को शो मैन यूं ही नहीं कहा जाता. उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक नायाब फिल्में दीं और साथ ही दी संगीतकारों की एक ऐसी जोड़ी जिसने हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में अलग ही मुकाम हासिल किया. ये जोड़ी थी शंकर जयकिशन की. शंकर हैदराबाद के रहने वाले थे, अपने शुरूआती दिनों में उन्हें तबला बजाने का शौक था जबकि जयकिशन गुजरात के थे और वो हारमोनियम बजाया करते थे. तकदीर का खेल देखिए कि जब ये दोनों कलाकार मुंबई पहुंचे तो दोनों एक ही गुजराती डायरेक्टर के पास काम की तलाश में जाते थे. इसी काम को खोजने में दोनों की दोस्ती हो गई.

शंकर उन दिनों पृथ्वी थिएटर में थोड़ा बहुत काम करते थे, उन्होंने जयकिशन को पृथ्वीराज कपूर से पूछे बिना ही साथ काम करने का न्यौता दे दिया. ये भी इत्तफाक ही था कि पृथ्वीराज कपूर ने जब जयकिशन को हारमोनियम बजाते सुना तो उन्होंने तुरंत उनके नाम पर हामी भर दी. इस तरह ये दोनों ही कलाकार पृथ्वी थिएटर में साथ साथ काम करने लगे. ऊपर वाले ने कुछ तो संयोग बनाया ही रहा होगा कि इन दोनों में गजब की दोस्ती हो गई. यहां तक कि सेट पर लोग इन्हें राम लक्ष्मण कहकर बुलाते थे.

साल 1948 जब इन दोनों संगीतकारों की किस्मत इन्हें एक अलग ही मुकाम पर ले आई. राज कपूर बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म आग बना रहे थे. फिल्म के संगीत का जिम्मा राम गांगुली पर था. इस फिल्म के दौरान ही राज कपूर फिल्म-बरसात के संगीत पर भी कुछ काम कर रहे थे. इसी बीच राज कपूर की राम गांगुली से कुछ अनबन हो गई.

गुस्साए राज कपूर ने उन्हें फिल्म बरसात में काम ना करने के लिए कह दिया. इसके बाद उन्होंने शंकर को फिल्म बरसात का संगीत तैयार करने को कहा, शंकर अपने जोड़ीदार के नाम की सिफारिश के लिए तैयार बैठे थे. राज कपूर ने जयकिशन के नाम पर हामी भी भर दी और इस तरह 1949 में आई फिल्म बरसात के साथ फिल्म इंडस्ट्री को शंकर जयकिशन नाम की एक शानदार संगीत जोड़ी मिली.

इस बेमिसाल जोड़ी के बनने की कहानी के बाद इनकी बनाई एक शानदार धुन आपको सुनाते हैं और फिर उस धुन की कहानी यानी उसके राग की कहानी.

‘ओ बसंती पवन पागल’ ये गाना 1960 में शंकर जयकिशन ने राज कपूर की बनाई फिल्म जिस देश में गंगा बहती है के लिए कंपोज किया था. शैलेंद्र के लिखे और लता मंगेशकर के गाए इस गीत ने उस दौर के फिल्म संगीत पर अपनी कमाल की छाप बना ली. इस गाने का जिक्र इसलिए जरूरी था क्योंकि इस गाने को शंकर जयकिशन ने एक बेहद दुर्लभ राग बसंत मुखारी पर कंपोज किया था. शास्त्रीय संगीत में तो फिर भी इस राग को गाने बजाने का प्रचलन है लेकिन फिल्मी संगीत में इस राग को इससे पहले शायद ही किसी संगीतकार ने छुआ हो. इसके पीछे एक बड़ी वजह थी कि इस राग का बेहद कठिन होना.

बावजूद इसके सच ये है कि राज कपूर के प्रति वो इस जोड़ी का सम्मान और प्यार था कि उनके लिए हमेशा कुछ नया करने की चाहत बनी रहती थी. वो उनके लिए किसी भी किस्म का जोखिम उठाने तक को तैयार रहते थे या यूं कहें कि उन्हें अपने काम पर जबरदस्त भरोसा था. खैर, जानकार बताते हैं कि राग बसंत मुखारी के पूर्वांग में राग भैरव होता है जबकि उत्तरांग में राग भैरवी. भैरव और भैरवी के बीच रागों का पूरा एक ‘स्पेक्ट्रम’ चलता है. जाहिर है ये राग जटिल तो है ही. फिल्मी संगीत में कुछ और गाने मिलते हैं जो इस राग को आधार बनाकर कंपोज किए गए हैं. दिलचस्प बात ये है कि जटिल राग होने के बाद भी इस राग में कंपोज किए गए सारे ही गीत बेहद लोकप्रिय हुए. जैसे 1968 में आई फिल्म मेरे हमदम मेरे दोस्त का ये गीत सुनिए, संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का है.

इसके अलावा 1962 में आई फिल्म- फिर वही दिल लाया हूं का गाना- देखो बिजली डोले और 1974 में आई फिल्म हाथ की सफाई का गाना, वादा कर ले साजना भी राग बसंत मुखारी पर आधारित है. फिल्म- फिर वही दिल लाया हूं का संगीत ओपी नैय्यर का था जबकि हाथ की सफाई का संगीत कल्याण जी आनंद जी ने दिया था. आइए इसमें से एक गीत सुनते हैं.

राग का शास्त्रीय पक्ष

आइए अब आपको हमेशा की तरह राग के शास्त्रीय पक्ष की जानकारी देते हैं. राग बसंत मुखारी भैरव थाट का राग है. इस राग में ‘रे’ ‘ध’ और ‘नी’ कोमल लगता है जबकि बाकी सभी स्वर शुद्ध लगते हैं. इस राग का वादी सुर ‘म’ और संवादी सुर ‘स’ है. इस राग को गाने बजाने का समय दिन का दूसरा पहर माना जाता है. जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि इस राग के पूर्वांग में राग भैरव और उत्तरांग में राग भैरवी का सामंजस्य है इसीलिए ये राग ना सिर्फ कठिन है बल्कि थोड़ा दुर्लभ भी है. इस बात को आसान शब्दों में आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि राग भैरव सुबह का राग है और भैरवी रात का, लिहाजा अगर एक राग में ही इन दोनों राग की छाप हो तो उसका कठिन होना लाजिमी है. आइए अब आपको इस राग का आरोह अवरोह बताते हैं. इस राग में बड़ा ख्याल और छोटा ख्याल भी गाया जाता है. आरोह- सा रे, ग म, प, ध नी सां अवरोह- सां नी ध प म, ग रे सा.

फिल्मी संगीत के मुकाबले राग बसंत मुखारी शास्त्रीय संगीत के कलाकारों में प्रचलित राग है. कलाकार भले ही मंच पर दी जाने वाली प्रस्तुतियों में कभी कभार ही इस राग को सुनाते हों लेकिन सुनाते जरूर हैं. आपको संगीत मार्तंड मेवाती घराने के विश्वविख्यात कलाकार पंडित जसराज जी का गाया राग बसंत मुखारी सुनाते हैं.

वाद्ययंत्रों में आज हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सिरमौर कलाकारों में से उस्ताद अली अकबर खान का सरोद वादन सुनिए. इस वीडियो में वो राग बसंत मुखारी बजा रहे हैं. इसी के साथ इजाजत भी दीजिए, अगले हफ्ते एक नए राग के साथ मुलाकात होगी.

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