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जब रागदरबारी के लेखक को लखनऊ पुलिस तलाशने लगी

अपनी साहित्यिक रचनाओं के लिए श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादेमी अवॉर्ड, व्यास सम्मान जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Dec 31, 2017 09:49 AM IST

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जब रागदरबारी के लेखक को लखनऊ पुलिस तलाशने लगी

हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाओं में से एक है- राग दरबारी. राग दरबारी के लेखक श्रीलाल शुक्ल थे. यूं तो श्रीलाल शुक्ल ने दर्जनों किताबें लिखीं, लेकिन हिंदी के आम पाठकों में उनकी पहचान राग दरबारी के लेखक के तौर पर ज्यादा हुई. पेशे से ब्यूरोक्रेट श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग थी.

अपनी साहित्यिक रचनाओं के लिए श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादेमी अवॉर्ड, व्यास सम्मान जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया था. आज श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर हम उन्हें और उनकी रचनाओं को याद करें, उससे पहले आपको बिल्कुल छोटे-छोटे तीन किस्से सुनाते हैं. ये किस्से हिंदी साहित्य के एक और लोकप्रिय लेखक रवींद्र कालिया ने अपनी किताब ‘सृजन के सहयात्री’ में लिखे है. ‘सृजन के सहयात्री’ में रवींद्र कालिया ने अपने समकालीन साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण लिखे थे. श्रीलाल शुक्ल पर लिखे गए संस्मरण से तीन किस्से पढ़िए-

किस्सा- 1

लखनऊ में मेरे एक आईएएस मित्र रहते हैं, एक बार उनसे मिलने उनके निवास स्थान पर गया. बाहर एक चौकीदार तैनात था. मैंने उससे पूछा, साहब हैं? हां हैं क्या कर रहे हैं? शराब पी रहे हैं. उसने निहायत सादगी से जवाब दिया.

किस्सा- 2

श्रीलाल शुक्ल जब इलाहाबाद नगर निगम के प्रशासक थे तो उनसे अक्सर भेंट होती थी. उनका चौकीदार भी कुछ-कुछ लखनऊ के मित्र के चौकीदार जैसा था. एक बार उनसे मिलने गया और चौकीदार से यूं पूछने पर कि श्रीलाल जी घर पर हैं या नहीं, उसने बताया साहब हैं. क्या कर रहे हैं- मैंने पूछा बाहर बगीचे में बैठे हैं और टकटकी लगाकर चांद की तरफ देख रहे हैं. किस्सा- 3

इसी प्रकार लखनऊ में श्रीलाल जी के एक अन्य पड़ोसी से भेंट हुई थी. वे भी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी थे. श्रीलाल जी की तरह ही मस्त मलंग. शाम को 6 बजे घर से गाड़ी लेकर निकले और रात 12 बजे तक ना लौटे. परिवार के तमाम लोग परेशान हो उठे. उनके मित्रों के यहां फोन किए गए, लेकिन उनका अता पता नहीं मिल रहा था. तमाम रेस्तरां और बार देख डाले, निराशा ही हाथ लगी. आखिर पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस भी सक्रिय हो गई. वायरलेस से तमाम थानों को इसकी सूचना प्रेषित कर दी गई.

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खबर मिलते ही कुछ पत्रकार भी उनके निवास पर पहुंच गए. रात भर अटकलों का बाजार गर्म रहा. कुछ लोग किसी माफिया सरगना का नाम ले रहे थे कि जब वे गृह मंत्रालय से सम्बद्ध थे तो एक माफिया सरगना को पकड़वाने में अहम भूमिका निभाई थी. कुछ लोग उसे किसी प्रेम प्रसंग से जोड़ रहे थे. रात भर प्रशासन परेशान रहा, पुलिस सक्रिय रही. भोर होने पर पाया गया कि उनका गैरेज खुला है. गैरेज में कार भी है और कार में वो भी हैं. स्टीयरिंग पर माथा टेके इत्मीनान से सो रहे हैं.

पसंद नहीं थी किसी बात में पेचीदगी

ये तो हुए किस्से. अब इन किस्सों का किस्सा. हुआ यूं कि इन किस्सों को पढ़ने के बाद श्रीलाल शुक्ल ने रवींद्र कालिया को एक चिट्ठी लिखी. उस चिट्ठी में उन्होंने साफ-साफ लिखा कि पड़ोसी की आड़ लेकर श्रीलाल जी के जो किस्से संस्मरण में लिखे गए हैं, वो अगर उनका नाम लेकर भी लिख दिए गए होते तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता. दरअसल, जो दो किस्से आपने अभी श्रीलाल जी के पड़ोसी के नाम पर पढ़े वो उन्हीं के किस्से थे. ये श्रीलाल जी की शख्सियत की पहचान थी. उन्हें किसी भी बात में पेचीदगी पसंद नहीं थी. ब्यूरोक्रेट जरूर थे, लेकिन दोस्तों के बीच नहीं. हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू समेत आधा दर्जन भाषाओं के जानकार थे, लेकिन उसका बखान नहीं करते थे.

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श्रीलाल शुक्ल की विख्यात कृतियों में राग दरबारी के अलावा सूनी घाटी का सूरज, आदमी का जहर, विश्रामपुर का संत, यह घर मेरा नहीं है, राग विराग, मकान, पहला पड़ाव जैसी रचनाएं हैं. ये अलग बात है कि उनके साथ भी वही चुनौती रही जो कई कलाकारों, लेखकों के साथ होती है. तमाम स्तरीय किताबें लिखने के बाद भी राग दरबारी उनकी ‘सिग्नेचर’ रचना बन गई. सिर्फ प्रसंग के तौर पर बच्चन जी की ‘मधुशाला’ और गोपाल दास नीरज की ‘कारवां गुजर गया’ याद आती है. ऐसा और भी कई लेखकों के साथ हुआ है.

श्रीलाल शुक्ल (फोटो: फेसबुक)

श्रीलाल शुक्ल (फोटो: फेसबुक)

दिलचस्प बात ये भी है कि जब राग दरबारी छप कर आई तो उसे शुरुआती दिनों में काफी आलोचना का सामना करना पड़ा. उन दिनों कथाकार मार्कण्डेय ने ‘कथा’ नाम की साहित्यिक पत्रिका में इस किताब की समीक्षा प्रकाशित की थी. वो समीक्षा श्रीपत राय ने की थी. श्रीपत राय कथा सम्राट प्रेमचंद के पुत्र थे. उन्होंने किताब की समीक्षा में तो जो लिखा वो लिखा ही था समीक्षा का शीर्षक था- बहुत बड़ी ऊब का महाग्रंथ.

रागदरबारी के बारे अच्छी नहीं थी राय

रवींद्र कालिया और श्रीलाल शुक्ल की हमप्याला दोस्ती की एक वजह ये भी थी कि रवींद्र कालिया ने राग दरबारी की जमकर तारीफ की थी. उन दिनों की चर्चा में रहने वाली संस्था ‘परिमल’ की भी राग दरबारी के बारे में राय अच्छी नहीं थी. इसे पूर्वाग्रह से ग्रसित राय इसलिए भी माना जा सकता है क्योंकि परिमल कवियों की संस्था थी और उससे जुड़े कवियों को ग्रद्य लेखन दूसरे दर्जे का लेखन लगता था. खैर, ये नियति और उस रचना की स्वीकार्यता थी कि आज जब उस रचना को आए करीब पचास साल पूरे होने वाले हैं तब भी वह हिंदी की सबसे ज्यादा बिकने वाली कृतियों में से एक है.

अपने व्यक्तिगत जीवन और स्वभाव में श्रीलाल शुक्ल बड़े भावुक माने जाते थे. उनकी पत्नी गिरिजा जी की जब सेहत बिगड़ी तो उन्होंने बड़ी लगन से उनकी देखभाल की. 28 अक्टूबर 2011 को श्रीलाल शुक्ल भी अपनी रचनाओं को अपने पाठकों के लिए ताउम्र छोड़कर दुनिया को अलविदा कह गए.

अपनी कालजयी रचना राग दरबारी के बारे में श्रीलाल शुक्ल कहा करते थे- 'मुझे लगा कि जब तक समाज के प्रति आपकी व्यापक प्रतिक्रिया न हो, इन छोटी रचनाओं के माध्यम से, चिकोटी काटने से कोई खास बात नहीं बनती. व्यंग लिखना है तो छोटी-छोटी चिकोटी कारगर नहीं होगी और ऐसे में राग दरबारी की अवधारणा हुई.'

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