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कहानी लुगदी शैली की जिसके अस्तित्व का संघर्ष आज भी जारी है

अपनी सारी पठनीयता के बावजूद लुगदी साहित्य एक ऐसा साहित्य रहा, जिसे पढ़ा तो गया लेकिन चर्चा नहीं होती थी. अजीबोगरीब शीर्षक और कहानी कहने के चटपटे तरीके के कारण ये साहित्य की सौतेली औलाद ही बनी रही.

Updated On: Dec 14, 2017 09:31 PM IST

FP Staff

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कहानी लुगदी शैली की जिसके अस्तित्व का संघर्ष आज भी जारी है

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 5 पर ए.एच व्हीलर स्टॉल है जहां कई तरह की किताबें देखी जा सकती हैं, जैसे कुकबुक्स, फोटोग्राफी की किताबें, अंग्रेजी बोलने वाली किताबें, वास्तु, ज्योतिष, जन्मकुंडली, गाइड, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पत्रिकाएं, फैशन पत्रिकाएं आदि-आदि. सामने की तरफ रहस्य-रोमांच वाली किताबें हैं, जिनमें सिडनी शेल्डन, डैन ब्राउन से लेकर चेतन भगत जैसे लेखकों के लघु उपन्यास भी शामिल हैं. एक तरफ मोटे-मोटे लेकिन छोटे आकार के उपन्यासों की ढेरी लगी है. इनके शीर्षक कुछ इस तरह हैं- मुर्दा नं. 13, कातिल कौन, भूखा शेर. इनके पन्नों की क्वालिटी अपेक्षाकृत गिरी हुई है. अपने रंगीन-चटपटे कवर और कम कीमत के साथ ये साहित्य की बनिस्बत भारतीय यात्रियों की पुरानी यादों का हिस्सा हैं, ठीक वैसे ही जैसे कि अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा ए.एच व्हीलर स्टॉल.

लुगदी कागजों पर छपे और भड़कीले कवर के साथ ये पेपरबैक 1970-80 दशक में भारतीय यात्रियों के नायक हुआ करते थे. इनमें रहस्यमयी मोड़ आते, उत्तेजक डायलॉग और मनोहरी दृश्यों से भरे हुए होते.

फोटो : न्यूज 18

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बॉलीवुड की मुनाफा कमाने वाली फिल्मों की तरह इन्हें पसंद करने वालों की भी एक पूरी जमात हुआ करती थी. इन उपन्यासों की पहचान उन कागजों से बनी, जिनपर वे छपा करते थे. इसी तर्ज पर नामी-गिरामी साहित्यकारों ने लेखन की इस शैली को 'लुगदी साहित्य' नाम दिया.

हालांकि ऐसे उपन्यासों की साहित्यिक किताबों में कोई गणना नहीं थी, लेकिन हिंदी पट्टी के लाखों पाठक इन्हें चाव से पढ़ते. उन्हें इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था कि इसमें साहित्य का अंश कितना है. जो लोग लुगदी साहित्य के अच्छे दिन देख चुके हैं, वे अब भी इसके आकर्षण से अछूते नहीं हैं. इन्हीं में से एक हैं विशी सिन्हा. वे इन उपन्यासों के नियमित पाठक हैं और साथ ही दिल्ली में सुरेन्द्र मोहन पाठक फैन क्लब के प्रबंधक भी हैं. वे याद करते हैं, 'उन दिनों ट्रेन के डिब्बों के भीतर चहलकदमी करते हुए आप देखते तो पाते कि हर दूसरा यात्री इन्हीं उपन्यासों में डूबा हुआ है.'

देश में तब हो रहे बदलावों की एक झलक इनमें भी देखी जा सकती है. वो वक्त सैटेलाइट टीवी से पहले का था. इन उपन्यासों की रुमानियत और उत्तेजना से मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के लोग अछूते नहीं थे. ज्यादातर पुरुष इन्हें पढ़ते हुए रोमांचित हो जाते और इसलिए ऐसी किताबें उनके साथ सफर का हिस्सा होती थीं. महिलाएं, जो कि घर-गृहस्थी के पचड़ों में उलझी रहतीं, किसी अलसाई दुपहरी में ये उपन्यास उनके दिनों का भी हिस्सा होते. बहुत से लोगों के लिए केवल ये उपन्यास ही जिंदगी में किसी बदलाव या उत्तजेना का कारण होते थे, जिन्हें पढ़ते हुए उनकी उदास, स्थिर जिंदगी में कोई नयापन भर आता.

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लुगदी का व्यवसाय

इन किताबों का गणित सरल था- मामूली दफ्तरों से ये चलाए जा रहे थे, कागज कम गुणवत्ता वाले होते, लेखकों की स्क्रिप्ट पढ़कर सुधारी जाती और छपने के लिए भेज दी जाती. संपादक और इसी तरह के तामझाम, जो बड़े पब्लिशिंग हाउसेज़ में आम हैं, यहां पर पैसों की बचत के लिए ऐसा कुछ नहीं होता था. 70 के दशक में किताबों की कीमत 8 रुपए तक होती थी जो 90 में बढ़कर 20 से 30 रुपए तक पहुंची. बिक्री के लिए उपन्यास बस स्टेशन और रेलवे स्टेशनों के करीब मिला करते ताकि यात्री लंबी यात्रा की बोरियत से बचने के लिए खुद ही इन तक पहुंच जाएं. किसी नए उपन्यास से आधी कीमत पर इनकी अदला-बदली भी की जा सकती थी. सिन्हा बताते हैं, "लोग एक स्टेशन पर एक उपन्यास खरीदते, यात्रा के दौरान उसे खत्म कर उतरते वक्त उसे देकर आधीक कीमत पर एक नया उपन्यास ले लेते. ऐसा बहुत से लोग करते थे." उपन्यास लगातार आते रहते ताकि पाठक एक से दूसरी किताब तक पहुंच सकें.

अपने सबसे अच्छे वक्त में लुगदी फिक्शन उद्योग में लगभग 60 प्रकाशक हुआ करते थे, जिनमें से ज्यादातर मेरठ में थे. एक प्रकाशक एक महीने में लगभग 10 किताबें प्रकाशित करता. यानी सालभर में लगभग 100 किताबें. इस तरह से 60 प्रकाशकों के बीच पाठकों को हर साल लगभग 60 हजार नई किताबें मिलतीं.

किताबें प्रकाशित होने के साथ ही पढ़ी भी जा रही थीं. किसी स्थापित लेखन की नई किताब आते ही पाठकों में सनसनी मच जाती. विज्ञापन और रेडियो पर जिंगल्स इन किताबों के आसपास बुने जाते और बिक्री बढ़ जाती. कई बार बिक्री इतनी ज्यादा होती कि बाजार में पुस्तकों की कमी पड़ जाती. कुछ लोकप्रिय उपन्यासों पर फिल्में भी बनाई गईं.

फोटो : न्यूज 18

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इस शैली में लिखने वाले 100 लेखकों में, कुछ ने बेहद लोकप्रियता पाई. इनमें सुरेंद्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा, राणु, गुलशन नंदा, परशुराम शर्मा, अनिल मोहन और कर्नल रणजीत (छद्म नाम) चुनिंदा नाम हैं. क्राइम थ्रिलर लिखने वाले अधिकतर लेखक पुरुषों के बीच लोकप्रिय थे, वहीं रानू, गुलशन नंदा और राज कमल ने सामाजिक विषयों पर लिखकर महिलाओं और कॉलेज के छात्रों के बीच लोकप्रियता हासिल की. इसी वजह से कई लेखकों जैसे सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा की हर महीने एक किताब बाजार में आई. पाठक की 'पैंसठ लाख की डकैती' उपन्यास जो कि 1970 में आई, उसे पहले ही हजारों पाठक बुक कर चुके थे. बाजार में आने के कुछ ही दिनों के भीतर पहले प्रिंट की एक लाख से ज्यादा किताबें निकल गईं. माना जाता है कि इसकी 25 लाख से भी ज्यादा प्रतियां बिकीं और यह 21 बार प्रकाशित हुआ था. इन उपन्यासों की मांग इतनी थी कि बड़े लेखकों को तो अच्छी धनराशि मिलती ही थी, नए लेखकों को भी हर किताबे के 10 हजार रुपए मिल जाते. यह 70-80 के दशक की बात हो रही है. ये हिंदी लुगदी साहित्य का दौर था, जो कि बहुत लंबा नहीं चला.

एक शैली का लुप्त होना अपनी सारी पठनीयता के बावजूद लुगदी साहित्य एक ऐसा साहित्य रहा, जिसे पढ़ा तो गया  लेकिन चर्चा नहीं होती थी. अजीबोगरीब शीर्षक और कहानी कहने के चटपटे तरीके के कारण ये साहित्य की सौतेली औलाद ही बनी रही. लाखों में बिक्री के बावजूद, ये घरों में छिपाकर ही रखे जाते.

90 के दशक के साथ कई बदलाव आए, जिनमें टीवी, इंटरनेट, मोबाइल और शॉपिंग मॉल्स शामिल थे. मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग इसमें खो गया और इसके साथ ही लुगदी साहित्य के पतन का दौर शुरू हो गया. पुस्तक प्रकाशकों और विक्रेताओं ने पहली बार इनकी बिक्री में गिरावट महसूस की. 90 के दशक के खत्म होते न होते, टीवी और मोबाइल फोन के कारण इनके पाठकों की संख्या में असामान्य ढंग से गिरावट आई.

फोटो : न्यूज 18

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छोटी यात्राएं होने लगीं और यात्री किताबों की जगह मोबाइल फोन को तरजीह देने लगे. घरों के भीतर भी ऊब से बचने के लिए टीवी सीरियल्स चलने लगे. लुगदी साहित्य के साथ जुड़ा हुआ मसाला शब्द भी इसके पाठकों की संख्या में गिरावट की वजह बना.

दूसरी बड़ी मुश्किल, चेतन भगत जैसे लेखकों के साथ आई. इनकी सरल अंग्रेजी ने उन पाठकों को भी जोड़ा, जो क्लिष्टता के कारण साहित्यिक अंग्रेजी पुस्तकों से दूरी बनाए रखते थे. इस बाजार ने छोटे शहरों और कस्बों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया. लुगदी साहित्य के संदर्भ में अभी के हालात बहुत खराब हैं. जिन पुस्तकों को पहले ही बुक करवा लिया जाता था, उनके लेखक अब महीने में 50 किताबें भी मुश्किल से बेच पाते हैं. 90 की शुरुआत में औसत लेखक की किताब की प्रतियां भी 30 हजार से ज्यादा बिक्री होतीं. अब ये संख्या बमुश्किल 2000 है. पैसे बचाने के लिए कवर को डिजिटली डिजाइन किया जा रहा है, इससे कवर डिजाइन करने वाला उद्योग भी चौपट हो चुका है.

अपने सुनहरे दिनों में मेरठ से ही 35 प्रकाशक हुआ करते थे. 2017 में अब यहां केवल 2 प्रकाशक हैं. इनमें से एक है रवि पॉकेट बुक्स. इसके मालिक मनीश जैन, स्वीकारते हैं कि 'ये उद्योग अपनी अंतिम सांसें ले रहा है. खुद को बचाए रखने के लिए दूसरी तरह की किताबें प्रकाशित करना शुरू कर दिया है.' अकादमिक और वास्तु की किताबों का ढेर उनकी इस बात की पुष्टि करते हैं. लेखन की इस शैली के प्रमुख लेखकों में अंतिम लेखक, लेखक सुरेंद्र मोहन पाठक इस गिरावट के लिए प्रकाशन उद्योग को ही दोषी मानते हैं. वे कहते हैं, 'बिक्री को देखते हुए ज्यादा मुनाफे के लिए प्रकाशक कच्चे लेखकों से झूठे नामों से लिखवाने लगे थे. वे गुणवत्ता से ज्यादा संख्या पर जोर दे रहे थे. ये तरीका मनोरंजन की बदलती दुनिया के साथ कदमताल नहीं कर सका.'

पाठक, हालांकि अपने साथी लेखकों की तुलना में काफी बेहतर हालात में हैं. 50 साल के करियर और 300 किताबों के लेखक के रूप में उन्हें हार्पर कोलिन्स द्वारा संपर्क किया गया. पिछले चार सालों से उनकी किताबें कोलिन्स और वेस्टलैंड द्वारा प्रकाशित की जा रही हैं. इनमें से कुछ का भी अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है. प्रकाशक बदलने के साथ पेपर क्वालिटी और कीमत भी बढ़ गई है. उनकी नई पुस्तक, कोलाबा कंस्पिरेसी (एचसी द्वारा प्रकाशित) की गई, जिसकी कीमत 135 रुपए है. ये निम्न-मध्यम वर्ग की पहुंच से बाहर है, जो कि पहले क्राइम थ्रिलर्स में रोमांच ढूंढा करता था.

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फोटो : न्यूज 18

लुप्त होती शैली में पाठक के कद का कोई और लेखन आ सके, इसकी कोई संभावना नजर नहीं आती. पुराने कई लेखक नहीं रहे और कोई नया लेखक उनकी जगह लेता हुआ दिखाई नहीं दे रहा. नए लेखक प्रकाशन लागत को साझा करने के लिए मजबूर हैं. जैन बताते हैं, "पाठक का लिखा नया  उपन्यास अभी भी बेचा जा सकेगा, लेकिन पाठकों को नए लेखक को स्वीकार करने में बहुत समय लगता है. इसलिए, हमारे जैसे प्रकाशक नए लेखकों के नाम पर जोखिम के लिए तैयार नहीं हैं." यह बात नए लेखकों के लिए खास प्रोत्साहित करने वाली नहीं.

अस्तित्व के लिए संघर्ष किताबों के प्रकाशक और विक्रेता इन दिनों बचे रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इसके लिए इंटरनेट को भी एक विकल्प बतौर लिया जा रहा है. रवि पॉकेट बुक्स ने बुक मदारी नामक एक ऐप को लॉन्च करने की घोषणा की है, इसमें उपन्यास से लेकर कई शैलियों की किताबें एक जगह मिलेंगी. मेरठ के प्रकाशक भी अब प्रतियोगी परीक्षाओं के किताबों के प्रकाशन की ओर मुड़ गए हैं. जो लोग अब भी सक्रिय हैं, वे भी ऐसी शैलियों के प्रकाशन पर जोर दे रहे हैं जो मांग में हैं.

हालांकि अधिकांश मौजूदा प्रकाशकों ने ये काम बंद कर दिया है, वहीं कुछ नए लोग भी हैं, जो इस शैली को दोबारा जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा ही एक उपक्रम है सूरज पॉकेट बुक्स. ये मुंबई से संचालित हो रहे हैं और इन्होंने परशुराम शर्मा नामक लोकप्रिय लेखक की किताबों को दोबारा प्रकाशित किया है.

हालांकि हिंदी बाज़ार पर दखल जमाने की कोशिश कर रहे, एसपीबी के मालिक शुभनंद बहुत संभलकर कहते हैं कि उन्होंने कहानियों की मूल प्रकृति यानी क्राइम थ्रिलर को सहेजा है, न कि लुगदी साहित्य की गुणवत्ता को. "हम अपनी किताबें सफेद कागजों पर छापते हैं. पाठक भी खुद को लुगदी कागजों में छपी किताबों के साथ नहीं देखा जाना चाहते हैं, "वे कहते हैं. एसपीबी की किताबें ऑनलाइन उपलब्ध हैं.

सस्ते लुगदी साहित्य से महंगे सफ़ेद पेपर तक की यात्रा ने इन किताबों को सड़क किनारे की दुकानों से ऑनलाइन स्टोर और बड़ी किताबों की दुकानों तक भी पहुंचा दिया है. इसका मतलब यह भी है कि किताबों की लागत बढ़ेगी यानी ये उन प्रकाशकों के लिए दिक्कत की बात है, जो सस्ते कागजों पर छपाई किया करते हैं. अब तक पारंपरिक लुगदी साहित्य के प्रकाशकों का भविष्य अनिश्चित दिखाई पड़ रहा है, लेकिन हो सकता है कि एक पूरी शैली को परिभाषित करने वाले रहस्य-रोमांच के उपन्यास गुमनामी के अंधेरों में खोने से पहले कुछ और वक्त लें.

(न्यूज़ 18 से साभार)

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