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केआर नारायणन: रबर-स्टाम्प नहीं लीक तोड़ने वाले राष्ट्रपति

भारत के इकलौते दलित राष्ट्रपति जिन्होंने राजनीतिक पार्टियों को जता दिया था कि वो संविधान रक्षक की कुर्सी पर हैं

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jul 09, 2017 11:11 AM IST

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केआर नारायणन: रबर-स्टाम्प नहीं लीक तोड़ने वाले राष्ट्रपति

देश के सबसे ऊंचे आसन पर कोई दलित पहुंचे इस तमन्ना की उम्र कितनी होगी? क्या आप इसका कोई अनुमान लगा सकते हैं ? यह तमन्ना उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी है हमारे देश की आजादी!

बात 2 जून 1947 की है और वाकया महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा का. गांधी नहीं जानते थे कि उनकी जिंदगी के अब बस आठ ही महीने शेष हैं, सो भावी भारत का सपना उनकी खुली आंखों में तैर रहा था.

जब गांधी ने कहा दलित महिला बने राष्ट्रपति

प्रार्थना सभा में गांधी ने कहा- 'वो वक्त बड़ी तेजी से चला आ रहा है जब भारत को अपना पहला राष्ट्रपति नियुक्त करना होगा. अगर चकरैय्या जीवित होते तो मैं उन्हीं के नाम का प्रस्ताव करता. मेरी दिली ख्वाहिश है कि एक वीर, निस्वार्थ और निष्कपट हृदय की कोई दलित (गांधी के शब्द को यहां आज के चलन और संवेदना के ख्याल कर बदल दिया गया है) महिला हमारी पहली राष्ट्रपति बने. यह निरा सपना भर नहीं है. भावी राष्ट्रपति के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी नहीं. बेशक उसकी सहायता के लिए सियासी मामलों और विदेशी भाषा के जानकार होंगे ही. और, यह सपना तभी साकार हो सकता है जब एक-दूसरे को काटना-मारना छोड़ हम सारा ध्यान गांवों पर लगाएं..'

Mahatma Gandhi

चकरैय्या.. बस नाम का इतना ही हिस्सा इतिहास अपने पन्ने पर दर्ज कर पाया है. हिंदुस्तान की धरती का सनातनी सवाल है क्या है नाम, कौन सा है गांव-- ‘कहां के पथिक कहां कीन्ह है गवनवा, कौन गाम के धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो भवनवा..’. वनवास को निकले राम से यह पूछा था राह के लोगों ने.

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लेकिन इसी हिंदुस्तान की धरती पर चकरैय्या का पूरा नाम-गाम किसी को पता नहीं है. और यह अधूरापन भी खुद में हिंदुस्तान की महान कहलाने वाली संस्कृति पर एक मारक टिप्पणी ही है. विडंबना कहिए कि ‘असंभव संभावना’ कहलाने वाले रामभक्त गांधी ना होते तो चकरैय्या का अधूरा नाम भी शायद इतिहास अपने पन्नों पर दर्ज ना करता.

नफरत की आंधी तेज थी, देश के भूगोल का बंटवारा दिलों को भी दो फाड़ कर रहा था. लोग एक-दूसरे को धर्म के नाम पर काटने-मारने पर उतारू थे. महात्मा सांप्रदायिक घृणा की आग से दहकते देश को अपनी करुणा का संदेश सुनाकर घायल मन के साथ दिल्ली लौटे ही थे कि उन्हें खबर मिली चकरैय्या नहीं रहे.

साबरमती आश्रम के इस निष्कलुष, वीर और सेवाभावी सदस्य को ब्रेन ट्यूमर की बीमारी ने महात्मा गांधी से छीन लिया. और, गोपालकृष्ण गांधी कहते हैं कि चकरैय्या के गांव और परिवार का तो छोड़िए ठीक से यह भी नहीं पता कि वे आंध्रप्रदेश के थे या तेलंगाना के. गांधी के लिखे से आप इतना जान पाते हैं कि वे दलित परिवार के थे.

कहते हैं, अच्छाई से भरी सारी इच्छाएं पूरी होती हैं क्योंकि सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वोच्च आसन पर ‘कतार में खड़े सबसे आखिरी आदमी’ को विराजमान देखने का महात्मा का सपना ठीक आधी सदी बाद पूरा हुआ 25 जुलाई 1997 को जब त्रावणकोर रियासत(केरल) के गांव के एक दलित परिवार के सदस्य केआर नारायणन हमारे गणतंत्र का सिरमौर बने.

केरल के गांव से दिल्ली तक का सफर

राजनीति विज्ञान के पंडित हैराल्ड जोसेफ लॉस्की के शिष्य थे के आर नारायणन. 1930 के दशक की आर्थिक मंदी के बीच ब्रिटिश लोकतंत्र के संकट की समझ बनाने के लिए मार्क्सवाद की तरफ मुड़े लॉस्की कहते थे कि समानता के बगैर कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती. और, जाति-व्यवस्था की गलाघोंट जकड़न वाले समाज में जन्मे केआर नारायणन का जिंदगीनामा लॉस्की के इस कहे का एक जीवंत उदाहरण है!

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डॉ. आंबेडकर की तरह केआर नारायणन के लिए भी जाति-व्यवस्था की जकड़न वाले समाज में इंसानी हक और काबिलियत हासिल करने का एकमात्र रास्ता था- पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई. त्रासदी देखिए कि जब भी मौका लगा जाति-व्यवस्था के ठेकेदारों ने इस राह में भी अड़चन खड़ी करने में कोई कोर-कसर ना छोड़ी.

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त्रावणकोर रियासत के छोटे से गांव में सात भाई-बहनों के परिवार में जन्म हुआ था केआर नारायणन का. पिता वैद्य थे, जड़ी-बूटियों के उपचार के सहारे जो रकम हाथ में आती थी उससे परिवार का गुजारा किसी तरह होता था.

ईसाई मिशनरियों के एक स्कूल में पिता ने दाखिल करवाया. छुटपन में 15 किलोमीटर की दूरी स्कूल जाने के लिए पैदल तय करते थे केआर नारायणन और किताबों की तो छोड़ ही दें तब पैरों की हिफाजत के लिए चप्पल भी किसी से उधार मांगकर जुटाने होते थे उन्हें.

स्कूल की फीस ना चुका पाने के कारण प्रिंसिपल की फटकार झेलनी होती थी और फटकार को बर्दाश्त करने की कोशिश में आए आंसू पिता से छुपाने होते थे.

प्रतिभाशाली थे सो स्कॉलरशिप मिली और सूबे की राजधानी के एक कॉलेज में दाखिला मिला. यहां पढ़ाई में टॉप किया. उस वक्त का कायदा यह था कि जो कॉलेज में टॉपर होगा वह उसी कॉलेज में शिक्षक लग जाता था. लेकिन कॉलेज-प्रशासन की नजर उनकी जाति पर थी सो अपमानित करने के ख्याल से क्लर्की की नौकरी की पेशकश की गई.

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अपनी शिकायत नौजवान केआर. नारायणन ने त्रावणकोर के महाराजा को सुनाने की कोशिश की तो राजदरबार से कहा गया- ‘महाराजा किसी ‘अछूत’ की बात नहीं सुनेंगे.' इस अपमान से आहत केआर.नारायणन ने तब कॉलेज में डिग्री वितरण समारोह का बहिष्कार किया था.

यूनिवर्सिटी ऑफ त्रावणकोर से अंग्रेजी साहित्य में सबसे ज्यादा अंकों से पास होने वाले पहले दलित युवा केआर नारायणन ने देश की राजधानी दिल्ली पहुंचकर नौकरी तलाशी, ‘द हिंदू’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के लिए पत्रकारिता की.

इसी दौरान एक बार महात्मा गांधी का भी इंटरव्यू किया. लेकिन आगे पढ़ने की धुन बनी रही. इस धुन में ही एक फेलोशिप पर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स पहुंचे और वहां हैराल्ड लॉस्की के शिष्य बने.

जब कम्युनिस्ट कहा गया और मंत्रीपद नहीं मिला

लॉस्की की एक चिट्ठी ही जवाहरलाल नेहरू से उनकी भेंट का बहाना बनी. देश के पहले प्रधानमंत्री से अपनी पहली भेंट का जिक्र उन्होंने इन शब्दों में किया है-

' लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में पढ़ाई पूरी करने पर लॉस्की ने खुद ही मुझे नेहरू के नाम एक सिफारिशी चिट्ठी दी. दिल्ली पहुंचने पर मैंने प्रधानमंत्री से मुलाकात का वक्त मांगा. मुझे लगता है, यह सोचकर कि एक स्टूडेंट लंदन से पढ़ाई कर स्वदेश लौटा है, मुलाकात की मेरी बात मान ली गई. यहीं संसद-भवन में उनसे मेरी मुलाकात हुई थी.'

'हमने लंदन के बारे में थोड़ी-बहुत बातें कीं और मुझे अहसास हुआ कि अब चलना चाहिए. मैंने गुडबाय कहा और कमरे से चलते वक्त लॉस्की की चिट्ठी उन्हें दी, बाहर निकलकर घुमावदार रास्ते पर कुछ दूर आगे आया होऊंगा कि जिस तरफ से आया था उसी ओर से मुझे तालियों की आवाज सुनायी दी. पीछे घूमा तो देखा कि पंडितजी (नेहरू) मुझे अपने पास आने का इशारा कर रहे हैं.'

'मेरे कमरे से निकलने के बाद उन्होंने चिट्ठी खोलकर पढ़ लिया था. तुमने मुझे यह पहले क्यों नहीं दिया- नेहरू ने पूछा. ‘सर, आय ऐम सॉरी. मुझे लगा मुलाकात के बाद चिट्ठी देना ठीक होगा.’ यह मेरा जवाब था. चंद सवालों के बाद उन्होंने मुझसे कहा- ठीक है, फिर आपसे फिर मुलाकात होगी और जल्दी ही मुझे भारतीय विदेश सेवा में काम करने का मौका मिला.'

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उस वक्त देश के नव-निर्माण के लिए बेहतरीन प्रतिभाओं की जरूरत थी और पंडित जवाहरलाल नेहरू को नजर आया कि लॉस्की के शिष्य केआर नारायणन बेहतरीन डिप्लोमेट साबित हो सकते हैं. नेहरू का विश्वास सही साबित हुआ.

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थाईलैंड, तुर्की और चीन में भारतीय राजनयिक के रूप में केआर नारायणन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. चीन के साथ संबंधों को सामान्य करने में उनकी कोशिशें अपने समय में निर्णायक साबित हुईं. यह उनकी दक्षता का ही प्रमाण है कि विदेश-सेवा से रिटायरमेंट के बाद एक बार फिर से उन्हें अमेरिका में भारत का राजनयिक नियुक्त किया गया.

के.आर. नारायणन को राजनीति में लाने का श्रेय इंदिरा गांधी को है. वे करेल के पलक्काड की ओट्टापलम् सीट से लगातार तीन दफे(1984, 1989 और 1991) कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने.

1984 के राजीव गांधी मंत्रिमंडल में उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया था लेकिन 1991 की कांग्रेस सरकार में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. तब केरल के ही कांग्रेसी मुख्यमंत्री के करुणाकरण ने उन्हें बताया था कि आपको कम्युनिस्ट विचारधारा से नजदीक मानने के कारण मंत्रीपद नहीं दिया गया है.

नारायणन का जबाव था कि ‘भाई, हमने तो कम्युनिस्ट कैंडिडेट एके बालन और लेनिन राजेंद्रन को चुनाव मे हराया है.’ इस जवाब पर करुणाकरण के मुंह से कोई बोल ना फूटे थे.

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क्या करुणाकरण, के.आर नारायणन को यह याद दिलाना चाहते थे कि वे वामपंथी विचारों की नर्सरी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के वीसी रह चुके हैं और कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों के प्रशंसक हैराल्ड लॉस्की के शिष्य भी सो, उनकी निष्ठा संदिग्ध है ? कार्यकाल की समाप्ति के बाद अपनी विचारधारा के सवाल को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक इंटरव्यू में खुद को ‘नेहरूवियन सोशलिस्ट’ बताते हुए कहा कि- 'ना तो कम्युनिज्म का भक्त हूं और ना ही कम्युनिज्म का अंधविरोधी.'

उन्हें रबर-स्टांप राष्ट्रपति कहलाने से इनकार था

शंकरदयाल शर्मा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की कांग्रेस पार्टी की कोशिशों की काट वीपी सिंह और रामविलास पासवान ने यह कहकर की थी कि दलित समुदाय का कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के पक्ष में सहमति बनाने के लिए कांग्रेस को मोल-भाव करना पड़ा. नतीजे में केआर नारायणन 1992 में उप-राष्ट्रपति बने थे.

जनता दल और वाममोर्चे ने उनके नाम का पुरजोर समर्थन किया. वामपंथी पार्टियों से मिले समर्थन की बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने खुद ही इंटरव्यू में कहा था कि ‘लेफ्ट’ ने केरल में ओट्टापलम से मेरी उम्मीदवारी (लोकसभा) का विरोध किया था क्योंकि 'वे लोग जानते थे कि विचाराधारा के मामले में मेरे उनसे मतभेद हैं' लेकिन उप-राष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने मुझ जैसे 'एक खतरनाक गैर-कम्युनिस्ट को समर्थन देने का फैसला किया क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में उस वक्त हालात बड़े खास थे. यह (समर्थन) उनकी सियासी रणनीति का हिस्सा था. मुझे उनके समर्थन का फायदा हुआ और मुझे समर्थन देने से उनकी सियासी पेशकदमियों को स्वीकार्यता हासिल हुई.'

के आर, नारायणन को क्या फायदा हुआ यह तो बड़ा स्पष्ट है. राष्ट्रपति पद के मुकाबले में उनके खिलाफ खड़े थे टीएन शेषन. चुनाव-आयुक्त के रूप में उन्होंने मतदान संबंधी धांधलियों को रोकने के लिए उठाये गये कदमों के कारण मध्यवर्ग के बीच खासी लोकप्रियता बटोरी थी. लेकिन केआर नारायणन से उनका चुनावी मुकाबला एकतरफा साबित हुआ. केआर नारायणन 95 फीसदी मत हासिल कर चुनाव जीते.

लेकिन सवाल यह है कि केआर नारायणन के राष्ट्रपति बनने से वामधारा की पार्टियों की पेशकदमियों को कैसे स्वीकार्यता हासिल हुई? इसका पता कुछ अहम घटनाओं पर उनकी टिप्पणियों से चलता है. उनकी बातों से यह भी जाहिर हो जाता है कि उन्हें रबर-स्टाम्प राष्ट्रपति बनने से इनकार था.

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के.आर, नारायणन के उप-राष्ट्रपति रहते बाबरी-मस्जिद के विध्वंस की घटना हुई. ‘द हिंदू’ के संपादक एन राम के साथ अपने इंटरव्यू में उन्होंने इस घटना को 'महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश में हुई सबसे बड़ी त्रासदी' करार दिया था.

उनके कार्यकाल के एकदम आखिरी वक्त में ‘गोधरा-कांड’ हुआ और गुजरात भीषण दंगे की चपेट में आया. उस वक्त को याद करते हुए उन्होंने 2005 में कहा कि मैंने अटल बिहारी वाजपेयी से इसरार किया कि ‘दंगों पर काबू करने के लिए सेना भेजिए. सेना भेजी गई, लेकिन उसे गोली चलाने का अधिकार नहीं दिया गया. अगर सेना को दंगाइयों पर गोली चलाने का आदेश दिया जाता तो गुजरात की त्रासदी से बचा जा सकता था. लेकिन केंद्र और सूबे की सरकार ने ऐसा नहीं किया. मुझे लगता है गुजरात दंगे में केंद्र और सूबे की सरकार की मिलीभगत थी.'

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में देश के संविधान को वक्त की जरूरत के अनुकूल बनाने के लिए उसपर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की गई थी.

तर्क दिया गया कि अगर देश के सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक कामकाज में तमाम तरह ही बुराइयां आ घुसी हैं और देश में स्थिर सरकार नहीं बन पा रही है तो उसकी बड़ी वजह है कि संविधान आज की जरूरतों पर खरा नहीं उतरता.

वाजपेयी सरकार ने जस्टिस एमएनआर वेंकटचेल्लैया की अध्यक्षता वाले संविधान सुधार आयोग के 11 मनोनीत सदस्यों से कहा कि आप संविधान में संभावित सुधार सुझाइए ताकि अस्थिर सरकारों के दौर से बाहर निकलना मुमकिन हो.

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सरकार की इस पहलकदमी को निशाने पर लेते हुए केआर नारायणन ने सुप्रीम कोर्ट के स्वर्ण जयंती समारोह के अपने प्रसिद्ध भाषण ( 28 जनवरी 2000) में डॉ. आंबेडकर का यह कथन याद दिलाया कि संविधान बेकार नहीं है, वह काम लायक है, लचीला तो है लेकिन इतना मजबूत भी कि शांति और युद्ध की हालत में देश को एकजुट रख सके और 'अगर कुछ गलत होता है तो उसका कारण यह नहीं होगा कि हमारे संविधान में खोट है बल्कि हमें कहना होगा कि खोट आदमी में है. आज जब संविधान के पुनरावलोकन की बात हो रही है, यहां तक कि नया संविधान ही लिख डालने की बात हो रही है तो हमें सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि संविधान ने हमें फेल नहीं किया बल्कि हमने ही संविधान को फेल कर दिया हो.'

उन्होंने अपने भाषण में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के वाक्यों की याद दिलाई कि: ‘ अगर हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि सच्चरित्र और सत्यनिष्ठ हुए तो वे दोषपूर्ण संविधान के सहारे भी बेहतरीन काम कर दिखाएंगे लेकिन उनमें अगर इन गुणों का अभाव हुआ तो फिर संविधान देश की मदद नहीं कर सकता.’

उस घड़ी देश का संविधान बदलने पर तुली सरकार से केआर नारायण ने इशारों में कह दिया था कि जरूरत डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और डॉ. आंबेडकर के इस कहे पर ध्यान देने की है.

‘वर्किंग प्रेसीडेंट’

केआर नारायणन अपने को वर्किंग प्रेसीडेंट कहते थे, ऐसा राष्ट्रपति जो संविधान के हर कोने की हिफाजत करता हुआ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करता है.

वे मानते थे कि संविधान राष्ट्रपति को घटनाओं में हस्तक्षेप करने या उनपर असर डालने लायक प्रत्यक्ष अधिकार ना के बराबर देता है लेकिन कार्यपालिका पर राष्ट्रपति बड़ी महीनी से असर डाल सकता है बशर्ते 'राष्ट्रपति का आचरण और विचार कुछ ऐसे हों कि लोग उन्हें अपने बात-व्यवहार से मेल खाता हुआ पाएं.'

लोकतंत्र में लोगों की मर्जी को सर्वोच्च मानने का ही ख्याल रहा कि उन्होंने यूपी में कल्याण सिंह सरकार (बीजेपी) को गिराकर वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने के आईके गुजराल सरकार के फैसले (अक्तूबर 1997) पर अपनी मंजूरी की मोहर नहीं लगाई.

यूपी विधानसभा में कल्याण सिंह सरकार को विश्वास मत हासिल करना था और उस वक्त सदन में भारी हंगामा हुआ. इस हिंसक हंगामे को आधार बनाकर सूबे की लोकतांत्रिक सरकार को केंद्र की गुजराल सरकार ने गिराना चाहा था.

आगे केंद्र की वाजपेयी सरकार ने बिहार में राबड़ी देवी की सरकार के साथ भी यही करना चाहा. भ्रष्टाचार के आरोप में लालू यादव के इस्तीफे के बाद बनी राबड़ी देवी की 14 माह पुरानी सरकार को उस वक्त (अक्तूबर, 1998) 325 विधायकों के सदन में 182 विधायकों का समर्थन हासिल था लेकिन एनडीए सरकार शासन की ‘अराजक’ स्थिति को आधार बनाकर सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहती थी. राष्ट्रपति के आर नारायणन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की इस सलाह को मानने से इनकार कर दिया.

जब सरकार गठन की रीत टूटी

डावांडोल सरकारों के उस दौर में उन्होंने हमेशा ध्यान रखा कि सरकार उसी पार्टी की बने जो बहुमत साबित करने की क्षमता रखती हो. उनसे पहले चलन बन निकला था कि राष्ट्रपति चुनाव जीतकर आने वाली सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता दे देते थे. शंकरदयाल शर्मा और आर वेंकटरमण ने ऐसा ही किया था. लेकिन के आरनारायणन ने इस चलन को तोड़ा.

Shankar Dayal Sharma

मार्च 1998 के लोकसभा चुनावों में संयुक्त मोर्चा की हार हुई. कुल 543 सीटों वाली संसद में बीजेपी को 179 सीटें मिलीं और उसके सहयोगी दलों को 73 सीटें. साथियों को मिलाकर कुल 252 सीटों तक पहुंच पाने वाली बीजेपी को बहुमत साबित करने के लिए 21 सांसदों का समर्थन जरूरी था. राष्ट्रपति का अटल बिहारी वाजपेयी के पास संदेशा पहुंचा कि अगर ‘आप बहुमत से चलने वाली स्थायी सरकार बना सकते हैं तो फिर मुझे बताइए.

वाजपेयी का जवाब था कि मेरे साथ 252 सांसद हैं. राष्ट्रपति ने लिखित में समर्थक सांसदों के नाम सौंपने को कहा लेकिन 12 मार्च के दिन अटल बिहारी वाजपेयी मात्र 240 सांसदों के समर्थन का पत्र दे पाए.

दो दिन बाद 14 मार्च के दिन एआईएडीएमके की महासचिव जयललिता की चिट्ठी राष्ट्रपति को पहुंची कि वाजपेयी की सरकार बनती है तो उसे हम बेशर्त समर्थन देने को तैयार हैं, बहुमत का आंकड़ा अब भी दूर था.

आगे चंद्रबाबू नायडू के मार्फत राष्ट्रपति के सामने जब यह स्पष्ट हुआ कि तेलुगु देशम पार्टी विश्वास मत हासिल करने के दौरान तटस्थ रुख अपनाएगी तब जाकर उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया. दस दिन के भीतर सदन में बहुमत साबित करने का भी निर्देश हुआ.

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19 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और 28 मार्च के दिन उनकी सरकार ने 261 के मुकाबले 274 वोटों से विश्वास मत हासिल किया.

खंडित जनादेश के उस दौर में केआर नारायणन ने सुनिश्चित किया कि सरकार सबसे ज्यादा सीट पाने वाली पार्टी की नहीं बल्कि बहुमत साबित कर सकने वाली पार्टी की बने.

यह श्रेय भी केआर नारायणन को दिया जाना चाहिए कि सरकार के गठन या फिर लोकसभा को भंग करने के अपने फैसले को वे तफ्सील से समझाते थे.

जयललिता के समर्थन वापस लेने के बाद 17 अप्रैल 1999 के दिन वाजपेयी सरकार विश्वास मत हार गई और लोकसभा भंग करने का फैसला लेना पड़ा तो राष्ट्रपति के कार्यालय से पूरी तफ्सील में एक संदेश जारी हुआ कि इस फैसले क्या कारण रहे.

दायित्व के निर्वाह में पारदर्शिता की मिसाल करने वाले केआर नारायणन शब्द के सटीक अर्थों में सिटिजन्स प्रेसीडेंट थे. फरवरी 1998 के लोकसभा चुनावों के लिए वोट डालना था तो आम नागरिकों की कतार में खड़े होकर मतदान किया था उन्होंने. उन्हें भरोसा था कि लोकतांत्रिक भारत बाधाओं को पार करते हुए अब उस मुकाम पर आ गया है जब ‘कतार में खड़े सबसे आखिरी आदमी’ आवाज की उपेक्षा नहीं की जा सकेगी.

इसी भरोसे से राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कहा कि- ‘राष्ट्र ने अपने सर्वोच्च आसन के लिए एक ऐसे व्यक्ति को चुना जो समाज के सबसे जमीनी तबके में जन्मा और इस पवित्र भूमि की धूल और धूप में बड़ा हुआ, यह बात इस तथ्य की निशानदेही करती है कि आम आदमी के सरोकार हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन के मुख्य मंच पर आ चुके हैं. निजी गौरव के किसी भाव से नहीं बल्कि व्यापक अहमियत के इसी अर्थ में मैं अपने राष्ट्रपति चुने जाने पर आज खुश हूं.'

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