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कृत्रिम मांस बदल सकता है हमारी दुनिया की बदरंग तस्वीर

मैं इस मसले पर आगे और भी लिखूंगी. सो, वेबसाइट के इस कोने पर नजर जमाए रहिए, उत्सुकता और उत्साह की मेरी भावना में साझीदार बनिए.!

Updated On: Nov 08, 2018 08:12 AM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

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कृत्रिम मांस बदल सकता है हमारी दुनिया की बदरंग तस्वीर
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तकरीबन 20 साल पहले लिंडा मेकार्टनी ने कृत्रिम मांस का आविष्कार कर और उसे बढ़ावा देकर एक तरह से दुनिया को बदलने की कोशिश की. मेकार्टनी ने कुछ ऐसा किया था कि पौधों से ली गई सामग्री मांस का स्वाद दे. लेकिन इसका कोई असर न हुआ. यह आविष्कार लोगों की दिलचस्पी का विषय रहा और इसे वैसे शाकाहारियों ने अपना आहार बनाया जो मांस के स्वाद को जानना चाहते थे. मांस में किन अणुओं के कारण खास स्वाद और विशेष किस्म की बनावट पैदा होती, इसे जानने के लिए ‘इम्पॉसिबल फूड एंड बियोन्ड मीट’ सरीखी कंपनियों ने जंतुविज्ञान का सहारा लिया और फिर पशुओं से एकदम ही अलग चीजों के इस्तेमाल के सहारे बिल्कुल मांस सरीखी वस्तु बना डाली तो भी यह सारी कोशिश भोजन की मेज पर एक और ‘डिश’(व्यंजन) बढ़ाने वाली साबित होकर रह गई.

वैज्ञानिकों और उद्यमियों ने पशुओं से नहीं बल्कि किन्ही और चीजों के इस्तेमाल से बिल्कुल मांस जैसा पदार्थ बना डाला है-बीते पांच सालों में जितना इस बात ने मुझे आश्चर्यचकित किया है उतना किसी और बात ने नहीं

हम जानते हैं कि दुनिया में एक भारी बदलाव कंप्यूटर, ईमेल तथा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करने वाले गैजेटस् के चलन से आया. मैं तो उस दुनिया की ठीक-ठीक याद भी नहीं कर पाती जिसमें सेलफोन नहीं हुआ करता था. दुनिया में यह बदलाव चंद स्वप्नदर्शियों की बदौलत आया जो अरबपतियों में शुमार हुए हालांकि उनका मकसद कभी भी अरबपति बनने का नहीं था.

दुनिया में दूसरा बड़ा बदलाव तब आएगा जब पशुओं से हासिल मांस की जगह ‘क्लीन मीट’ (स्वच्छ मांस) का इस्तेमाल होगा. यह मीट के सीरम(लसी) में मीट की कोशिकाओं के संवर्धन(मल्टीप्लीकेशन) से बनता है.

और विस्मय की बात देखिए कि जिन बड़ी कंपनियों ने दुनिया में बदलाव की पहली बड़ी लकीर खींची उन्हीं कंपनियों ने बदलाव की इस दूसरी बड़ी लकीर को खींचने के काम में भारी निवेश कर रखा है. माइक्रोसॉफ्ट, वर्जिन, गूगल, फेसबुक..ऐसी ही कंपनियां हैं. और, कहीं ज्यादा अहम बात ये है कि टायसन फूड तथा करगिल जैसी दुनिया की बड़ी मांस-विक्रेता कंपनियां लाखों डॉलर का निवेश कर रही हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि भविष्य ऐसे ही मांस के बाजार का है. सो, ये कंपनियां शुरुआत से ही इसमें अपने कदम रखना चाहती हैं.

जरा कल्पना कीजिए उस दुनिया की जिसमें हिंसा नहीं होगी. अमेरिका में एक अध्ययन हुआ कि देश में कौन-से इलाके सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं. पता चला कि कसाईखानों के आस-पास का कुछ किलोमीटर का दायरा सबसे ज्यादा असुरक्षित होता है. भारत में पिछले महीने हुए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि इस देश में रामपुर सबसे कम निवास-योग्य शहर है. इस शहर को कसाईघरों और छूरी-कैंची का शहर कहा जाता है. कल्पना कीजिए कि वो दुनिया कैसी होगी जिसमें ना तो कोई कसाईघर होगा और ना ही जानवरों को जबरिया पालकर उनकी निर्दयता से हत्या की जायेगी.

सोचिए कि वो दुनिया कैसी होगी जब जानवर पशुपालन की कैद से आजाद होंगे लेकिन मांस हरेक के लिए उपलब्ध होगा. ऐसा होगा जब हम कल्चर्ड मीट तैयार करेंगे. तब जानवरों के अवशिष्ट और अंदरूनी अंगों के निस्तारण(डिस्पॉजल) की झंझट नहीं रहेगी, उबकाई लाने वाली बदबू और घबराहट पैदा करने वाली चीख भी ना होगी. तब ऐसा कोई ट्रक ना दिखेगा जिसपर मरियल जानवरों को ठसाठस लादा गया हो. तब कोई बछड़ा अपनी मां से ना बिछड़ेगा और ना ही कसाइयों का कोई माफिया तंत्र होगा.

कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की जिसमें आप इच्छा भर मीट खा सकेंगे और ये खतरा ना रहेगा कि मीट खाने से उसके साथ जो एंटीबायोटिक और हार्मोन शरीर में जा रहे हैं उनसे कोई बीमारी हो जाएगी.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की जब आकाश बिल्कुल नीला होगा और हवा एकदम ही तरोताजा- ना तो कहीं पानी की कमी होगी और ना ही जंगलों का कोई अभाव. जंगलों का इफरात इतना होगा कि बादल वक्त से घिरेंगे और पानी खूब बरसेगा. कल्पना कीजिए उस दुनिया की जिसमें तापमान अब जैसी तेजी से ना बढ़ रहा होगा-एक ऐसी दुनिया जिसमें तापमान की बढ़ोतरी के कारण पैदा होने वाले बाढ़ और सुनामी जैसे खतरों का वजूद ही ना होगा.

किसी सुंदर सपने सरीखा जान पड़ता यह भविष्य अभी कितना दूर है ? यह हम सबों पर निर्भर है: मैं अपने जीवन-काल में ही ऐसा भविष्य देख सकूंगी. यह ‘क्लीन मीट’ के जरिए पैदा होने वाला भविष्य कहलाएगा.

पहला मीटलेस (मांसरहित) बर्गर 2013 में बना (इसका खर्चा गूगल के सहसंस्थापक सर्गे ब्रिन ने उठाया था). साल 2018 में सैकड़ों स्टार्ट अप कंपनियां इस क्लीन मीट को बनाने के लिए जरूरी कोशकीय प्रगुणन (सेल्युलर मल्टीप्लीकेशन) की प्रक्रिया कर पाने में सक्षम हो चली हैं. मेम्फिस मीट्स जैसी कंपनियों ने तो बत्तख और मुर्गी के मांस की कई वेरायटी तैयार कर ली है. अब केवल एक ही मुश्किल बची है कि इस तकनीक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कैसे हो. लेकिन यह भी होकर ही रहेगा. आखिर, जब दुनिया में पहला लैपटॉप बना था तो उसकी कीमत लाखों डॉलर में थी. यही हाल लाइटबल्ब का भी था.

मैंने क्यों कहा कि इस भविष्य का साकार होना हमारे ऊपर निर्भर है ? वजह ये है कि अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मीट को फार्म हाऊस की जगह प्रयोगशाला में तैयार करने वाली कंपनियों के लिए कुछ मानक और नियम बनाये हैं. अब वो दिन लद गये जब मीट के चक्कर में जानवरों के खुर, पंख और पंजों के निपटान की चिन्ता करनी पड़ती थी. अब आंख या अंतड़ी को फेंकने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी. अब मौजूद होगा सिर्फ खाने योग्य मीट. साल 2018 की जुलाई में मेरीलैंड में एफडीए तथा कृषि विभाग ने कृत्रिम रूप से बनाए मीट पर चर्चा के लिए पहली बैठक बुलाई. इस बैठक में सैकड़ों लोग शामिल हुए. वर्ल्ड बैंक ने अपने मुख्यालय में एक बैठक बुलाई जिसमें क्लीन मीट के उद्यमियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्रियों के सामने इस उद्योग से जुड़े अपने सोच का साझा किया.

कभी आने-जाने के लिए हम घोड़े का इस्तेमाल करते थे. इसका ये मतलब नहीं कि हमें घोड़ों से बहुत लगाव था. घोड़े के इस्तेमाल के पीछे हमारी मंशा बस इतनी भर थी कि हम कहीं तेजी से आ-जा सकें. और, इसके लिए हमें घोड़ों को दाना-पानी देना पड़ता था, उसे अस्तबल में रखना और उसके मल-मूत्र को साफ करना पड़ता था तो ये सब हमें मंजूर था. लेकिन फिर कारों का चलन शुरू हुआ और घुड़पालन गैर-जरूरी हो गया. हमने जल्दी ही कारों का अपना लिया और अब घोड़े सिर्फ धार्मिक रीत के पर्यटन के मकसद से पाले जाते हैं. यही बात कसाईखानों के साथ भी है. इन्हें कोई पसंद नहीं करता. ना तो हमें खून से भरी नदियां पसंद हैं ना ही ग्रीन हाउस गैस. पर्यावरण को पहुंचने वाला बड़ा नुकसान भी हमें पसंद नहीं लेकिन हमें भेड़-बकरी, सुअर, भैंस और मुर्गी का मांस पसंद है. हम दूध या अंडे खाना चाहते हैं.

सबकुछ बदल चुका है. पौधों को उगाने और सींचने का तरीका तक बदल गया है लेकिन मीट का उत्पादन अब भी उसी रीति से होता है जैसे 20 हजार साल पहले हुआ करता था. मीट-उत्पादन से जुड़े ऊर्जा के अनुपात पर गौर करें कि वह कितना गैर-जरूरी जान पड़ता है: एक किलो मीट के लिए 11 किलो अनाज पशु को खिलाना होता है. किसी एक गाय या भैंस के लिए 60 हजार लीटर पानी की जरूरत होती है. हजारों लोग भुखमरी की चपेट में हैं क्योंकि उन्हें सस्ती कीमत पर अनाज नहीं मिलता. युरोप में हर सात किलो में एक किलो मांस भारतीय अनाज के सहारे उत्पादित होता है. लेकिन हमारे मुल्क में कुपोषण की जो हालत और पानी की जो कमी मौजूद है उसपर जरा नजर डालिए. अगर हम मीट खाते और निर्यात करते रहेंगे तो ना मानवता रहेगी और ना ही कोई सुशासन.

लोगों का जीवन मीट-उत्पादन के इस तरीके से बहुत ज्यादा प्रभावित होता है. कल्चर्ड मीट से यह सब बदल जाएगा. अनाज की खपत में कमी आएगी और वो सस्ता होगा. पानी की बचत होगी और गरीबों को जमीन मिल सकेगी. ब्लूनेलू नाम की कंपनी ने सेल्युलर एक्वाकल्चर शुरू किया है. एक बार इसके उत्पाद बाजार में आ गए तो आप बिना फार्मलिन, मानव-मल और रासायनिक रंगों वाली मछली हासिल कर सकेंगे. इन चीजों का इस्तेमाल मछली को बनावटी तरीके से ताजा दिखाने के लिए होता है. माडर्न मीडोज नाम की कंपनी ऐसी कोशिश कर रही है कि पशु-त्वचा का इस्तेमाल किये बगैर चमड़ा बनाया जा सके.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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कोशिकाओं को प्रसंस्कृत करने की यात्रा बहुत जटिल साबित हुई है. इसके लिए ऐसी खास कोशिकाओं की पहचान करनी होती है जो प्रगुणन कर सकें और लचीली हों. उचित बायो-रियेक्टर तैयार करने होते हैं- ऐसे रियेक्टर जो वैसा ही तापमान तैयार कर सकें जितना पशुओं की देह में मौजूद होता है. ऐसा होने पर कल्चर्ड मीट का उत्पादन ग्रामीण स्तर पर चलने वाले उद्योग का रूप ले सकेगा.

शीर्षस्तर के वैज्ञानिकों तथा कोशिका-विज्ञानियों ने अपनी मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर इस काम में अपनी विशेषज्ञता लगाई है. इस काम में लगे कई लोग भारतीय हैं. मेम्फिस मीटस् की स्थापना डॉ. उमा वलेटी ने की है और वहीं इसके अध्यक्ष भी हैं. उमा वलेटी एक हार्ट सर्जन हैं. परफेक्ट डे फूड्स के मिल्क विदाउट काऊ में रेयान पंड्या तथा पेरुमल गांधी दोनों भारतीय हैं.

पशु परिदृश्य से गायब नहीं होंगे. पशुओं से कोशिका जुटाई जाएगी और इन कोशिकाओं को बायो-रियेक्टर में रखा जाएगा. पशुओं से पोषक कल्चर-सीरम भी जुटाना होगा. लेकिन इसकी मात्रा अब की तरह ज्यादा नहीं बल्कि बहुत कम होगी.

यही वक्त है जब भारत सरकार को इस काम में अपने कदम आगे बढ़ाने चाहिए. अगर प्रक्रिया का पेटेन्ट हो गया तो फिर इस काम में आगे बढ़ना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रह जाएगा. इसलिए, हमें ओपन सोर्स-रिसर्च की जरूरत है ताकि क्लीन मीट बनाने से जुड़ा विज्ञान सभी की पहुंच में हो.

भारत की फ्यूचर फूड्स जैसी बड़ी कंपनियों ने इसमें गहरी दिलचस्पी जाहिर की है और कई अमेरिकी कंपनियां भी भारत में अपना साझेदार ढूंढ़ रही हैं. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि नेहरूवादी ढांचे के भीतर विज्ञान के मंदिर के नाम से पुकारी गई आईसीएआर ( भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्) और सीसीएमबी ( सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलेक्यूलर बॉयोलॉजी) जैसी संस्थाएं आरामपरस्ती के झूलन-खटोले से नीचे उतरें. इस झूलन-खटोले पर कई सालों से ये संस्थाएं गहरी नींद में सोयी हैं. इन संस्थाओं को अब ऐसे शोध-अनुसंधान करने की जरुरत है जो भारतीय अर्थव्यवस्था का चेहरा बदलकर रख दे.

मैं इस मसले पर आगे और भी लिखूंगी. सो, वेबसाइट के इस कोने पर नजर जमाए रहिए, उत्सुकता और उत्साह की मेरी भावना में साझीदार बनिए.!

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