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पीरियड्स: दक्षिण भारत में शर्म नहीं जश्न है पहला पीरियड

ऋतु कला संस्कार अमीर-गरीब हर तबके में बड़े उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जाता है

Updated On: Feb 07, 2018 02:17 PM IST

Puja Upadhyay

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पीरियड्स: दक्षिण भारत में शर्म नहीं जश्न है पहला पीरियड

इस शुक्रवार, 9 फरवरी को आ रही फिल्म पैडमैन ने माहवारी जैसे बेहद संवेदनशील और निषिद्ध विषय को एक आकर्षक पैकेजिंग में बाज़ार के लिए तैयार कर दिया है. विडंबना ये है कि पद्मश्री से सम्मानित अरुणाचलम मुरुगनाथनम ने सैनिटेरी नैपकिन बनाने के बारे में इसलिए सोचा क्योंकि उनकी पत्नी ने कहा कि सैनिटेरी पैड इतने महंगे हैं कि उनके इस्तेमाल के लिए उसे घर के दूध के बजट में से कटौती करनी पड़ेगी.

मुरुगनाथनम ने ऐसी मशीनें बनायी हैं जिससे सैनिटेरी नैपकिन सस्ता, स्वच्छ और आसानी से उपलब्ध हो सकता है. वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक गांवों में ऐसी मशीनों की फ़ैक्टरी लगायी जाए जिससे रोज़गार भी हो और किसी भी औरत को सैनिटेरी पैड इस्तेमाल करने में आर्थिक समस्या ना हो. फ़िल्म ‘पैडमैन’ बाज़ार की उसी चौंध का इस्तेमाल करती है जिसकी वजह से सैनिटेरी नैपकिन अपनी लागत से कहीं ज़्यादा महंगे बिकते हैं.हैशटैग #padmanchallenge में सैनिटेरी पैड के साथ तस्वीरें खिंचाने वाले अधिकतर वे ही लोग हैं जिनके लिए पैड वर्जित या अछूत नहीं रहा है.

भारत जैसे बहुसांस्कृतिक/मल्टी-कल्चरल देश में माहवारी एक बेहद उलझा हुआ विषय है. इतना कि इसपर बात करने की अभी शुरुआत ही हुई है कि इसे हमेशा से एक औरतों का मामला माना जाता रहा है. ना तो हमारी फ़िल्में और ना ही हमारा समाज ऐसे किसी विषय पर बात करने के लिए तैयार रहा है. ऐसे में अक्षय कुमार जैसे मेनस्ट्रीम अभिनेता का इस विषय पर फ़िल्म बनाना और उसपर बात शुरू करना, बहुत कुछ कहता है. हम बदलाव की दिशा में बढ़ रहे हैं, भले ही कुछ उलटे सीधे क़दम लेते हुए सही, लेकिन कोशिश की जा रही है.

उत्तर भारत में लड़की के पीरियड्स शुरू होते उसे एक सामाजिक संस्कार मिलता है- शर्मिंदा होने का. हज़ार हिदायतें और एक भय का माहौल तैय्यार होता है. माहवारी से जुड़ी हर चीज़ के साथ शर्म और बात को ढकना और छिपाना जुड़ा है, कुछ इस क़दर कि लड़कियां जो कि 9-13 वर्ष की होती हैं, कई बार डर जाती हैं कि उन्हें कोई भयानक बीमारी हुयी है. इस समय अछूत होने और चीज़ों को ना छूने, अपवित्र होने और पूजा ना करने की बातों के साथ मासिकधर्म की सारी चीज़ों को सबसे छुपा कर रखने की हिदायत दी जाती है.

माहवारी में कपड़ा इस्तेमाल करना अपनेआप में ख़तरनाक नहीं है. ख़तरनाक है उसके साथ जुड़ी गंदगी. कपड़े को अगर धो कर धूप में सुखाया जाए तो ये एक स्वस्थ और सुरक्षित तरीक़ा है जिससे इन्फ़ेक्शन नहीं होगा. लेकिन माहवारी के साथ जुड़ी शर्म के कारण ये कपड़े गंदे, बिना ठीक से धुले और छाया में सुखाए जाते हैं जिससे कीटाणु पनपते हैं और इन्फ़ेक्शन होते हैं.

Sanitary Napkin

दक्षिण के लिए उत्सव है रजस्वला होना

यहीं दक्षिण भारत में बहुत सालों से चली आयी परम्पराओं में एक ‘ऋतुकला संस्कारम’ है. लड़की के रजस्वला होने पर/मासिक धर्म शुरू होने पर/पहली बार पीरियड आने पर किए गए संस्कारम को अलग अलग नामों से जाना जाता है लंगा वोणी, पावड़ाई दावणी, लंगा दावणी, पुष्पवती, समर्थ आड़िंदी, मोगु कुंडिस्ते इत्यादि. इन नामों में दो भाव प्रमुख रहते हैं - पहला, लड़की का स्त्री होना, समर्थ होना, वयस्क होना, और कली से फूल में बदलने के भाव में - खिलना… दूसरा भाव परिधान से जुड़ा होता है - साड़ी या ‘परिकिणी वोणी’. इसलिए इस संस्कार को प्यूबर्टी रिचुअल या हाफ़ साड़ी रिचुअल भी कहते हैं.

इस दिन पहली बार लड़की के पहनने के लिए हाफ़-साड़ी या साड़ी दी जाती है. पैडमैन फ़िल्म की हीरोईन राधिका आप्टे को उनके पहले पीरियड्ज़ आने पर तोहफ़े में घड़ी मिली थी, ये ख़बर मीडिया को बेहद अचरज से भर गयी थी. देश का हिंदीभाषी मीडिया दक्षिण भारत की कई रस्मों के बारे में बहुत हद तक अनभिज्ञ है.

ऋतुकला संस्कारम के बारे में उत्तर भारत में भी अलग अलग मत हैं जो सोचने पर विवश करते हैं कि हम आधुनिक हो रहे हैं या हमारे पुरखे हमसे ज़्यादा आधुनिक थे. इस संस्कार के शुरू होने के मूल कारण ये रहे थे कि पुराने ज़माने में लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती थी. जब लड़की को पहला पीरीयड आता है इसका मतलब ये हुआ कि वह अब संतान की उत्पत्ति कर सकती है और अब उसकी शादी के लिए रिश्ते आ सकते हैं. ये लड़की के जीवन में एक ज़रूरी पड़ाव होता था और इस पड़ाव पर उसे सगे सम्बंधी और पारिवारिक मित्र आ कर आशीर्वाद देते थे. जिस तरह लड़कों के उपनयन संस्कार को उनके पुरुष होने के दिशा में पहला पड़ाव माना गया, वैसे ही लड़की के ऋतुकला संस्कारम को उसके स्त्री होने का पड़ाव माना जाता था. ये शादी की तरह ही काफ़ी धूमधाम से मनाया जाता है.

हर इलाके में अलग है परंपरा

दक्षिण के हाफ साड़ी फंक्शन बड़े छोटे हर तबके में मनाए जाते हैं

दक्षिण के हाफ साड़ी फंक्शन बड़े छोटे हर तबके में मनाए जाते हैं

वैसे तो संस्कार परिवार, जाति और क्षेत्र के हिसाब से अलग अलग होते हैं लेकिन मूल रूप रेखा कुछ ऐसी है. जिस दिन लड़की के पीरियड शुरू होते हैं उस दिन सुहागन औरतें उसे पानी से नहलाती हैं. उसे साफ़ और सफ़ेद कपड़े देती हैं और फिर अगले सात से दस दिन तक उसे एक अलग कमरा दिया जाता है. ये कमरा कभी कभी घर से बाहर भी होता है. लड़की को इन दिनों पुरुषों से दूर रखा जाता है. उसे खाने को पौष्टिक खाना दिया जाता है जैसे तिल और गुड़ के लड्डू, तिल के तेल में छनी चीज़ें जैसे मुरक्कु, दोसा इत्यादि. कुछ घरों में कच्चा अंडा देने का भी ज़िक्र होता है. सातवें या दसवें दिन नौ सुहागिनें लड़की को हल्दी और नीम के पत्ते मिले पानी से नहलाती हैं. इसके बाद लड़की शुद्ध हो जाती है और पूजा में हिस्सा ले सकती है.

लड़की को दुल्हन की तरह सजाया जाता है. सगे सम्बंधी उसके लिए उपहार लाते हैं जो कि परिवार की हैसियत के हिसाब से गहने, कपड़े, फल इत्यादि होता है. लड़की की पसंद के हिसाब से किताबें, घड़ी या इस तरह की चीज़ें भी हो सकती हैं. शाम को भोज का आयोजन होता है जिसमें लड़की के बैठने के लिए स्टेज पर एक सजी हुयी कुर्सी होती है. सबसे पहले लड़की के माता-पिता, या कहीं कहीं लड़की का मामा उसे आशीर्वाद देने के लिए हल्दी मिला चावल उसपर छिड़कते हैं और कुमकुम का टीका लगाते हैं. कहीं कहीं हल्दी भी लगाते हैं.

लोग ये भी बताते हैं कि अंग्रेज़ी में हाफ साड़ी नाम की ये परंपरा दक्षिण भारत के रोमन कैथोलिक्स में भी होती है. इसमें बाकी बातें वैसी ही रहती हैं. देवी-देवताओं की जगह क्रॉस होता है. दीपक की जगह कैंडल जलाई जाती हैं.

दक्षिण भारत में, ख़ास तौर से तमिलनाडु में ये ऋतुकला संस्कारम एक लड़की के जीवन का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण उत्सव होता है. लड़की इस दिन किसी राजकुमारी की तरह महसूस करती है. परिवार समाज में बचपन से ऐसे उत्सव देखने के कारण लड़कियों को उत्साह से इंतज़ार रहता है कि उनके पीरियड आएं और घर पर फ़ंक्शन हो.

नई पीढ़ी जा रही है दूर

नई पीढ़ी में इस परंपरा को लेकर झिझक और शर्म है. जबकि पुरानी पीढ़ी अभी भी ऐसे उत्सव करना चाहती है, उनकी समझ में ये एक स्त्री के जीवन का ख़ूबसूरत हिस्सा है और ऐसे में परिवार का आशीर्वाद लेना चाहिए और परम्परा को जीवित रखना चाहिए. इन दिनों अधिकतर शिक्षित घरों में ऐसे निर्णय सम्मिलित रूप से लिए जाते हैं. कुछ लोग इसमें सिर्फ़ एक छोटा सा आयोजन करके सिर्फ़ परिवार के लोगों को बुलाते हैं. समाज की बदलती संरचना की कारण कुछ ग़रीब परिवारों में ऐसे आयोजन इसलिए नहीं होते कि बड़ी हो गयी लड़की के बारे में लड़कों को पता चलना ख़तरनाक है.

माहवारी के बारे में बात ना करना, इससे जुड़ी शर्म, इससे जुड़े गंदे और छिछले मज़ाक़ और इसे किसी औरतों की बीमारी या समस्या लेबल कर देना ही सबसे मुश्किल चीज़ है. देश की आधी आबादी जिसका सामना हर महीने करती है उसपर बात करने की और ज़रूरत है. पैड्स ही नहीं, बाक़ी तरीक़े जैसे कि मेन्स्ट्रूअल कप, सैनिटेरी नैप्किन डिसपोज़ल और बढ़ते कचरे के बारे में भी बात करना ज़रूरी है. वर्चूअल मीडिया की क्रांति सिर्फ़ एक हैशटैग से बना ख़ुमार ना हो और फ़िल्म के बाद ये मुद्दा कहीं खो ना जाए, ये हम सबकी ज़िम्मेदारी है. पैडमैन फ़िल्म अपने बाज़ारीकरण के बावजूद और ठीक उसके कारण भी इस मुद्दे पर लोगों को बात करने का एक प्लेटफॉर्म दे रही है. अब हम इस मुद्दे को कहां लेकर जाते हैं, ये हम सब पर निर्भर करता है.

मर्द और मौगा

Phullu

कहते हैं कि कला समाज का आइना होती है. 1985 में फ़िल्म मर्द में चाबुक से छिला हुआ जिस्म लिए अभिताभ बच्चन कहता है, ‘मर्द को दर्द नहीं होता’. हिंदी सिनेमा में बहुत सालों तक हीरो की यही छवि रही है. 2017 में आई फ़िल्म ‘फुल्लु’ में जब हीरो कहता है, ‘जो औरत का दर्द नहीं समझता, भगवान ओ के मर्द नहीं समझता’ तो इसमें वो स्टीरियोटाइप टूट सकता था, लेकिन फ़िल्म में किरदार के लिए ‘मौगा’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जो उन पुरुषों के लिए प्रयुक्त होता है जिनमें स्त्रियोचित लक्षण पाए जाते हैं. हम देखते हैं कि हीरो ख़ुद भी उस स्टीरियोटाइप से बंधे हुए हैं जिसमें संवेदनशील होने की अति दिखाई जाती है और कोरी भावुकता से जोड़ कर इसे सिर्फ़ स्त्रियों के खाते में लिखा जाता है.

पैडमैन यहां एक नया क़िस्म का ओजस्वी किरदार रचने की कोशिश करता है, फ़िल्म के ट्रेलर में ओरिजिनल ‘मर्द’, अमिताभ बच्चन की गहरी, गम्भीर और आकर्षक आवाज़ आपको हीरो से मिलवाती है…अमेरिका के पास सुपरमैन है, बैटमैन है, स्पाइडरमैन है, लेकिन इंडिया के पास…पैडमैन है’. फ़िल्म का नायक एक ग्लैमरस ‘सुपरहीरो’ है. ट्रेलर इस मुश्किल कहानी को जनमानस तक पहुंचाने के लिए आसान और ख़ूबसूरत ही नहीं, सबसे ज़रूरी फ़ैक्टर, ‘मनोरंजक’ बना देता है. मुद्दे का सरलीकरण इसका सतहीकरण भी करता हुआ महसूस होता है.

अपनी भतीजी के ऋतुकला संस्कार में महेश बाबू

अपनी भतीजी के ऋतुकला संस्कार में महेश बाबू

आते हैं फ़िल्म के मूल विषय पर - माहवारी. तो समाज में इससे जुड़े तीन फ़ैक्टर्ज़ होते हैं- पहला: आर्थिक समस्या पैड्स का महंगा होना, दूसरा: सामाजिक कारण- जैसे कि शर्म के कारण इनका अनुपलब्ध होना और इन दोनों के कारण उपजा हुआ स्वच्छता का कारक - माहवारी के समय आसान लेकिन गंदगी वाले उपाय करना जैसे कि लकड़ी का बुराद, गोबर के उपले, सूखे पत्ते और गंदा कपड़ा. अगर ये तीनों कारण फ़िल्म को काम्प्लिकेट करने के लिए काफ़ी नहीं हैं तो इनमें एक और फ़ैक्टर जुड़ जाता है - बाज़ार का. इसी विषय पर पिछले साल आयी फ़िल्म ‘फुल्लु’ के बारे में सिर्फ़ सुगबगाहट हुयी. जब की पैडमैन के पब्लिसिटी स्टंट इसे पब्लिक से जोड़ रहे हैं. जब तक ऐसे किसी विषय में मसाला नहीं डाला जाएगा, देश की पब्लिक फ़िल्म देखने नहीं जाएगी.

सैनिटरी नैप्किन से जुड़ी कई समस्याएं हैं इनमें पहली समस्या सैनिटरी पैड का महंगा होना है. ये सबसे आसान समस्या है और इसलिए इसका हल मुरुगनाथनम खोज सके. एक सस्ती मशीन कि जिससे बने पैड कम लागत में तैय्यार हो जाएं. बड़े मल्टीनैशनल कम्पनीज़ सैनिटेरी पैड्ज़ की ऐड्वर्टायज़िंग और डिस्ट्रिब्यूशन में बहुत पैसा ख़र्च करती हैं. जबकि मुरुगनाथनम की मशीनें गांवों में बिठायी जा सकती हैं और उनसे बने सस्ते पैड आसपास के इलाक़े में बेचे जा सकते हैं. देश में और भी कुछ व्यवसायी ऐसी कम लागत के पैड्स बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

इसके साथ ही इसका सामाजिक पक्ष एक बेहद उलझा हुआ हिस्सा है जिसके बारे में कोई एक सही मत नहीं हो सकता है. अपने ही देश में माहवारी को लेकर बहुत से अलग अलग विचार और परम्पराएं हैं. यहां एक मुठभेड़ सिर्फ़ पुराने और नए में ही नहीं उत्तर और दक्षिण भारत में भी है.

वर्चुअल मीडिया की क्रांति सिर्फ़ एक हैशटैग से बना ख़ुमार ना हो और फ़िल्म के बाद ये मुद्दा कहीं खो ना जाए, ये हम सबकी ज़िम्मेदारी है. पैडमैन फ़िल्म अपने बाज़ारीकरण के बावजूद और ठीक उसके कारण भी इस मुद्दे पर लोगों को बात करने का एक प्लेटफॉर्म दे रही है. अब हम इस मुद्दे को कहां लेकर जाते हैं, ये हम सब पर निर्भर करता है.

(पूजा उपाध्याय स्वतंत्र लेखन करती हैं, इस लेख में परंपराओं के बारे में दक्षिण भारत के अलग-अलग लोगों से बात करके लिखा गया है.)

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