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जन्मदिन विशेष: बचपन में कुल्हाड़ी लेकर क्यों स्कूल गए थे पंकज त्रिपाठी?

अपने सशक्त अभिनय से पहचान बनाने वाले पंकज त्रिपाठी के जन्मदिन पर खास

Updated On: Sep 28, 2018 08:43 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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जन्मदिन विशेष: बचपन में कुल्हाड़ी लेकर क्यों स्कूल गए थे पंकज त्रिपाठी?

पंकज त्रिपाठी अब फिल्म इंडस्ट्री का जाना माना नाम हैं. कुछ साल पहले तक उनका नाम बताने के बाद गूगल पर उनकी फोटो दिखानी पड़ती थी. फोटो देखते ही लोग कहते थे कि ओह, हां...अच्छा ये हैं पंकज त्रिपाठी. बड़े शानदार अभिनेता हैं भाई ये तो. कई लोग पंकज त्रिपाठी को विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ओंकारा’ के सुपरहिट गाने-‘नमक इश्क का’ से पहचानते थे. बिपाशा बसु पर फिल्माए गए और रेखा भारद्वाज के गाए इस गाने के बीच में पुलिस थाने में पंकज त्रिपाठी की ‘एंट्री’ और फिर उनका हाथ में बीयर की बोतल लेकर कमर मटकाते नाचना कईयों को याद है.

ओंकारा 2006 में आई थी. इसके बाद भी पंकज त्रिपाठी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल में नजर आते रहे. हां, लेकिन ये सच है कि पंकज जब भी स्क्रीन पर आए नोटिस हुए. इसीलिए गूगल पर तस्वीर देखकर हर किसी ने उन्हें पहचाना और सराहा. ओंकारा के करीब पांच-छ साल बाद वो फिल्म आई कि पंकज त्रिपाठी को लोग नाम और शक्ल से एकसाथ जानने लगे. वो फिल्म थी गैंग्स ऑफ वासेपुर. फिल्म में सुल्तान कुरैशी का किरदार निभाने के बाद पंकज को वो पहचान मिल गई जिसके वो हकदार थे.

अंग्रेजी के एक प्रोफेसर को उस फिल्म में सुल्तान का रोल इतना पसंद आ गया कि उन्होंने पंकज से कहा कि वो सुल्तान के हाथों मरना चाहेंगे. जाहिर है उस फिल्म के बाद पिछले तीन साल में तो पंकज त्रिपाठी के करियर का ग्राफ तेजी से ऊपर आया और आज वो कई बड़े निर्माता निर्देशकों के पसंदीदा कलाकार हैं. उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है. आप पंकज से पूछिए कि जब आपको लोग शक्ल से जानते थे लेकिन नाम से नहीं तब का पसंदीदा रोल कौन सा है- वो बताते हैं ‘मसान’ फिल्म में मेरे दो सीन थे. रेलवे क्लर्क का रोल था. वो छोटा सा रोल मुझे कभी नहीं भूलेगा. हालांकि तब तक इंडस्ट्री में ठीकठाक पहचान बन चुकी थी. मसान का वो रोल वाकई बड़ा नोटिस हुआ था. इसके अलावा नील बटा सन्नाटा, फुकरे, बरेली की बर्फी जैसी फिल्मों ने भी पंकज को पहचान दिलाई है.

पंकज की कहानी दिलचस्प है. जन्म हुआ बिहार के गोपालगंज में. सामान्य सा परिवार था. सामान्य घरों के बचपन जैसा बचपन था. घर से स्कूल. स्कूल से घर. जरूरत पड़ी तो पिता के साथ खेती में हाथ बंटाना. पंकज के मन में एक शरारत का ‘एलिमेंट’ हमेशा से था. अब भी है. वो हसंते हुए बताते हैं कि मैं तो बचपन से बड़ा उपद्रवी था. हमारे गांव में एक बड़े भाई जैसे थे. उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल खोला था. उन्हें गांव के लोग कहते थे कि इनका दिमाग खिसक गया है. पागल हो गया है. मेरी उम्र 9-10 साल रही होगी. हम बच्चे भी जानते थे कि उन्हें गांव के बड़े-बूढे पागल बुलाते हैं.

उन्हीं दिनों की बात है कि फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ रिलीज हुई थी. फिल्म में एक गाना था- ‘दिल दीवाना बिन सजना के माने ना, ये पगला है समझाने से समझे ना’. मैं जैसे ही उनको देखता था, बस यही गाना गाने लगता था. सारा जोर उस लाइन पर होता था- ये पगला है समझाने से समझे ना. हम लोगों की इस शरारत को समझते तो वो भी थे, एक दिन उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने गुस्से में कहा कि तुम्हारा कान काट दूंगा. अगले दिन मैं स्कूल में अपने साथ कुल्हाड़ी लेकर गया था कि अगर उन्होंने मुझे काटा तो मैं भी उन्हें काट दूंगा.

घर से स्कूल और स्कूल से घर के रास्ते में थिएटर कहां से आया? इस सवाल के जवाब में पंकज बताते हैं, 'हमारे गांव में एक सज्जन थे तारकेश्वर तिवारी. उन्हें पोलियो था. वो बिस्तर पर ही रहते थे. वो गांव देहात में सेक्स एजुकेशन की बातें करते थे. अपनी बात ही यहां से शुरू करते थे कि आओ बच्चों मैं तुम्हें एक नई दुनिया दिखाता हूं. इसके अलावा वो नाटक लिखते थे. पूरा प्लान बनाते थे कि इस बार ये नाटक किया जाएगा. कहीं न कहीं मेरे अंदर भी नाटक का बीजारोपण वहीं से हुआ. बाद में जब मैं पटना में थिएटर करने लगा तो वो बहुत खुश होते थे. उनकी चाहत थी कि मैं एक दिन फिल्मों में भी अभिनय करूं. बड़ा अफसोस होता है कि जब मैं अभिनेता बना तब तक वो दुनिया से जा चुके थे.'

पंकज की एक्टिंग का वो किस्सा तो अब फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर है जब उन्होंने बचपन में अपने गांव में एक लड़की का रोल किया था. नाटक बनाने वाले ने सबसे पहले पंकज से कहा कि अपने बाबू जी जाकर पूछ लो कहीं उन्हें आपत्ति न हो. दरअसल डायरेक्टर को इस बात का डर था कि कहीं पंकज के पिताजी अपने बेटे के लड़की बनने से नाराज होकर बीच नाटक में ही मारपीट पर ना ऊतारू हो जाएं. उस समय पंकज नौंवी-दसवीं में पढ़ते थे और अपने गांव में ब्राह्मण परिवार के इकलौते ऐसे बच्चे थे जो नाटक में लड़की बनने जा रहा हो.

पंकज याद करके बताते हैं, 'पिता जी ने कहा तुन्हें जो करना है करो. उन्होंने मुझे कभी मना नहीं किया. पिता जी के अलावा बाद के दिनों में जो टीचर्स मिले उन्होंने भी मुझे ‘सपोर्ट’ ही किया. यहां तक कि जब मैं होटल में नौकरी करता था तो मेरे साथ के लोग या मेरे सीनियर भी मुझे एक्टिंग को लेकर बहुत ‘सपोर्ट’ करते थे.

मायानगरी मुंबई के संघर्ष भी बड़े निराले होते हैं. क्या पंकज को कभी भूखे पेट भी सोना पड़ा, पंकज कहते हैं कि नहीं ऐसा कभी नहीं हुआ. ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैंने अपनी जरूरतों को बहुत सीमित करके रखा. हम लोग बहुत ही छोटे घर में रहते थे. गांव में जितनी बड़ी मेरे घर की रसोई थी मुंबई में शुरुआती दिनों में पूरा घर उतना ही बड़ा था. पत्नी नौकरी करती थीं. 1200 रुपए में पूरे महीने का राशन आ जाता था. इसलिए भूखे पेट सोने का संघर्ष कभी नहीं रहा.'

न्यूटन में पंकज त्रिपाठी

न्यूटन में पंकज त्रिपाठी

पंकज त्रिपाठी का अपनी पत्नी से प्यार का इजहार भी निराला है. जान-पहचान पहले से थी. लिहाजा एक बार ट्रेन से कलकत्ता के रास्ते में पंकज ने अपने प्यार का इजहार किया था. इतना उपद्रवी और मजाकिया होने के बाद भी फिल्मों में अब तक पंकज ने ज्यादातर गंभीर किस्म के रोल किए हैं. क्या आपको लगता है कि कॉमेडी का बेस्ट रोल अभी आना बाकी है? पंकज कहते हैं, 'निश्चित रूप से. अभी स्त्री फिल्म में मैंने छोटा सा परिचय दिया है कॉमेडी का, जिसकी बहुत तारीफ हो रही है. लेकिन कॉमेडी का जो पूरा ‘एलिमेंट’ मेरे अंदर है उसका बेस्ट परफॉर्मेंस आना अभी बाकी है.'

क्या अब इंडस्ट्री ने पूरी तरह पंकज को स्वीकार कर लिया है? क्या अब संघर्ष के दिन बीत चुके हैं? पंकज कहते हैं कि अब इतना तो हो गया है कि बैंक बैलेंस की चिंता नहीं रहती. अब बस ये चिंता रहती है कि अभिनय को वापस कुछ दे सकूं. नए-नए कलाकारों से मिल सकूं. अपने अभिनय के ‘क्राफ्ट’ पर काम कर सकूं. बतौर एक्टर ‘ग्रो’ करता रहूं, क्योंकि अब बतौर अभिनेता मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई है. मुझे यकीन है कि ईमानदारी और ‘सिंसिएरिटी’ बेकार नहीं जाती. अभिनय का ‘प्रॉसेस’ सीखने वाला है. हम रोज सीखते हैं. बस ये ‘क्राफ्ट’ कायम रहे. कोई कॉम्प्लिमेंट जो पंकज को भूलता ना हो? जी, न्यूटन देखने के बाद महेश भट्ट ने फोन करके कहा था सामने होते तो गले लगा लेता.

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