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जन्मदिन विशेष: एक ऐसा साधक जिसकी गायकी में है घरानों का संगम

तीन घरानों की गायकी में माहिर पंडित उल्हास कशालकर अपने आप में अनूठे हैं

FP Staff Updated On: Jan 14, 2018 09:32 AM IST

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जन्मदिन विशेष: एक ऐसा साधक जिसकी गायकी में है घरानों का संगम

एक आवाज़,तीन घराने और तीनों ही घरानों की खालिस सच्ची प्रामाणिक गायकी, किसी एक कलाकार को लेकर ऐसा कम ही सुनने को मिलता है, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एक गायक ऐसे भी हैं जिनसे तीन-तीन घरानों की शुद्ध गायकी सुनी जा सकती है. खयाल गायन के तीन प्रमुख घरानों, ग्वालियर, जयपुर-अतरौली और आगरा की गायन शैलियों पर उन्हें समान अधिकार है और वो इन तीनों के प्रतिनिधि गायक समझे जाते हैं. वो गायक हैं पंडित उल्हास कशालकर. आज पंडित उल्हास कशालकर का जन्मदिन है. आइए 14 जनवरी के दिन 1955 में जन्मे उल्हास कशालकर के संगीत सफर के बारे में आपको बताते हैं. पंडित उल्हास कशालकर के गाए राग भैरव को सुनिए और उसके बाद उनके संगीत सफर के किस्से.

नागपुर से हैदराबाद के बीच में एक छोटा-सा कस्बा है पंढरकोढ़ा. उल्हास कशालकर वहीं अपने पिता नागेश दत्तात्रेय कशालकर के साथ रहते थे. पिता पेशे से वकील थे लेकिन संगीत का बहुत शौक था, ग्वालियर घराने के मटंगीबुआ से गाना सीख भी चुके थे. पिता ने ही उल्हास कशालकर का बचपन में सुरों से परिचय कराया. घर में बचपन से ही तानपुरा और हारमोनियम के स्वर गूंजते थे. उल्हास के बड़े भाई भी गाते थे और घर में गंधर्व महाविद्यालय का सेंटर था. उल्हास बचपन से ही पुणे, मुंबई, बड़ौदा में होनेवाले म्यूजिक कंपटीशंस में शरीक होते थे और इनाम जीतते थे.

पंढरकोढ़ा से ही उन्होंने बीए किया और उसके बाद नागपुर विश्वविद्यालय से संगीत में एमए किया. नागपुर यूनिवर्सिटी में ग्वालियर घराने के दिग्गज गायक विनायकराव पटवर्धन के शिष्य अनंत केशव कोगजे थे, जो खयाल और ठुमरी गाते थे. एक गुरु प्रभाकर राव खरदेनिवेश जी भी थे. एमए करते हुए उल्हास ने इन दोनों से सीखा और इन्हीं की प्रेरणा से संगीत को जीवन बनाने का संकल्प लिया. इस वीडियो में पंडित उल्हास कशालकर राग भीमपलासी गा रहे हैं.

एमए में टॉप करने के बाद गुरु की तलाश में उल्हास कशालकर पहले पंडित गजाननराव जोशी के पास गए. जोशी जी बुजुर्ग हो चुके थे, उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी और वो गाना और वायलिन बजाना दोनों छोड़ चुके थे. वो सिखाने के लिए तैयार नहीं हुए. फिर उल्हास पंडित राम मराठे के पास गए जो ग्वालियर और आगरा जैसे कई घरानों का गाना जानते थे. पंडित राम मराठे ने जगन्नाथ बुआ पुरोहित से 15 साल तक आगरा घराने की गायकी सीखी थी. वो मराठी रंगमंच में अभिनय और निर्देशन भी करते थे. राम मराठे से उल्हास कशालकर ने करीब डेढ़ साल तक गाना सीखा और फिर गजाननबुआ के पास दोबारा गए. गजानन बुआ सिर्फ 15 मिनट सिखाने को तैयार हो गए. चार-पांच महीने तक यमन की तालीम चलती रही.

उल्हास कशालकर बताते हैं, ‘गजाननबुआ से सीखते वक्त पता चला कि गाना क्या है, घरानेदार गायकी क्या होती है. एक-एक मात्रा का हिसाब और राग का चलन सबको संभालकर आगे बढ़ना और अपनी बात कहना. वो भी इस तरह कि सुननेवाले को आनंद आ जाए. गजानन बुआ जोशी से उन्होने आगरा और जयपुर-अतरौली घराने की स्टाइल भी सीखी. इस छोटे से वीडियो में आपको पंडित उल्हास कशालकर की तैयारी देखने को मिलेगी. जो राग दरबारी है.

उल्हास कशालकर कम गाए जानेवाले रागों को भी शुद्ध शास्त्रीय रूप में अवतरित करने के लिए जाने जाते हैं. एक इंटरव्यू में उल्हास कशालकर बताते हैं- ‘मैं जब ग्वालियर के राग गाता हूं तो ग्वालियर की शैली में. लेकिन जयपुर के राग जिस तरह से मिले, उन्हें जयपुर की शैली में उसी तरह से प्रस्तुत करता हूं, जैसे सावनी, रईसा कान्हड़ा, खट या खोकर. आगरा के मेघ, बरवा, गारा कान्हड़ा वगैरह, उन्हें आगरा के ढंग से ही, फिर ग्वालियर की नजर से नहीं देखता हूं. मेरे दोनों गुरु ही, गजाननबुआ और राम मराठे, विलायत हुसैन खां के शागिर्द थे.’ उल्हास कशालकर के दोनों गुरु रामभाऊ और गजानन बुआ पुरानी शैली के गायक थे. यही बात उल्हास की गायकी में भी दिखाई देती है. करीब बीस साल पहले की इस रिकॉर्डिंग में पंडित उल्हास कशालकर राग पूरिया धनाश्री और राग सावनी गा रहे हैं.

उल्हास ने ग्वालियर, जयपुर और आगरा तीनों घरानों की गायकी को आत्मसात किया है. कई बार एक ही परफॉरमेंस में वो तीनों घरानों की स्टाइल दिखाते भी हैं. राग के चलन को बरतते हुए उल्हास कशालकर तीनों घरानों की खूबसूरती बयान कर सकते हैं. हालांकि अपनी गायकी का आधार वो ग्वालियर को ही मानते हैं. उल्हास कशालकर उतने बुजुर्ग नहीं हुए हैं लेकिन उनका दुर्लभ रागों और बंदिशों का चयन, गायकी की शैली और सुरों का लगाव पुराने जमाने में ले जाता है. मुश्किल से मुश्किल राग को वो ऐसी सहजता से परोसते हैं कि सुननेवालों को सिर्फ राग की मिठास ही महसूस होती है. अपने गुरुओं से मिली तालीम में उल्हास जी अपनी उपज को बहुत खूबसूरती से मिक्स करते हैं. उल्हास कशालकर काफी समय तक पुणे रेडियो स्टेशन में प्रोग्राम एग्जिक्यूटिव रहे. 1993 में वो कोलकाता की मशहूर आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी में गुरु हो गए .

संगीत रिसर्च एकेडमी में गुरु के तौर पर उन्हें बहुत मान सम्मान मिला है. उन्होने अनगिनत होनहार शिष्य तैयार किए हैं. उल्हास कशालकर आज एक सिद्ध गायक हैं. संगीत के जरिए खुद को, अपनी कल्पना कोअभिव्यक्त करते हैं. देश के सम्मानित और व्यस्ततम गायकों में गिने जाते हैं. उनको सुनने के लिए संगीत समारोहों में भीड़ जुटती है.  भारत सरकार की ओर से पंडित उल्हास कशालकर को संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और पद्मश्री से नवाजा जा चुका है. इसके अलावा भी उन्हें कई सम्मानित पुरस्कारों से नवाजा गया है. दुआ है कि पंडित उल्हास कशालकर की संगीत साधना यूं ही चलती.

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