Co Sponsor
In association with
In association with
S M L

रवींद्रनाथ टैगोर की अधूरी प्रेम कहानियों में बहुत दर्द भरा है

रवींद्रनाथ का हृदय आजीवन प्रेम की भरपूर बारिश में सराबोर को आतुर रहा, वो जीवनभर रह-रहकर बौछारों में हल्का सा भीगते रहे

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jul 02, 2017 02:40 PM IST

0
रवींद्रनाथ टैगोर की अधूरी प्रेम कहानियों में बहुत दर्द भरा है

प्रियंका चोपड़ा एक मराठी-बांग्ला द्विभाषी फिल्म बना रही हैं. रवींद्रनाथ टैगोर और उनकी कथित प्रेमिका अन्नपूर्णा तुरखुद की कहानी पर बन रही इस फिल्म को शांतिनिकेतन की एक कमेटी जांचे परखेगी. ताकि उसमें कुछ भी आपत्तिजनक न जाए.

वैसे यह पहला मामला नहीं है जब रवींद्रनाथ टैगोर के निजी जीवन पर चर्चा हुई हो. नोबेल विजेता कवि के जीवन में समय-समय पर आईं महिलाओं की एक लंबी लिस्ट और रोचक कहानियां हैं.

सूर्य के सामने कमल 

वियोग का दर्द कवि बनने की पहली शर्त है. टैगोर भी इससे अछूते नहीं थे. 1878 में 17 साल के रवींद्रनाथ को इंग्लैंड जाना था. उससे पहले उनके भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर ने उनको बॉम्बे के डॉ. आत्माराम पांडुरंग तुरखुर्द के घर पर दो महीने के लिए रखा.

डॉक्टर साहब की 17-18 साल की बेटी अन्नपूर्णा को कहा गया कि रवि (रवींद्रनाथ) को अंग्रेजी सिखाई जाए. बताया जाता है कि ऐना (अन्नपूर्णा) को रवि से लव ऐट फर्स्ट साइट जैसा कुछ हो गया. चंचल ऐना शर्मीले रवि को दिनभर परेशान करती, चुहल करती और छेड़ती.

एक दिन ऐना को पता चला कि रवि बाबू कविता लिखते हैं. उसने चैलेंज दिया कि मेरे लिए कविता लिखो.

रवि ने कविता लिखी मगर ऐना का नाम नलिनी रख दिया. 'शोनो गो सोखी खोलों आंखी... घूम ऐखोनो भांगिलो नाकी' सुनो रे सखी आंखें खोलो...अभी नींद नहीं टूटी है क्या.

राग भैरवी में रचकर सुनाई गई इस कविता ने ऐना के प्रेम को गहरा कर दिया. ऐना रवि को लेकर संजीदा हो गई. मगर रवि को तो इंग्लैंड जाना था, और वो चला भी गया. दत्ता और रॉबिन्सन की लिखी किताब ‘मैरिएड माइंडेड मैन’ में जिक्र मिलता है कि इस प्रेम का पता ऐना के पिता को चल चुका था. 1879 में वो ठाकुरबाड़ी गए. बेटी का रिश्ता लेकर. रवि के पिता देवेंद्र बाबू ने मना कर दिया. ऐना टूट गई.

रवि ने नलिनी को नायिका बनाकर कविता की किताब ‘कवि काहिनी’ लिखी. ऐना को इसकी सारी कविताएं जबानी याद थीं. उसका कहना था कि इन कविताओं को सुनकर वो डेथ बेड से भी वापस आ सकती है.

Annapurna-Rabindranath Tagore

अन्नपूर्णा तुरखुर्द और रवींद्रनाथ टैगोर

1880 में ऐना की शादी एक स्कॉट हेडमास्टर से हो गई. कुछ सालों में वो इंग्लैंड रहने चले गए. इसके बाद जीवन भर नलिनी नाम से लिखने वाली ऐना 1891 में चल बसी. रवींद्रनाथ ने एक नाटक लिखा नायिका का नाम ‘नलिनी’ रखते हुए, जिसका समर्पण वाला पन्ना कोरा छोड़ दिया गया था.

जीवन के आखिरी सालों में गुरुदेव अपनी इस कहानी पर बोले. कृष्णा कृपलानी की जीवनी में जिक्र आता है. रवींद्रनाथ का कहना था कि हम दोनों में रस्साकशी का खेल चल रहा था. मुझे अंदाजा नहीं था कि वो हार मानकर मुझ पर आश्रित हो जाएगी. उसने मुझसे कहा था कि तुम्हारा चेहरा सुंदर है. कभी दाढ़ी मत रखना. स्पष्ट है कि मैंने उसकी सलाह नहीं मानी. पर शुक्र है कि उसको कभी मेरा दाढ़ी वाला चेहरा देखना नहीं पड़ा.

वैसे 17 साल के उस कवि ने ऐना को नलिनी नाम ऐसे ही नहीं दिया था. संस्कृत साहित्य में नलिनी की उपमा उस कमल के लिए इस्तेमाल की जाती है, जो सूरज यानी रवि को देखते ही खिल उठता है.

पर पहला प्रेम तो कोई और था 

शायद अन्नपूर्णा के जीवन में रवि पहला प्रेम हों, मगर रवींद्रनाथ की नियति में दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से ये जगह किसी और के लिए थी. गुरुदेव की मां बहुत कम उम्र में गुजर गईं थी. 10 साल के रवि को दोस्ती करने के लिए एक साथी मिल गई. 12 साल की कादंबरी देवी रवि के बड़े भाई ज्योतिंद्रनाथ की पत्नी और परिवार की बालिका वधू थीं.

रवि और कादंबरी दोनों ठाकुरबाड़ी के दालानों, बरामदों में साथ घूमते. कादंबरी की तरफ से रवि के लिए खयाल रखने का भाव भी था. रवि कविताएं लिख कर कादंबरी को सुनाता. सामने से पंखा झलते हुए कादंबरी उन्हें मुकम्मल करतीं. धीरे-धीरे बचपन से यौवन आने लगा. मगर दोनों की अंतरंगता बढ़ती रही. अब रिश्तेदार पीठ पीछे खुसर-फुसर करने लगे थे. सामने व्यंग्य के तीर छोड़ जाते. दोनों के संबंधों को तमाम मसालों के साथ सुनाया जाता.

रवींद्र के पिता देवेंद्र बाबू ने रवि की शादी करवाने का फैसला लिया. 1884 में 22 साल के रवींद्र की शादी 10 साल की मृणालिनी से करवा दी गई. इसके 4 महीने बाद 19 अप्रैल, 1884 को कादंबरी ने जहर पी लिया. 21 अप्रैल को उनकी मौत हो गई. आत्महत्या का कोई कारण स्पष्ट रूप से लिखा नहीं मिलता. मगर धारणा है कि इसके पीछे रवींद्रनाथ की शादी सबसे बड़ी वजह थी.

टैगोर ने एक और कविता की किताब लिखी जिसका नाम था ‘भांगा हृदय’ (टूटा दिल). गुरुदेव के लिखे गीतों में कहीं-कहीं पर प्रेम में असीम दुख का जिक्र मिलता है. उनका बसंत पर लिखा एक प्रसिद्ध गीत है. ‘आए खैला भांगार खैला, खेलबी आए.’ आओ आज खेल खत्म कर देने का खेल खेलते हैं.

जीवनसंगिनी का साथ 

कभी मीरा और कभी राधा के होने में अक्सर लोग रुक्मिणी का दर्द भूल जाते हैं. 10 साल की मृणालिनी को ब्याह के तुरंत बाद कादंबरी देवी के अनुभव से गुजरना था. ऊपर से रवींद्रनाथ जैसी शख्सियत की अर्धांगिनी होने का दबाव.

मृणालिनी ने बांग्ला, संस्कृत और अंग्रेजी की पढ़ाई की. रामायण का अनुवाद किया. 13 साल की उम्र में पहले बच्चे को जन्म देने के बाद से परिवार के सामने आदर्श दंपति होने के सारे रिवाज निभाती रहीं. 29 साल की उम्र में 1891 में वो चल बसीं. रवींद्रनाथ सब कुछ छोड़कर दो महीने तक पत्नी की सेवा करते रहे. बाद में मृणालिनी को समर्पित करते हुए उन्होंने ‘समर्पण’ लिखी.

रंगहीनता को हटाने वाली विदेशिनी

आश्चर्य की बात है कि प्रकृति की सुंदरता को कई तरह से परिभाषित करने वाले रवींद्रनाथ लाल रंग नहीं देख पाते थे. अभिनेता और लेखक मानव कौल का इसपर ‘कलर ब्लाइंड’ नाम से एक ड्रामा भी है.

अधेड़ रवींद्रनाथ को अर्जेंटीना से एक दोस्त मिली. 1924 में अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में विक्टोरिया ओकॉम्पो से मुलाकात के बाद दोनों में पत्र व्यवहार चलता रहा. धीरे-धीरे विक्टोरिया ने इस प्रसिद्ध कवि के मन की गांठों को छुआ. उन्हें पेंटिंग करने के लिए प्रेरित किया. रंगों के मामले में सीमित दायरे में बंधें रवींद्रनाथ ने पेंटिंग भी बनाईं, उनकी प्रदर्शनियां भी लगीं.

संगीत में गुरुदेव ने अपनी इस विदेशिनी (जिसे वो विजया कहते थे) को एक खास जगह दी है.

'आमी देखेची शारद प्राते तोमाए. आमी देखेची माधवी राते तोमाए आमी आकाशे पातिया कान सूनेची-सूनेची तोमारी गान, आमी सूनेची आमी चीनी गो चीनी तोमारे ओ गो विदेशिनी, तूमी थाको सिंधु पारे ओगो विदेशिनी.'

'मैंने देखा है शारद प्रातः में तुम्हें, मैंने देखा है माधवी रात में तुम्हें. मैंने आकाश में कान लगाकर तुम्हारा गाना सुना है. हां, मैंने सुना है मैं पहचानता हूं तुम्हें ओ विदेशिनी, तुम नदी के पार रहती हो न विदेशिनी'

इसके अलावा भी कविवर के जीवन में हर उम्र और पीढ़ी की तमाम महिलाएं अलग-अलग तरह से जुड़ती रहीं. वो सब को ढेर सारे खत लिखते. रवींद्र संगीत में रचे उन 2500 से ज्यादा अपने गीतों से अलग. शायद रवींद्रनाथ का हृदय आजीवन प्रेम की भरपूर बारिश में सराबोर को आतुर रहा और वो जीवनभर रह-रहकर बौछारों में हल्का सा भीगते रहे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
जो बोलता हूं वो करता हूं- नितिन गडकरी से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi