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‘डॉन’ को पकड़ने के चक्कर में ‘दबोची’ गई पुलिस टीम को ‘हथियाने’ की जिद पर जब अड़ गईं दो देशों की सरकारें!

पड़ताल के दौरान कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि शिकारी (पड़ताली पुलिस टीम) खुद ही शिकार हो जाता है. तमाम चाक-चौबंदियों के बाद भी पड़ताली टीम की जान जोखिम में पड़ जाती है.

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Jun 23, 2018 09:17 AM IST

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‘पड़ताल के दौरान कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि शिकारी (पड़ताली पुलिस टीम) खुद ही शिकार हो जाता है. तमाम चाक-चौबंदियों के बाद भी पड़ताली टीम की जान जोखिम में पड़ जाती है.’ सांसें रोक देने वाली ऐसी ही जानलेवा आपबीती का अनुभव रहा है दिल्ली पुलिस की टीम का. वास्तव में किसी जमाने में जिसे जान और इज्जत बचाने के लाले पड़ गये थे. जब वो चोरी-छिपे ‘डॉन’ की एक झलक पाने की ललक में, पड़ोसी मित्र देश की सर-ज़मीं पर जा धमकी थी.

कैसे बची थी उस पड़ताली टीम की जान और इज्जत? इस शनिवार ‘पड़ताल’ की कड़ी में हम ऐसे ही तमाम जटिल सवालों के बेबाक जबाव देंगे. 1990 के दशक में मील का पत्थर साबित हुई एक पुरानी ‘पड़ताल’ की सच्ची घटना सुना रहे हैं. आज पूरे 25 साल बाद. दिल्ली पुलिस के उन्हीं आला ‘पड़तालियों’ की मुंहजुबानी, पड़ताल की दुनिया का शानदार इतिहास लिखने की ललक में, जिन्होंने खुद की जिंदगियां बिछा दी थीं रूह कंपा देने वाली मौत की राह में!

25 साल पहले देश की सबसे मंहगी किडनैपिंग

घटना है थाना दक्षिणी दिल्ली के सी.आर. पार्क (चितरंजन पार्क) इलाके की. सन 1993-94 में मार्च का महीने था. शाम के समय टहलने निकले एस.एल. पाहवा दो घंटे बाद भी वापस घर नहीं लौटे. परेशान हाल परिजनों ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने पाहवा की तलाश शुरू कर दी. दिल्ली के पॉश एरिया ग्रेटर कैलाश इलाके में रहने वाले पाहवा भारत के नामी-गिरामी होटल व्यवसायियों में शुमार थे. अपहरण की घटना के कुछ समय बाद ही पाहवा के घर दुबई से फोन-कॉल आयी. फोन करने वाले ने खुद को ‘डॉन-भाई’ बताया. उस जमाने में ‘डॉन भाई’ का मतलब सिर्फ और सिर्फ दाऊद इब्राहिम होता था.

अपहरण में दाऊद के गुर्गों का जिक्र आते ही परिवार वालों और दिल्ली पुलिस को पसीना आ गया. डॉन के गुर्गों ने बजरिये टेलीफोन धमकाया था कि 24 घंटे के भीतर 5 करोड़ फिरौती का इंतजाम कर लो. वरना एस.एल. पाहवा की हत्या कर दी जायेगी. उस वक्त दिल्ली के पुलिस कमिश्नर थे एम.बी. कौशल (मुकुंद बिहारी कौशल). 1979 बैच (अग्मू कॉडर) के आईपीएस आलोक कुमार वर्मा दक्षिणी जिला (दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर और वर्तमान में केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई के डायरेक्टर) और 1984 बैच के आईपीएस (अग्मू कॉडर) दीपक मिश्रा (वर्तमान में केंद्रीय सुरक्षा बल सीआरपीएफ में स्पेशल डायरेक्टर हेडक्वार्टर/वर्क्स/ ऑपरेशंस) पश्चिमी दिल्ली जिला के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) थे.

‘भाई’ को दबोचने को बनाई गयी उसके ‘दुश्मनों’ की टीम!

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आनन-फानन में पुलिस कमिश्नर एम.बी. कौशल ने पड़ताली टीम के गठन की जिम्मेदारी दीपक मिश्रा के हवाले कर दी. यह जानते हुए भी कि दीपक मिश्रा पश्चिमी जिले के डीसीपी हैं (उस वक्त) जबकि, अपहरण की घटना घटी थी दक्षिणी जिले में. अपहरण में दाऊद सा खूंखार डॉन संदिग्ध था. दीपक मिश्रा ने टीम में शामिल किया एसएचओ कालका जी इंस्पेक्टर राजेंद्र बख्शी और नई दिल्ली जिले के स्पेशल-स्टाफ में तैनात सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा को (दोनों ही पड़ताली अफसर एसीपी के पद से रिटायर हो चुके हैं). 25 साल पुरानी उस जोखिम भरी पड़ताल की यादों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं टीम के पड़ताली अफसरों में से एक रिटायर्ड एसीपी हरचरण वर्मा.

डीसीपी ने थानेदारों की पत्नियां पार्टी से घर भिजवा दीं!

बकौल हरचरण वर्मा, ‘अपहरण हुए दो दिन बीत चुके थे. एस.एल. पाहवा जैसी ‘मंहगी’ किडनैपिंग में पुलिस का रिजल्ट ‘जीरो’ और जोखिम ‘हाई-लेवल’ का था. सरकार का पुलिस कमिश्नर पर पुलिस कमिश्नर का डीसीपी दीपक मिश्रा और पड़ताली टीम पर पाहवा की सकुशल रिहाई कराने का लगातार दबाव बढ़ता जा रहा था.

एक रात टीम लीड कर रहे डीसीपी दीपक मिश्रा महरौली में उस जगह जा पहुंचे, जहां एसीपी वी. रंगनाथन की रंगारंग-पार्टी चल रही थी. मैं और इंस्पेक्टर राजेंद्र बख्शी सपरिवार पार्टी में मौजूद थे. डीसीपी मिश्रा साहब ने हम दोनो (राजेंद्र बख्शी और हरचरण वर्मा) को पार्टी-लॉन से बाहर बुला लिया. उन्होंने हम दोनो की पत्नियों को सविनय पार्टी बीच में ही छुड़वाकर अपने-अपने घरों को वापस भिजवा दिया.

उसी रात हम दोनों, जसवीर मलिक इंस्पेक्टर स्पेशल स्टाफ साउथ, सब-इंस्पेक्टर सुरेश कौशिक (एसीपी से रिटायर हो चुके हैं) इंस्पेक्टर ऑपरेशन सेल पश्चिमी जिला रवि शंकर कौशिक (दिल्ली के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रिटायर्ड डीसीपी) के साथ दीपक मिश्रा ने रात के दो बजे तक एक बे-नतीजा मीटिंग की. हां, मीटिंग में अपहरणकर्ताओं की वो ‘ऑडियो-रिकार्डिंग’ पुलिस टीम ने जरूर सुनी, जिसमें पाहवा को छोड़ने की एवज में 5 करोड़ की फिरौती मांगी गई थी.

मैंने वह आवाज अपने एक मुखबिर को सुनवाई. मुखबिर ने पहचान कर बताया कि, यह आवाज अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद की नहीं है, बल्कि उसके गुर्गे ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू की है.’

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उस रात पहली बार सुना डॉन बबलू का नाम और आवाज ‘बबलू का नाम सामने आया तो, उसी रात दोबारा नेहरू प्लेस पुलिस चौकी में पड़ताली टीम की मीटिंग हुई. चूंकि उन दिनों डॉन के नाम पर एक अदद दाऊद ही दुनिया की तमाम पुलिस और खुफिया एजेंसियों की आंखों में चढ़ा हुआ था. सो हमें एक बार को तो मुखबिर की बातों पर ही शक होने लगा था, लेकिन सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा को अपने उस मुखबिर पर बहुत ज्यादा विश्वास था. और मुझे उससे भी ज्यादा विश्वास इंस्पेक्टर राजेंद्र बख्शी तथा सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा के ऊपर था.’ उन दिनों बवाल-ए-जान बनी उस दिल दहला देने वाली ‘पड़ताल’ के खौफनाक मंजर का सच, आज 25 साल बाद बेबाकी से बयान करते हैं, उस टीम के प्रमुख रहे दबंग और सूझबूझ वाले आईपीएस अधिकारी दीपक मिश्रा.

खबर जूनियर इंजीनियर की, कामयाबी पुलिस को मिली

बकौल रिटायर्ड सहायक पुलिस आयुक्त हरचरण वर्मा, ‘मुखबिर से मुझे यह पता लग गया कि, अपहृत शिकार (पाहवा) को अपहरणकर्ताओं ने आरके पुरम इलाके में स्थित एक मशहूर स्कूल के आसपास किराये के किसी सरकारी फ्लैट में छिपा रखा है. फ्लैट में कुछ दिन पहले ही सोची-समझी साजिश के तहत अपहरणकर्ताओं ने ही ले-देकर लैंड-लाइन टेलीफोन लगवाया है. एमटीएनएल के जिस (महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड, दिल्ली) जूनियर इंजीनियर ने टेलीफोन कनेक्शन फ्लैट में लगाया, वो तो पुलिस के सामने कभी नहीं आया. हां, दिल्ली पुलिस को फ्लैट का एड्रेस मुखबिर ने लाकर जरूर थमा दिया.’

पुलिस खोजती रह गयी, अपहृत खुद ही छूट आया

टीम ने फ्लैट पर छापा मार कर अपहृत करोड़पति ‘शिकार’ को छुड़ा लेने की परमीशन मांगी. टीम लीड कर रहे पश्चिमी जिले के डीसीपी दीपक मिश्रा ने फ्लैट पर छापा मारने की इजाजत नहीं दी. लिहाजा पुलिस टीम मन मसोस कर फ्लैट के पास से खाली हाथ वापिस लौट गई. दिलचस्प यह रहा कि पुलिस पड़ताल ही करती रह गई, उधर बंधक होटल मालिक एसएल पाहवा संदिग्ध हालातों में खुद ही अपहरणकर्ताओं के चंगुल से सही-सलामत छूट गये. हैरान करने वाला करिश्मा आखिर कैसे हो गया? पीड़ित परिवार ने कभी उजागर नहीं किया. दिल्ली पुलिस ने कभी पूछा नहीं. यही वजह है कि उलझे तमाम सवालों का माकूल जवाब 25 साल बाद भी किसी के पास नहीं है.

आईपीएस दीपक मिश्रा

आईपीएस दीपक मिश्रा

पाहवा गुपचुप छूटे, गुरुजी का शागिर्द ‘खुलेआम’ पकड़ा संदिग्ध हालातों में ही सही मगर पाहवा की सकुशल रिहाई होते ही पुलिस टीम ने आरके पुरम स्थित उस संदिग्ध फ्लैट पर छापा मार दिया. नतीजा, दो दिन बाद बबलू श्रीवास्तव का गुर्गा केवल किशोर सैनी (केके सैनी, दिल्ली की अदालत ने कुछ साल पहले ही उसे उम्रकैद की सजा सुनाई है) पुलिस के हाथ चढ़ गया. नेहरू प्लेस पुलिस चौकी में सैनी से पड़ताली टीम प्रमुख डीसीपी दीपक मिश्रा की मौजूदगी में पूछताछ हुई. तब राज खुला कि दुबई और काठमांडू (नेपाल) में बैठा बबलू श्रीवास्तव खुद को ‘डॉन’ बताकर, बजरिये अपने पले हुए गुर्गों के, भारत में करोड़ों रुपये की धन-वसूली के काले-कोरबार में जुटा है.

सैनी से उस पूछताछ के दौरान सामने आये इन तमाम सनसनीखेज खुलासों की तस्दीक उस पड़ताली टीम के प्रमुख रहे आईपीएस दीपक मिश्रा और प्रमुख सदस्य दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी हरचरण वर्मा भी आज 25 साल बाद करते हैं.

‘शागिर्द’ ने ही पहुंचाई ‘गुरुजी’ की गर्दन तक पुलिस दीपक मिश्रा के मुताबिक,‘हमारी उस टीम के सक्रिय सदस्य रहे सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा के मुखबिरों का ही बताया हुआ वो रास्ता था, जो हमें बबलू की मांद के मुहाने तक ले जा सकता था. पाहवा अपहरण कांड में सबसे पहले सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा के हाथ लगा बबलू का भाड़े का बदमाश के.के सैनी. के.के सैनी ढीठ और आसानी से न खुलने वाला ‘हार्डकोर-क्रिमिनल’ और शार्प-शूटर था.

वह आसानी से उस्ताद (बबलू) के हर ‘राज’ से पर्दा उठाने को राजी नहीं था. हमने भी पूछताछ में जल्दबाजी नहीं की. ज्यों-ज्यों के.के. सैनी टूटता गया. हम उससे हासिल जानकारी के तार जोड़कर बबलू की गर्दन तक पहुंचने का रास्ता बनाते गये.’ हैरतंगेज उस पड़ताल के दिल दहला देने वाले मंजर को याद करते हुए दीपक मिश्रा आगे बताते हैं, ‘सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा और इंस्पेक्टर राजेंद्र बख्शी, बबलू श्रीवास्तव के बारे में काफी कुछ के.के सैनी से कबूलवा चुके थे. उसी ने बबलू के ‘राइट-हैंड’ बदमाश मंजीत सिंह उर्फ मंगा के बारे में बताया. दुबई और नेपाल में छिपा बबलू इन्हीं दोनों के दमखम पर भारत में कांट्रैक्ट-किलिंग, किडनैपिंग का काला-कारोबार कर रहा था.’

पाहवा अपहरण कांड की मुसीबत ने कई खुशियां भी दीं!

पाहवा भले ही संदिग्ध हालातों में छूटकर सलामत बच चुके थे, उनकी किडनैपिंग में हाथ आए कांट्रेक्ट किलर के.के सैनी ने पुलिस की गोद में एक साथ कई खुशियां डाल दी थीं. करीब 25 साल बाद इस हकीकत से दीपक मिश्रा और उनकी टीम के विश्वासपात्र और मुखबिर नेटवर्क के धनी रिटायर्ड एसीपी हरचरण वर्मा भी आज इंकार नहीं करते हैं. पूछताछ के दौरान ही के.के सैनी ने ही यह भी राजफाश किया था कि दाऊद इब्राहिम के हुक्म पर बबलू श्रीवास्तव ने ही बजरिये के.के सैनी और मंजीत सिंह मंगा ने इलाहाबाद में सर-ए-शाम कस्टम कमिश्नर एल.डी. अरोड़ा की गोली मारकर हत्या करवाई थी. अरोड़ा की ‘कांट्रेक्ट-किलिंग’ थी. शार्प-शूटर और कांट्रेक्ट-किलर सैनी के बयान पर विश्वास किया जाये तो, अरोड़ा को ठिकाने लगवाने की एक करोड़ की डील में दाऊद ने 50 लाख की मोटी रकम बबलू को एडवांस दे दी थी.

सीबीआई के मुलजिम, दिल्ली पुलिस ने ढूंढ निकाले!

दिल्ली पुलिस ने एक अदद बजरिये पाहवा अपहरण कांड, कस्टम कमिश्नर एलडी अरोड़ा हत्याकांड के ‘कांट्रैक्ट-किलर’ (केके सैनी और मनजीत सिंह मंगा) भी सीबीआई से पहले ही खोज निकाले. जबकि हाई-प्रोफाइल एल.डी. अरोड़ा हत्याकांड की जांच सीबीआई के सिर पर लंबे वक्त से लदी हुई थी. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बजरिये दिल्ली पुलिस हाथ लगी जानकारी की मदद से ही बाद में सीबीआई ने एलडी अरोड़ा हत्याकांड की पड़ताल आगे बढ़ाई. यह अलग बात है कि, इस मुद्दे पर न तो कभी सीबीआई ने खुलकर दिल्ली पुलिस की तारीफ की. न ही अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनकर दिल्ली पुलिस ने खुद कभी इसका श्रेय लेकर अपनी पीठ ठोंकी. सच को लेकिन नकारा भी तो नहीं जा सकता है.

कांटे से कांटा निकालने का फार्मूला बना गले की फांस

के.के सैनी से जैसे ही पुलिस को पता चला कि बबलू का अड्डा काठमांडू (नेपाल) में भी है. तो पड़ताली टीम की बांछें खिल गईं. दिल्ली पुलिस की आस्तीन में अंडरवर्ल्ड की दुनिया का वो ‘सपोला’ आने वाला था, दिल्ली पुलिस में ‘सिपाही’ से लेकर ‘कमिश्नर-साहब’ तक में से किसी ने भी पहले कभी जिसका नाम नहीं सुना था. दीपक मिश्रा ने इंस्पेक्टर राजेंद्र बख्शी, सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा के नेतृत्व में 8-10 सदस्यीय एक पड़ताली टीम गोरखपुर भेज दी (यही टीम बाद में काठमांडू में, नेपाल पुलिस के चंगुल में बुरी तरह फंस गयी थी). कहा जाता है कि एस.एल. पाहवा अपहरण कांड के मास्टर-माइंड बबलू को दबोचने के लिए दिल्ली पुलिस की पड़ताली टीम को गोरखपुर भेजे जाने की जाने-अनजाने बस एक अदद यही वो गलती हो गयी जिसने कालांतर में भारत और नेपाल जैसे दो मित्र-देशों को जिद पर अड़ाकर आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया था. हालांकि इन खबरों की पुष्टि और विरोध कभी न तो खुलकर भारत ने किया और न ही नेपाल ने.

डॉन की झलक पाने की ललक बनी थी बवाल-ए-जान

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हरचरण वर्मा

पड़ताली टीम के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर अपना मुंह इस संवाददाता के सामने अब जब 25 साल बाद खोला तो बताया, ‘हम लोग बा-असलहा दिल्ली से गोरखपुर के लिए रवाना हुए थे. प्लान था कि गोरखपुर के आसपास पहुंचकर काठमांडू में छिपे नौसिखिये कथित डॉन बबलू श्रीवास्तव का कोई न कोई लोकल-लिंक (भारत की सीमा में) खोज लेंगे. अचानक गोरखपुर में हालात कुछ ऐसे बन गये कि हम लोगों को काठमांडू (नेपाल सीमा में) के अंदर प्रवेश करना पड़ गया. रात में दिल्ली पुलिस की टीम को आम-आदमी की तरह काठमांडू में ही छिपकर रहना पड़ा. ब-जरिये मुखबिर हमें पक्का पता चल चुका था कि बबलू श्रीवास्तव उस दिन काठमांडू में मौजूद है.

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मुखबिर ने हमें वो कसीनो भी दिखा दिया, जहां बबलू अक्सर देर रात तक जुआं खेलता था. हमने सोचा कि हम कसीनो में सर-ए-आम बबलू पर हाथ डालेंगे तो, शोर-शराबा और हमारा (दिल्ली पुलिस की नेपाल में रेड का) जबरदस्त विरोध होगा. लिहाजा हमने तड़के अंधेरे में उस मकान से बबलू को काबू करने की सोची, जहां वह बहैसियत किरायेदार छिपकर रह रहा था.’

गद्दार ने दंगे कराके नेपाल में दिल्ली पुलिस फंसा दी!

उसी पड़ताली टीम के एक और भुक्तभोगी आला अफसर की मुंहजुबानी, ‘सुनियोजित योजना के तहत तड़के हमने (दिल्ली पुलिस टीम) उस मकान पर (काठमांडू में) छापा मार दिया, जिसमें खुद को डॉन और दाऊद इब्राहिम का राइट-हैंड कहने वाला, बबलू श्रीवास्तव कायरों की मानिंद छिपा हुआ था. दिल्ली पुलिस को छापे में बबलू नहीं मिला. पुलिस टीम समझ गयी कि मुखबिर ने हमारे साथ गद्दारी कर दी है. मुखबिर ने हमें बबलू के ठिकाने और मौजूदगी की जानकारी तो दी. साथ ही उसने, बबलू को भी काठमांडू में उसकी तलाश में घूम रही दिल्ली पुलिस टीम की जानकारी भी दे दी थी.

दिल्ली पुलिस द्वारा बबलू के ठिकाने पर छापा मारने की खबर काठमांडू शहर में फैली तो स्थानीय (काठमांडू) पब्लिक भड़क गयी. भीड़ ने शहर में कई जगह आगजनी-पथराव कर दिया. दंगा भड़कता देख हम लोग जान बचाने के लिए वहां से भाग खड़े हुए. अभी कुछ किलोमीटर ही भागे थे कि हथियारबंद नेपाल पुलिस ने हमें पकड़ लिया. नेपाली पुलिस हमसे (दिल्ली पुलिस टीम) हमारे हथियार मांगने पर अड़ गयी. जोकि वो लाख कोशिशों के बाद भी हमारे पास से बरामद नहीं कर सकी. घंटों नेपाल पुलिस ने हमें बंदूकों के साये में बंधक बनाकर पूछताछ की.

शाबासी कौन देता? दिल्ली आते ही टीम सस्पेंड हो गयी

बकौल हरचरण वर्मा, ‘मुसीबत की उस घड़ी में बड़े भाई की तरह दिल्ली में दिन-रात हमारी चिंता में जाग कर एक पांव पर खड़े थे डीसीपी दीपक मिश्रा. जिंदादिल आईपीएस अफसर दीपक मिश्रा के भगीरथ प्रयासों की बदौलत ही हम सब (नेपाल में फंसी दिल्ली पुलिस टीम) जैसे-तैसे बा-असलहा जिंदा अपनी सरहद में (भारतीय सीमा) वापस लौट सके.’

यहां उल्लेखनीय है कि बाद में यह मुद्दा इस हद तलक बढ़ गया कि काठमांडू की गुस्साई जनता को शांत करने के लिए उस वक्त के नेपाली प्रधानमंत्री, भारत सरकार के सामने इस बात पर अड़ गये कि काठमांडू में छापा मारने गयी दिल्ली पुलिस की टीम को हर-हाल में वह नेपाल के हवाले करे. अपुष्ट खबरों के मुताबिक, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मामला चूंकि पहले से ही हिंदुस्तानी-हुक्मरान और दिल्ली पुलिस के आला-अफसरान की नजर में था. सो नेपाली प्रधानमंत्री की उस मांग को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया. हालांकि इन चर्चाओं पर कालांतर में कभी न तो नेपाल सरकार ने और न ही भारत सरकार ने अपनी मुहर लगाई. उस हैरतंगेज पड़ताल के तमाम उतार-चढ़ाव झेलने वाली दिल्ली पुलिस टीम के सदस्य रहे हरचरण वर्मा दो दशक बाद जिक्र आने पर ठहाका मारकर बेसाख्ता हंसते हुए बताते हैं, ‘गुडवर्क का इनाम-इकराम मिलने की बात दूर की कौड़ी साबित हुई.

नेपाल पुलिस के चंगुल से जान बचाकर भारत लौटे. दिल्ली पहुंचते ही पूरी पुलिस टीम को दिल्ली पुलिस कमिश्नर एम.बी. कौशल ने सस्पेंड कर दिया था.’ इस संवाददाता के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, पुलिस टीम के सस्पेंशन के पीछे दबी जुबान नेपाली सरकार और वहां की जनता को शांत करना, उन दिनों प्रमुख वजह माना/समझा गया था. कुछ समय बाद पूरी पड़ताली पुलिस टीम बहाल कर दी गयी.’

सेकेंड लेफ्टिनेंट की जगह थानेदार बनना किया मंजूर

दिल्ली के मौजूदा पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक के साथ बायें से दाये एस.एल. पाहवा अपहरण कांड में बबलू श्रीवास्तव का नाम खोजकर सबसे पहले बाहर लाने वाले एसीपी हरचरण वर्मा रिटायरमेंट वाले दिन

दिल्ली के मौजूदा पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक के साथ एस.एल. पाहवा अपहरण कांड में बबलू श्रीवास्तव का नाम खोजकर सबसे पहले बाहर लाने वाले एसीपी हरचरण वर्मा रिटायरमेंट वाले दिन

13 अक्टूबर सन् 1957 को हरचरण वर्मा का जन्म दक्षिणी दिल्ली के जमरूदपुर गांव में यहां हुआ था. इसी गांव की जमीन पर कालांतर में दिल्ली के अमीरों के लिए आज की ग्रेटर कैलाश जैसी पॉश कालोनी बसाई गयी. ग्रेटर कैलाश पार्ट-1 स्थित समरफील्ड स्कूल से 12वीं पास की. 1977 में पीजी डीएवी कॉलेज लाजपत नगर से ग्रेजुएशन कर रहे थे. तभी 1977 में इंडियन मिलिट्री अकादमी के जरिये फौज में सेकेंड लेफ्टिनेंट और दिल्ली पुलिस में डायरेक्ट सब-इंस्पेक्टर सलेक्ट हो गये. कबूल की थानेदारी. दिल्ली पुलिस नौकरी की पहली पोस्टिंग मिली 1980 में दक्षिणी दिल्ली के लाजपत नगर थाने में.

1994 में इंस्पेक्टर बनने के बाद पहाड़गंज, सरोजनी नगर, जनकपुरी, चितरंजन पार्क, गोकुलपुरी, डिफेंस कालोनी, कनाट प्लेस, हजरत निजामुद्दीन थानों के एसएचओ रहे. 2011 में एसीपी (असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर) प्रमोट होकर ट्रैफिक, लाजपत नगर, कालका जी, पंजाबी बाग आदि सब-डिवीजन और स्पेशल ब्रांच में तैनात रहे. 31 अक्टूबर 2017 को एसीपी न्यू फ्रेंड्स कालोनी सब-डिवीजन के पद से हरचरण वर्मा दिल्ली पुलिस से रिटायर हो गये.

(इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में पढ़िये- ‘खनन माफिया से दो-दो रुपये की चौथ-वसूली में बाधा बनने वाले जिस दारोगा को सिपाही ने थाने से बे-दखल करा दिया, कालांतर में आखिर कैसे वही सब-इंस्पेक्टर देश का मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डीसीपी बना ?’)

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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