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1984 दंगा: ‘एक तरफ पेट्रोल माचिस, दूसरी ओर तलवार-कृपाण वाली भीड़ के बीच, मैं रिवॉल्वर लिए खड़ा था!’

1 नवंबर 1984 को दिल्ली में न तो पुलिस सेफ थी और न ही पब्लिक. सब एक-दूसरे के खून के प्यासे थे

Updated On: Nov 24, 2018 09:36 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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1984 दंगा: ‘एक तरफ पेट्रोल माचिस, दूसरी ओर तलवार-कृपाण वाली भीड़ के बीच, मैं रिवॉल्वर लिए खड़ा था!’

‘प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश-दुनिया में कोहराम मच चुका था. कोई जान बचाने को तो, कोई किसी की जान लेने के लिए बेतहाशा भाग रहा था. गुस्से में पब्लिक है या पुलिस! यह समझ पाना मुश्किल था. बेहद जटिल था यह सोच पाना कि, पुलिस पहले खुद को सेफ पैसेज दे! या फिर वो पब्लिक को बचाए. सच पूछिए तो 1 नवंबर 1984 को दिल्ली में न तो पुलिस सेफ थी और न ही पब्लिक. सब एक-दूसरे के खून के प्यासे थे.

मुझे लगा आज अगर कुछ नहीं किया तो, इतिहास में आज का दिन ‘काला’ दर्ज हो जाएगा. सो हाथ में मौजूद लोडिड सरकारी रिवॉल्वर से गोलियां चला दीं. बेखौफ दंगाईयों की भीड़ पर. और वो दिन इतिहास के पन्नों में ‘बदनुमा’ सा दर्ज होने से बच गया.’ जी हां पेश ‘पड़ताल’ की इस खास किश्त में मिलिए सन् 1984 दंगों में पुलिसिया भीड़ से अलग इबारत लिखने वाले उसी दबंग पूर्व आला-आईपीएस से. और जानिए दिल्ली के उस गांव के बारे में जिसमें अक्सर झूलता रहता है फांसी का फंदा! गांव में से एक-दो कातिलों को फांसी के तख्ते पर चढ़ाने के बाद, फिर किसी तीसरे मुजरिम को लाकर टाँगे जाने के इंतजार में?

होली सा जल रहा था भागीरथ पैलेस मार्केट

‘यह आंखों देखी है 1 नवंबर सन् 1984 की. मैं उन दिनों दिल्ली के उत्तरी जिले में बहैसियत एडिश्नल पुलिस कमिश्नर (अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त) तैनात था. खुद को सुरक्षित बचाने के फेर में मैंने अपनी आंखों से, पुलिस को भीड़ के बीच हांफते. बेतहाशा संकरी गलियों में भागते-दौड़ते. लाउडस्पीकरों पर चीखते-चिल्लाते देखा. भीड़ के गुस्से का आलम यह था कि, ‘पुलिस-लाउडस्पीकरों’ की कानफोड़ू आवाज घुटकर दम तोड़ दे रही थी. लाल किले के सामने मौजूद मशहूर भागीरथ पैलेस मार्केट, होलिका-दहन की मानिंद धूं-धूं कर जल रही थी. शहर मैं फैल चुके उन बदतर हालातों में भी मेरी ड्यूटी लगा दी गई तीन-मूर्ति में. मिसेज गांधी (प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी) की दर्शनार्थ रखी गई लाश की रखवाली के वास्ते! क्यों भई? शहर जल रह है और एक आईपीएस अपने जिले से बाहर दूसरे जिले में फंसा दिया गया. आखिर क्यों?’

कमिश्नर बोले तीन मूर्ति पहुंचो!

‘उत्तरी जिले का सेकेंड अफसर होने के नाते मेरी प्राथमिकता में था अपने जिले की जनता को सुरक्षित करना. न कि दूसरे जिले में ड्यूटी निभाने की. दरअसल यह सब तमाशा हुआ सुबह उस वक्त जब, पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन का मुझे बजरिए प्रधानमंत्री सुरक्षा विंग (दिल्ली पुलिस की पीएम सिक्योरिटी शाखा) मैसेज मिला. टेलीफोन से मिले मैसेज में मुझे कहा गया कि मैं, सीधे तीन मूर्ति पहुंचूं. वहां भीड़ बढ़ेगी. मिसेज गांधी (इंदिरा गांधी) का पार्थिव शव जनता के दर्शनार्थ वहीं रखा गया है. जबकि मुझे अपने जिले की चिंता सता रही थी कि, न मालूम वहां के हालात क्या होंगे?’

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जलते जिले में जाने से कमिश्नर ने रोक दिया!

‘आदेश चूंकि ऊपर से था. सो न चाहते हुए भी मैं तीन-मूर्ति पहुंच गया. मगर दिल-ओ-दिमाग में अपने उत्तरी जिले की ही चिंता भरी हुई थी. इतने में ही मेरे साथ रहने वाले वायरलेस ऑपरेटर ने बताया कि, लाल किले के सामने हालात बेकाबू हो गए हैं. भीड़ ने भागीरथ पैसे जैसे बड़े और मशहूर मार्केट को आग के हवाले कर दिया है. सूचना मिलते ही मैंने हालातों से पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन (टंडन साहब अब इस दुनिया में नहीं हैं) को वाकिफ कराया. उधर से जबाब मिला कि वहां अभी मत जाईए. कुछ बड़ा हो तभी तीन-मूर्ति छोड़ना. मैं मगर इसके बाद भी नहीं माना. सो बिना आगे पीछे की कुछ सोचे ही पहुंच गया, अपने उत्तरी जिले की लाल किला चौकी पर.’

20 नवम्बर 2018 को सिख विरोधी दंगों में उम्रकैद की सजा पाये नरेश सहरावत

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मैंने दंगाईयों पर गोली चलवा दी!

‘लाल किला चौकी से 5-6 हवलदार-सिपाही साथ लिए. कुछ मेरा स्टाफ पहले से ही मेरे साथ था. एसएचओ कोतवाली तिवारी और एसीपी कपूर को भी साथ लिया. पैदल मार्च करता हुआ ही जब, चांदनी चौक रोड पर शीशगंज गुरुद्वारे के पास (पुलिस चौकी फव्वारा) पहुंचा तो, वहां दो हिस्सों में बंटी भीड़ एक दूसरे की जान लेने पर उतारू मिली. एक तरफ की भीड़ के हाथों मे नंगी तलवारें-कृपाण-कटारें, नुकीले खतरनाक बल्लम-भाले थे. सड़क के दूसरी ओर डटी भीड़ के हाथों में लाठी-डंडे, पेट्रोल-डीजल जैसे ज्वलनशील पदार्थ और माचिसें थीं. मैंने तलवारें हाथों में लिए खड़ी भीड़ को शांत करके गुरुद्वारे के भीतर भेज दिया. मगर दूसरे समुदाय की भीड़ काबू नहीं आ रही थी.

मुझे लगा कि, आज कुछ अनहोनी घट सकती है. लिहाजा मैंने साथ मौजूद हवलदार सतीश चंद्र (चंद्रा) को चीखते हुए आदेश दिया...गोली चला दो. मेरी आवाज पर ही उसने गोली चला दी. गोली एक को लगी तो वो नीचे गिर गया. साथ ही मैंने भी भीड़ को आगे न बढ़ने की चेतावनी देते हुए गोली चला दी. मैंने मौके पर ही हवलदार सतीश चंद्र को नकद इनाम देने की भी घोषणा की थी.’

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भीड़ का प्लान मुझे जलाकर मारने का था!

‘गोली चलने के बाद भीड़ कुछ पीछे हटी लेकिन, गोली चलने की दहशत के बाद जो रिजल्ट आने की उम्मीद थी, वह नहीं आया. भीड़ बार-बार चांदनी चौक की ओर से शीशगंज गुरुद्वारे की ओर बढ़ने लगती थी. इसी दौरान मुझे एक मुखबिर से सूचना मिली कि, मेरे गोली चलाने और गोली चलवाने के ऑर्डर से दंगाईयों की भीड़ बौखला गयी है. गुस्साई भीड़ मुझे आग में झोंककर मारने की प्लानिंग बना रही है. साथ मौजूद मातहतों ने मुझे इशारा किया कि, मैं उस वक्त वहां से हट जाऊं. मैं मगर वहीं डटा रहा. पांच दिन लगातार उन्हीं बदतर हालातों में अपनी और बाकी बेकसूरों की जान बचाने के वास्ते जूझता रहा. पांच दिन बाद जब मौके पर फौज (भारतीय सेना) पहुंची तब, हालात धीरे-धीरे काबू आने शुरू हुए.’ बताते हैं पूर्व आईपीएस और दिल्ली के रिटायर्ड संयुक्त पुलिस आयुक्त (JOINT POLICE COMMISSIONER) मैक्सवेल परेरा.

गोली न चलाता तो वो दिन इतिहास में 'काला' हो जाता...पूर्व आईपीएस दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड संयुक्त पुलिस आयुक्त मैक्सवेल परेरा

गोली न चलाता तो वो दिन इतिहास में 'काला' हो जाता...पूर्व आईपीएस दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड संयुक्त पुलिस आयुक्त मैक्सवेल परेरा

हाथ-पांव फूलने के बावजूद गोली चलाकर बचाई जान

‘मैं उन दिनों दक्षिणी दिल्ली जिले के स्पेशल स्टाफ में बतौर सब-इंस्पेक्टर तैनात था. इंचार्च थे इंस्पेक्टर ओ.पी शर्मा मेरा ऑफिस था लाजपत नगर में. डीसीपी थे चंद्र प्रकाश. 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के अगले ही दिन शहर के हालात बुरी तरह बिगड़ चुके थे. पब्लिक की बात छोड़िए, हम-लोगों के (दिल्ली पुलिस) हाथ-पांव फूले हुए थे. सोचने-समझने की ताकत जीरो हो गयी थी. हम पुलिस फोर्स थे. सीमित संख्या में.

भीड़ के जत्थों में शामिल लोगों की गिनती कर पाना नामुमकिन था. महिपालपुर गांव, सनलाइट कालोनी में यूं तो उस समय निशाने पर लिया जा रहा वर्ग-विशेष (सिख) आबादी ज्यादा नहीं थी, मगर भीड़ तो भीड़ थी. उसे जहां पुलिस सुस्त मिलती वो वहीं कुछ न कुछ काम कर डालती. कई जगह पर तो मुझे अपनी और साथियों की जान बचाने के लिए अंधाधुंध फायरिंग करनी पड़ी. ताकि गुस्साई भीड़ तितर-बितर हो जाए. सच तो यह है कि नवंबर 1984 में जान-माल का सबसे ज्यादा नुकसान तो 1 नवंबर को ही हो चुका था.’ बताते हैं देश के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट एल.एन राव. .यानी लक्ष्मी नारायण राव. राव बाद में दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल डीसीपी से रिटायर हो चुके हैं.

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा 1984 सिख विरोधी दंगों में सजा-ए-मौत पाये यशपाल सिंह का महिपालपुर स्थित घर

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा 1984 सिख विरोधी दंगों में सजा-ए-मौत पाये यशपाल सिंह का महिपालपुर स्थित घर

‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी’ पहुंचा महिपालपुर गांव

‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी’ ने दक्षिणी दिल्ली के महिपालपुर गांव का भी भ्रमण किया. 20 नवंबर 2018 (मंगलवार) को दिल्ली की पटियाला हाउस ट्रायल कोर्ट ने यहीं के मूल निवासी यशपाल सिंह और नरेश सहरावत को 1984 सिख विरोधी दंगों में सजा मुकर्रर की. हरदेव सिंह और अवतार सिंह की हत्या के आरोप में यशपाल को सजा-ए-मौत और नरेश सहरावत को ब-मशक्कत उम्रकैद की सजा सुनाई गई. इस लेखक ने उम्रकैद की सजा पाने वाले नरेश सहरावत के छोटे भाई सुरेश सहरावत से बात की. सुरेश उन दिनों दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन रोड स्थित डिफेंस फायर सर्विस के इंजीनियर स्टोर डिपो में तैनात थे.

जब भाई मेरे साथ था तो, उसने सिख कब मार डाले?

सुरेश-नरेश के पिता देवीराम की फायर-ब्रिक्स की फैक्टरी थी. नरेश, पिता के साथ ही फैक्टरी में काम करता था. सजायाफ्ता (उम्रकैद) नरेश के छोटे भाई सुरेश सहरावत के मुताबिक, ‘31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा के मरने के बाद दिल्ली में दंगे होने लगे, तो मैंने बड़े भाई नरेश को 1 नवंबर 1984 को स्कूटर से अपने दफ्तर बुला लिया. ताकि दोनों भाई सुरक्षित घर पहुंच सकें. उस दिन मैंने चार सिखों को जिनके पीछे भीड़ पड़ी हुई थी. अपने दफ्तर के गेट के भीतर छिपाकर जान बचाई थी.

ऐसे में सोचिए कि जब, मेरा भाई मेरे साथ 15-20 किलोमीटर दूर था. उसी वक्त वो दो लोगों की महिपालपुर गांव में पहुंचकर हत्या कैसे कर सकता है? सुरेश के मुताबिक, ‘मेरे बड़े भाई नरेश को सिख दंगों में दोषी करार दिया गया है, यह खबर भी अगले दिन अखबारों से पढ़ने को मिली है. उनके मुताबिक, जो एफआईआर में नामजद था उसे तो (जेपी सिंह) बरी कर दिया. जिनका (यशपाल सिंह और नरेश सहरावत) कहीं नाम नहीं था, उन्हें फांसी और उम्रकैद सुना दी!’ फिलहाल उम्रकैद की सजा पाने वाले नरेश और यशपाल का परिवार अब दिल्ली हाईकोर्ट की शरण में जाने की तैयारी में है.

जिसने कभी गाली नहीं दी उसे फाँसी और उम्रकैद की सजा! हैरत की बात है...देशमुख सहरावत, 1984 सिख विरोधी दंगे में सजायाफ्ता यशपाल और नरेश के पड़ोसी

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महिपालपुर के बाशिंदों को पहले भी मिली है फांसी

मंगलवार यानी 20 नवंबर 2018 को सुनाई गई सजा सही है या गलत? यह तय करना अदालत का काम है. हां इतना जरूर है कि अगर, महिपालपुर गांव के इतिहास पर नजर डाली जाए तो वह जरूर हैरतंगेज है. महिपालपुर गांव का इतिहास अगर पलटा जाए तो, आज के जाट-बाहुल्य इस गांव को 12वीं शताब्दी में महरौली में रहने वाले अनंगपाल सिंह तोमर ने बसाया था. अनंगपाल सिंह तोमर हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाना थे. अब करीब 70 साल के हो चुके महिपालपुर निवासी देशमुख सहरावत, 34 साल बाद अचानक आए इस फैसले से हैरत में हैं. साथ ही वे बताते हैं कि, ‘होने को तो 1970 के दशक में उनके गांव के दो लोगों को फांसी की सजा हो चुकी है. सन् 1975 के आसपास गांव के जिन दो लोगों को गांव में ही हुई हत्या के मामले में फांसी के फंदे पर लटकाया गया, उनका नाम जयचंद और हुकुम सिंह था.’

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सुबह लौटी मौत शाम को फिर जा पहुंची

हाल ही में सिख विरोधी दंगों में SIT की तफ्तीश पर फांसी की सजा पाए यशपाल और उम्रकैद की सजा पाने वाले नरेश सहरावत के पड़ोसी देशमुख सहरावत के शब्दों में, ‘घटना वाले दिन सुबह करीब 8-9 बजे कुछ लड़के हो-हल्ला करते हुए गांव में आए थे. गांव वालों ने उन्हें धमकाकर भगा दिया. शाम करीब 4-5 बजे उसी दिन अचानक भीड़ गांव में आ पहुंची. गांव वाले कुछ समझ पाते उससे पहले ही भीड़ ने, मौजीराम पंडित के मकान में किराए पर रहने वाले दो सिख परिवारों पर हमला कर दिया. सामने स्थित एक सिख लड़के के दुकान पर भी भीड़ ने हमला कर दिया. जिसमें दो लड़कों की बाद में मौत हो गई.’

जिसने कभी गाली नहीं दी उसे ‘फांसी’!

गांव के मुअज्जिज देशमुख सहरावत आगे बाते हैं कि, ‘मौजीराम पंडित जी का बेटा रामशरण और एक अन्य किरायेदार उस दोहरे हत्याकांड में गवाह बने. बाद में उन्हीं की गवाही पर नामजद आरोपी जेपी सिंह बरी हो गया. जिस यशपाल सिंह और नरेश सहरावत का केस में दूर-दूर तक कहीं नाम-ओ-निशान कागजों में नहीं था, वे सजा कर दिए गए! जबकि घटना वाले दिन यशपाल कोलकता में था. यशपाल के पिता हनुमंत सिंह की गिनती गांव के सुलझे हुए लोगों में होती है. जबकि यशपाल के दादा केसराम डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के मेंबर भी थे.

नरेश सहरावत के परिवार का भी गांव में कभी किसी से कोई विवाद नहीं हुआ.’ देशमुख सहरावत के मुताबिक, ‘सिख विरोधी दंगों में जिस नरेश सहरावत को उम्रकैद सुनाई गई है उसके दादा करनदास गांव के जिम्मेदार बाशिंदे और दिल्ली सरकार (उस जमाने दिल्ली बोर्ड हुआ करता था) में टीचर थे. मैंने तो कभी भी इन दोनो सजा पाये लोगों के या उनके परिवार के किसी सदस्य के मुंह से गाली तक नहीं सुनी. और सजा मौत और उम्रकैद की सुना दी गयी. वो भी 34 साल बाद. केवल 3 साल की एसआईटी पड़ताल के बलबूते!’

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इस संडे क्राइम स्पेशलमें पढ़ना न भूलें DP की DIARY के अंतिम भाग में.... ‘यूं ही खैरात में कोई लड़की दुपट्टे से, किसी अजनबी का खून नहीं पोंछती है! जेब में ‘चवन्नी’ नहीं और इरादा ‘चीनी-मिल’ मालिक बनने का...! पिता की चाहत ने सोहबत बिगाड़कर, ‘विकास’ के जीवन की रफ्तार रोक दी!’

(पड़ताल की यह किश्त, 1984 सिख विरोधी दंगों में उम्रकैद की सजा पाये मुजरिम नरेश सहरावत के छोटे भाई सुरेश सहरावत, फांसी और उम्रकैद की सजा पाये मुजरिमों के पड़ोसी महिपालपुर गांव के मूल निवासी बजुर्ग देशमुख सहरावत और दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड पुलिस अफसरों से हुई बातचीत के आधार पर पेश की गई है. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी और लेखक किसी भी दावे या बयान की पुष्टि नहीं करते हैं.)

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