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देश की पहली कॉन्ट्रैक्ट-किलिंग : लाश पर मौजूद ‘उल्टे-स्वेटर’ ने हत्यारे भाईयों को फांसी दिलवाई

पेश 'पड़ताल' की इस कड़ी में सन 1973 में (करीब 45 साल पहले), ऐसे ही तमाम पेचीदा सवाल-जवाबों के इर्द-गिर्द घूमती रहने वाली देश में ‘ठेके पर हुई हत्या’ की (कॉन्ट्रैक्ट-किलिंग) पहली घटना की बेमिसाल ‘तफ्तीश’ यहां लिख रहा हूं.

Updated On: Jul 21, 2018 03:17 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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देश की पहली कॉन्ट्रैक्ट-किलिंग : लाश पर मौजूद ‘उल्टे-स्वेटर’ ने हत्यारे भाईयों को फांसी दिलवाई

अपराधी, अपराध का 'ब्लू-प्रिंट' तैयार करता है. फिर उस ब्लू-प्रिंट के आधार पर घटना को अंजाम देता है. अपराध के बाद शुरू हुई पुलिसिया-पड़ताल लेकिन, अपराध-अपराधी की दशा और दिशा तय करती है. 'मुलजिम' को 'मुजरिम' करार दिलवाकर उसे, सजा मुकर्रर करा पाने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी 'पड़ताल' के रहम-ओ-करम पर ही टिकी होती है.

पेश 'पड़ताल' की इस कड़ी में सन 1973 में (करीब 45 साल पहले), ऐसे ही तमाम पेचीदा सवाल-जवाबों के इर्द-गिर्द घूमती रहने वाली देश में ‘ठेके पर हुई हत्या’ की (कॉन्ट्रैक्ट-किलिंग) पहली घटना की बेमिसाल ‘तफ्तीश’ यहां लिख रहा हूं. उस जमाने में केस की पड़ताल में प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहने वाले पड़ताली आला-पुलिस अफसर, महिला की लाश का पोस्टमॉर्टम करने वाले फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट्स (पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर/पुलिस सर्जन) की मुंहजुबानी.

कालांतर में कोर्ट द्वारा ‘ऐतिहासिक’ करार दी जा चुकी इस पड़ताल के अंत में हम आपको फांसी की सजा पाए ऐसे कैदी से (हालांकि बाद में इस कैदी की सजा उम्रकैद में बदल गई) भी मिलवा रहे हैं जो, उस पहली काॉट्रैक्ट-किलिंग के आरोपियों में से एक सजायाफ्ता मुजरिम के साथ तिहाड़ जेल में कैद रहा. सन् 1973 के बाद, आज पूरे 45 साल यानी करीब 4 दशक बीतने के उपरांत.

देश की पहली ‘कॉन्ट्रैक्ट-किलिंग’ की तमाम खासियत!

4 दिसंबर 1973 की शाम करीब सात-साढ़े सात बजे घटित जिस सनसनीखेज हत्याकांड का जिक्र मैं यहां कर रहा हूं, उसकी तमाम हैरतंगेज खासियत थीं. मसलन हत्याकांड की जड़ में उस जमाने में देश के इकलौते काबिल और मशहूर नेत्र सर्जन डॉक्टर और उसकी माशूका का प्रेम-प्रसंग पता चला. खुद से उम्र में दो-गुने अधेड़ उम्र के धन्नासेठ डॉक्टर प्रेमी और उसकी दौलत की चाहत में अंधी माशूका पागलपन की हद तलक पहुंच चुकी थी.

परिणाम यह रहा कि प्यार में कांटा बनी प्रेमी की बेकसूर बीवी को, माशूका ने भाड़े के हत्यारे भाईयों से कत्ल करा डाला. षड्यंत्र में शामिल आरोपी डॉक्टर भारत के राष्ट्रपति का मानद नेत्र चिकित्सक था. जबकि आरोपी मास्टर-माइंड मजरिम साबित हुई माशूका, भारतीय सेना के एक आला-अधिकारी (कैप्टन) की बीवी थी. भाड़े के हत्यारे ‘किलर-ब्रदर्स’ को बाद में फांसी पर चढ़ा दिया गया. मैं बात कर रहा हूं देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी जिले धन्नासेठों की रिहाइश मानी जाने वाली डिफेंस कालोनी में हुए, देश को हिला देने वाले सनसनीखेज विद्या जैन हत्याकांड की.

भाड़े पर हुए देश के पहले कत्ल की संक्षिप्त कहानी

घटना वाली तारीख को शाम करीब 7-8 बजे के बीच नई दिल्ली जिले के तिलक ब्रिज इलाके में स्थित मशहूर क्लिनिक में एक महिला को गंभीर हालत में दाखिल कराया गया था. उसके हाथ सीने, पेट सहित बदन के अन्य तमाम अंगों पर चाकुओं के गहरे घाव थे. अस्पताल में साथ पहुंचे उम्रदराज डॉक्टर पति ने खुद को भारत का मशहूर नेत्र-सर्जन और घायल महिला को पत्नी विद्या जैन (45) बताया. घटना को अंजाम दिए जाने के कुछ समय के भीतर ही विद्या जैन की मौत हो चुकी थी. सूचना मिलते ही पुलिस अस्पताल और घटनास्थल पर पहुंच गयी. मामला चूंकि राष्ट्रपति के मानद नेत्र चिकित्सा सलाहकार की पत्नी के कत्ल का था. लिहाजा हत्याकांड से दिल्ली और देश में कोहराम मच गया.

4 दिसंबर 1973 थाना डिफेंस कालोनी की वो रात

हत्याकांड वाली रात करीब साढ़े ग्यारह बजे डिफेंस कॉलोनी थाने में एफआईआर नंबर 957/1973 पर धारा 302/34/120बी और 25/54/59 शस्त्र अधिनियम (आर्म्स एक्ट) के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. मौके पर पहुंची पुलिस को बाद में दौरान-ए-पड़ताल .303 का देसी रिवाल्वर, जीवित कारतूस और चाकू मिल गया.

उस सनसनीखेज हत्याकांड में विद्या जैन का डॉक्टर पति, पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार की निवासी उसकी प्रेमिका और पूर्व सेक्रेटरी, प्रेमिका के इशारे पर ‘कॉन्ट्रैक्ट-किलर-ब्रदर्स’ का इंतजाम करने वाला चरखी दादरी (भिवानी हरियाणा) निवासी षड्यंत्रकारी, भाड़े के हत्यारे भाई उजागर सिंह-करतार सिंह, गुड़गांव (अब गुरुग्राम हरियाणा) के गांव गौरी थाना हसनपुर निवासी दो लोगों (कॉन्ट्रैक्ट-किलर-ब्रदर्स के इंतजामी) सहित 7 को दिल्ली पुलिस ने आरोपी बनाया. कालांतर में कोर्ट ने आरोपियों में से कॉन्ट्रैक्ट-किलर-ब्रदर्स को को सजा-ए-मौत और बाकी को उम्रकैद की सजा मुकर्रर की.

पड़ताल में इसलिए जुटे थे दिल्ली के बाकी थाने भी...

PRABHATI LAL

रिटायर्ड असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर प्रभाती लाल (उस वक्त लोधी कालोनी थाने के एसएचओ.)

1971 में डिफेंस कॉलोनी थाने के तत्कालीन एसएचओ और फिर विद्या जैन हत्याकांड के वक्त लोधी कालोनी थाने के एसएचओ रहे इंस्पेक्टर प्रभाती लाल निम्भल (अब करीब 78 साल के प्रभाती लाल 18 साल पहले अक्टूबर 2000 में दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट कमिश्नर पद से रिटायर हो चुके हैं) के मुताबिक, ‘घटना भले ही मेरे थाना क्षेत्र की नहीं थी, मगर चूंकि मैं डिफेंस कॉलोनी थाने का कुछ समय पहले तक एसएचओ रह चुका था. दूसरे, कत्ल की गई महिला विद्या जैन रसूखदार खानदान (भारत के राष्ट्रपति के मानद नेत्र सर्जन डॉक्टर की पत्नी) से तालुल्क रखती थीं. इसलिए आसपास के सब-डिवीजन के एसीपी और तमाम थानों के एसएचओ को भी आला पुलिस अफसरों ने पड़ताल में शामिल होने की हिदायत दी थी. लिहाजा वायरलेस मैसेज मिलते ही मैं 15 मिनट में घटनास्थल पर पहुंच गया.

बेबस विद्या को दौड़ा-दौड़ा कर कत्ल किया होगा!

घटनास्थल के पास स्थित सूखे नाले में और उसकी दीवारों पर खून के धब्बे  मौजूद थे. खून के धब्बों/छींटों की स्थिति इस बात की तस्दीक कर रहे थे कि क्रूर-खूंखार कातिलों के सामने शिकार (विद्या जैन) बेबस था. नाले की दीवारों पर रगड़े जाने के निशान चुगली कर रहे थे कि जान बचाने के लिए निरीह विद्या जैन ने कातिलों के कब्जे से भागने की भी बेइंतहा कोशिश की थी, लेकिन या तो हत्यारों ने उन्हें दबोच कर बेबस कर दिया. या फिर ताबड़तोड़ चाकुओं के हमले से बेहाल और बेदम हो चुकीं विद्या जैन लाख चाहकर भी नाले से बाहर नहीं निकल सकीं. विद्या जैन का एक हाथ भी पोस्टमॉर्टम के दौरान फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स को टूटा (फ्रैक्चर्ड) मिला.’ बताते हैं उस वक्त लोधी कॉलोनी थाने के एसएचओ रहे प्रभाती लाल.

खून के निशानों को आईजी पान की ‘पीक’ समझे!

बकौल रिटायर्ड एसीपी प्रभाती लाल, ‘उन दिनों दिल्ली पुलिस का बॉस पुलिस महानिरीक्षक ही होता था. मौके पर मौजूद भीड़ में वो भी था. उसे खून के धब्बों और पान की पीक में फर्क नजर नहीं आ रहा था. इसकी दो वजह हो सकती हैं. पहली वजह पुलिसिया नौकरी में उसका पड़ताल का अनुभव ‘जीरो’ होना. दूसरे रात हो चुकी थी. अंधेरे में दिखाई देना काफी कम हो चुका था. तीसरी वजह वो आईजी मौके पर मौजूद पब्लिक और अधीनस्थ पुलिस अफसरों को जान-बूझकर गुमराह करने की या बरगलाने की जुगत में रहा हो! या हो सकता है कि, उसके दिमाग में इन तमाम बातों में से कोई नहीं रही हो, वह सिर्फ उस आला पुलिस अफसर की एक अदद कम-अक्ली भर भी हो सकती है.’

मातहत एसएचओ ने आईजी की बोलती बंद कर दी!

बेखौफ और बेबाक प्रभाती लाल बताते हैं, ‘वो आईजी था तो पूरी दिल्ली पुलिस का बॉस (उस जमाने में दिल्ली पुलिस में कमिश्नरी सिस्टम की जगह आईजी सिस्टम था) लेकिन, उसके 'पान की पीक' वाले तर्क पर मुझे हंसी भी आई और कोफ्त भी हुई. मैंने उसकी (आईजी) इतनी बात तो मौके पर ही दो-टूक काट दी कि यह पान की पीक कतई नहीं हो सकती, हैं तो खून के ही धब्बे. वो आईजी मुझसे बोला, ' जब हत्या चाकुओं से गोदकर की गई है तो, फिर खून की पिचकारी क्यों नहीं मौके पर गिरीं/लगीं मिलीं?'

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मैंने उसे मुंह पर ही जवाब दे दिया, 'हो सकता है सर जाड़े का वक्त है. मृतका के (विद्या जैन) बदन पर ठंड से बचने के लिए एक या दो स्वेटर मौजूद रहे हों. स्वेटर पहने हुए अगर, किसी शख्स के बदन पर चाकू घोंपे या मारे जाएंगे तो, खून की धार पिचकारी के रूप में बाहर न आकर, भारी-मोटे ऊनी कपड़ों में ही दबकर सूख या समा जाएगी. इतना सुनते ही उस कथित काबिल आईजी ने बिना कुछ बोले ही ‘हां..हां..हूं..हूं' में गर्दन हिला दी.’

बेखौफ हत्यारे, बेबस शिकार और संदिग्ध पति था!

ASHOK SAXENA

अशोक सक्सेना

2008 में सेंट्रल दिल्ली जिले के दरियागंज सब-डिवीजन के एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) पद से रिटायर हो चुके अशोक कुमार सक्सेना के मुताबिक, ‘विद्या जैन हत्याकांड की पड़ताल से मेरा सीधा वास्ता कोई नहीं था. चूंकि मेरे एसएचओ खुद मौके पर मौजूद थे. सो बहैसियत थानेदार मैं भी लोधी कॉलोनी थाने से घटनास्थल पर पहुंच गया. पड़ताल की बारीकियां देखने-समझने-सीखने के लिए. उस रात और फिर बाद में पुलिस हिरासत में मुख्य षड्यंत्रकारी और बाद में मुजरिम करार दिए गए विद्या जैन के डॉक्टर पति ने, नर्सिंग होम में जो कहानी सुनाई थी वो, किसी के गले नहीं उतर रही थी. आरोपी डॉक्टर द्वारा सुनाई गई कहानी के मुताबिक दिन छिपे वह, पत्नी विद्या जैन के साथ कार में बैठने के लिए घर के बाहर निकला. पत्नी के साथ उसे एक पार्टी में जाना था. कार में बैठ पाने से पहले ही घर की देहरी पर ही पत्नी विद्या जैन को गुंडों ने खींच कर मार डाला और भाग गए.’

अशोक कुमार सक्सेना के मुताबिक, ‘अगर मैं यह कहूं कि बयान और घटनास्थल के हालात शुरू से ही विद्या जैन के पति को ही कटघरे में खड़ा कर रहे थे तो अनुचित नहीं होगा.’

सवाल जिन्होंने मर्डर के मास्टर-माइंड को हिला दिया

प्रभाती लाल के मुताबिक, ‘ गिरफ्तारी के बाद मैंने विद्या जैन के पति से चार रात पूछताछ की. वो जुबान खोलने को ही राजी नहीं था. कोई रास्ता न देखकर मैंने एक रात 108 सवाल तैयार किए. मेरे सवालों की फेहरिस्त में से पहला सवाल पढ़ते ही, दिसंबर की ठंड में भी विद्या जैन के पति के माथे पर पसीना आ गया. मेरा पहला सवाल था कि मर्डर वाली शाम वारदात से ठीक पहले वो (विद्या जैन का पति) प्रेमिका के साथ कार में बैठा था! उस वक्त उसने प्रेमिका से यह किस आधार पर और क्यों कहा, 'आज अब इस घड़ी के बाद से ही तुम (प्रेमिका) मेरी पत्नी होगी?' विद्या जैन का पति जानता था, 'यह बात तो गुप्त और दो के ही बीच (प्रेमिका और हत्याकांड में आरोपी/षडयंत्रकारी विद्या जैन का डॉक्टर पति) हुई थी. वो समझा कि थाने की महिला हवालात में कैद करके रखी गई उसकी प्रेमिका दिल्ली पुलिस के सामने पूरी तरह टूटकर हकीकत बयान कर चुकी है. और फिर वो धीरे-धीरे पड़ताल में उलझता और पुलिस के सामने टूटता चला गया.’

वह अड़ गए थे इसलिए रात में नहीं हुआ पोस्टमॉर्टम!

BHARAT SINGH

भरत सिंह

करीब 45 साल के लंबे अंतराल के बाद इस संवाददाता/लेखक ने अथक प्रयासों से देश के मशहूर पूर्व फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट डॉ. भरत सिंह (रिटायर्ड एडिश्नल डायरेक्टर जनरल, हेल्थ सर्विसेज, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया) को भी खोज निकाला. डॉ. भरत सिंह ने ही 5 दिसंबर सन् 1973 को दिल्ली की सब्जी मंडी ( तीस हजारी कोर्ट के सामने) मोर्च्यूरी (पोस्टमॉर्टम हाउस) में विद्या जैन के शव का पोस्टमॉर्टम (शव-विच्छेदन) किया था.

बकौल डॉ. भरत सिंह, ‘जैन परिवार का एक करीबी रिश्तेदार भारतीय सेना में आला-अफसर था. परिवार और पुलिस दोनों चाहते थे कि पोस्टमॉर्टम रात में ही हो जाए. समस्या यह थी कि रात के वक्त पोस्टमॉर्टम की परमीशन देने का विशेषाधिकार दिल्ली के लेफ्टिनेंट-गवर्नर के पास ही होता है. मामला हाईप्रोफाइल होने के बाद भी तत्कालीन उप-राज्यपाल ने रात के वक्त पोस्टमॉर्टम की अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया. लिहाजा तमाम रसूखदारों के लाख चाहने के बाद भी उस रात शव का पोस्टमॉर्टम नहीं हो सका. ’

पार्टी में जाने वाली महिला उल्टा स्वेटर क्यों पहनेगी?

विद्या जैन के शव का पोस्टमॉर्टम करने के दौरान ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (AIIMS) दिल्ली के फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट डॉ. जगदीश चंद्रा भी डॉ. भरत सिंह के साथ मौजूद थे. पड़ताल में जुटी दिल्ली पुलिस की टीम को दौरान-ए-पोस्टमॉर्टम, ब-जरिये फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट्स कई सनसनीखेज तथ्य हाथ लग गये.

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मसलन, ‘पोस्टमॉर्टम के दौरान विद्या जैन के बदन पर ऊन का स्वेटर (कॉर्डिगन) मिला. स्वेटर में भी चाकूओं के तमाम निशान मौजूद थे. खास बात यह थी कि, विद्या जैन ने वो स्वेटर उल्टा पहना हुआ था.’ इस तथ्य की पुष्टि आज करीब 45 साल बाद डॉक्टर भरत सिंह भी करते हैं. उनके मुताबिक, ‘पोस्टमार्टम के दौरान स्वेटर वाली बात सामने आते ही मैंने, पुलिस टीम को इशारा किया था कि वो, संदिग्धों से सवाल करे, 'पार्टी में सज-धजकर जाने वाली कोई स्त्री (विद्या जैन) भला उल्टा स्वेटर क्यों पहनेगी?' ट्रायल कोर्ट में सजा/सुनवाई के दौरान बाकी गवाह/सूबतों के साथ-साथ इस बिंदु को भी प्रमुखता से इंगित किया गया था.’

प्रमुख षड्यंत्रकारी मेरे साथ तिहाड़ जेल में कैद रहा!

विद्या जैन हत्याकांड की तफ्तीश को इस ‘पड़ताल’ में लिखने के लिए तलाशे जा रहे फैक्ट्स के दौरान ही, मुझे एक और चौंकाने वाली शख्शियत के रूप में मिले अजय सिंह. अजय सिंह, विद्या जैन हत्याकांड की मुख्य षड्यंत्रकारी और उम्रकैद की सजायाफ्ता महिला मुजरिम (विद्या जैन के पति की प्रेमिका, अब उम्रकैद की सजा काट चुकी) की पुरानी दिल्ली स्थित रिहाईश के आसपास के ही रहने वाले हैं.

AJAY SINGH

अजय सिंह

अजय सिंह को कालांतर में एक हत्याकांड में फांसी की सजा हुई थी. हालांकि बाद में ऊपरी अदालत में अजय सिंह की फांसी की सजा उम्रकैद में बदल गई. अजय सिंह की बात अगर मानी जाए तो, ‘विद्या जैन हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पाया विद्या का डॉक्टर पति, उनके साथ (अजय सिंह) तिहाड़ जेल में करीब दो-ढाई वर्ष कैद रहा था. वो (विद्या जैन का उम्रकैद का सजायाफ्ता पति) और मैं दोनो ही उम्रकैद काट रहे थे. वो तिहाड़ जेल से मुझसे पहले ही उम्रकैद काटकर बाहर चला गया.’

हकीकत खुलते ही दोनो सजायाफ्ता ने मुंह फेर लिए!

बकौल अजय सिंह, ‘मैंने और विद्या जैन की हत्या के षडयंत्रकारी उनके पति ने जब तिहाड़ में कैद किए जाने की अपनी-अपनी वजहें/अतीत की सच्चाई एक दूसरे को सुनाईं तो शायद, डॉक्टर जैन को मैं, मन ही मन अखरने लगा था. मुझे लगता था कि, क्योंकि मैं डॉक्टर जैन की पूर्व सेक्रेटरी और उनके ही साथ तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा भोग रही उनकी, कथित प्रेमिका के घर के करीब (पुरानी दिल्ली) का रहने वाला हूं.

ऐसे में उनकी ( सजायाफ्ता डॉक्टर) कोई बात ब-जरिये मेरे (अजय सिंह) कहीं आरोपी डॉक्टर की माशूका तक न पहुंच जाये! हांलांकि मैंने आज तक 45 साल में कभी आरोपी डॉक्टर की प्रेमिका की शक्ल नहीं देखी है. आरोपी डॉक्टर द्वारा मुझसे अचानक मुंह मोड़ लेने के पीछे, यह मेरी निजी सोच है. डॉक्टर जैन ने कभी ऐसा कुछ हालांकि खुलकर मेरे सामने उजागर नहीं किया. हां, उसके बाद से हम दोनों (अजय सिंह और आरोपी डॉक्टर) ने बिना किसी से कुछ कहे ही जेल में मिलना-जुलना न के बराबर और बोलचाल तकरीबन बंद ही कर दी.’

पड़ताल जो कानून की नजर में ‘नजीर’ बन गई

लंबी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आरोपी महिला (विद्या जैन के पति की माशूका) के वकील ए.एन. मुल्ला और आरोपी डॉक्टर (विद्या जैन का पति) के वकील बी.बी. लाल की तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया. ट्रायल कोर्ट ने विद्या जैन के आरोपी पति, उसकी पूर्व सेक्रेटरी-कथित महिला मित्र सहित पांच लोगों को उम्रकैद की सजा मुकर्रर कर दी.

जबकि करतार सिंह और उजागर सिंह (कांट्रेक्ट-किलर-ब्रदर्स) के ऊपर 27 शस्त्र अधिनियम और हत्या का भी आरोप साबित हुआ. लिहाजा उन दोनों को सजा-ए-मौत (फांसी) मुकर्रर की गई. पेश मामले की ‘पड़ताल’ में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को ट्रायल-कोर्ट ने एतिहासिक करार दिया.

हत्याकांड की सुनवाई कर रही दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने मामले को ‘COOL AND CALCULATED’ करार दिया. पुलिस ने 3 जनवरी 1974 को एक आरोपी रामजी को APPROVER बना दिया. जबकि अदालत से सजा-ए-मौत मुकर्रर होने के बाद, विद्या जैन के हत्यारे करतार सिंह और उजागर सिंह ‘किलर ब्रदर्स’ को सन् 1983-84 के आसपास तिहाड़ सेंट्रल जेल में फांसी पर लटका दिया गया. सभी सजाएं पटियाला हाउस के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के.एस. बड्डू (K.S. BADDU) द्वारा मुकर्रर की गईं थीं.

( इस संडे क्राइम स्पेशल में पढ़िये...’इंटरपोल में पहले भारतीय असिस्टेंट डायरेक्टर बने आईपीएस ने छह महीने तक क्यों नहीं देखा पत्नी का चेहरा! साथ ही अपहरणकर्ता अपने जाल में फंसे एक बेबस धन्नासेठ शिकार को कत्ल कर पाते, उससे पहले इसी दबंग आईपीएस ने शिकारियों के तीन गुंडे कैसे दौड़ाकर कर डाले ‘कत्ल’ )

(लेखक वरिष्ठ और स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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