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DP की DIARY PART-1: 'तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी! बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीके-फीके'

जिन लोगों को आज के डीपी में माफिया नजर आता है! क्या उनमें से किसी ने कभी जिंदगी में सर्फाबाद गांव में बचपन और किशोरावस्था में धर्मपाल को देखा?

Updated On: Nov 10, 2018 09:12 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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DP की DIARY PART-1: 'तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी! बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीके-फीके'
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‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी’ के पाठकों के वास्ते मेरे द्वारा लंबे समय से हर शनिवार लिखी जा रही ‘पड़ताल’ और हर रविवार ‘संडे क्राइम स्पेशल’ के तहत अब से मैं शुरू कर रहा हूं एक ‘विशेष-सीरीज’. जिसका नाम है नाम ‘DP की DIARY’. डीपी की डायरी आप तक पहुंचाने का मैं तो, एक जरिया या रास्ता भर हूं. असल में पाठकों के सामने लाई जा रही, सफेद कागजों पर उतारी-उकेरी गई अनकही कहानी है ‘डीपी’ की ही निहायत निजी-जिंदगी’.

इसमें कई वो किस्से होंगे जिन्हें आप पहले से जानते-सुनते रहे हैं. तमाम वे हैरतंगेज ‘राज’ भी पढ़ने को मिलेंगे जिन्हें, बजरिये इस सीरीज के पहली बार खुद डीपी ला रहे हैं जमाने के सामने. इसमें डीपी द्वारा जेल की कोठरी में लिखी गई ‘डायरी’ के साथ-साथ ही.

डीपी के ‘एक्सक्लूसिव-इंटरव्यू’ के आधार पर भी तमाम सच सामने आएगा. वो कड़वा सच जो, न मालूम कितने साल से, डीपी के दिल में मौजूद यादों के ज़ख्म और फफोलों में से धीरे-धीरे रिस रहा था. जेल की ऊंची चौहद्दी (चार-दीवारी) के भीतर मौजूद अंधेरी और शमशानी सन्नाटे वाली ‘काल-कोठरी’ में. मैं बात कर रहा हूं, देश के पूर्व सांसद और सर्फाबाद गांव के ‘धर्मपाल’ की. वो धर्मपाल जो, गांव के ऊबड़-खाबड़ अंधेरे गली-गलियारों से निकल कर कालांतर में पहुंच गए थे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की निशानी. यानी भारत की संसद जैसी चकाचौंध वाली आलीशान एतिहासिक इमारत में. वही धर्मपाल जो, संसद में पहुंचते-पहुंचते बन चुके थे धर्मपाल से ‘बाहुबली सफेदपोश डॉन डीपी’. वही डीपी जो, मौजूदा वक्त में, हत्या के आरोप में सजायाफ्ता कैदी के रूप में 9 मार्च 2015 से काट रहे हैं ‘उम्रकैद’. देहरादून की सुद्धोपुरा जेल की तन्हा काल-कोठरी में. तो पढ़ना शुरू करिए ‘डीपी की डायरी’ की पहली किश्त. किसी अपराध या अपराधी का कोई महिमा-मंडन किए बिना. बजरिये 'डीपी की ही स्वहस्त-लिखित डायरी'.... बिना किसी काट-छांट (संपादन) या लाग-लपेट के.

एक जुबान के तमाम झंझट

'कोई मुझे अच्छा आदमी कहता है और कोई बुरा. एक अदद मुझ अदना से इंसान को लेकर जितने मुंह, उससे कहीं ज्यादा मेरे किस्से-कहानियां हैं. इन किस्सों की भीड़ में कई ऐसे भी हैं जो, खुद मुझे ही नहीं पता हैं. मेरी जिंदगी की हकीकत तो वास्तव में मरहूम अदाकारा मीना कुमारी के चंद अल्फाजों तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी! बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं फीके-फीके' में ही सिमट-समा सी गई है.

इसे बंदिश कहूं या फिर मजबूरी कि इस मायावी-दुनिया में मैं या आप कोई भी किसी की जुबान बंद नहीं कर या करा सकता है. जुबान ही अगर इंसान के काबू में होती तो फिर, कृष्ण के सामने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भला अपनों के बीच 'खूनी-महाभारत' ही क्यों होता?

सलाखों में छलका जिंदगी का ‘सच’

‘जेल की आसमान छूती चौहद्दी (चार-दिवारी) के भीतर सूनसान-कोठरी में बैठा हूं. जेल के वक्त ने मुझे सोचने-समझने का भरपूर मौका बख्शा है. जेल के ‘वीराने’ ने मन को जुबान से ज्यादा ‘गतिमान’ बना डाला है. रही-सही कसर जेल के सींखचों से कोठरी के भीतर आती, उस बेहरम सर्द हवा ने पूरी कर दी है जो, सिराहने पड़ी हरे-सफेद रंग के चौखाने (चार-खाने) कवर वाली डायरी के 'कोरे-पन्नों' को, लम्हा-लम्हा उकसाती है.

फाइल फोटो

फाइल फोटो

सींखचों के अंदर सूनी रातों और शांत सुबहों ने बोझिल मन को जुबान से कहीं ज्यादा 'उतावला' बना डाला है. ऐसे में, जेल बैरक में बंधी बेजान सी अलगनी (कपड़े टांगने का तार-रस्सी) पर टंगे मेरे सफेद-झक कुरते (कमीज) की जेब में से झांक रही कलम ही क्यों, 'बे-स्याही' (सूखी) होने का दाग खुद की ‘निब’ पर लगवाए? लिहाजा मैंने अपनी जिंदगी खुद ही डायरी के कोरे कागजों पर कुरेदने की कोशिश करना शुरू कर दिया. बिना कोई लेखक, कवि या बुद्धिजीवी होते हुए भी. वो जिंदगी जिसमें समाहित है मेरा बचपन, जवानी और वर्तमान. ताकि मेरी आने वाली पीढ़ियाँ तो कम से कम मुझे पढ़-समझ सकें. जमाने भर के तमाम वाहियात किस्से-कहानियों से इतर.'

1948 में दिल्ली से सटे बुलंदशहर का सर्फाबाद

7 मई 2017 सुद्धोवाला जेल, देहरादून (उत्तराखंड) : ‘उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिलांतर्गत बसा हुआ था छोटा और बेहद पिछड़ा गांव सर्फाबाद. आजकल यह गांव देश की राजधानी दिल्ली से सटे हाईटेक शहर नोएडा की बहुमंजिला चमचमाती आलीशान इमारतों के बीच खुद का अस्तित्व (पहचान) बचाए रखने की जद्दो-जहद से जूझ रहा है. गांव का जिला बुलंदशहर से बदलकर, अब गौतमबुद्ध नगर हो चुका है. इसी सर्फाबाद गांव के बाशिंदे थे मेरे दादा हरिलाल यादव. कालांतर में हरिलाल यादव के दो बेटे हुए तेजपाल सिंह यादव और रिछपाल यादव. रिछपाल की छत से गिर जाने के कारण 15 साल की उम्र में ही असमय मृत्यु हो गई. कुनबे में अकेले बचे तेजपाल यादव के घर सात संतानों का जन्म हुआ. चार बेटे राम सिंह, श्याम सिंह (प्रधान), धर्मपाल (मैं स्वंय) और धर्मवीर. जबकि तीन बहनों का नाम रखा गया धनेश्वरी, प्रेम और सत्यवती. मेरा जन्म 25 जुलाई 1948 को हुआ था. इस हिसाब-किताब से आज मैं करीब 70 साल का हो चुका हूं.’

एक ‘धर्म’पाल’ के सौ-सौ नाम की सौगात!

‘सर्फाबाद गांव के ठेठ किसान और कट्टर आर्य-समाजी विचारधारा वाले महाशय तेजपाल सिंह यादव और खजाना देवी का तीसरे नंबर का वही बेटा धर्मपाल यानि मैं. कालांतर में ‘डीपी यादव’ के नाम से चर्चित हुआ. या यूं कहूं कि कर दिया गया तो भी झूठ नहीं होगा. जिंदगी में ज्यों-ज्यों नौजवानी-जिंदादिली पनपी-पली-बढ़ी त्यों-त्यों जमाने ने मेरे नाम के संग-संग 'कांट्रेक्ट-किलर, दबंग-दूधिया, बाहुबली, डॉन, भू-माफिया, सफेदपोश, शराब-माफिया और न मालूम क्या-क्या...धर्मपाल के आगे-पीछे-ऊपर-नीचे, समाज और सत्ता के चंद कथित-ठेकेदारों को, जहां जगह मिली वहीं ‘चिपका’ या ‘जड़’ दिये.

जश्न मनाने तक का मौका नहीं मिला

‘आंख के अंधे और कान से बहरे. शीशमहलों में बैठे समाज के चंद ‘ठेकेदारों’ में से किसी को भी एक ठेठ गरीब आर्य-समाजी किसान का बेटा धर्मपाल में कभी नजर नहीं आया, सिवाय मेरे अपने चंद चाहने वालों के. अगर यह लिखूं तो कतई झूठ नहीं है. बाकी सब कुछ मैं अपने शुभचिंतकों व मुझे ईमानदारी और करीब से जानने वालों पर छोड़ता हूं. वे खुद तय करें कि कल का धर्मपाल क्या असल में आज का ‘माफिया’ है! या फिर बीते कल के एक किसान मां-बाप की संतान. या फिर कालांतर के सर्फाबाद जैसे पिछड़े गांव का किसान-पुत्र, जुझारू नौजवान! वक्त और हालातों ने जिसे, जवानी का जश्न मनाने तक का मौका कभी नहीं दिया. जिसका बचपन गरीबी-दुर्दिन और अशिक्षा के जोहड़ (ताल) में कूदते-फांदते-डूबते-उतराते ही गुजर-बीत गया.’

बूढ़ी दीवारों वाली बिना पुती भूतिया पाठशाला

‘दुश्वारियों भरे जिस जमाने में सर्फाबाद में मेरा जन्म हुआ. उन दिनों गांव में न साबुत गली-गलियारे थे, न बिजली-पानी का साधन. कुल जमा सर्फाबाद ठेठ भारतीय संस्कृति और गरीबी-पिछड़ेपन का सर्वोत्तम नमूना था. शिक्षण संस्था के नाम पर गांव में एक अदद वर्षों से बिना लिपी-पुती खंडहर में तब्दील हो चुकी प्राइमरी-पाठशाला थी. चौमास (बरसात) के दिनों में जिसकी, खस्ताहाल दीवारें लगातार पानी में भीगने से खुद-ब-खुद ही हरे रंग में बदल जाती थीं. वजह थी दीवारों पर काई की मोटी परत जम जाना. पट्टे का धारीदार सूती अंडरवियर-बनियान पहनकर नंगे पांव. चूल्हे की कालिख से पोत कर चमकाई गई, नाड़े या रस्सी में बंधी. गले में लटकी तख्ती (लकड़ी की स्लेट). बुदक्का (सफेद खड़िया रखने वाली शीशी) और टांटर की कलम (विशेष किस्म की लकड़ी की कलम) संग. उस बूढ़ी भूतिया पाठशाला में तालीम हासिल करने के नाम पर. मै भी कुछ महीने उछल-कूद मचाने गया था.’

बचपन में शिक्षा 

पिता के साथ डीपी यादव ( फाइल फोटो )

पिता के साथ डीपी यादव ( फाइल फोटो )

‘पढ़ाई के नाम पर पाठशाला में मौजूद इकलौते मास्साब (मास्टर). गांव के 10-15 पूर्णत: निरक्षर गरीब किसान मां-बापों के नौनिहालों को ‘घेरे-बटोरे’ दो-तीन घंटे बैठे रहते थे. कार्तिक, माघ (नवंबर-दिसंबर) महीने में सूरज की धूप सेंकने के लिए...दूसरे, हर महीने सरकार से मिलने वाली औनी-पौनी पगार (वेतन) की चाहत में. कुल-जमा निरक्षरता के श्राप से जूझ रहे सर्फाबाद गांव वालों के जीवन-यापन का सहारा खेती-बाड़ी ही थी. खेती-किसानी की बैसाखियों पर ही मेरा परिवार भी घिसट रहा था.

आज 70 साल बाद जेल की कोठरी में जिंदगी का सच कबूल करने में मुझे कोई संकोच या शर्मिंदगी नहीं है. क्योंकि अगर मेरी मासूम आंखों ने बचपन में वे दुर्दिन न देखे होते तो शायद, हाड़तोड़ मेहनत-मशक्कत के बलबूते सर्फाबाद का धर्मपाल हिंदुस्तान जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में यूपी से विशाल सूबे से कुलांचे भरता हुआ देश की संसद (लोकसभा) में न पहुंचा होता. यह अलग बात है कि ‘संसद’ में पांव रखते ही धर्मपाल को, कांच के घरों में रहने वाले चंद लोगों ने धर्मपाल को माफिया डॉन बाहुबली डीपी में बदल डाला.’

‘साहिब’ कैसे समझें सर्फाबादी का दर्द!

‘7-8 साल की उम्र में बाकी बच्चों की तरह ही मेरे बचपन ने भी खेलने-कूदने के लिए. पहली कुलांच (छलांग) मारी ही थी. सामने परिणाम यह था कि मेरे नंगे-पांव आज के से किसी खूबसूरत ‘प्ले-ग्राउंड’ की बजाए खेत-खलिहान में मौजूद नुकीले ठूंठों (कटी हुई फसल की सूखी जड़ों का नुकीला हिस्सा) के ऊपर गिरकर लहू-लुहान हो गए. बचपन में एड़ियों से रिसते उस खून को देखा तो, बेबस बाल-मन सिहर उठा. उस वक्त का धर्मपाल और आज का डीपी भला कैसे समझ पाता? बचपन में एड़ियों से रिसने वाला वही खून धर्मपाल से मेरे डीपी में तब्दील किये जाने के वक्त, मुझे किसी मजबूत संबल का सा संग देगा.’

गाय के गोबर से उन्हें सड़ांध मुझे सुगंध आई

‘कांच के घरों में रहने वाले जिन चंद धन्नासेठों (राजनीतिज्ञ और अमीर) ने, खुद के दामन बेदाग बचाने की हसरत में मुझे “धर्मपाल” से “डीपी या डॉन” बना डाला! उन्हें हमेशा गऊ-माता के पवित्र गोबर से बदबू या सड़ांध का ही अहसास हुआ. धर्मपाल की तो आंख ही तबेलों (जानवरों को बांधकर रखने की जगह) में खुली. तो, सोचो भला मुझे गाय-भैंस के गोबर में से बदबू या सड़ांध का अहसास कैसे होता? बस यही वो तमाम वजहें हैं जो, सदैव गहरी खाई सी रही हैं. चंद कथित ईमानदार धन्नासेठों और गांव की संकरी मिट्टी-छप्पर वाली कोठरी में पल-पोसकर बड़े हुए 'धर्मपाल' की सोच के बीच.’

वे मुर्दों को ‘पूंछ’ पकड़ाते, मैंने गाय का दूध पिया

‘ मैं तो गाय के गोबर से लिपे घर में घुटनों के बल चलकर खुद के पांवों पर खड़ा हुआ. जिस गाय का दूध पीकर बलिष्ठ-गबरु नौजवान बना. यह अलग बात है कि उसी गाय की पूंछ पकड़ाई जाती है, शमशान ले जाने के वक्त उन तमाम ‘धनवान’ मुर्दों को. एक अदद परलोक में उनके मोक्ष-प्राप्ति की उम्मीद या लालच में. जिन्होंने मुझे धर्मपाल से ‘बाहुबली माफिया डॉन’ में बदलने में जरा भी रहम नहीं खाया. मैं आज भले ही जेल की ‘काल-कोठरी’ में कैद हूं. बाहर मौजूद आलीशान 'शीश-महलों' के अंदर छिपे मेरे दुश्मन और शीशमहल के बाहर मौजूद दोस्त दोनों, अब खुद तय करें कि वास्तव में माफिया कौन है? डीपी को तो देहरादून की सिद्धोपुरा जेल की सलाखों में भी गांव के तबेलों और गाय के पवित्र गोबर की सी खुश्बू आती है.’

एक धर्मपाल पर सौ-सौ बे-असर टोटके

‘(मेरी जन्म-स्थली सर्फाबाद गांव और ईमान-धर्म के मेरे चंद शुभचिंतकों को छोड़कर) जमाने में कुछ ‘मतलबी-टाइप’ लोगों ने मुझे हर उस “नाम” से “बदनाम” करने में रहम नहीं खाया जो नाम समाज में इंसान की छवि बिगाड़ते हैं. दुश्मनों को जब मौका हाथ लगा उन्होंने, मुझ पर दांव चल दिया. दुश्मनों के कुछ दांव से मैं बच गया कुछ में बुरी तरह फंस गया.कुल जमा आगर यह कहूं कि एक धर्मपाल को इंसान से 'शैतान' बनाने के सौ-सौ “टोटके” अमल में लाए गए तो यह झूठ नहीं होगा. महज इसलिए कि पंक्षी के से पंख (पर) न होते हुए भी कहीं मैं, खुद के 'पांवों' के बलबूते उड़कर आसमान न छू लूं. यह मेरे कमजोर विरोधियों की 'नपुंसक मानसिकता हो सकती है. मुझे ‘नेस्तनाबूद’ कर डालने वाला 'ब्रह्मास्त्र' या हथियार नहीं.’

किसे डुबोऊंगा! मैं ही डूब गया था!

फाइल फोटो

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‘जेल ने मुझे खुद को समझने का मौका दिया है. जेल ने मौका दिया है मुझे अपने उस बचपन को पलटकर देखने का जो, मेरी ही जिंदगी में क्या, किसी भी इंसान के जीवन में लौटकर नहीं आता. जेल न हुई होती तो शायद, जमाने की मशरुफियतों में मैं अपने ही, अतीत के फटे-पुराने पन्नों पर लिखी खुद की कहानियां जिंदगी के अंतिम पड़ाव (70 वर्ष की आयु में) पर दोबारा न पढ़ पाता. जमाने को जबसे मेरे मजबूत पांव नजर आए. बदन से पांवों को काटकर मेरे कंधों के नीचे बैसाखियां लगाने की वक्त ने तमाम “बे-दम” कोशिशें कीं. गैरों से मैं इसलिए भी कोई शिकवा भला क्यों करुं, जब उनसे ज्यादा खुद मुझे अपनी हर चीज याद है. किस्सा तब का है जब मैं बहुत छोटा था. एक दिन अचानक गांव वाले मकान के सामने मौजूद पुश्तैनी तालाब में डूब गया. मुझे डूबता हुआ ताई जल्लो ने दूर से देख लिया. उसे तैरना आता था. उस दिन जल्लो ताई नहीं बचाती तो शायद आज मुझे 'निपटाने' के इंतजामों में मशरुफ बाकी तमाम अपनी जिंदगी का चैन हराम न कर रहे होते!’

मौत का मातम मिटाने को पीते ‘हुक्का’

‘हिंदू-समाज में कहीं किसी शव का दाह-संस्कार (अंतिम संस्कार) करने के बाद घर पहुंचे गमगीन लोग कुछ देर आंगन में बैठने के बाद घरों को चले जाते हैं. हमारे यहां रिवाज इसके एकदम अलग था. श्मशान से लौटे लोग चौपाल पर कुछ देर 'हुक्का' पीते. घर-परिवार की दो-चार बातें गांव के बुजुर्ग चौपाल पर करते. जैसे ही हुक्के की आग ठंडी पड़ती, शव का अंतिम संस्कार करके आए लोग, अपने-अपने घरों को चले जाते थे. बचपन के ही दिनों की बात है. जिसे आज जेल में करीब 60-65 साल बाद याद करके हंसी भी आती है. घर-गांव में पानी का कोई इंतजाम नहीं था. मजबूरी में गांव के जिस तालाब में हम-उम्र बच्चे गाय-बैल-भैंस नहलाते थे. उसी तालाब में हम सब बालक भी नहा लेते थे.’

हवाई-जहाज से हरियाली दिखती, किसान नहीं?

‘जेठ-बैसाख की भरी दोपहरी में. तपती हुई जमीन पर वो नंगे पांव. खेत-खलिहानों में दौड़ते-भागते बिलबिलाते हुए जाना-आना खूब याद है. चारा काटने की मशीन अक्सर खराब पड़ी रहती थी. तंगहाली के चलते चारा-मशीन की मरम्मत करा पाने के स्थिति नहीं थी. इसीलिए मैंने बचपन में दादा हरिलाल को बुढ़ापे में हाथों से लोहे के गंड़ासे से लकड़ी के मोटे गुद्दे (टुकड़ा) पर जानवरों का चारा काटते हुए भी देखा. मरहूम दादा की वो मेहनत आज याद आने पर महसूस होता है कि, आलीशान इमारतों में बैठकर. ट्रेन के एअरकंडीशनर डिब्बों (कम्पार्टमेंट्स) या फिर हवाई-जहाज की खिड़कियों से बाहर झांकने पर खेतों की हरियाली जितनी खूबसूरत नजर आती है. उस हरियाली में दम तोड़ चुके गरीब किसान के माथे-बदन से चुई पसीने की बूंदें किसी को दिखाई नहीं देती हैं. आखिर क्यों?’

माफिया तलाशने वालों सर्फाबाद भी तो देखो

‘जिन लोगों को आज के डीपी में माफिया नजर आता है! क्या उनमें से किसी ने कभी जिंदगी में सर्फाबाद गांव में बचपन और किशोरावस्था में धर्मपाल को देखा. कच्चा मकान बनाने के लिए सिर पर गीली मिट्टी के भारी तसले (लोहे की परात) ढोते हुए? क्या उन्होंने धर्मपाल को जानवरों का चारा नंगे पांव तपती दुपहरियों में ढोते देखा है? अगर नहीं तो फिर, सच को देखे बिना “झूठी” शान-ओ-शौकत के चक्कर में. खुद के मतिभ्रम के चलते धर्मपाल से काहे की और कैसी दुश्मनी बांध ली?’

‘संडे क्राइम स्पेशल’ में पढ़ना न भूलें: ‘DP की DIARY: PART-2’ 'आखिर क्यों कूद गईं थीं मेरी ताई आधी रात को गांव के गहरे कुएं में...? क्यों ‘मंडी के तानाशाह-लाला’ की डांट-डपट सुनकर सहम गया था बचपन में मैं...? पूरा दिन काला करने के बाद भी, आखिर बचपन में रेलगाड़ी देखने की मेरी हसरत क्यों रही गयी अधूरी...? बचपन में कौन और क्यों करवा डालता था नाई से जबरिया मेरा सिर पूरी तरह उस्तरे से‘गंजा’..?' जारी

(लेख डीपी यादव की जेल में लिखी डायरियों और उनसे हुई बातचीत पर आधारित है. ‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी और लेखक किसी भी दावे या बयान की पुष्टि नहीं करते. लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं. )

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