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वो IPS अफसर, जिससे दाऊद भी डरता था लेकिन जो कभी CBI डायरेक्टर नहीं बन सका!

बचपन में मां का शर्मीला बेटा आला-पुलिस-अफसर बनते ही अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से लंबी-लंबी बातें करने लगा, लेकिन उसे कभी सीबीआई का चीफ नहीं बनाया गया

Updated On: Oct 28, 2018 12:54 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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वो IPS अफसर, जिससे दाऊद भी डरता था लेकिन जो कभी CBI डायरेक्टर नहीं बन सका!
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बचपन में मां का शर्मीला बेटा आला-पुलिस-अफसर बनते ही अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से लंबी-लंबी बातें करने लगा. दोस्तों ने सिविल सर्विसेज का फॉर्म लाकर भरवा दिया तो, फर्स्ट-अटेम्प्ट में ही आईपीएस बन गया. तमाम उम्र जमाना जिसे कम बोलने वाला समझता रहा खाकी वर्दी में उसने, वो अनगिनत इबारतें लिख दीं जो, पुलिस की आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘नजीर’ बन गईं. भला इतना बड़ा कोई आला आईपीएस अफसर सड़क चलते ट्रक-ड्राइवरों की आंखों की रोशनी की ‘जांच-पड़ताल’ भी कराता होगा?

अजीब-ओ-गरीब होने के बाद भी मगर यह सवाल सच है. बशर्ते आईपीएस भी खुद को पहले इंसान और बाद में आला-पुलिस-अफसर या सरकारी हुक्मरान समझे तब. जी हां ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस खास-किश्त में मैं उसी आला-पुलिस अफसर का जिक्र आगे बढ़ा रहा हूं जिसने किसी ने जमाने में, बदल दी थी एक झटके में ही गोवा में बर्तन धोने वाले तमाम ‘हिंदुस्तानियों’ की जिंदगी. जिसे कदापि बर्दाश्त नहीं हुआ गोवा में गोरों का गाना मल्हार और हिंदुस्तानियों का धोना झूठे-बर्तन!

मुश्किल है अरुणाचल पुलिस में नौकरी

‘आईपीएस की ट्रेनिंग से लौटने के बाद इंस्पेक्टर मौजी खाने के दिशा-निर्देशन में मैंने दिल्ली के डिफेंस कालोनी थाने में ‘डी-कोर्स’ किया. 1979 में मुझे बहैसियत एसीपी यानी सहायक पुलिस आयुक्त (सहायक पुलिस अधीक्षक) पुलिसिया नौकरी में पहली पोस्टिंग मिली चाणक्यपुरी सब-डिवीजन में. सन् 1980 में मेरा तबादला कर दिया गया नेफा यानी नॉर्थ ईस्टर्न फ्रंटियर एजेंसी जो, अब अरुणाचल-प्रदेश के नाम से जाना जाता है. वहां मुझे बोम्बडिला जिले का पुलिस अधीक्षक बनाया गया. उस जमाने में एसपी बोम्बडिला की ही जिम्मेदारी थी बाकी दो जिलों सेप्पा और तवांग की कानून-व्यवस्था देखना.

वह बॉर्डर का इलाका था. इसलिए वहां पुलिस अधीक्षक का पद बहुत ही संवेदनशील माना जाता था. अरुणाचल की तैनाती के दौरान ही मुझे आभास हुआ कि वहां, सुबह के बाद शाम कैसी सामने आएगी? पुलिस के लिए वहां पर सब कुछ अनिश्चित सा ही रहता है. जब होगा तब निपटा जायेगा! जैसे हालात हर वक्त खाकी-वर्दी वाले पर झूलते रहते हैं. इसका अंदाजा पुलिस अफसर को भी लगा पाना मुश्किल काम था. अगर यह कहूं कि दिल्ली से वहां पहुंचा पुलिस अफसर दूसरों के कंधों पर नौकरी करने को बाध्य होता है तो, अतिश्योक्ति नहीं होगी.’

कई साल से थाना-हवालात में बंद मिले कातिल!

‘दिल्ली में पुलिस का जितना दमखम और दबदबा, इज्जत-आबरु-रुतबा है. अरुणाचल में सब-कुछ इसके उल्टा है. वहां पब्लिक के साथ-साथ, पुलिस को अपनी इज्जत भी खुद ही करनी पड़ती है. एकदम अलग दुनिया है अरुणाचल में खाकी-वर्दी के लिए. एक बार मैं थाने-चौकी के औचक-निरीक्षण पर निकला था. सेप्पा जिला मुख्यालय के एक थाने की हवालात में पहुंचा. देखा कि हवालात के अंदर दो लोग कैद करके रखे गए हैं. पूछताछ में पता चला कि, वे दोनों हत्या जैसे संगीन जुर्म के मुलजिम थे. 6-7 साल से थाने की ही हवालात में कैद थे. सुन-देखकर मेरा माथा ठनक गया. मैं सिहर गया. मन में विचार आया कि अगर ऐसा कहीं और हुआ होता तो, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी NHRC ने पूरे थाने सहित थानेदार और जिम्मेदार तमाम आला-पुलिस अफसरों तक को निपटा दिया होता. उसी दिन मुझे पता चला कि वहां कोई जेल नहीं बनाई गई थी जिसके चलते हत्यारोपी कई साल से थाने की ही हवालात में बंद करके रखा जाना मजबूरी मगर, मुझ जैसे एक पुलिस अफसर के लिए बेहद चौंकाने वाली जानकारी थी. हालांकि इस मुद्दे पर जब मैने आपत्ति जताई तो उस जमाने में वहां के डिप्टी कमिश्नर (डीसी) को काफी नागवार गुजरा था.’

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1984 के दंगों ने दिल दहला दिया

एशियन गेम्स शुरू हो चुके थे. 20 नवंबर सन् 1982 को मुझे तबादला करके अरुणाचल से दिल्ली बुला लिया गया. डिप्लॉयमेंट की जिम्मेदारी मुझे दी गई. उसी दौरान मुझे डीसीपी हेडक्वार्टर-2 लगा दिया गया. जब एडिश्नल डीसीपी सेंट्रल दिल्ली लगा तभी राजधानी में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद बवाल मच गया. सिख विरोधी दंगे भड़क गए. उस दौरान सिखों को बचाने में मैंने जो काम किया, दरअसल मेरी जिंदगी की असली पुलिसिंग तो वही थी. यह बात है सन् 1984 के दौरान की. उसके बाद सन् 1985 से 1987 तक डीसीपी ट्रैफिक के पद पर दिल्ली में ही तैनात रहा. ट्रैफिक में मौका हाथ आया सो वहां भी खुलकर काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय, जहां से बहैसियत पुलिस कमिश्नर रिटायर हुए नीरज कुमार.

आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय, जहां से बहैसियत पुलिस कमिश्नर रिटायर हुए नीरज कुमार.

टैक्सी वालों की ठगी को पहुंचाई ‘ठेस’!

डीसीपी ट्रैफिक रहते हुए रोज अखबारों में पढता था कि इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट और घरेलू हवाई अड्डे पर अक्सर टैक्सी वाले सवारियों को ठगते हैं. अक्सर लूटपाट की वारदातों की खबरें भी सामने आ जाती थीं. दिल्ली और देश की छवि तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब हो ही रही थी. अपराध बढ़ने से दिल्ली पुलिस की मिट्टी पलीद होने के साथ-साथ क्राइम-ग्राफ भी बढ़ता जा रहा था. एक दिन जब माथा ठनका तो, एयरपोर्ट पर ‘प्री-पेड-बूथ’ बनवा दिया. इस फैसले को अमली जामा पहने जब मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि प्री-पेड-बूथ के बाहर टैक्सी ड्राइवर पर्ची लेने के लिए बाकायदा लाइन में लगे हैं, तो मुझे बहुत खुशी हुई. लगा कि मैंने दिल्ली और देश की जनता के लिए कम से कम बहैसियत डीसीपी ट्रैफिक होने के नाते कुछ तो सहूलियत भरा काम किया.

ट्रक ड्राइवर और ट्रांसपोर्टरों की ‘रोशनी’ बढ़ा दी!

यह किस्सा भी दिल्ली में डीसीपी ट्रैफिक की तैनाती के दौरान का ही है. सुनने में आया कि राजधानी की साफ-सुथरी और चौड़ी सड़कों पर रात के वक्त घुसते ही बाहरी राज्यों के ट्रक ड्राइवर अंधाधुंध ड्राइविंग पर उतर आते हैं. जिससे रात में दिल्ली की सड़कों पर हादसों की संख्या में निरंतर इजाफा होता जा रहा था. साथी पुलिस अफसरों के साथ काफी माथा-पच्ची की. उसके बाद मेरे जेहन में आया कि क्यों न ट्रक-ड्राइवरों की आंखों की रोशनी की एक बार जांच करा ली जाए! मेरी सोच अजीब-ओ-गरीब जरूर थी. उस पर अमल करना बेहद जटिल मगर जरूरी भी था. वजह वही डीसीपी ट्रैफिक होने के नाते मैं दिल्ली की जनता को बेकाबू ट्रक के टायरों के नीचे भला मरने देने के लिए कैसे छोड़ सकता था?

मेरी इस अफलातूनी सोच पर महकमे और समाज में कौन क्या सोचेगा-कहेगा, इन तमाम दकियानूसी सवालों से मैंने पहले खुद को छुटकारा दिलाया. फिर दिल्ली में पहुंच रहे ट्रक-ड्राइवरों में से अधिकांश की आंखों की रोशनी की जांच का अभियान छेड़ दिया. खर्चा लिया ट्रक मालिकों यानी ट्रांसपोर्टरों की जेब से. पड़ताल के हैरतंगेज परिणाम सामने आए. सैकड़ों ड्राइवर कमजोर आंख होने के चलते अंधे होने की कगार पर खड़े थे. कई को तो 20 मीटर दूर तक का भी नजर नहीं आ रहा था. वह नायाब फॉर्मूला देश में पहली बार दिल्ली में मैंने अख्तियार किया. यह अलग बात है कि कुर्सी से मेरे हटते ही, वो अभियान भी ‘ठंडे बस्ते’ में बंद कर दिया गया.

बायें से दायें नीरज कुमार, सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर शांतनु सेन के साथ

बायें से दायें नीरज कुमार, सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर शांतनु सेन के साथ.

मेरी बात नहीं मानी लिहाजा हजारों करोड़ डूब गए!

डीसीपी ट्रैफिक के दौरान का ही शुरू हुआ एक और गंभीर मामला याद आ रहा है मुझे. दिल्ली की सरकार बीआरटी कॉरीडोर (BUS RAPID TRANSIT COORIDOR) व्यवस्था लागू करने पर आमादा हो गई. मुझसे मशविरा मांगा गया. चूंकि मैं दिल्ली की सड़कों पर जिंदगीभर आम आदमी की हैसियत से भी चल चुका था. मुझे मालूम था कि यहां की सड़कों पर BRT सिस्टम फेल होगा शर्तिया. वजह थी जिस शहर के लोगों में उस वक्त ‘लेन-ड्राइविंग’ का सेंस ही नहीं था. ऐसे में ‘चार-लेन’ के ट्रैफिक को ‘दो-लेन’ में ठूंसते ही जाम लगना तय था.

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2010 आते-आते मैं डीसीपी ट्रैफिक से स्पेशल पुलिस कमिश्नर (एडमिनिस्ट्रेशन) बन गया. उधर मेरी सलाह को नजरंदाज करके लागू किया गया ‘BRT COORIDOR’ फार्मूला भीड़ भरी दक्षिणी दिल्ली की सड़कों पर धूल चाटता हुआ ध्वस्त हो गया. टैक्स से वसूली जनता की हजारों करोड़ की कमाई कुछ जिद्दी और न-समझ सरकारी-सिपहसालारों ने ‘बीआरटी-कॉरीडोर’ में बसों के पहियों के नीचे ‘कुचल’ कर स्वाह कर डाली. सवाल यह है कि इतने मोटे आर्थिक नुकसान का हिसाब कौन और किससे मांगे?

जमाने को पनाह मंगाई, मगर खुद पार नहीं पा सका!

सन् 1988 से 89 तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली का डीसीपी रहा. उसके बाद 1992 तक दक्षिणी दिल्ली जिला डीसीपी रहा. 1992-93 में दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच का डीसीपी बना दिया गया. 1993 में ही डीसीपी से क्राइम (दिल्ली पुलिस) से बहैसियत डीआईजी मैं डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में चला गया. करीब 9 साल सीबीआई में डीआईजी और फिर ज्वाइंट-डायरेक्टर तक के पद पर तैनात रहा. इस बीच सीबीआई में नौ डायरेक्टर समित दत्ता, विजय रामाराव, आर.के. राघवन, सरदार जोगिंदर सिंह, आरसी शर्मा, कार्तिकेन, टीएन मिश्रा और पीसी शर्मा आए गए. सबके कार्यकाल में मेरे काम और तारीफों के ‘पुलिंदे’ बंधे. 1993 में मुंबई बम धमाकों की पड़ताल के लिए सीबीआई में ‘स्पेशल-टॉस्क-फोर्स’ (STF) तैयार की.

दाउद इब्राहिम जो खुद को अंडरवर्ल्ड का डॉन कहता था, तमाम मर्तबा रहम की भीख मांगता रहा. आफताब अंसारी, रोमेश शर्मा, मेमन परिवार, गुजरात में खौफ का दूसरा नाम रहे अब्दुल लतीफ को खून के आंसू रुला दिए सीबीआई में रहते हुए ही. इसके बाद भी मैं सरकारी ‘साहिबों’ को सीबीआई का डायरेक्टर बनने के काबिल नहीं लगा! इस सवाल का जवाब देने वाला मुझे आज भी कोई ईमान वाला ‘दिलावर’ नहीं मिला है. आज सीबीआई मुख्यालय में पढ़े-लिखे ‘पहलवानों’ द्वारा खोदे अखाड़े में जो, दंगल हो रहा है वह दुनिया के सामने है.

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‘गोरे’ गायें मल्हार, अपने धोएं बर्तन! बर्दाश्त नहीं था

बात उन दिनों की है जब मैं गोवा में तैनात था. गोवा में मैंने खुद देखा कि वहां का पूरा ‘बिजनेस-स्ट्रक्चर’ गोरों (विदेशियों) के हाथ में बंद है. इनमें प्रमख हैं ब्रिटिश, इटैलियन, पुर्तगाली, नाइजीरियंस. मैंने देखा कि गोवा में गोरे चेहरे पर चश्मा चढ़ाकर मल्हार (अंग्रेजी गाने) गाते फिर रहे हैं. टूरिस्ट वीजा पर आए अंग्रेज, अंग्रेजी गानों पर नाच-गाकर समुंदर किनारे मटरगश्ती करते थे. उसी गोवा में उन्हीं गोरों के बीच में हमारे अपने लोग (हिंदुस्तानी) झूठे बर्तन धो रहे होते हैं. क्यो भई ऐसा क्यों? हमारी जमीन पर गोरे मौज मारें और उनके सामने हिंदुस्तानी बर्तन मांजें! कलेजा मुंह को आ गया. मन विचलित हो उठा. सोचा पहले गोवा से गोरों की सफाई जरूरी है. तभी हमारे अपने दो जून की इज्जत की रोटी का जुगाड़ कर पाएंगे.

सबसे पहले मैंने गोवा में कई साल से चल रहे ‘इंगो’ बाजार को नेस्तनाबूद किया. जोकि हर शनिवार की रात को जगमगाता था. बाजार में बिकने वाली ड्रग्स का धंधा चौपट किया. खुलेआम मैदान में मेरे उतरते ही सबसे पहले वहां से रफूचक्कर हुआ विदेशी ‘इंगो’, जोकि जर्मनी का मूल निवासी था. उस बाजार के कारोबार में एक भारतीय नेता-जी की पत्नी की भी खासी उछल-कूद मची रहती थी.

कश्मीर का ‘बाटलो’ गोवा में धर लिया

गोवा पोस्टिंग के दौरान ही मार्च 2006 में तारिक बाटलो (वाटलो) को गिरफ्तार कर लिया. उसकी गिरफ्तारी में भारतीय खुफिया एजेंसी (आईबी) ने काफी मदद की थी. दरअसल तारिक वाटलो मूलत: कश्मीर घाटी का रहने वाला था. पूछताछ में तारिक ने जो कुछ कबूला उसे सुनकर गोवा पुलिस और आईबी वाले हिल गये. उसने बताया कि अगर वो गिरफ्तारी से बच जाता तो बाली के नाइट क्लब में हुए आतंकी हमले जैसा ही कदम उसे भारत को दहलाने के लिए उठाना था. बाटलो की गिरफ्तारी वाले दिन भी दिल ने महसूस किया कि चलो, पुलिस की वर्दी देश और यहां की निर्दोष जनता को महफूज रखने के काम तो आ सकी. पटना से निकले पांव कभी पीछे नहीं लौटे.

बायें से दायें दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल तेजेंद्र खन्ना के साथ (बीच में) नीरज कुमार सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक शांतनु सेन के साथ.

बायें से दायें दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल तेजेंद्र खन्ना के साथ (बीच में) नीरज कुमार सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक शांतनु सेन के साथ.

बिहार में सासाराम के करीब रोहतास जिले के गांव शिवपुर चितौली में 4 जुलाई सन् 1953 को मेरा जन्म सिविल इंजीनियर पिता श्री विश्वनाथ सहाय और मां पुष्पा सहाय के घर में हुआ था. बचपन में शर्मीला था. 1970 में पटना से दिल्ली पहुंचा तो फिर पांव कभी वापिस नहीं लौटे. दिल्ली से ही पोस्ट ग्रेजुएशन किया. दिल्ली में मिली प्रेमिका माला कुमार को ही बाद में पत्नी स्वीकार किया. सन् 1976 में आईपीएस बन गया. कॉडर मिला अग्मू (अरुणाचल गोवा मिजोरम और अन्य यूनियन टेरिटरीज).

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आईपीएस बनने पर मां परेशान थी कि मैं पुलिस अफसरी कैसे करूंगा? मैं अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से ही ‘गुफ्तगू’ करने लगा. दाऊद शातिर दिमाग और मैं ‘शुद्ध-जिद्दी’ था. सो उसकी कोई बात नहीं मानी. जिंदगी की दौड़-भाग शुरू हुई तो अमेरिका, इज्राइल, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात भी घूम आया. 37 साल आईपीएस रहते हुए पुलिसिया नौकरी की. इस दौरान सीबीआई में ज्वाइंट डायरेक्टर, गोवा का पुलिस महानिदेशक (2004-2006), तिहाड़ जेल महानिदेशक रहा. जुलाई 2013 में दिल्ली पुलिस कमिश्नर पद से रिटायर हो गया. फिलहाल बीसीसीआई की एंटी करप्शन ब्रांच और सिक्योरिटी यूनिट में कार्यरत हूं बहैसियत प्रधान सलाहकार.

मैं ही तो हूं वो.......

मैं वही पूर्व आईपीएस नीरज कुमार हूं, जिसने जमाने को झकझोर देने वाले निर्भया गैंगरेप हत्याकांड से सीखा जिंदगी जीना. निर्भया कांड ने ही जिसे कराई थी अपने और पराए की पहचान. जिसे निर्भया कांड ने ही समझाया था, हाथी के खाने और दिखाने के दांतों के बीच का फर्क. मैं वही नीरज कुमार हूं जिसे तिहाड़ जेल के कैदी आज भी याद रखे हुए हैं ‘पढ़ो और पढ़ाओ’ अभियान के लिए. मैं ही वह नीरज कुमार हूं दिल्ली पुलिस कमिश्नर पद से रिटायर होने से चंद दिन पहले प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दाऊद जिसे समझा रहा था, ‘अब तो रिटायर हो रहे हो. अब तो मेरा पीछा छोड़ दो.’

मैं ही हूं वह नीरज कुमार हूं जिसे सरकारी सिपहसलारों ने सीबीआई का डायरेक्टर बनाना नहीं कबूला! मैं वही नीरज कुमार हूं जिसने गुस्साए अन्ना हजारे को हाथों-हाथ थामकर साध लिया था तिहाड़ जेल मुख्यालय की चौहहद्दी के भीतर. आज मैं सीबीआई के अखाड़े में हो रहे पढ़े-लिखों का ‘दंगल’ देख रहा हूं खुलेआम बेफिक्री के आलम में बैठा. मैं ही वो नीरज कुमार हूं, निर्भया कांड में जिसके पीछे पड़ा था जमाना हाथ धोकर...मगर मेरे पांवों के नीचे से कोई जमीन नहीं खिसका पाया. लाख झंझावतों को जन्म देने के बावजूद.’

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(पाठकों के पास भी अगर है ऐसा ही कोई दमदार जावांज या किरदार-कहानी. तो तुरंत लिख भेजिये. अपने नाम, नंबर, पते सहित संक्षिप्त जानकारी. नीचे दिये ई-मेल पर. patrakar1111@gmail.com)

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