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दौलत की 'मैली-मुराद' ने जब विश्वासघात को भी मंगवा दी थी 'पनाह'

विमल, बड़े भाई धनिक लाल (36) के साथ विष्णु गार्डन (पश्चिमी दिल्ली जिला) स्थित फुलझड़ी बनाने की फैक्टरी में नौकरी करता था. 14 फरवरी 2002 (वेलेंटाइन-डे) धनिक लाल एक लाख रुपए लेकर यमुना पुश्ता (दिल्ली के उत्तरी जिले के थाना कोतवाली इलाके में) के लिए निकला था

Updated On: Sep 29, 2018 09:08 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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दौलत की 'मैली-मुराद' ने जब विश्वासघात को भी मंगवा दी थी 'पनाह'

जर जोरु और जमीन. तीनों के ऊपर शुरू हुई ‘हक’ की लड़ाई की ‘हद’ मापने को. अभी तक जमाने में कोई पैमाना नहीं बना है. इन तीनों को ही लेकर या फिर, तीनों में से किसी पर भी शुरू हुई जंग में हार-जीत का फैसला आज भी मौका, मैदान, वक्त और हालातों की वैसाखियों पर ही टंगा हुआ मिलता है. मैं जिक्र कर रहा हूं करीब 16 साल पहले हुई, हैरतंगेज आपराधिक घटना का. जो भटक रही थी, साजिश, फरेब, गद्दारी और कत्ल-ए-आम की चौहद्दी के इर्द-गिर्द. पैनी नजर से हुई ‘पड़ताल’ की बदौलत ही तय हो पाया था कि, किस कदर भारी पड़ जाती है कभी-कभी? इंसान की बेईमान मंशा और रात-ओ-रात दौलतमंद बनने की घिनौनी ख्वाहिश! कालांतर में दिल्ली-बिहार के बीच महीनों पुलिसिया फाइलों में.

इधर से उधर भटकती रहने वाली. 2000 के दशक की वही कामयाब ‘पड़ताल’. कानूनी दस्तावेजों में जो साबित हुई थी ‘मील का पत्थर’. पुलिस की आने वाली पीढ़ियों को पढ़ने/पढ़ाने-सीखने-सिखाने के लिए उम्दा पाठ. बीते कल में हाड़तोड़ पुलिसिया मशक्कत के ‘सुई-धागे’ से, ‘गूंथी’ गई ‘तफ्तीश’ की सच्ची कहानी. पेश है ‘पड़ताल’ की इस खास किश्त में. ब-जुबान उस ऐतिहासिक पड़ताल के आला-पड़ताली-पुलिस अफसरों के.

फरवरी सन् 2002 दिल्ली का उत्तरी जिला

थाना यमुना-पुश्ता की पुलिस चौकी पर विमल ऋषिदेव नाम का युवक पहुंचा. दिल्ली पुलिस और अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, विमल मूलत: थाना नाहरा के गांव शाहपुर मझौल, जिला सहरसा, बिहार का निवासी था. विमल, बड़े भाई धनिक लाल (36) के साथ विष्णु गार्डन (पश्चिमी दिल्ली जिला) स्थित फुलझड़ी बनाने की फैक्टरी में नौकरी करता था. 14 फरवरी 2002 (वेलेंटाइन-डे) धनिक लाल एक लाख रुपए लेकर यमुना पुश्ता (दिल्ली के उत्तरी जिले के थाना कोतवाली इलाके में) के लिए निकला था.

यमुना पुश्ता स्थित इंदिरा कालोनी निवासी छोटे लाल के साथ धनिक को गांव (बिहार) के लिए दिल्ली से बजरिए ट्रेन रवाना होना था. बहन की शादी की खरीददारी और इंतजाम कराने के लिए. छोटे लाल बिहार में विमल और धनिक के गांव के पास का ही रहने वाला था. छोटे लाल दूर का रिश्तेदार भी था. छोटे लाल और उसके दोस्त सिकंदर को इस बात की जानकारी थी कि, बहन की शादी के लिए धनिक लाल एक लाख रुपए लेकर उनके पास पहुंच रहा है. कई दिन तक धनिक लाल गांव नहीं पहुंचा. जबकि धनिक का ममेरा भाई सिंकदर गांव पहुंच गया. तब धनिक के संदिग्ध हालातों में गायब हो जाने की बात का खुलासा हुआ.

दिल्ली पुलिस का मुख्यालय

दिल्ली पुलिस मुख्यालय

बे-हयाबिहार पुलिस ने बेहालको बहलाया!

चूंकि धनिक लाल बिहार के लिए निकला था. इसलिए पहले उसके छोटे भाई ने बिहार पुलिस से संपर्क साधा. गले में मुसीबत पड़ती देख बिहार पुलिस ने, मामले को दिल्ली पुलिस की ओर टरका-सरका दिया. बिहार पुलिस चाहती तो विमल की शिकायत पर ‘जीरो-एफआईआर’ दर्ज करके प्राथमिक जांच के बाद, पड़ताल में दिल्ली पुलिस का सहयोग ले सकती थी. ऐसा करने वाला फिर बिहार पुलिस की भला बेहयाई कैसे साबित हो पाती? बेहाल छोटे भाई विमल की सूचना पर, दिल्ली पुलिस ने धनिक लाल की गुमशुदगी (रिपोर्ट) दर्ज करके पड़ताल शुरू कर दी. दौरान-ए-पड़ताल साबित हो गया कि, धनिक लाल, यमुना पुश्ता स्थित इंदिरा कालोनी में रहने वाले छोटे लाल के पास पहुंचा था. छोटे लाल ने दिल्ली पुलिस को बताया कि वह , सिकंदर (विमल और धनिक का ममेरा भाई) के साथ तड़के ही धनिक को बिहार जाने वाली ट्रेन पर बैठा आया था. इसके बाद क्या हुआ नहीं पता.

सिंकदरके सामने संदिग्ध साबित हुआ छोटा

पुलिसिया फाइलों में दर्ज किए गए तफ्तीशी-मजमून के मुताबिक, अल-सुबह सिकंदर को ट्रेन छूट जाने की बात कहकर, जल्दी-जल्दी भीड़ में (तकरीबन जबरदस्ती से ही) छोटे ने महानंदा ट्रेन के भीतर चढ़ा दिया था. दिल्ली स्टेशन पर सिकंदर ने जब, धनिक लाल के बारे में पूछा तो छोटा बोला, ‘ट्रेन में बहुत भीड़ है. धनिक लाल पीछे-पीछे आ रहा होगा. वह खुद ही चढ़ जाएगा ट्रेन में. तुम जल्दी ट्रेन में चढ़ो. वरना धनिक के चक्कर में तुम्हारी भी ट्रेन छूट जाएगी.’ दिल्ली में तो छोटे की बातों में आकर सिकंदर ट्रेन में चढ़ गया. उसका मन लेकिन पूरे रास्ते ममेरे भाई धनिक से मिलने को व्याकुल रहा.

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सहरसा (बिहार) स्टेशन पर पहुंचते ही सबसे पहले सिकंदर ने धनिक को तलाशा. वहां धनिक नहीं मिला तो सिकंदर ने दिल्ली फोन करके धनिक के छोटे भाई विमल को पूरा वाकया बयान किया. अब तक छोटे, सिकंदर और विमल की बातों से दिल्ली पुलिस यह ताड़ चुकी थी कि हो न हो, धनिक के गायब होने या उसे गायब करने/ कराने में छोटे का हाथ जरूर है. न कि सिकंदर कहीं संदिग्ध है. पड़ताल में जुटी दिल्ली के कोतवाली थाने की पुलिस मगर सामने आ रहे तथ्यों पर चुप्पी साध गई. अपनी आंख और कान खुले छोड़कर.

टेलीफोन-कॉल ने पुख्ता की पड़ताल उस वक्त कोतवाली थाना प्रभारी/एसएचओ इंस्पेक्टर अशोक कुमार सक्सेना (2008 में दिल्ली के सेंट्रल जिला दरियागांज एसीपी के पद से रिटायर खानदानी कोतवाल) और एडिश्नल एसएचओ (वसंत विहार सब-डिवीजन के मौजूदा एसीपी सतीश कुमार केन) थे. दोनों इंस्पेक्टर अब तक ‘पड़ताल’ में सामने आए तथ्यों से, उत्तरी जिला डीसीपी संजय बेनीवाल (वर्तमान में चंडीगढ़ के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस यूटी कैडर 1989 बैच आईपीएस) को अवगत करा चुके थे. डीसीपी बेनीवाल ने दोनों इंस्पेक्टर (एसएचओ और एडिश्नल एसएचओ) की तत्कालिक मदद के लिए, उस वक्त उत्तरी जिले की एडिश्नल डीसीपी गरिमा भटनागर (वर्तमान में चीफ मिशन मैनेजमेंट यूएन हेडक्वार्टर, न्यूयॉर्क में तैनात यूटी काडर 1994 बैच की आईपीएस) को भी लगा दिया. पुलिस द्वारा संदिग्धों की लगाम ढीली छोड़ते ही. एक दिन विमल की फैक्टरी में अनजान इंसान की टेलीफोन-कॉल पहुंच गई. उसने विवेक ऋषिदेव से कहा कि, ‘अगर वो अपने गायब हुए बड़े भाई धनिक लाल को जिंदा छुड़वाना चाहता है तो, पांच लाख की फिरौती का इंतजाम कर ले.’ उस ‘फोन-कॉल’ से पुलिसिया ‘पड़ताल’ की तस्वीर का रुख तकरीबन साफ हो गया. पहले से ही ताड़ में बैठी पुलिस ने संदिग्ध छोटे लाल को दबोच लिया.’

दिल्ली पुलिस की आने वाली पीढ़ियों के लिए पाठ बन गयी वो एतिहासिक 'पड़ताल..पंजाब के राज्यपाल वीपी सिंह बदनोर के साथ उत्तरी दिल्ली जिला के तत्कालीन डीसीपी और चंडीगढ़ के मौजूदा पुलिस महानिरीक्षक संजय बेनीवाल'

दिल्ली पुलिस की आने वाली पीढ़ियों के लिए पाठ बन गई वो एतिहासिक 'पड़ताल..पंजाब के राज्यपाल वीपी सिंह बदनोर के साथ उत्तरी दिल्ली जिला के तत्कालीन डीसीपी और चंडीगढ़ के मौजूदा पुलिस महानिरीक्षक संजय बेनीवाल'

छोटेने कर डाली बड़ीकरतूत

दिल्ली पुलिस जैसे ही असली रंग में आई. बेखौफ होकर पुलिस को ‘कमअक्ल’, समझने की गलती कर रहे, मुख्य षडयंत्रकारी छोटे लाल (26) का हौसला ‘हांफने’ लगा. उससे मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने दूसरे आरोपी (छोटे लाल का दोस्त), ओम प्रकाश यादव (निवासी गोरखपुर यूपी) को भी दबोच लिया. दौरान-ए-पड़ताल दोनों ने बताया कि, वे धनिक लाल को 14 फरवरी (सन् 2002 वेलेंटाइन डे वाली रात) को, अपहरण करने वाले दिन ही, रात के वक्त में, कत्ल कर चुके थे. लाश को पास मौजूद जानवरों के गोबर वाले गहरे दल-दलनुमा तालाब में डुबो दी. हत्या शराब पिलाकर की गई. वारदात को अंजाम छोटे लाल के कच्चे घर के पास स्थित दूसरे घर में दिया गया. जिस घर में चंद रुपयों के लालच में विश्वास का कत्ल (धनिक लाल) हुआ वो, छोटे लाल की प्रेमिका का था.

वेलेंटाइंस-डे पर विश्वासका कत्ल

पूछताछ के दौरान छोटे और ओम प्रकाश यादव ने पुलिस को बताया कि, धनिक छोटे पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करता था. इसी के चलते धनिक ने छोटों के पास पहुंचने से पहले ही उसे (छोटे को) बता दिया था कि, उसके पास एक लाख रुपए हैं. जो ब-हिफाजत बहन की शादी के लिए गांव लेकर जाने हैं. साथ ही बहन की शादी के लिए खरीदा हुआ कुछ सामान भी है. यह भनक मिलते ही छोटे का ईमान डोल गया. उसने यह ‘राज’ तुरंत ओम प्रकाश को यादव को बताया. धनिक लाल के पहुंचने से पहले ही छोटे और ओमप्रकाश ने षडयंत्र रच लिया कि कैसे, धनिक लाल को ठिकाने लगाना है. छोटे और ओम प्रकाश के मजबूत इरादों वाले षडयंत्र में भी मगर छेद सौ रह गये थे. इन्हीं छेदों में से वे दोनों पुलिस को दिखाई दे रहे थे. लिहाजा दोनों कातिल मय नकदी और माल के गिरफ्तार कर लिये गये.

लाश खोजने का ‘जानलेवा’ फॉर्मूला

हत्यारोपियों के साथ पुलिस गोबर की दलदल (गहरे तालाब) वाली जगह पहुंची. मौका (दलदल) देखकर पुलिस को पसीना आ गया. सैकड़ों युवकों को मोटा इनाम-इकराम देकर लाश तलाशने में पुलिस ने मदद की गुहार लगाई. जहरीली गैसशुदा-गोबर की दलदल में कोई दस कदम घुस पाया कोई 50 कदम. कुल जमा खुद की जान के लाले पड़ते देख सब लड़के तालाब से वापिस बाहर निकल आये. अब पुलिस ‘मरता क्या न करता’ वाली हालत में तालाब के चारों ओर खड़ी थी. लाश निकालने की मुसीबत थाना कोतवाली पुलिस की झोली में आन पड़ी. लाश एहतियातन निकालनी थी. ताकि उसका कोई अंग पहले से ही सड़े हुए गोबर की दलदल में फंसा या डूबा न रह जाए.

Delhi Police

आईपीएस काटते हैं कन्नी मगर....

मौके पर तत्कालीन एडिश्नल डीसीपी गरिमा भटनागर भी पहुंच चुकी थीं. उन्होंने पुलिस वालों को जब, उस जानलेवा जहरीली गोबर-गैस से युक्त तालाब में, एक-दूसरे की कमर से रस्सी बांधे खड़े देखा, तो वे सिहर गईं. जैसे-तैसे एहतियात बरतते हुए पुलिसकर्मियों ने ‘मानव-श्रंखला’ बनाकर, दलदली गोबर के तालाब से लाश निकाल ली. उसके बाद गरिमा भटनागर ने लाश खोजने वाले बहादुर मातहतों को, भरपूर इनाम-इकराम (पुलिसिया नौकरी में कायदे-कानून से जो वाजिब था) से नवाजा. बकौल मामले के पड़ताली अशोक कुमार सक्सेना, ‘अमूमन ऐसे अवसरों पर आईपीएस स्तर के आला-पुलिस अफसरान नाक-भौं ही सिकोड़ते ही दिखाई देते हैं. या फिर ‘साहब-लोग’ सड़ी-गली लाश देखकर नाक को ‘परफ्यूम्ड’ रुमाल में दबाते दिखाई देते हैं. गरिमा भटनागर ने मगर उस तफ्तीश में काबिल-ए-गौर यादगार भूमिका निभाई थी.’

कोतवाल भी इनका कायलहै क्योंकि...

‘अधिकांश आईपीएस ऐसे घटनास्थलों पर एअरकंडीशंड दफ्तरों से निकलने में ही तौहीन समझते हैं. डीसीपी संजय बेनीवाल और एडिश्नल डीसीपी गरिमा भटनागर ने उस पड़ताल में जिस तरह, सिपाही-हवलदार से लेकर इंस्पेक्टर तक का हौसला बढ़ाया. वह यादगार और काबिल-ए-तारीफ था. आज भी नहीं भूला हूं.’ उस पड़ताल की यादों के पन्ने पलटते हुए बेबाकी से 16 साल बाद भी बताते हैं. दिल्ली पुलिस के पूर्व खानदानी कोतवाल (अशोक सक्सेना के पिता ओम प्रकाश सक्सेना उत्तर प्रदेश पुलिस के दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रिटायर्ड डिप्टी एसपी, दादा छन्नू लाल सक्सेना दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसपी, चाचा शील कुमार सक्सेना दिल्ली पुलिस के दबंग रिटायर्ड एसएसपी/डीआईजी) और मामले के पड़ताली रहे रिटायर्ड एसीपी अशोक कुमार सक्सेना.

दिल्ली के पूर्व पुलिस कमीश्नर अजय राज शर्मा के साथ अशोक सक्सेना

दिल्ली के पूर्व पुलिस कमीश्नर अजय राज शर्मा के साथ अशोक सक्सेना

पीढ़ियों के लिए ‘पाठ’ बनी ‘पड़ताल’

‘धनिक लाल हत्याकांड की कामयाब पड़ताल में उस जमाने में कोतवाली थाने में तैनात, सिपाही-हवलदार से लेकर इंस्पेक्टर तक की अविस्मरणीय भूमिका रही थी. 16 साल बाद भी मुझे बखूबी याद है कि, उस पूरी तफ्तीश में उत्तरी दिल्ली के कोतवाली थाना पुलिस को, जितनी मेहनत नहीं करनी पड़ी, उससे कई गुना ज्यादा जानलेवा भागीरथ प्रयास, धनिक लाल की लाश, तालाब से बाहर लाने में करने पड़ गये. कोतवाली पुलिस ने उस दिन अगर सब्र और एहतियात से काम न लिया होता तो, हमें (दिल्ली पुलिस) जानमाल का नुकसान भी उठाना पड़ सकता था. चलिए कोई बात नहीं.

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उस पड़ताल से पुलिस ने भी बहुत कुछ नया सीखा. यह तफ्तीश सिर्फ एक हत्याकांड की ‘इन्वेस्टीगेशन’ भर ही नहीं, हमारी (पुलिस) नई पीढ़ियों के लिए 'पाठ' के रूप में भी आईंदा काम आएगी. ईमानदारी और मेहनत का ‘फल’ कभी सड़कर खराब नहीं होता है. ऐसी पड़तालें ही पुलिस की आने वाली पीढ़ियों की 'धरोहर' हैं.’ 16 साल पुरानी उस पड़ताल की यादों के पन्नों को पलटकर पढ़ने की कोशिश करते हुए बताते/सुनाते हुए गौरवांवित महसूस करते हैं. इस समय चंडीगढ़ के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) और उत्तरी दिल्ली जिला के तत्कालीन पुलिस उपायुक्त संजय बेनीवाल.

दगा की सजा ने जहन्नुमकी जिंदगी

दोस्ती में विश्वास के कत्ल की उस हैरतंगेज आपराधिक घटना की एफआईआर (नंबर 109) कोतवाली थाने के तत्कालीन हवलदार/ ड्यूटी अफसर जगबीर सिंह द्वारा 21 फरवरी 2002 को लिखी गई थी. मामले के पड़ताली रहे अशोक कुमार सक्सेना के मुताबिक, ‘धारा 364ए, 302, 201, 34, 394, 328 के तहत दर्ज मुकदमे में छोटे लाल और ओम प्रकाश यादव को कत्ल, अपहरण, लूट, षड्यंत्र रचने और सबूत मिटाने का मुख्य आरोपी बनाया था. 16 मई 2002 को अदालत में चार्जशीट (आरोप-पत्र) दाखिल की गई थी. करीब चार साल के अंदर ही 31 मार्च सन् 2006 को दिल्ली की तीस हजारी अदालत के, एडिश्नल सेशन जज एस.सी. राजन ने दोनों हत्यारोपियों को ‘मुजरिम’ करार देकर ‘उम्रकैद’ की सजा सुना दी.’

खानदानी कोतवाल अशोक कुमार सक्सेना (बायें) साथ में महिला आईपीएस गरिमा भटनागर, पत्नी कल्पना और बेटी गुंजन (दायें) के साथ

खानदानी कोतवाल अशोक कुमार सक्सेना (बायें) साथ में महिला आईपीएस गरिमा भटनागर, पत्नी कल्पना और बेटी गुंजन (दायें) के साथ

इस संडे क्राइम स्पेशलमें जरूर पढ़े

‘कई साल से अदालतों में चल रही, रुला देने वाली पुलिस-वकीलों की जिरहों से भांप चुका था मैं कि, सर-ए-शाम भरे बाजार में कत्ल के आरोप में मुझे, फांसी पर लटकाए जाने की सजा ही मुकर्रर होगी! सजा ऐलान होने वाले दिन से पहली पेशी पर ही मैंने, पत्नी को जिस दिन अदालत में न आने को कहा था, उसी दिन मुझे ‘सजा-ए-मौत’ सुना भी दी गई. फांसी के फंदे पर चढ़ने से बच जाने के बाद भी. जवानी के 18 सुनहरे साल जेल की काल-कोठरी में गुजार कर भी सही-सलामत जेल से बाहर आये, सजायाफ्ता पूर्व मुजरिम की बेबाक मगर खौफनाक मुंहजुबानी. बिना किसी काट-छांट या संपादन के.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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