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बुरे दिनों से गुजरती CBI की साख

CBI की सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री के पूर्व डायरेक्टर विश्वनाथ सहगल के मुताबिक, ‘मेरे जमाने में रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, अमेरिका में सीबीआई का डंका बजता था

Updated On: Feb 16, 2019 09:23 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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बुरे दिनों से गुजरती CBI की साख

देश की वो इकलौती जांच एजेंसी कभी जिसके नाम और खौफ से अच्छे-अच्छों को पसीना आया करता था आज उसी सीबीआई के 'साहब' से लेकर 'सिपाही' तक हलकान हुए पड़े हैं. कल तक जो सीबीआई का मुखिया बनने या पोस्टिंग के लिए लार-टपकाते थे वही अब सीबीआई का जिक्र छिड़ने पर बगलें झांक रहे हैं. आज पड़ताल की इस कड़ी में पढ़िए कि क्यों खाकी के तमाम 'बहादुरों' का सीबीआई से 'मोह-भंग' होता जा रहा है...

सीबीआई ‘गुलाम-भारत’ से ‘आजाद-हिंदुस्तान’ तक

बात है 1941 की, जब हिंदुस्तान गुलामी की बेड़ियों से बरी होने को बेचैन था. उन दिनों युद्ध के दौरान इस्तेमाल होने वाले संबंधित सामान की खरीद में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की सूचनाएं अंग्रेजी हुकूमत को आए दिन मिलती थीं. इस पर लगाम लगाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने बनाया स्पेशल पुलिस स्टैब्लिश्मेंट यानी SPE. इसके नियंत्रण की लगाम रखी केंद्रीय स्तर के हुक्मरानों के हाथों में. 1946 में ‘दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टैब्लिशमेंट एक्ट’ बना. इसके साथ ही SPE का कार्य-क्षेत्र बढ़ाकर पूरे भारत में कर दिया गया. साथ ही राज्यों में भी SPE के हस्तक्षेप के रास्ते खोल दिए गए ताकि देश के हर सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सके.

नाम बदला, काम नहीं

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कहा जाए कि कालांतर में (1 अप्रैल 1963 को) वही SPE (DSPE के अधीन कार्यरत) आज कथित रूप से संक्रमित हो चुकी ‘सीबीआई’ है तो इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं होगा. नाम बदलने के साथ ही सीबीआई के संस्थापक निदेशक बनाए गए डी.पी. कोहली. बतौर सीबीआई निदेशक, कोहली साहब का कार्यकाल रहा 1 अप्रैल 1963 से 31 मई 1968 तक.

इससे पहले (1955 से 963 तक) स्पेशल पुलिस स्टैब्लिश्मेंट के सर्वे-सर्वा भी कोहली (बहैसियत पुलिस महानिरीक्षक) ही थे. मौजूदा सीबीआई डायरेक्टर ऋषिकांत शुक्ला का नंबर 29वां है. हिंदुस्तान के हुक्मरानों के लिए बहैसियत सीबीआई निदेशक सबसे भारी ‘बोझ’ साबित हुए डायरेक्टर आलोक वर्मा. और उनके साथ स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना.

सब वक्त-वक्त की बात है वरना...

बात है जनवरी 2002 की. अमेरिकी खुफिया और जांच एजेंसियों के प्रमुख दिल्ली में डेरा डाले हुए थे. उस समय भारत के केंद्रीय गृह-सचिव थे कमल पांडे. जबकि सीबीआई की कमान थी पी.सी. शर्मा को हाथों में. एक सुबह जब अमेरिकी अफसरान ब्रेकफास्ट के बहाने नई दिल्ली में एक बेहद खास मीटिंग में मशगूल थे. तभी कोलकता में अमेरिकन सेंटर पर हमला करके कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर डाली गई. उस वक्त वरिष्ठ आईपीएस नीरज कुमार (दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त) सीबीआई में बतौर ज्वाइंट-डायरेक्टर तैनात थे.

नीरज कुमार और कोलकता (पश्चिम बंगाल पुलिस) के उस समय सीआईडी के ‘बॉस’ आईपीएस राजीव कुमार के बीच आपसी तालमेल और गजब की सूझबूझ थी. आज कोलकता के जिन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के पीछे सीबीआई हाथ धोकर पड़ी है, ये वही राजीव कुमार हैं. उनके दम-खम पर सीबीआई और दिल्ली पुलिस ने जनवरी 2002 में कोलकता स्थित अमेरिकन सेंटर पर हुए हमले से संबंधित तमाम महत्वपूर्ण जानकारियां जुटा कर हमलावरों को दबोचा था. यह अलग बात है कि आज उसी सीबीआई और राजीव कुमार के बीच बेहद तनातनी का माहौल है.

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कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार

बटोरो-समेटो और बे-शर्म होकर भाग जाओ!

सीबीआई भले ही कोई भी राग अलापे मगर सच्चाई ये है कि वो राज्यों की वैसाखियों की मोहताज हमेशा बनी रहती है! कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन आफताब अंसारी की विदेश से गिरफ्तारी इसकी जीती-जागती मिसाल साबित हुई थी. आज सीबीआई की देहरी पर धक्के खा रहे आईपीएस राजीव कुमार (मौजूदा कोलकता पुलिस कमिश्नर) ने 2000 के दशक में अगर सीबीआई को महत्वपूर्ण जानकारियां नहीं दी होतीं तो शायद आफताब अंसारी की गर्दन तक कानून और सीबीआई के हाथ पहुंच कभी न पहुंच पाते.

यह अलग बात है कि काम निकालने के बाद पीठ दिखा देने वाली सीबीआई राज्य पुलिस के तमाम एहसान भले न माने लेकिन राजीव कुमार के इस कारनामे का जिक्र नीरज कुमार ने अपने संस्मरणों में भी किया है.

सब दब-खप जाएगा सब्र रखिए

आलोक वर्मा, राकेश अस्थाना या फिर रंजीत सिंहा जैसे आला-नंबरदार सीबीआई के डायरेक्टरों ने भले ही महकमे के माथे पर ‘कलंक’ के कितने मोटे दाग-धब्बे क्यों न लगा दिए हों लेकिन इस सबसे भला सीबीआई को क्या फर्क पड़ने वाला? सीबीआई की दर-ओ-दीवार गवाह हैं इस बात की कि आज जो बवाल मचा है आने वाला कल उसे खुद-ब-खुद ही भुला देगा. पब्लिक है धीरे-धीरे सब भूल जाएगी. यह सब सीबीआई की चार-दीवारी के भीतर बैठे-बैठे सोचकर खुद को दिलासा दी जा सकती है.

रस्सी जल गई पर ऐंठ नहीं गई

सच मगर यह भी है कि सीबीआई में जो भी कुछ इस वक्त हो रहा है वो आने वाली पीढ़ियों के जेहन से इतनी जल्दी भुलाया जाने वाला नहीं है. यह बात दूसरी है कि रुतबे की हनक में सीबीआई के साहिबान इसे चेहरों से जग-जाहिर न होने दें. इसका सबसे बड़ा नमूना है कार्यकारी निदेशक नागेश्वर राव और सीबीआई के कानूनी सलाहकार की भरी अदालत में (सुप्रीम कोर्ट) खुलेआम की गई ‘बेइज्जती’ या फिर दुर्गति! सीबीआई के इतिहास में शायद इतना बुरा हाल पहले कभी किसी का हुआ होगा!

CBI

बीते समय के दौरान आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना की लड़ाई ने सीबीआई की छवि को काफी धक्का पहुंचाने का काम किया है

फिर भी दिल है कि मानता नहीं....

भले ही हालिया घटनाओं से जांच एजेंसी साख के संकट से जूझ रही हो लेकिन अब भी कुछ ऐसे अधिकारी मौजूद हैं जो सीबीआई की ‘करिश्माई-कुर्सी’ से लिपटने-चिपटने की चाहत में बेहाल हो ‘मचल’रहे थे. इसके ताजा-तरीन नमूने के बतौर पेश आए! 1984 बैच यूपी कैडर के आईपीएस (वर्तमान में निदेशक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनॉलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंसेज और यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक) जावीद अहमद (जवीद).

अधूरी मुराद के मलाल में ‘मचलना’ गुनाह क्यों?

सीबीआई में हुई हालिया घटनाओं से जवीद साहिब कोई खास फर्क नहीं पड़ा. वो मछली नहीं. उसकी ‘आंख’ पर निशाना साधे बैठे थे. सोच रहे थे कि सीबीआई में मची अंदरूनी कलह और सियासत के बहाने तबाही के बह रहे दरिया में ही क्यों न सही, मौका मिला तो हाथ धोने से नहीं हिचकेंगे! मियां जवीद का ख्याल था! कि हिंदुस्तानी हुकूमत उन्हें देश का सबसे काबिल आईपीएस करार दिलवाने में, भला कोई कोर-कसर उठाकर बाकी क्यों रख छोड़ेगी?

हमारा खून, खून और तुम्हारा खून, पानी....!

कुल जमा, जनाब जवीद साहब सीबीआई की ‘बादशाहत’हाथ लगने को लेकर कतई किसी उहा-पोह में नहीं थे. उनके दिल-ओ-दिमाग ने दुरुस्त कर रखा था कि सीबीआई डायरेक्टर की कुर्सी पर वे ही ‘सजाए’ जाएंगे! हुकूमत भी आखिर हुकूमत ही होती है. सियासतदानों ने जमाने में ‘कंचे’ नहीं खेले होते हैं. सो जवीद साहब जैसे कई कथित काबिलों को दरकिनार करके सरकार ने सीबीआई की साहिबी ऋषिकांत शुक्ला के हाथों में सौंप दी. इसने जवीद साहब को ‘खुले’ में ला खड़ा किया. अधूरी ‘मुराद’ का दिल में दरिया जब बहा मन के तमाम बेचैन मलाल मचले तो जवीद साहब खुद को काबू कर पाने में नाकाम हो गए. लिहाजा तमाम सरकारी कायनात को कोसते हुए बेसाख्ता सर-ए-आम उगल ही बैठे..

‘अल्लाह की मर्जी...बुरा तो लगता है पर 'M' होना गुनाह है’

सोशल मीडिया पर उनकी इस तमाशाई पेशगी ने.जवीद साहब के दर्द को सर-ए-आम कर दिया. यह अलग बात है कि सीबीआई की सी हाय-तौबा वाली कुर्सी पर न सजाये जाने से बेइंतिहा नाराज जवीद साहब ने उस वक्त को सिरे से भुला दिया जब तमाम सीनियर आईपीएस को दरकिनार करते हुए उन्हें यूपी का डीजी बनाया गया था. तब न डीजीपी की दौड़ में मात खाए बाकी तमाम सीनियर आईपीएस के ‘H’ होने का ख्याल ही जेहन में नहीं आया. आखिर क्यों? शायद इसलिए कि कुर्सी तो कुर्सी है. वो सीबीआई की हो या फिर पुलिस महानिदेशक की. खुद के नीचे ‘बड़े ओहदे’ वाली कुर्सी भला किसे अच्छी नहीं लगेगी. काठ की कुर्सी का किस्सा जमाने में होता ही बाकी तमाम कहानियों से कुछ अलहदा है! इसमें कोई शक या दो राय नहीं.

ऐसा ठीक करूंगा कि याद रखेगी ‘सीबीआई’!

हालिया स्थिति से सीबीआई की सीएफएसएल (सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री) के पूर्व डायरेक्टर विश्वनाथ सहगल खासे खफा हैं. सहगल के मुताबिक, ‘मेरे जमाने में रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, अमेरिका में सीबीआई का डंका बजता था. आज सीबीआई जितनी ‘अशांत’ हो चुकी है. उस जमाने में वो उतनी ही शांत-शालीन थी. सीबीआई मेरे हवाले कर दो. ऐसा सुधारूंगा कि जिंदगी सीबीआई मुझे याद रखेगी.’

वरना ऐसे ही इधर उधर मुंह मारते फिरेंगे!

सहगल ने आगे कहा , ‘जब आलोक वर्मा-राकेश अस्थाना जैसे पढ़े-लिखे आईपीएस / डायरेक्टर लेवल के अफसरान ‘कुर्सी’ के लिए कुछ भी कर गुजरने पर उतर आएंगे.तो लोग हंसेंगे ही. दूसरे सीबीआई को ‘स्वतंत्र’ कर देना चाहिए. वरना वो दिन दूर नहीं होगा जब सीबीआई वाले सब इधर-उधर मुंह मारते फिरेंगे! हमारे वक्त में सीबीआई वाले किसी की देहरी पर किसी के भी हाथ का पानी पीना गंवारा नहीं करते थे. आज डायरेक्टर की कुर्सी के लिए खुलेआम सिर-फुटव्वल मची है.’

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं)

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