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अपना बरामद माल देख ‘रक्षा-मंत्री’ भी रह गए भौचक्के! पड़ताली को ‘आउट-ऑफ-टर्न’ देना ही भूल गई पुलिस!

48 साल बाद ‘पड़ताल’ की इस खास किश्त में आप भी साथ जुड़िए उस पड़ताली पुलिस अफसर के साथ जिसकी ‘पड़ताल’ ने कभी बचाई थी दिल्ली पुलिस की इज्जत

Updated On: Sep 22, 2018 10:07 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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अपना बरामद माल देख ‘रक्षा-मंत्री’ भी रह गए भौचक्के! पड़ताली को ‘आउट-ऑफ-टर्न’ देना ही भूल गई पुलिस!

1970 की बात है. भारत के रक्षा-मंत्री थे बाबू जगजीवन राम. उन दिनों बाबू-जी नई बनी 'इंदिरा कांग्रेस' के अध्यक्ष भी थे. भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध के आसार के चलते देश में उहापोह के हालात बने हुए थे. एक रात, बाबू जी और उनके बराबर की कोठी में रहने वाले जज साहब की कोठी में चोरी हो गई. रक्षा-मंत्री की सरकारी कोठी में चोरी ने दिल्ली पुलिस को पसीना ला दिया था.

चोरी भी हुई थी दो प्लाटून हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों की चाक-चौबंद ‘भीड़’ के बीच से. ऐसे में देश में कोहराम मचना लाजिमी थी. घटना का पर्दाफाश न होने के चलते, उस जमाने में दिल्ली के कई तुर्रम और फन्ने खां समझे जाने वाले आला-पुलिस अफसरों को, खुद की खाकी वर्दी और कंधे पर मौजूद चांदी के बिल्लों का रंग धूमिल पड़ता नजर आने लगा था. मामला पेचीदा और पड़ताल ‘जीरो’ थी. रक्षा-मंत्री और जज साहब के घर चोरी से ‘हलकान’ दिल्ली के पुलिस मुखिया (आईजी) ने, मामले का खुलासा करने वाले पुलिसकर्मी को, ‘आउट-ऑफ-टर्न’ (समय पूर्व पदोन्नति) देने का ऐलान कर डाला.

48 साल में कभी नहीं लौटा वो दिन

यह अलग बात है कि वारदात के पर्दाफाश के बाद, उस जमाने के तमाम ‘मतलब-परस्त’ आला-पुलिस-अफसरों के जेहन में, काबिल पड़ताली दारोगा को, ‘समय से पहले पदोन्नत’ करने की याद, फिर कभी लौटकर नहीं आई. जबकि काबिल थानेदार कालांतर में नियमित सेवा नियमावली के तहत ही, सब-इंस्पेक्टर से प्रमोट होकर इंस्पेक्टर बन गया. अब उसे एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) पद से भी रिटायर हुए भी 18 साल हो चुके हैं. 48 साल बाद ‘पड़ताल’ की इस खास किश्त में आप भी साथ जुड़िए उस पड़ताली पुलिस अफसर के साथ जिसकी ‘पड़ताल’ ने कभी बचाई थी दिल्ली पुलिस की इज्जत.

अक्टूबर 1970 में भारत के रक्षा-मंत्री की कोठी

babu jagjivan ram

यह सच्चा किस्सा है अक्टूबर 1970 के अंत का. धनतेरस का त्योहार था. रक्षा-मंत्री बाबू जगजीवन राम के सरकारी आवास से किसी ने दिल्ली के तुगलक रोड थाने को जो सूचना दी उसे सुनकर तत्कालीन थाना इंचार्ज (थानाध्यक्ष) इंस्पेक्टर ए.के. बोस को पसीना आ गया. सूचना थी केंद्रीय रक्षा-मंत्री बाबू जगजीवन राम और उनके बराबर स्थित एक जज साहब की कोठी में चोरी की. घटना आधी रात के बाद किसी समय घटी थी. सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस के आईजी, डीआईजी सहित तमाम आला-अफसरान घटनास्थल पर पहुंच गए. कुछ घंटे बाद ही थाने में एफआईआर दर्ज करके ‘पड़ताल’ शुरू कर दी गई.

छुट्टी रद्द करके गांव से बुलाया गया ‘थानेदार’

वारदात को हुए दो-तीन दिन बीत चुके थे. तफ्तीश में सफलता या प्रगति के नाम पर, आईजी से लेकर इंस्पेक्टर तक महज अपने-अपने गाल बजाने में मशरूफ थे. उसी दौरान किसी आला-पुलिस अफसर को उस वक्त, दिल्ली के मशहूर पड़ताली सब-इंस्पेक्टर प्रभाती लाल निम्भल का ख्याल आया. उन दिनों बेहतरीन तफ्तीशी के बतौर, प्रभाती लाल की साख दिल्ली पुलिस में खासी अच्छी बनी हुई थी. पता चला कि प्रभाती लाल तो कुछ दिन की छुट्टी पर गांव गए हैं. मामला चूंकि जज साहब और रक्षा-मंत्री की कोठी में हुई चोरी का था. लिहाजा छुट्टी बीच में ही कैंसिल कराके सब-इंस्पेक्टर प्रभाती लाल को गांव से ड्यूटी पर वापस बुला लिया गया.

हलकान ‘साहब’ डकार गए अपना ही ‘वायदा’!

दिल्ली पुलिस के अधिकांश अफसरान खुद की ‘वर्दी-बेदाग’ बचाने की जुगत तलाशने में जुटे थे. घटना में दो-तीन दिन बाद भी कोई सुराग हाथ में नहीं था. लिहाजा ठंड के दिनों में भी राजधानी के तमाम ‘पुलिसिया-साहब’ पसीने से तर-ब-तर थे. यह सोचकर कि मामले के खुलने में हो रही देरी न मालूम किस पुलिस-अफसर की ‘कुर्सी’ की बलि ले बैठे! इसी ताव में आकर उस जमाने में दिल्ली पुलिस मुखिया यानी महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, तब दिल्ली में पुलिस कमिश्नर सिस्टम नहीं था, इसलिए आईजी ही दिल्ली पुलिस का ‘बॉस’ होता था) मौखिक घोषणा कर गए.

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घोषणा के मुताबिक जो भी, पुलिस वाला वारदात का पर्दाफाश करता, उसे समय से पूर्व ही पदोन्नति (आउट ऑफ टर्न) दी जाएगा. मामले की पड़ताल पूरी हुए 48 साल हो चुके हैं. काबिल पड़ताली सब-इंस्पेक्टर, सहायक पुलिस आयुक्त पद से 18 साल पहले रिटायर हो चुका है. यह अलग बात है कि, उस वक्त बेहाल आला पुलिस अफसरान 30 साल में भी कभी पड़ताली अफसर को वायदे के मुताबिक ‘आउट-ऑफ-टर्न’ नहीं दे पाए. या यूं कहूं कि, आला पुलिस अफसरान केस-खुलने के बाद अपने वायदे को ही ‘डकार’ गए!

‘पड़ताल’ पर शुरू हुआ पुलिसिया ‘शीत-युद्ध’!

दिल्ली पुलिस ने तुगलक रोड थाना स्टाफ सहित क्राइम-ब्रांच और स्पेशल स्टाफ को भी तफ्तीश में जुटा दिया. कानूनी रूप से कागजातों में ‘पड़ताली’ बनाया गया सब-इंस्पेक्टर प्रभाती लाल निम्भल को. मामला चूंकि भारत के रक्षा-मंत्री और जज के यहां चोरी खोलने का था. आरोपी पकड़े जाने पर बड़े इनाम-इकराम की उम्मीदें पुलिस वालों के जेहन में ‘कुलाचें’ मार रही थी. लिहाजा दिल्ली पुलिस की यूनिट्स (तुगलक रोड थाना स्टाफ, स्पेशल स्टाफ और क्राइम-ब्रांच) के बीच अंदर-ही-अंदर ‘शीत-युद्ध’ सा शुरू हो गया. कोई भी पुलिस यूनिट अपनी तफ्तीश की रिपोर्ट, दूसरी यूनिट तक लीक न होने देने पर आमादा था.

अंग्रेजी अखबार ने छापी करोड़ों की चोरी!

एक ही रात में देश के रक्षा-मंत्री और जाने माने जज की कोठी में चोरी. पुलिस और देश की सरकार इसी से कम हलकान नहीं थी. रही-सही कसर पूरी कर दी, नमक-मिर्च लगाकर एक अंग्रेजी अखबार द्वारा छापी गई ‘फर्जी-खबर’ ने! मामले के पड़ताली रहे रिटायर्ड सहायक पुलिस आयुक्त प्रभाती लाल निम्भल के मुताबिक, ‘चोरी चूंकि देश की दो हाई-प्रोफाइल शख्सियतों की कोठी में हुई थी. इसलिए तमाम पुलिस अफसरान मीडिया से कन्नी काट रहे थे. अखबार वाले सोच रहे थे कि चोरी जब देश के मशहूर जज और रक्षा-मंत्री की कोठी में हुई है तो हो न हो जरूर कोई बड़ी और महत्वपूर्ण चीज ही चोरी हुई होगी. जबकि हकीकत इसके विपरीत थी. चोरी में ऐसा कुछ भी नहीं गया था, जिसे लेकर मीडिया बेवजह ही उछल-कूद मचा रहा था. हद तो तब हो गई जब, एक अंग्रेजी अखबार ने चोरी में 'करोड़ों' का माल जाने की सरासर झूठी कहानी छाप डाली.'

जज का माल रक्षा-मंत्री की कोठी में मिला!

घटनास्थल पर पुलिस पहुंची तो उसे मौके पर (रक्षा-मंत्री बाबू जगजीवन राम की कोठी) लोहे की एक रॉड और टाइपराइटर पड़ा हुआ मिला. कोठी के एक हिस्से में (किचन गार्डन) में इंसानी पांव के निशान साफ-साफ नजर आ रहे थे. दौरान-ए-पड़ताल पता चला कि टाइपराइटर बराबर में मौजूद जज साहब की कोठी से चुराया गया था. सवाल यह था कि जज साहब की कोठी से चुराया हुआ टाइपराइटर आखिर रक्षा-मंत्री की कोठी में लाकर क्यों छोड़ दिया गया होगा? इसका माकूल जवाब चोर पकड़े जाने और मामले का पर्दाफाश होने पर ही मिलना था.

सवाल जो ‘पड़ताली’ को उलझा रहे थे

पड़ताल में जुटे प्रभाती लाल के मुताबिक, ‘सवाल यह था कि जज और रक्षा-मंत्री की ही कोठियों को निशाना क्यों बनाया गया? दूसरा सवाल था कि दोनों कोठियों में सुरक्षा के लिए दो कंपनी फोर्स लगी हुई थी. इसके बाद भी आखिर चोरी हो कैसे गई? तीसरा सवाल था कि चोर जज साहब के यहां से जब टाइपराइटर चुरा ही लाए तो फिर वे उसे रक्षा-मंत्री की कोठी में क्यों छोड़ गए? चौथा सवाल था कि, चोर अंदर के यानी पहले से कोठी में आने-जाने वाले हैं या फिर कोई अनजान? पांचवां सवाल था कि, असल में चोरों का मकसद किस कोठी में चोरी का था? क्या चोर जो सामान चुराने आए थे, उसे ले जाने में कामयाब रहे? ’

स्लीपिंग रूम का दरवाजा खुला मिला!

पूरे घटनाक्रम में खास बात यह भी थी कि देश के प्रधानमंत्री के बाद जिस कोठी (रक्षा-मंत्री का आवास) की सबसे ज्यादा सुरक्षा थी, वहां आखिर चोरी हुई तो क्यों और कैसे? इन्हीं सवालों का जवाब तलाशना था पड़ताली पुलिस अफसर को. छानबीन में पता चला कि रक्षा-मंत्री की कोठी की सुरक्षा के लिए पिछले हिस्से में भी एक सुरक्षाकर्मी सादे लिबास में तैनात था. पड़ताली को अगर पूरे मामले में कहीं सबसे बड़ी लापरवाही नजर आ रही थी तो वह थी घटना वाली रात ‘डिफेंस-मिनिस्टर’ आवास में स्लीपिंग-रूम का रात के वक्त जाने-अजनाने पिछला दरवाजा खुला रहना.

संदिग्ध से निकला समस्या का समाधान

रिटायरमेंट के 18 सालों बाद पड़ताली अधिकारी प्रभाती लाल

रिटायरमेंट के 18 सालों बाद पड़ताली अधिकारी प्रभाती लाल

‘चोरों की तलाश में दिल्ली पुलिस का हर कर्मचारी शहर की गली-गली की खाक छान रहा था. मैं कई रात गोल्फ कोर्स ग्राउंड और लोधी गार्डन के आसपास नाइट-पेट्रोलिंग करता रहा. एक रात मुझे 20-22 साल का लड़का उसी इलाके में संदिग्ध हालात में भटकता दिखाई दे गया. उसके पास बिलकुल वैसा ही सरिया मौजूद था, जैसा रक्षा-मंत्री की कोठी से पुलिस को मिला था. तुगलक रोड थाने में लड़के ने बताया कि उसके गैंग में रामसिंह नाम के दो चोर हैं. एक रामसिंह उर्फ लंबू और दूसरा राम सिंह उर्फ उस्ताद.’ पुलिसिया नौकरी में मील का पत्थर साबित हुई उस पड़ताल का 48 साल बाद जिक्र करते हुए बताते हैं प्रभाती लाल.

चोर को ‘उस्ताद’ कहना कमाल कर गया

उस संदिग्ध लड़के से मिली जानकारी के आधार पर तुगलक रोड थाना पुलिस सीमापुरी थाने गई. पुलिस को वहां हवालात में बंद एक चोर मिला. उसे जीप से पुलिसकर्मी तुगलक रोड थाने ला रहे थे. रास्ते में प्रभाती लाल ने हवा में तीर चलाया. वे संदिग्ध से बोले ‘उस्ताद’. इतना सुनते ही संदिग्ध की घिघ्घी बंध गई. वो जीप में ‘मेमने’ (बकरी का बच्चा) की मानिंद पुलिसकर्मियों के सामने मिमियाने लगा.

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पुलिसकर्मियों से बोला, ‘मुझे मारना-पीटना मत. मैं सब कुछ सही-सही बता दूंगा. जज और मंत्री जी की कोठी से चुराया हुआ माल भी बरामद करा दूंगा.’ दरअसल चोर का उपनाम उस्ताद था. जिसे वो दारोगा के मुंह से सुनते ही हड़बड़ा गया कि पुलिस को आखिर पहले ही उसका नाम कैसे मालूम है? जबकि मामले के पड़ताली सब-इंस्पेक्टर प्रभाती लाल उसके बारे में पहले ही पकड़े गए उसके साथी से सब मालूमात हासिल कर चुके थे.

एफआईआर में जिक्र नहीं, वो माल भी बरामद!

सीमापुरी थाने की हवालात में बंद मिले चोर ने पुलिस को बताया कि जज साहब की कोठी से चुराया टाइपराइटर भारी था. उसे लाद कर ले जाने में परेशानी थी. साथ ही टाइपराइटर का साइज भी बड़ा था. जिसके चलते पकड़े जाने की आशंका भी थी. इसलिए उसे रक्षा-मंत्री की कोठी में छोड़ आए. लोहे की रॉड घटनास्थल पर वारदात के बाद भागते वक्त हड़बड़ाहट में छूट गई थी.

‘उस्ताद’ नाम के चोर की निशानदेही पर ही पुलिस ने पहाड़गंज इलाके से सड़क किनारे झाड़ियों में तोड़-फोड़ कर फेंक दिए गए चांदी के पीकदान को भी बरामद कर लिया. इसके अलावा चोरी गई कीमती घड़ियां भी बरामद कर ली गईं. पड़ताल में दिलचस्प मोड़ तब आया जब पता चला कि पड़ताली थानेदार, चोर की निशानदेही पर वो माल भी बरामद कर लाया है, जिसका एफआईआर में जिक्र ही नहीं था.

रक्षा-मंत्री माल देखकर भौचक्के रह गए!

पर्दाफाश करते ही तुगलक थाना पुलिस अखबारों में छा गई. जिन पुलिस वालों का चोरी और तुगलक रोड पुलिस से कोई लेना देना नहीं था, वे भी थाने में मुलजिमों (चोरों) और बरामद माल को देखने के लिए आ-जा रहे थे. बकौल पड़ताली प्रभाती लाल, ‘बाद में बरामद माल सहायक पुलिस अधीक्षक (आईपीएस एसपी) डी.के. कश्यप और तुगलक रोड थाना प्रभारी इंस्पेक्टर ए.के. बोस की मौजूदगी में रक्षा-मंत्री बाबू जगजीवन राम को दिखाया गया. तो मंत्री जी भी एक बार को इस बात पर भौचक्के रह गए कि इतना माल उनके आवास से चोरी हो गया था, जोकि बड़े ताज्जुब की बात थी. रक्षा-मंत्री इस बात से काफी खुश थे कि जो सामान जल्दबाजी में लिखी गई एफआईआर में दर्ज ही नहीं हो सका था, पुलिस ने उसकी भी रिकवरी (बरामदगी) कर डाली. जोकि अपने आप में किसी पुलिसिया पड़ताल में पेश किसी ‘नजीर’ से कम नहीं था.

‘मुलजिम’ को सरकारी गवाह बना दिया!

मामले के पड़ताली प्रभाती लाल के मुताबिक, ‘लंबू और उस्ताद चोरों की निशानदेही पर पहाड़गंज (रामनगर) इलाके से रात में ही दबिश देकर उस व्यापारी को भी दबोच लिया, जिसने चोरी का माल खरीदा था. वो व्यापारी इतना ज्यादा ढीठ था कि, कुछ भी कबूलने को राजी नहीं था. जबकि थाने में चोर उसके मुंह पर ही उसे माल बेचने की बात पर अड़े हुए थे. लिहाजा हमने जैसे ही खरीदार को मुलजिम के बजाए सरकारी-गवाह बनाने की बात कही, उसने वह सब कबूल लिया, जो चोर कह रहे थे. बाद में तीनों चोरों को अदालत में पेश किया गया. अदालत ने तीनों को एक साल की सजा मुकर्रर की थी.’

‘साहब’ से ‘सिपाहियों’ तक में सिर-फुटव्वल!

tughalak road

तुगलक रोड थाने के दबंग पड़ताली प्रभाती लाल ने कई रात की भागदौड़ के बाद केस खोल दिया. तीन चोर पकड़े गए. माल बरामद हो गया. तुगलक रोड थाना पुलिस को बधाईंयां मिलने लगीं. अगले दिन मीडिया और तमाशबीनों का तुगलक रोड थाने में मजमा लगा हुआ था. मुलजिमों को मय बरामद माल के अदालत में पेश किए जाने की तैयारियां चल रही थीं. बकौल पड़ताली दारोगा प्रभाती लाल, ‘उसी वक्त थाने में स्पेशल स्टाफ का एक डिप्टी एसपी दल-बल यानि शागिर्द/मातहत कुछ पुलिस वालों के साथ पहुंच गया. वो इस बात से खासा खफा था कि मुलजिमों की गिरफ्तारी से लेकर माल बरामदगी और फिर मीडिया को दी गई खबर में कहीं भी स्पेशल स्टाफ को आखिर शामिल क्यों नहीं किया गया? उसके इस अजीब-ओ-गरीब तर्क पर थाने में मौजूद सिपाही हवलदार भी इधर-उधर मुंह घुमाकर हंस रह थे.’

पुलिस के ‘तारणहार’ पड़ताली प्रभाती

प्रभाती लाल निम्भल का जन्म 6 अक्टूबर सन् 1940 को गांव फतेहपुरी (उस वक्त जिला गुड़गांव), जिला रेवाड़ी, हरियाणा में हुआ था. पेशे से भिवानी क्लोथ मिल में मिस्त्री चंदगीराम और उनकी पत्नी भूरी देवी की चार संतान में प्रभाती लाल सबसे बड़े हैं. प्रभाती लाल की उम्र जब 13 साल थी तभी पिता की मृत्यु हो गई. मां ने खेतों में 50 पैसे रोज की मजदूरी करके बच्चों को पढ़ाया लिखाया. 2 मार्च सन् 1959 को दिल्ली पुलिस में सहायक उप-निरीक्षक सलेक्ट हो गए.

कुनबे में पहला थानेदार बनने का सेहरा सिर बंधा. ट्रेनिंग के बाद पहली पोस्टिंग मिली सन् 1960 में मिली दिल्ली के कोटला मुबारकपुर थाने में. 18 साल की उम्र में ही दिल्ली पुलिस में एएसआई बनने वाले प्रभाती लाल ने करीब 42 साल दिल्ली पुलिस की नौकरी की. राष्ट्रपति संजीवा रेड्डी और ज्ञानी जैल सिंह सहित, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सुरक्षा गार्ड (पीएसओ) रहे. 24 फरवरी सन् 1979 को एसीपी बनने वाले प्रभाती लाल, करीब साढ़े 22 साल असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर रह कर सन् 2000 में उत्तर पूर्वी जिला से एसीपी पद से रिटायर हो गए.

(‘संडे क्राइम स्पेशल’ में जरूर पढ़ें: ‘जिस रणभूमि में ‘जयद्रथ-शिखंडी’ से बुजदिल और मतलब-परस्त सारथी-सेनापति थे, वो युद्ध लड़ने को कृष्ण से चतुर नेता और पुलिस अफसरों ने, हमारे ‘अभिमन्यु’ से बहादुर ‘लाल’ को भेजा ही क्यों?’ जैसे मन को झकझोर देने वाले सवाल का जवाब तलाशती. एक बहादुर पुलिस-अफसर के बेबस बुजुर्ग मां-बाप और, बेबस-बेहाल पत्नी की रुला देने वाली सच्ची कहानी.)

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