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पद्मावत विवाद: बीजेपी के पास राजपूत नेताओं की भरमार लेकिन शेखावत जैसा कोई नहीं

पद्मावत फिल्म पर हुए विवाद ने बीजेपी के राजपूत नेताओं की पोल खोली है. वो अपनी ही पार्टी के इतिहास से अनजान दिखे और शेखावत की सियासी ऊंचाई के आगे एकदम ही बौने नजर आए

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jan 31, 2018 07:27 PM IST

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पद्मावत विवाद: बीजेपी के पास राजपूत नेताओं की भरमार लेकिन शेखावत जैसा कोई नहीं

विवाद लंबा खिंचा लेकिन आखिरकार फिल्म पद्मावत रिलीज हुई. जहां तक कमाई करने का सवाल है फिल्म कामयाबी की बुलंदियां छू रही है (माना जा रहा है कि हफ्ते भर से भी कम समय में फिल्म ने 200 करोड़ रुपए कमाए हैं).

राजपूती आन-बान और शान के स्वघोषित रखवालों ने कहा था कि अंजाम खतरनाक होंगे लेकिन लोगों ने इसकी परवाह ना की और बड़ी तादाद में पद्मावत देखने पहुंचे. फिल्म को लेकर सियासी विवाद ने ज्यादा ही तूल पकड़ा था और कई लोग इस वजह से भी फिल्म देखने के लिए सिनेमाघरों में पहुंचे. फिल्म को लेकर हुए विवाद ने परंपरागत राजनीति की खोखलेपन को उजागर किया है.

जिन इलाकों में राजपूत समुदाय के लोगों की आबादी अच्छी-खासी है वहां सूबे की सरकारों ने सिनेमाघर के मालिकों को कहा कि आप इस फिल्म की स्क्रीनिंग मत कीजिए. गुजरात में विजय रुपाणी, राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने एक ना एक तरह से सूबे में निषेधाज्ञा जारी कर फिल्म की स्क्रीनिंग रोकने की जुगत लगाई.

फिल्म पर रोक लगाने के मामले में बीजेपी के खेमे के मुख्यमंत्रियों में इकलौता अपवाद भगवाधारी योगी आदित्यनाथ रहे जो हिंदू साधकों की एक मजबूत परंपरा नाथ-संप्रदाय के गोरखनाथ मठ के प्रधान भी है. विडंबना देखिए कि योगी आदित्यानाथ राजपूत जाति से ही आते हैं.

फिल्म पद्मावत का करणी सेना ने देश भर में कड़ा विरोध किया

राजपूत करणी सेना ने फिल्म पद्मावत का देश भर में कड़ा विरोध किया

फिल्म में एक खास समुदाय और उसकी महिला को सदियों पुराने सोच के चौखटे में दिखाया गया है. लेकिन कांग्रेस या फिर बीजेपी का कोई भी परंपरागत नेता ऐसे चित्रण को चुनौती देने और फिल्म की कहानी को घटिया बताने का साहस नहीं जुटा सका. ऐसा करने की जगह फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की पहल की गई. अगर बहस 'पद्मावत' को केंद्र में रखकर होती तो फिल्म की कथावस्तु को लेकर कहना होता कि आधुनिक सभ्यता के मान-मूल्यों की कसौटी पर खरा ना उतरने वाला एक मिथक इतिहास के नाम पर प्रचलित है और फिल्म में इस मिथक की निहायत ही बचकानी कहानी गढ़ी गई है.

दूसरी पार्टी की तुलना में बीजेपी की यह बताने की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बनती है

परंपरागत राजनीति ने फिल्म से जुड़े अहम तथ्य की अनदेखी की, वह उस भीड़ की पिछलग्गू बनी जो फिल्म पर रोक लगाने की मांग कर रही थी. चूंकि बीजेपी केंद्र और बहुत से सूबों में सत्ताधारी पार्टी बनकर उभरी है सो किसी भी दूसरी पार्टी की तुलना में यह बताने की उसकी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बनती है कि आखिर परंपरागत राजनीति के भीतर जगह इतनी तंग कैसे होते जा रही है. क्या बीते वक्त में भी ऐसा ही था? क्या परंपरागत दक्षिणपंथी राजनीति बाकियों की तुलना में तंग दायरों में चला करती है?

जो लोग बीजेपी के जन्मदाता भारतीय जनसंघ के इतिहास से परिचित हैं वो निश्चित ही इस बात को पूरे जोर-शोर से नकारेंगे. आइए, अपनी बात के पक्ष में कुछ तथ्यों को देखें. संघ-परिवार की राजनीति से उभरे देश के पूर्व उप-राष्ट्रपति और राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे भैरोसिंह शेखावत को दक्षिपंथी राजनीतिक धारा के इतिहास का सबसे बड़ा राजपूत नेता माना जा सकता है. क्षत्रिय महासभा नाम से राजस्थान में सामंतों-जागीरदारों का एक मंच हुआ करता था और 1952 में क्षत्रिय महासभा के समर्थन से भारतीय जनसंघ के जो 8 विधायक विजयी रहे उनमें एक भैरोसिंह शेखावत भी थे. लेकिन दीनदयाल उपाध्याय के दिशा-निर्देश में भारतीय जनसंघ ने अपने ही राजनीतिक हितों के विपरीत जाते हुए जागीरदारी प्रथा के खात्मे की तरफदारी की.

KARNI SENA

करणी सेना ने फिल्म के विषय में आरोप लगाया कि इसमें राजपूतों के इतिहास के साथ खिलवाड़ किया गया है

सामंती राजपूत नेताओं की मर्जी के खिलाफ जाते हुए शेखावत पार्टी के फैसले पर अडिग रहे. उन्होंने जागीरदारी प्रथा के खात्मे की लड़ाई अकेले दम पर जारी रखी हालांकि उस वक्त सत्ताधारी कांग्रेस ऐसे सुधारों को लागू करने में बहुत हिचकिचाहट दिखा रही थी. भारतीय जनसंघ और भैरोसिंह शेखावत राजस्थान में अलग-थलग पड़ गए, अपने फैसले की इन्हें सियासी कीमत चुकानी पड़ी और जनसंघ के 6 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी. लेकिन दीनदयाल उपाध्याय जागीरदारी प्रथा के खिलाफ अपने रुख पर डटे रहे और शेखावत ने सिद्धांत पर जो अटल रहने का रवैया दिखाया वह पार्टी के भीतर उनके कद के बढ़ने की वजह साबित हुआ.

भैरोसिंह शेखावत को तकरीबन वाजपेयी की हैसियत का नेता माना जाता था

शेखावत को ऐसी ही अग्निपरीक्षा एक बार वर्ष 1987 में देनी पड़ी. उस वक्त राजस्थान के सीकर जिले के देवराला गांव में रुपकंवर नाम की एक महिला को ‘सती’ बनने के लिए मजबूर किया गया था. 18 बरस की रुपकंवर को पति की चिता पर बैठने के लिए मजबूर कर ‘सती माता की जय’ के नारों के बीच जिंदा जला दिया गया. इस वक्त तक शेखावत सूबे में कद्दावर नेता बनकर उभर चुके थे. संघ-परिवार के भीतर उन्हें सबसे ज्यादा संभावनाशील नेताओं में गिना जाता था. उन्हें तकरीबन अटल बिहारी वाजपेयी की हैसियत का नेता माना जाता था.

भैरो सिंह शेखावत

राजपूत नेता के तौर पर भैरोसिंह शेखावत का कद काफी ऊंचा था

रुपकंवर को सती बनाने की घटना ने विवाद का रुप लिया. राजपूत नेताओं के एक समूह ने इस घटना को समुदाय की आन-बान का सवाल माना और जो गांववाले अपराध के भागीदार थे उनपर सरकार ने सख्ती बरती तो इस समूह ने विरोध किया. ऐसे में एक बार फिर शेखावत ने सती प्रथा की मुखालफत की, हालांकि इसका सीधा सा मतलब यही था कि उन्हें समुदाय के नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ेगा. सिद्धांत पर अडिग रहने का साहस दिखाने के कारण पार्टी के भीतर एक दफे फिर से उनका कद ऊंचा हुआ.

सन् 60 और 70 के दशक में भारतीय जनसंघ की मौजूदगी मामूली सी थी, उसमें राष्ट्रीय हैसियत के नेताओं की तादाद भी बहुत कम थी लेकिन आज ऐसी स्थिति नहीं है. आज बीजेपी में राष्ट्रीय हैसियत के नेताओं की भरमार है, पार्टी में मुख्यमंत्रियों की संख्या भी अच्छी-खासी है. पार्टी में बहुत से राजपूत नेता आगे की पंक्ति में हैं. मिसाल के लिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का नाम लिया जा सकता है और यूपी, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों का भी. यह सभी राजपूत जाति से आते हैं. लेकिन इनमें से किसी नेता ने करणी सेना नाम के उत्पाती जमावड़े के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला, सबके सब इसके दबाव में आ गए.

यूपी में फिल्म की स्क्रीनिंग होने दी और भीड़ की हिंसा की धमकी से बखूबी निपटे

इस रुझान के अपवाद सिर्फ योगी आदित्यनाथ साबित हुए जो राजनीति की परंपरागत धारा में नहीं आते. वो मुद्दे पर चुप रहे लेकिन उन्होंने यूपी में फिल्म की स्क्रीनिंग होने दी और भीड़ की हिंसा की धमकी से बखूबी निपटे.

Yogi Adityanath

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

थोड़े में कहें तो पद्मावत फिल्म पर हुए विवाद ने बीजेपी के राजपूत नेताओं की पोल खोली है. वो अपनी ही पार्टी के इतिहास से अनजान दिखे और शेखावत की सियासी ऊंचाई के आगे एकदम ही बौने नजर आए.

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