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जब ओपी नैयर के गाने आकाशवाणी ने बैन कर दिए थे

नैयर ने संगीत भी अपनी शर्तों पर दिया और ज़िंदगी भी अपनी शर्तों पर जी

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jan 16, 2018 08:47 AM IST

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जब ओपी नैयर के गाने आकाशवाणी ने बैन कर दिए थे

पंजाब में लोहड़ी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. संगीत के बिना लोहड़ी की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इसी लोहड़ी के दो दिन बाद 1926 में पंजाब में एक बच्चा पैदा हुआ, ओम प्रकाश नैयर यानी ओपी नैयर. एक ऐसा संगीतकार जिसने अपनी धुनों के जरिए न सिर्फ संगीत का एक नया ढंग बनाया. अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी.

सबसे महंगे कंपोज़र और अश्लीलता का आरोप

‘कजरा मोहब्बत वाला’, ‘दीवाना हुआ बादल’, ‘इक परदेसी मेरा दिल ले गया’, ‘आओ हुज़ूर तुमको’, ‘आइये मेहरबान’, ‘पुकारता चला हूं मैं’, ‘लाखों है यहां दिलवाले’, ‘उड़े जब-जब ज़ुल्फे तेरी’, ‘तौबा ये मतवाली चाल’ जैसे सब गाने उन्होंने कंपोज किए और आज भी बड़े लोकप्रिय हैं. इतने कि नई पीढ़ी को भी इनकी याद दिलाने में मशक्कत नहीं करनी पड़ती.

नैयर ने पहला गाना सीएच आत्मा के लिए बनाया, ‘प्रीतम आन मिलो’. इस गाने के लिए उन्हें 12 रुपए मिले. नैयर ने इसके बाद एक-एक कर हिट गाने देना शुरू किया. इतने कि एक समय पर वो फिल्म में म्यूज़िक देने के 1 लाख रुपए तक चार्ज करते थे.

हालांकि ये सफर आसान नहीं रहा. 1950 के दशक की शुरुआत में नैयर की फिल्में कुछ खास नहीं कर पाई. इस बीच उन्हें गीता दत्त ने अपने पति और फिल्मकार गुरदत्त से मिलवाया. गुरुदत्त की फिल्म 'आर-पार' के लिए उन्होंने संगीत दिया. फिल्म के गानों ने धूम मचा दी. शमशाद बेग़म की आवाज़ में कभी आर कभी पार, गीता दत्त का गाया 'बाबूजी धीरे चलना' आज भी तरह-तरह के रीमिक्स के नाम से क्लब और पब में बजता है. इसके बाद उन्होंने गुरुदत्त के साथ फिल्म मिस्टर एंड मिसेस 55 में काम किया. 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी', 'ठंडी हवा काली घटा' जैसे गाने फिर सुपर हिट हुए.

इसके बाद तो उन्होंने इतनी हिट फिल्में दी कि लिस्ट बनानी मुश्किल है. इनमें ‘कश्मीर की कली’, ‘तुमसा नहीं देखा,’ ‘बाप रे बाप,’ ‘हावड़ा ब्रिज,’ ‘सीआईडी,’ ‘फागुन’ के बिना बात आगे नहीं बढ़ सकती. ‘सीआईडी’ में ओपी नैयर ने आशा भोंसले को पहली बार मौका दिया और इस जोड़ी ने बाद में कई हिट गाने दिए.

एक समय उनके गानों को आकाशवाणी ने प्रसारित करने से मना कर दिया. कहा गया कि ये गाने 'संगीत' हैं ही नहीं. पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित हैं. इसके बाद ये गाने रेडियो सीलोन पर बजना शुरू हुए. रेडियो सीलोन की लोकप्रियता में बड़ा योगदान इन गानों का भी है.वैसे नैयर अपने बारे में कहते रहे  कि वो इंडस्ट्री के नंबर दो संगीतकार हैं, बाकी लोग एक नंबर के लिए लड़ते रहें.

सीमित जानकारी, बड़ा ऐटिट्यूड

ओपी नैयर और लता मंगेश्कर के बीच की अनबन के बारे में हर संगीत प्रेमी जानता है. ओपी ने कभी लता मंगेश्कर के साथ काम नहीं किया. यहां तक कि आखिरी समय में मध्य प्रदेश सरकार ने जब नैयर को लता मंगेशकर अवॉर्ड देने की घोषणा की तो नैय्यर ने उसे भी लेने से मना कर दिया. इसके साथ-साथ नैयर संगीत की बहुत कम तकनीकी जानकारी रखते थे. मगर नौशाद, शंकर-जयकिशन और एसडी बर्मन जैसे महारथियों के बीच उनकी सफलता अद्भुत है. नैयर की लोकप्रियता ये भी बताती है कि संगीत अपनी तमाम शास्त्रीयता के बावजूद कला है. हालांकि नैयर के बीच-बीच में अपने गायकों से टकराव की खबरें भी आती रही. कहीं उनका रफी से नाराज़गी का किस्सा मिलता है कहीं किसी और से.

उनकी आशा भोंसले से करीबी और परिवार से टकराव के किस्से भी खूब हैं. कहा जाता है कि शादी की शुरुआत में ही नैयर ने अपनी पत्नी से कहा कि उनके बारे में जितने भी पुराने अफेयर की खबरें वो सुनेंगी वो सहीं हैं. इस तरह की बातें धीरे-धीरे बढ़ती रहीं. एक समय के बाद इतनी बढ़ गईं कि पत्नी परिवार के साथ अलग रहने लगी. ये नाराजगी इतनी बढ़ी कि नैयर ने अंतिम इच्छा में कहा कि उनका परिवार उनके अंतिम संस्कार में न आए. नैयर के मरने के बाद ये इच्छा पूरी भी की गई.

संगीत का अलग ट्रेंड

संगीत के तीन पक्ष होते हैं, सुर-लय-ताल. नैयर का संगीत ताल प्रधान हैं. उनके गानों की बीट झटके में सर पर चढ़ जाने वाली होती है. नैयर ने पारंपरिक लोकसंगीत की ताल ‘पंजाबी’ और ‘कहरवा’ को लेकर खूब प्रयोग किए. इसमें उनके उड़े ‘जब-जब जुल्फें तेरी’ जैसे गाने सुपर हिट हैं. इसके अलावा उन्होंने पश्चिमी बीट्स को लेकर भी काफी काम किया. अमेरिकन मार्च (या हॉर्सबीट) को लकड़ी के साथ पंजाबी लोक संगीत को मिलाकर नैयर ने अपना एक सिग्नेचर स्टाइल बनाया. ‘ये चांद सा रौशन चेहरा,’ लाखों हैं यहां दीवाने, पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे, तुमसा नहीं देखा, मांग के साथ तुम्हारा, फिर वही दिल लाया हूं, ज़रा हौले-हौले चलो मोरे साजना, जैसे गानों ने हॉर्स बीट को नैयर का पर्याय मान लिया गया.

हालांकि इस बीट का इस्तेमाल नौशाद (बचपन के दिन भुला न देना) और आर डी बर्मन (कोई हसीना जब रूठ जाती है) ने भी किया. मगर इस ताल का क्रेडिट नैयर के नाम ही है. जब अंदाज़ अपना अपना में ‘एलो जी सनम’ जैसा गाना आया तो उसे नैयर स्टाइल का म्यूज़िक ही कहा गया. नैयर ने वेस्टर्न संगीत का भी खूब इस्तेमाल किया. उनका वॉल्ट्ज़ पर बना गाना ये है मुंबई मेरी जान, ओ माय डार्लिंग क्लेमेंटाइन की हूबहू नकल है. इसी तरह 'बाबूजी धीरे चलना' 'परहैप्स परहैप्स परहैप्स' पर बना है. हालांकि इससे अलग उन्होंने शास्त्रीय संगीत की ताल और कुछ एक राग का अच्छा इस्तेमाल किया.

ओपी नैयर के बारे में एक ही बात कही जा सकती है. वो अलहदा थे. उनके संगीत में उनकी छाप दिखती है. इसी तरह उनकी ज़िंदगी में उनके संगीत जैसे आरोह-अवरोह हैं. उन्हीं का एक गाना है जो उनपर फिट बैठता है. तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया.

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