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राजे सरकार को इसकी फिक्र नहीं कि टाइगर जिंदा है भी या नहीं!

राजस्थान की राजे सरकार को बड़ा झटका लगा है. क्योंकि राज्य को उसके तीसरे टाइगर रिजर्व के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा

Subhesh Sharma Updated On: Mar 30, 2018 04:47 PM IST

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राजे सरकार को इसकी फिक्र नहीं कि टाइगर जिंदा है भी या नहीं!

'Tiger Tiger, burning bright,. In the forests of the night;. What immortal hand or eye'.

विलियम ब्लेक द्वारा लिखी गई ये मशहूर कविता टाइगर की बेमिसाल शक्ति और उसकी अहमियत को बेहतरीन ढंग से समझाती है. इस कविता का मतलब अधिकतर वाइल्डलाइफ प्रेमी तो समझते हैं. लेकिन अगर टाइगर को बचाना है तो आम लोगों को भी इसे समझना होगा. हाल ही में दुनिया के आखिरी बचे मेल व्हाइट राइनों 'सूडान' ने दुनिया को अलविदा कह दिया और इसी के साथ हमारी आंखों के सामने से विलुप्त हो गई गैंडे की एक प्रजाति. ऐसा ही हाल टाइगर का भी है. जिसे बचाने के लिए प्रयास तो बहुत किए जा रहे हैं. पर एक हल्की सी चूक इस खतरे में पड़ी प्रजाति को विलुप्त होने की कगार पर खड़ा कर सकती है.

टाइगर को बचाने के लिए देश भर में और विदेशों में भी ढेरों मुहिम चल रही है. सरकार भी इस कोशिश में है कि बाघों को ज्यादा से ज्यादा रिजर्व एरिया दिया जा सके. लेकिन राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार को इस मामले में एक बड़ा झटका लगा है. क्योंकि राज्य को उसके तीसरे टाइगर रिजर्व में टाइगर की एंट्री के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा. यहां बात हो रही है मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व की. जिसे राज्य सरकार की ओर से तो 2013 में टाइगर रिजर्व का स्टेटस मिल गया. लेकिन अभी तक इसमें एक भी टाइगर को बसाया नहीं जा सका है.

कौन है जिम्मेदार

 

Darah range

Darah range

31 मार्च 2018, तक मुकुंदरा हिल्स में टाइगर्स को रिलोकेट किया जाना था. लेकिन एनटीसीए (नेशनल टाइगर कंजरवेटिव अथॉरिटी) की ओर से इसे हरी झंडी नहीं मिली. वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) का हिस्सा रह चुके और एनवॉयरनमेंटल साइंस प्रोफेसर हेम सिंह गहलोत ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कई समस्याओं के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि टाइगर को यहां शिफ्ट न किए जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण है. मुकुंदरा हिल्स के आसपास में बसे गांव वाले और वन अधिकारियों का ढीला रवैया.

गहलोत ने कहा कि एनटीसीए की गाइडलाइंस को फॉलो नहीं किया गया है. सरकार लोगों को दूसरे स्थान पर शिफ्ट करने में नाकाम रही है और न ही टाइगर के रहने लायक हैबिटैट तैयार गया है.

स्थानीय लोगों को कब शुरू हुई दिक्कत

गहलोत ने कहा, '2013 में मुकुंदरा हिल्स (जो कि पहले दरा वाइल्डलाइफ सेंचुरी था) को टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला. लेकिन उस समय घाटी, नारायणपुरा, मशालपुरा और दरा रेंज में बसे गांव वालों को इससे कोई दिक्कत नहीं थी. पर जैसे ही टाइगर को शिफ्ट करने का काम अंतिम दौर में पहुंचने लगा, लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. और शिफ्ट करने से इनकार कर दिया. इसके लिए राजस्थान फॉरेस्ट डिपार्टमेंट भी जिम्मेदार है, क्योंकि एनटीसीए द्वारा निर्देश मिलने के बाद भी वो छह सालों में लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट नहीं कर सका.

Photo Source: Asif Khan

Photo Source: Asif Khan

गहलोत ने बताया कि सरकार ने इसे अपना महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट तो बताया. लेकिन इसके लिए जमीनी स्तर पर काम नहीं हुआ. 82 sq.km के इस इलाके में अभी तक न तो फेंसिंग है और न ही ट्रेन की चपेट में आने से जानवरों को बचाने के लिए टनल हैं. आपको बता दें कि इस इलाके में फेंसिंग बेहद जरूरी है, क्योंकि हर रोज यहां से करीब 150 ट्रेनें गुजरती हैं. साथ ही दरा-झालावाड़-कोटा हाईवे पर दिन रात सैकड़ों गाड़िया तेज रफ्तार से दौड़ती हैं.

काम में इतनी देरी क्यों?

एनटीसीए के बार-बार टाइगर्स के लिए रेडियो कॉलर, फेंसिंग व अन्य जरूरी चीजों के बारे में पूछे जाने के बाद भी राजस्थान वन विभाग के कानों में जूं तक नहीं रेंगी. और जब एनटीसीए की तरफ से उनके इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर लगाम लगा दी गई. तो उनकी ओर से कहा जा रहा है कि रेडियो कॉलर खरीदे जा चुके हैं. एक वरिष्ठ वन अधिकारी का कहना है कि हमने एनटीसीए को अपना जवाब भेजा दिया है. रेडियो कॉलर खरीदे जा चुके हैं. साथ ही हमारे विशेषज्ञों द्वारा प्रे बेस असेसमेंट (शिकार का आकलन) भी किया गया है, जो कि वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) द्वारा किया जाना था.

tiger

इस प्रोजेक्ट के पूरा न हो पाने के कारण बहुत से हैं. लेकिन इससे सबसे बड़ा झटका देश में टाइगर कंजर्वेशन के काम को लगा है. आखिर कब सरकार, वन विभाग और जनता अपनी जिम्मेदारी लेगी? इस सवाल का जवाब अभी भी खोज पाना नामुमकिन लगता है. हम सभी को ये बात समझनी होगी कि अगर टाइगर हमारे देश से विलुप्त हो गए, तो जंगल भी खत्म हो जाएंगे.

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