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जिन्ना और भगतसिंह: इतिहास के इस चौक पर इतना अंधेरा क्यों है भाई!

बंटवारे की याद से तालमेल बैठाने की जुगत में दोनों अपने इतिहास के कुछ हिस्से को अक्सर ‘देश-निकाला’ देना चाहते हैं और ऐसा करते ही ‘पाकिस्तान’ और ‘हिन्दुस्तान’ में कुछ घट जाता है, इन मुल्कों की रुहानी तस्वीर से कोई रंग उखड़ जाता है

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: May 10, 2018 01:24 PM IST

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जिन्ना और भगतसिंह: इतिहास के इस चौक पर इतना अंधेरा क्यों है भाई!

इतिहास को देश-निकाला देने के खतरे हैं. जरा, इतिहास को देश-निकाला देकर देखिए- दरअसल वह देश ही आपके हाथ से निकल जाएगा जिसे पुरखों ने आपको विरासत के रूप में सौंपा है.

बंटवारे ने बड़े जख्म दिए- सो भारत और पाकिस्तान किसी और के नहीं बल्कि अपने ही दिल के दाग से जलते रहने वाले दो बेचैन मुल्क हैं. बंटवारे की याद से तालमेल बैठाने की जुगत में दोनों अपने इतिहास के कुछ हिस्से को अक्सर ‘देश-निकाला’ देना चाहते हैं और ऐसा करते ही ‘पाकिस्तान’ और ‘हिन्दुस्तान’ में कुछ घट जाता है, इन मुल्कों की रुहानी तस्वीर से कोई रंग उखड़ जाता है.

मिसाल के नीचे बयान की जा रही हाल की दो घटनाओं पर गौर कीजिए- पहली घटना लाहौर (पाकिस्तान) की है और इसके केंद्र में हैं भारत में शहीद-ए-आजम कहे जाने वाले सरदार भगत सिंह. दूसरी घटना का रिश्ता अलीगढ़(भारत) से है और इसके केंद्र में हैं पाकिस्तान में ‘कायद-ए-आजम’ पुकारे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना.

लाहौर के चौक पर भगतसिंह

बात बीते 23 मार्च यानी भगतसिंह की शहादत की 87वीं बरसी की है. लाहौर के शादमान चौक पर कुछ स्त्री-पुरुष जमा हुए. हाथों में भगत सिंह की तस्वीर और पोस्टर! ये लोग मांग कर रहे थे कि पाकिस्तान की सरकार भगत सिंह और उनके साथियों (सुखदेव और राजगुरु) को राष्ट्र-नायक घोषित करे, भगतसिंह को अपने सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-हैदर’ से नवाजे और शादमान चौक पर भगतसिंह की स्मारक बनाए !

लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत ऐसा क्यों करे भला! उसकी भरसक कोशिश यही रही कि लाहौर से भगत सिंह की कोई याद जुड़ी है तो उसे यों दबाकर रखे कि पाकिस्तानी अवाम के जेहन पर भूले से भी वह याद दस्तक ना दे सके. बात बेशक समझ में आती है-भगतसिंह ऐलानिया तौर पर नास्तिक थे जबकि पाकिस्तान नाम के विचार की बुनियाद ही में एक मजहब (इस्लाम) है. कहीं ना कहीं खटका लगा रहता होगा पाकिस्तान की हुकूमत को नास्तिक भगतसिंह से वर्ना इतिहास के तकाजे से शादमान चौक पर स्मारक बनाने और भगतसिंह को निशान-ए-हैदर से नवाजने में क्या परेशानी हो सकती है भला!

लाहौर के इस शादमान चौक पर कभी अंग्रेजी जमाने की वह सेंट्रल जेल हुआ करती थी जहां 87 साल पहले 23 मार्च 1931 को भगतसिंह और साथियों ने फांसी के फंदे को चूमा था. ब्रिटिश ऑफिसर जे पी सांडर्स पर गोली चलाने और सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के मामले में इसी जेल में भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को लगभग दो साल (8 अप्रैल,1929 से 22/23 मार्च 1931) तक कैद रखा गया. Shaheed-Bhagat-Singh-1

वजह चाहे जो रही हो लेकिन वो जेल 1961 में गिरा दी गई, अगर भगतसिंह की यादों को बचाने की फिक्र होती तो स्मारक के तौर पर ही सही उस जेल को पाकिस्तानी हुकूमत बचा सकती थी. जेल के फांसी वाले अहाते को मिटाने की जुगत हुई, उसे 1947 में शादमान चौक का नाम दिया गया वर्ना फांसी की घटना(1931) बाद से लोग-बाग उस जगह को चौक भगतसिंह के नाम से ही पुकारते आ रहे थे.

बहरहाल, भगतसिंह से प्यार करने वाली पाकिस्तानी जनता और सरकार के बीच मुद्दे पर टकराव बना रहा- लोग मांग करते रहे कि चौक को भगतसिंह का नाम दिया जाय, उनका स्मारक बने. आखिरकार देर तक चली तकरार के बाद साल 2012 में पाकिस्तान की पंजाब सरकार चौक को भगतसिंह का नाम देने को तैयार हुई. लेकिन 2016 तक मंजर फिर से बदलकर पुरानी टेक पर आ गया क्योंकि कट्टरपंथियों ने चौक का नाम बदलने के सरकार के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी थी. इस साल की फरवरी तक मामला कोर्ट ही में फैसले का इंतजार कर रहा है.

भगतसिंह का मुकदमा और जिन्ना

फैसला चाहे जो हो लेकिन भगतसिंह की याद से पाकिस्तान का पीछा छुड़ा पाना मुमकिन नहीं. आप जग की आंखों में थोड़े समय के लिए धूल झोंक सकते हैं लेकिन खुद को धोखा देना बहुत मुश्किल है-भगतसिंह को लेकर पाकिस्तान की मुश्किल इस एक बात से जुड़ी है.पाकिस्तानी हुकूमत कायद-ए-आजम जिन्ना से कन्नी नहीं काट सकती और उसे पता है कि जिन्ना की कहानी के जिन्दा रहते उससे भगतसिंह की कहानी को भी अलगाया नहीं जा सकता.

भगत सिंह और जिन्ना दोनों अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े थे लेकिन यह  ये सही है कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ जैसी जंग जिन्ना लड़ रहे थे वो रास्ता भगत सिंह का नहीं था. जिन्ना कानून जानते थे, अपने मामले के पक्ष में अर्जी-दलील और कानून के दायरे के भीतर रहते हुए आंदोलन यही उनका रास्ता था. लेकिन भगतसिंह अंग्रेजी कानून के पाखंड को समझते थे, उनका रास्ता उस क्रांति का था- जिसे बंदूक की नलियों से गुजरने में परहेज ही नहीं!

लेकिन रास्ते का यह अलगाव जिन्ना के आड़े ना आ सका-वे भगतसिंह के मुकदमे में कानून के उड़ाए जा रहे मजाक के खिलाफ ब्रिटिश असेंबली में उठ खड़े हुए. वाकया तबका है जब लाहौर जेल में भगतसिंह ने कुछ सहूलियतों की मांग की और जेल-प्रशासन ने उसे ठुकरा दिया. भगतसिंह और उनके साथी भूख-हड़ताल पर बैठ गए. उन्होंने जबर्दस्ती खाना खिलाने की कोशिश की गई लेकिन जेल-प्रशासन नाकाम रहा. भूख हड़ताल के कारण मामले की सुनवाई में जा पाने से भगतसिंह और उनके साथी लाचार थे. सवाल उठा-जिस पर आरोप है, वही अदालत में अपने बचाव के लिए मौजूद नहीं तो फिर सुनवाई कैसे हो?

अंग्रेजी सरकार ने एक संशोधन पारित किया. इस संशोधन के जरिए कोर्ट को अधिकार दिया गया कि आरोपी अगर स्वेच्छा से कोर्ट ना आए तो फिर उसकी गैरमौजूदगी में उसके खिलाफ अदालती सुनवाई जारी रह सकती है. जिन्ना ने 12 सितंबर 1929 के दिन सेंट्रल असेंबली में इस संशोधन का विरोध किया. 

असेंबली में कहा, 'आप चाहते हैं यह सदन इस मामले में एक खास कानून बनाये, ऐसा कानून जो इस मामले (भगतसिंह) में भूख-हड़ताल तुड़वाने का औजार बने. याद रखिए कि ये लोग सर पर कफन बांध चुके हैं. ये कोई मजाक नहीं है..जो भूख हड़ताल पर बैठता है उसे अपने जमीर (विवेक) पर यकीन होता है, वह अपने जमीर के कहे पर चलता है और उसे अपने मकसद के जायज होने का भरोसा होता है. वे कोई आम अपराधी नहीं है और चाहे मैं उनके रास्ते को पसंद नहीं करता लेकिन आप चाहे उन्हें कितना भी गुमराह बता लें लेकिन यह आपकी सरकार है..निन्दा के काबिल यह आपकी सरकार जिससे ये लोग नफरत करते हैं.'

जिन्ना ने भगतसिंह के पक्ष में अंग्रेजी सरकारी की पोलपट्टी खोलते हुए उस रोज असेंबली में कहा था, 'क्या आज की तारीख में दुनिया में ऐसी भी कोई सभ्य सरकार है जो दिन-रात, हर हफ्ते और हर महीने अपने लोगों को कटघड़े में खड़े करने पर आमादा है?...अगर आंखें खोलकर देखें तो क्या आपको खुद ही यह महसूस नहीं होता कि आपकी नीतियों और आपके कार्यक्रमों के खिलाफ लोगों में आक्रोश है, चौतरफा आक्रोश..?

असेंबली में जिन्ना के इस भाषण के बाद ट्रिब्यून ने लिखा कि जिन्ना ने मामले को जिस तरह से रखा उसका सदन पर गहरा असर पड़ा..सभी मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे और सदन में उनकी हर तरफ से सराहना हुई. कानून में संशोधन की कोशिश सदन में कामयाब ना हुई तो गवर्नर जेनरल ने अध्यादेश जारी किया. इस अध्यादेश के बूते भगतसिंह को बचाव का मौका दिए बगैर अदालती कार्यवाही जारी रही. बाद को यह अध्यादेश ‘अवैध’ करार दिया गया. लेकिन जिन्ना के उस भाषण के बाद यह तय हो गया कि बगैर सुनवाई के किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का अंग्रेजी कानून नहीं चलने वाला.

अलीगढ़ में जिन्ना

पाकिस्तानी हुकूमत की मुश्किल है कि वह जिन्ना को कायद-ए-आजम कहना चाहती है लेकिन कुछ ऐसे कि जिन्ना की कहानी में भगतसिंह नजर नहीं आए- आखिर भगतसिंह उस भारत के शहीद-ए-आजम जो ठहरे जिसे उसने अपने जन्म से ही मन ही मन दुश्मन मुल्क का दर्जा दे रखा है!

सीमा के इस पार कुछ ऐसी ही मुश्किल ‘अखंड भारत’ की हिन्दुत्वादी राजनीति करने वालों के साथ भी है. वे अखंड भारत के सपने में सेंधमारी करने वाले जिन्ना को ‘देश-निकाला’ देना चाहते हैं और अपनी इस चाहत के हाथों अक्सर हलकान होते हैं क्योंकि जिन्ना की याद को ‘देश-निकाला’ देने का मतलब होगा ‘लोकमान्य’ बाल गंगाधर तिलक और ‘लौहपुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल की कहानी के कुछ हिस्से कम करना.

साल 1916 में राजद्रोह के मुकदमे में लोकमान्य तिलक के पक्ष में पैरवी जिन्ना ने की थी. इस मुकदमे में तिलक निर्दोष साबित हुए. तिलक चाहते थे कि मुकदमे को सियासी रंग दिया जाय लेकिन जिन्ना ने उन्हें मना किया. कहा, सिर्फ कानून के नुक्ते से ही मुकदमा लड़ने दीजिए और अपने दोस्त जिन्ना की बात तिलक ने मान ली. उस साल कांग्रेस में तिलक के दोबारा दाखिले में जिन्ना मददगार बने और उसी साल दोनों के आपसी सहयोग से वह ऐतिहासिक लखनऊ समझौता भी हुआ जिसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक साक्ष्य माना जाता है.

Mohammed_Ali_Jinnah_smoking

यों सरदार पटेल और जिन्ना देश के बंटवारे के इतिहास में दो विपरीत ध्रुव की तरह देखे जाते हैं लेकिन एक मुकदमे में लौहपुरुष पटेल की तरफ से बचाव में पैरवी जिन्ना और उनके मातहत वकीलों की टोली ने की थी. अहमदाबाद (स्वामी नारायण आर्टस् कॉलेज) के इतिहासकार रिजवान कादरी की किताब सरदार ‘पटेल- एक सिंहपुरुष’ में जिक्र आता है कि 28 अप्रैल 1922 को अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में एक मुकदमा दर्ज हुआ. सरदार पटेल और अहमदाबाद म्युनिस्पैल्टी के 18 पार्षदों पर अंग्रेजी सरकार ने आरोप लगाया कि ‘सार्वजनिक धन का दुरुपयोग’ हुआ है सो उन्हें 1,68,600 रुपये सरकारी खजाने मे जमा करने होंगे. सरदार पटेल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में मुकदमा जीत गए तो सरकार मामले को बम्बई हाईकोर्ट ले(1923) गयी. हाईकोर्ट में पटेल के पक्ष में पैरवी जिन्ना और उनके मातहत वकीलों की टोली ने की और पटेल यहां फिर से मुकदमा जीते.

जिन्ना की कहानी से ना लोकमान्य तिलक को अलगाया जा सकता है और ना ही सरदार पटेल को. लेकिन फिर इस बात का क्या करें कि जिन्ना की जिद ही ने पाकिस्तान बनवाया ? ‘अखंड भारत’ के अपने सपने और ‘बंटवारे की सच्चाई’ को लेकर दुविधा के दोराहे पर खड़ी हिन्दुत्व की राजनीति जिन्ना को लेकर कभी सहज नहीं हो पाती और अक्सर अपनी समझ के हाथों हलकान होती है.

ऐसा एक वाकया 2005 की जून में हुआ जब बीजेपी के अध्यक्ष के रुप में लालकृष्ण आडवाणी ने कराची में जिन्ना की कब्र पर पहुंचकर उन्हें ‘इतिहास-निर्माता, धर्मनिरपेक्ष और हिन्दू-मुस्लिम एकता के अग्रदूत’ कहकर याद किया था और ऐसा करने के कारण बाद को पार्टी के भीतर आलोचना के पात्र बने . दूसरी दफे पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री जसवंत सिंह हलकान हुए. उन्होंने जिन्ना, पटेल और विभाजन के इर्द-गिर्द किताब (जिन्ना: इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस) लिखी. किताब में तर्क दिया कि विभाजन की वजह नेहरू की केंद्रीकृत नीति रही और इस बात को छुपाने के लिए नाहक ही बंटवारे का दोष जिन्ना को दिया जाता है. इस किताब के प्रकाशन के बाद पार्टी ने ‘विचारधारा और अनुशासन’ का सवाल उठाते हुए जसवंत सिंह को निष्कासित कर दिया.

जिन्ना को ‘देश-निकाला’ निकाला देने की चाहत के हाथों हलकान होने की नई मिसाल अलीगढ़ से बीजेपी के सांसद सतीश गौतम हैं. दिल की हसरत (अखंड भारत) का भी जोर रहा होगा जो उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वीसी से चिट्ठी लिखकर पूछ लिया कि एएमयू के अहाते में मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर क्यों लटक रही है ?

चिट्ठी के सार्वजनिक होने के चंद घंटे के भीतर पार्टी के नेता और यूपी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि एएमयू से जिन्ना की ‘तस्वीर हटाने की मांग घटिया’ है क्योंकि बंटवारे से पहले देश की आजादी में जिन्ना का भी योगदान था. लेकिन ऐसा कहने पर हलकान मौर्य को भी होना पड़ा. बयान के बाद बीजेपी के ही एक और सांसद ने कहा कि ‘देश के तीन टुकड़े करने वाले जघन्य अपराधी जिन्ना को महापुरुष बताने वाले बयान के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य को माफी मांगनी चाहिए अन्यथा उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिए’.

लाहौर और अलीगढ़ से जुड़ी ये दो घटनाएं अपने इतिहास से अबतक तालमेल ना बैठा पाये दो मुल्कों की बेचैनी का इश्तहार हैं-पहली घटना (लाहौर) में इतिहास को तड़ीपार करने पर होने वाले नुकसान का इजहार है, दूसरी घटना(अलीगढ़) में ‘इतिहास’ के पूरेपन से घबड़ाकर उसे दुरुस्त करने की घातक हड़बड़ी. यादे रहे, इतिहास के अधूरेपन के चौराहे से आगे हर रास्ता एक अंधे कुएं के मुहाने पर आकर खत्म होता है. किसी ने यों ही नहीं कहा कि इतिहास पर तुम तमंचे से गोली चलाओ तो वह तुमपर तोप से गोले बरसाता है!

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