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मृणाल सेन: भारत का सबसे 'ईमानदार' डायरेक्टर जो अपनी गलतियों से सीखकर महान बना

मृणाल सेन संस्कृति में राजनीति को बाधा मानते हैं और कभी किसी वामपंथी पार्टी के मेंबर नहीं रहे. पर साहित्य और कला के जरिए राजनीति में कभी नहीं चूके

Updated On: May 14, 2018 11:35 AM IST

Avinash Dwivedi
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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मृणाल सेन: भारत का सबसे 'ईमानदार' डायरेक्टर जो अपनी गलतियों से सीखकर महान बना
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बंगाल, सोनार बंगाल, महान बंगाल, विचित्र बंगाल, इसी बंगाल के हैं मृणाल सेन. भारत की महान फिल्म डायरेक्टर तिकड़ी में से एक. बाकी दो को आप नाम से जरूर जानते होंगे, सत्यजित रे और ऋत्विक घटक. भारतीय सिनेमा को वैश्विक फलक पर शुरुआती पहचान दिलाने का लगभग सारा श्रेय ये तिकड़ी ले जाती है.

वापस आते हैं मृणाल दा पर जिनके 95वें जन्मदिन पर आप उनसे मुखातिब हो रहे हैं. 14 मई, 1923 को अविभाजित बंगाल के फरीदपुर कस्बे में जन्मे मृणाल सेन चालीस के दशक में कलकत्ता चले आए. जहां उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की. कॉलेज अपने होनहार छात्रों के लिए विश्वप्रसिद्ध है, इंटरनेट पर आपको एक लंबी लिस्ट मिल जाएगी. वैसे कुछ नाम हैं, स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस, मन्ना डे.

पहला प्यार सिनेमा नहीं साहित्य था

कॉलेज में पढ़ाई-लिखाई का अच्छा माहौल था तो यहां पढ़ने के दौरान मृणाल सेन का साहित्य से रिश्ता गहराया. पर यह रिश्ता फिल्मों की ओर झुका, जब लेखक 'रुडोल्फ अर्नहाइम' की किताब 'फिल्म एस आर्ट' पढ़ने के शौकीन मृणाल सेन के हाथ लगी.

बकौल मृणाल सेन, अपनी पढ़ने की आदत के चलते ही सिनेमा से उनका लगाव हुआ, क्योंकि इसके बाद सिनेमा पर उन्होंने कई किताबें पढ़ीं. मृणाल सेन अपने समकालीन डायरेक्टर तिकड़ी के बारे में भी कहते हैं कि ऋत्विक घटक, थियेटर से और वो साहित्य से सिनेमा की ओर आए, उनमें से सत्यजित रे ही थे जो शुरुआत से ही सिनेमा के प्रति डेडिकेटेड थे. वैसे ताउम्र तीनों में एक-दूसरे के लिए बहुत सम्मान रहा. आपस में असहमतियां भी हुईं पर उन्हें भी सबने मर्यादित तरीके से ही सामने रखा.

मृणाल सेन और सत्यजीत रे

मृणाल सेन और सत्यजित रे

उस दौर में ऐसे कई क्रिएटिव दिमागों को इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) साथ ले आया था. ऋत्विक घटक और मृणाल सेन इसके सक्रिय सदस्य थे. अपने फिल्मी करियर की शुरुआत मृणाल सेन ने एक सरकार विरोधी फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने से की.

लेकिन एक मुसीबत में फंसने से उन्हें स्क्रिप्ट जलानी पड़ी और फिर वो फिल्म कभी नहीं बनी. इसके बाद कुछ वक्त तक उन्होंने दवाओं के एजेंट के तौर पर काम किया और मौका पाते ही फिल्ममेकिंग की ओर वापस लौट आए. और एक स्टूडियो में साउंड रिकॉर्डिस्ट की जॉब कर ली. कुछ वक्त बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म बनाई, जिसका नाम था 'रात भोरे'. ईमानदार मृणाल सेन कहते हैं कि यह फिल्म उनके लिए डिजास्टर और एक दु:स्वप्न की तरह है, क्योंकि एक डॉयरेक्टर के तौर पर उसमें वो कुछ भी नहीं दिखा सके थे.

मेहनत रंग लाई

मृणाल सेन ने फिल्म विधा को बहुत गंभीरता से लेते हुए इसे पूरे मनोयोग से सीखना शुरू कर दिया. उन्हें सफलता मिली उनकी फिल्म 'नील आकाशेर नीचे' (1959) से. इसके बाद उनकी एक और फिल्म आई जिसका नाम था 'बाइसे श्रवण' (1960). 'बाइसे श्रवण' में रवींद्रनाथ टैगोर की शव यात्रा में हुई एक मौत के जरिए बंगाल के जनजीवन को दिखाने का प्रयास हुआ था. पर 'महान' शब्द मृणाल सेन के साथ अभी जुड़ना बाकी था क्योंकि 'भुवन सोम' अभी नहीं आई थी. यह फिल्म आई 10 साल बाद 1969 में, और इसके साथ ही दुनिया भर में मृणाल सेन के सिनेमा की धूम मच गई. दर्शकों के साथ ही दुनिया भर के आलोचकों ने इस फिल्म की तारीफ की. नहीं की तो सत्यजित रे ने. रे ने इस फिल्म को औसत बताया और कहा कि यह बस एक ब्यूरोक्रेट के गांव की बाला का साथ पाकर हृदय परिवर्तन हो जाने की साधारण कहानी भर है.

मृगया फिल्म की शूटिंग के दौरान मृणाल सेन

मृगया फिल्म की शूटिंग के दौरान मृणाल सेन

पर रे की बात से इतर मृणाल सेन की इस फिल्म में दो बातें खास थीं. पहली ये कि मृणाल सेन ने यह फिल्म हिंदी में बनाई थी और दूसरी, उन्होंने कहानी को सौराष्ट्र (गुजरात का भाग) में फिल्माया था. बंगाली डायरेक्टर्स की जिस तिकड़ी की बात ऊपर की गई है, मृणाल दा उनमें पहले थे जो हिंदी में फिल्में बना रहे थे. ऋत्विक घटक ने हिंदी में एक भी फिल्म नहीं बनाई. सत्यजित रे ने हिंदी में एक मात्र फिल्म बनाई 'शतरंज के खिलाड़ी' जो भुवन सोम के आठ साल बाद 1977 में आई. दरअसल मृणाल सेन के लिए भाषा बाधा नहीं बल्कि प्रसार का जरिया थी, उन्होंने बांग्ला के साथ ही हिंदी, ओड़िया और तमिल में भी फिल्में बनाईं. इतना ही नहीं तीनों की फिल्मों के बैकड्रॉप में बंगाल ही अधिकांशत: रहा क्योंकि वहीं की कहानियां कही जा रही थीं पर अपनी फिल्मों में सबसे ज्यादा बंगाल से अलावा जगहें फिल्माने वाले भी मृणाल सेन ही थे.

मैंने जो संग तराशा वो ख़ुदा हो बैठा

मृणाल सेन ने जिस तरह से सौराष्ट्र को भुवन सोम में दिखाया है, अद्वितीय है. कहा जा सकता है कि मृणाल सेन किसी भी चीज से खुद को बोझिल नहीं रखते थे. मृणाल सेन ने अपनी फिल्ममेकिंग के साथ भी बहुत से प्रयोग किए. मोंटाज, जम्पकट और कार्टून का जबरदस्त प्रयोग आपको उनकी फिल्म 'भुवन सोम' में देखने को मिलेगा. वैसे भुवन सोम पर बात खत्म करने से पहले सत्यजित रे की आलोचना को फिर याद करते हैं.

जब दुनिया में फिल्म की तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे और भारत में 'न्यू वेव' सिनेमा की शुरुआत करने का खिताब इसे दे दिया गया था उस वक्त अमिताभ बच्चन के सौम्य नैरेशन से सजी इस फिल्म को सत्यजित रे ने औसत करार दिया था. पर 1977 में बनाई खुद की फिल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' में 'सत्यजित रे' ने 'भुवन' सोम की हर तकनीक और स्टाइल को दोहराया. चाहे वो अमिताभ बच्चन का नैरेशन रहा हो, कार्टूनों का प्रयोग या फिर मोंटाज और जम्पकट. यहां यह बात करने का मेरा उद्देश्य तुलना नहीं बल्कि दोनों के सम्बंधों को उकेरना है. ताकि उनके बीच कलात्मक आदान-प्रदान की बात समझी जा सके.

मृणाल सेन ने कुछ बेहतरीन एक्टर्स की खोज भी की. जिसमें मिथुन चक्रवर्ती, अंजन दत्त, ममता शंकर, श्रीला मजूमदार और माधबी मुखर्जी आदि हैं. इसके अलावा भी उन्होंने स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह और ओमपुरी के साथ कई फिल्मों में काम किया. तीन बार बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीत चुके मिथुन चक्रवर्ती को मृणाल सेन ने अपनी 1977 की फिल्म मृगया में लॉन्च किया था. और मिथुन ने पहला राष्ट्रीय पुरस्कार इसी फिल्म के लिए जीता था.

सबकी अपनी-अपनी पॉलिटिक्स है

मृणाल सेन संस्कृति में राजनीति को बाधा मानते हैं और कभी किसी वामपंथी पार्टी के मेंबर नहीं रहे. पर साहित्य और कला के जरिए राजनीति में कभी नहीं चूके. उन्होंने 'भुवन सोम' के बाद नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर के कलकत्ता (अब कोलकाता) पर तीन फिल्में बनाईं. जिन्हें 'कलकत्ता ट्रायोलॉजी' के नाम से जाना जाता है. ये फिल्में हैं 'कलकत्ता 71', 'इंटरव्यू' और 'पदातिक'. तीनों ही फिल्मों में सीधे सरकार विरोधी रुख अपनाया गया है.

मृणाल दा ने प्रभावोत्पादकता के लिए अपने तरकश का हर तीर इन फिल्मों में प्रयोग किया है. कट से लेकर फिल्म के म्यूजिक तक सारी चीजें आपको असहज करती हैं और उस वक्त के कलकत्ता के कष्टों को उभारती हैं.

खुद मृणाल सेन बताते हैं कि 'पदातिक' की रिलीज के बाद 12 हफ्ते तक दिन के सारे तीन शो कलकत्ता में हाउसफुल होते थे. लोग यह मानकर फिल्म नहीं देखने जाते थे कि वो कोई फिल्म देखने आए हैं बल्कि लोग मानते थे कि वे सरकारी नृशंसता का विरोध करने के लिए किसी राजनीतिक सभा में एकत्र हुए हैं. और साथ ही उस दौर में इन फिल्मों को देखने जाना जांबाजी का काम भी था.

मृणाल सेन के पीछे एक औरत का हाथ रहा

हालांकि घिसी-पिटी पंक्ति- हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है- को न भी दोहराना चाहूं तो भी मृणाल दा के फिल्मी करियर की बात उनकी पत्नी गीता सोम (जो शादी के बाद गीता सेन हो गई थीं और मृणाल दा की जिंदगी में भुवन सोम से पहले आ चुकी 'सोम' थीं) के बिना नहीं की जा सकती. दोनों के बीच बहुत शांति रहती थी, वैसे ही जैसे चार्ली चैप्लिन और उनकी आखिरी पत्नी ऊना के बीच. हालांकि गीता जी ने मृणाल दा की कई फिल्मों में अभिनय किया और मृणाल दा खुद भी स्वीकारते हैं कि वो कई बार उनसे सलाह लिया करते थे.

भुवनसोम का पोस्टर

भुवनसोम का पोस्टर

वैसे दोनों की मुलाकात एक असिस्टेंट और नई हिरोइन के रूप में एक ऐसी फिल्म के सेट पर हुई थी जो कभी पूरी ही नहीं हो सकी. दोनों ने परिवार की मर्जी के खिलाफ अंतरजातीय विवाह किया. जिसका कुछ खामियाजा भी दोनों ने भुगता. गीता सेन खुद स्वीकारती हैं कि भुवन सोम से पहले के उनके जीवन के कई दिन फांकों में गुज़रे. गीता सेन ने मृणाल सेन की फिल्मों 'कलकत्ता 71', 'कोरस', 'एकदिन प्रतिदिन', 'अकालेर सांधाने', 'खांधार' और 'आरोहण' में अभिनय किया है. यही कारण होगा कि एक बार सत्यजित रे ने मृणाल दा के बारे में कहा था, 'वे भाग्यशाली हैं कि उनके पास एक रेडीमेड हीरोइन घर पर ही है.'

कहा जा सकता है भारत का सबसे 'ईमानदार' फिल्ममेकर

बकौल मृणाल सेन उन्हें जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार की सूचना दी गई तो गीता सेन ने उन्हें चूमा था. इतना ही नहीं कई बार बातचीत में गीता सेन, मृणाल सेन को एक बेहद ईमानदार इंसान के तौर पर याद करती रही हैं. सोचिए इस प्रेम की क्या ही मिसाल दी जाए कि 93 साल के मृणाल सेन के बगल में लेटी गीता सेन (करीब इतनी ही बुजुर्ग) बार-बार मृणाल दा की ईमानदारी की बात दोहराती हैं. आपकी नस-नस से वाकिफ किसी शख्स के मुंह से आई यह तारीफ आपको बिल्कुल पवित्र कर देती है.

शायद यह सच भी है मृणाल दा खुद भी कहते हैं कि मैंने पहली फिल्म बहुत बुरी बनाई थी और बाद में मैंने सीख-सीख के फिल्में बनाईं. वो यह भी स्वीकारते हैं कि लाखों रुपए होने के मुकाबले मुझे मेरे सिनेमा के लिए दादासाहब फाल्के की नवाजिश ज्यादा प्रसन्न करती है. गीता सेन 2017 की शुरुआत में गुजर चुकी हैं. लोग कहते हैं मृणाल दा ने अपना सबसे अनमोल अवॉर्ड खो दिया है.

ये भी जानिए

-मृणाल दा ने 80 वर्ष की उम्र में 2002 में अपनी आखिरी फिल्म आमार भुवन बनाई थी.

-1998 से 2003 तक वे कम्युनिष्ट पार्टी की ओर से राज्यसभा के लिए भी नॉमिनेट किए गए.

-सन् 2000 में उन्हें रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन ने ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप सम्मान से सम्मानित किया.

-साहित्य के लिए नोबेल प्राप्त लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्खेज उनके खास मित्रों में से हैं.

-मृणाल दा ने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म प्रतिस्पार्धाओं में जज/ ज्यूरी की भूमिका निभाई है. कांस को वे अपना दूसरा घर बताते रहे हैं.

-मृणाल दा और गीता सेन के बेटे कुणाल, 'इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका' में चीफ टेक्निकल डेवलपमेंट ऑफिसर हैं.

चलते-चलते

लेख का पहला वाक्य 'भुवन सोम' फिल्म में अमिताभ बच्चन के नैरेशन से प्रभावित है. जो अमिताभ बच्चन की किसी भी तरह की पहली फिल्म तो थी ही, साथ ही एकमात्र फिल्म भी थी जिसमें 'क्रेडिट्स' में उनका नाम 'अमिताभ बच्चन' नहीं 'अमिताभ' लिखकर आता है. ऐसा इसलिए क्योंकि उनका नाम 'बच्चन' लगाने से बहुत लंबा हो जा रहा था.

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