S M L

हिंदी सिनेमा में 'लड़का ब्यूटीफुल' जैसा गाना क्यों नहीं लिखा जाता

हमारे नायक भी लड़कियों पर मरते हैं और इन आंखों की मस्ती के गाते हुए लड़कियां भी खुद पर मरती हैं, बेचारे लड़कों पर कौन मरे

Puja Upadhyay Updated On: Nov 20, 2017 11:53 AM IST

0
हिंदी सिनेमा में 'लड़का ब्यूटीफुल' जैसा गाना क्यों नहीं लिखा जाता

बॉलीवुड में श्रंगार रस बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है. आपको यहां कई रंग मिलेंगे, चांद के रास्ते रूप का बखान हो ‘चौदहवीं का चांद हो’, ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’, या ‘खूबसूरत है वो इतना, सहा नहीं जाता’ या कि गहराई में उतर कर खूबसूरती से जीवन में रंग भरते गीत हों, ‘जीवन से भरी तेरी आंखें’. कई गीतों में एक सिचुएशन के साथ पूरी कहानी है, बारिश है, कि अपनी पूरी कलात्मकता में दृश्य आंखों के सामने ज़िंदा हो जाता है, ’जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात’, ‘एक लड़की भीगी भागी सी’.

सुंदरता का जिक्र करना हो तो नायिका की आंखों, जुल्फों, चाल, कपड़े… यहां तक कि बाल बनाने पर भी गीत लिखे गए हैं, ‘घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही’. किसी एक गीतकार की बात हो तो ताजगी और एकदम ही अलग उपमाएं लिए हुए गुलजार एक अलग ही स्कूल हैं.

हिंदी फिल्मों में लता मंगेशकर, आशा भोंसले से लेकर श्रेया घोषाल तक कई बेहतरीन आवाजों ने नायिकाओं की भावनाओं को संवारा है. गानों की बात करें तो फीमेल लीड में गानों की कोई कमी नहीं है. हम यहां सिर्फ फीमेल लीड सॉन्ग की बात कर रहे हैं, डूएट गीतों की नहीं, ना उन गीतों की जो मेल-फीमेल दोनों आवाजों में रिकॉर्ड किए जाते थे जैसे कि ‘अहसान तेरा होगा मुझ पर’ या फिर ‘जीवन से भरी तेरी आंखें’, इनके मेल-फीमेल दोनों आवाजों में मौजूद हैं. अगर स्त्रियों के गाए गीतों के बोल पर ध्यान दिया जाए तो इतने वर्षों में बने गीतों में मुट्ठी भर गीत भी नहीं निकलते हैं जो स्त्रियों ने पुरुषों के लिए गाए हों.

महिलाएं पुरुषों के लिए नहीं गातीं

पहली नजर में यह बात जितनी झूठी लगती है, उतनी है नहीं. फीमेल लीड गाए गानों की कमी नहीं है, लेकिन कई कई गानों के बोलों को देख कर यह पता चलता है कि जो गीत पुरुषों पर गाए हुए लगते भी हैं, वो शुरू होते ही दूसरी पंक्ति में ही स्त्री पर केंद्रित हो जाते हैं. ‘रंगीला रे’ लगता है कि किसी पुरुष पर गाना बना होगा लेकिन अंतरा में आते ही, ‘आंसू की साड़ी और आहों की चोली’ पर बात आ जाती है. तुम्हीं मेरी मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा से शुरू हुआ गाना उस पुरुष को आगे बयान नहीं करता बल्कि फिर से गाने को घुमा कर औरत पर ले आता है, तुम्हीं मेरे माथे की बिंदिया झिलमिल, तुम्हीं मेरे माथे का गजरा, तुम्हें सुला दूं… मतलब क्या उस पुरुष के लिए कोई उपमा हैं ही नहीं? और यह एक दो गानों की बात नहीं है, यह पैटर्न बॉलीवुड के पुराने गानों से लेकर एकदम नए गानों तक भी है.

गीत भले ही स्त्री ने गाए हों, शुरुआत भले ही लगे कि किसी लड़के पर होगा, माए नी माए मुंडेर पर तेरी बोल रहा है कागा में सिर्फ़ एक लाइन है उस जोगी के बारे में… चांद की तरह चमक रही थी उस जोगी की काया… फिर गाना लड़की के हाथों में मेहंदी लगाने पर उतर आता है. कमली में कैटरीना का डांस कमाल का है, वो शुरू होता है पत्थर रांझे के पिघलने से लेकिन आते आते, मैं पहन के साफा केसरिया जुगनी जोगन कहलाऊं पर ठहर जाता है.

आत्ममुग्ध होती हैं हमारी नायिकाएं

हिंदी गानों में स्त्रियां जो गीत गा रही हैं, वो भी स्त्री की खूबसूरती पर ही हैं. इन आंखों की मस्ती के, मेरा नाम चिन चिन चू, हवा हवाई, ऐसे कई गीत हैं जो स्त्रियों ने गाए हैं और अपनी ही खूबसूरती पर गए हैं. इसमें थोड़ा अलग हट के सजने संवरने पर भी बहुत गीत मिलते हैं, सजना है मुझे सजना के लिए, तेरे लिए पलकों की झालर बुनूं, मेरा दिल जो मेरा होता. ये सारे गीत भी स्त्री केंद्रित ही हैं. नए गीतों में जाएं तो भी स्त्रियों की ये आत्म-मुग्धता खत्म नहीं होती. मैं परेशान, परेशान, बेबात खुद पे, मरने लगी हूं, अब लड़कियां भी खुद पे मरें, लड़के भी लड़कियों पर ही मरें, बेचारे लड़के, उन पर कौन ही मरेगा फिर?

स्त्रियों के गाए गीतों में उनकी भावनाओं की बहुत बात होती है. बचपन के छूटे जाने की या वो प्रेम को लेकर क्या महसूस कर रही हैं, इसकी भी बात होती है. औरत के खयालों या अरमानों के बारे में स्टेटमेंट होता है, 'ऐ ज़िंदगी गले लगा ले’, ‘आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे’, ‘कई बार यूं भी देखा है’, ‘चली रे, चली रे, जुनूं को जिए’, ‘लव यू ज़िंदगी’, ‘धुनकी लागे’. ये गाने फलसफा बयान करते हैं. उनकी सोच को दिखाते हैं लेकिन है अपना दिल तो आवारा, ना जाने किस पे आएगा, वैसी कोई ख्वाहिश कहीं तो किसी गीत में आई हो, ऐसा नहीं है.

क्या औरतें हीरोइनों जैसी ही होती हैं?

औरतें क्या अकेले वक्त में भी खुद के बारे में ही सोचती हैं? घर का काम करते हुए क्या सिर्फ सजने-संवरने और अपनी खूबसूरती के बारे में सोचेंगी? कभी तो वो पुरुषों के बारे में सोचती हैं अकेली वक्त में, या उनकी खूबसूरती, उनकी अदाओं या उनके पौरुष पर ही मोहित होकर कुछ तो गुनगुनाती होंगी?

पिछले कई सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बनी फिल्मों में लगभग सारे बड़े गीतकार पुरुष रहे हैं. उनके पास पुरुष को देखने की वो नजर नहीं रही जो किसी औरत के पास होती है, या कि इस टॉपिक पर कभी किसी ने सोचा नहीं? किसी नायिका ने, किसी लीड फीमेल सिंगर ने कभी नहीं कहा कि ऐसा कोई गाना हो जो वो बयान करे जो हम सोच रहे हैं?

आखिर कई सालों के कई गीत खंगाल कर भी एक बस ‘पान खाए सैय्यां हमार’ जैसा एक ही गाना मिलता है. गुरुदत्त की फिल्म, साहब बीबी और ग़ुलाम के गाने, ‘भंवरा बड़ा नादान है’ हम देखते हैं कि नायिका नायक को देखते हुए लिख भी रही है और गा भी रही है. मगर ऐसी सिचुएशन फिल्मों में बहुत कम दिखाई गई हैं.

औरतों के श्रंगार का जैसा नख-शिख वर्णन मिलता है, हिंदी गीतों में पुरुष शरीर की उपस्थिति ही नहीं. सारे के सारे गाने खंगाल कर सिर्फ एक पंक्ति है जिसमें पुरुष का बदन दिखता है, और हां, इसे गुलजार के सिवा कोई नहीं लिख सकता था, ‘एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल’. अगर शाहरुख़ ने दर्द-ए-डिस्को के लिए सिक्स पैक ऐब्स बनाए तो उन्हें देख कर गाना गाने वाली लड़की कहां है? हैप्पी न्यू ईयर में दीपिका शाहरुख़ को देख कर ‘मनवा लागे’ ही गा रही हैं, भले ही फिल्मांकन में नायक के कपड़ों में आग लग रही हो. डिटेल यह है कि गाने में ठीक जैसे नायक की काली शर्ट में आग लगती है, गीत के बोल पुरुष आवाज में हैं, ‘खुले ख्वाबों में जीते हैं बावरे’.

ख्वाबों में भी भेदभाव

कुछ गाने अपवाद की तरह हैं लेकिन वो भी ख्वाब, ख्याल वाले हैं. मेरे ख्वाबों में जो आए, डीडीएलजे और फिर सोल्जर में भी ऐसे ही बोलों के साथ मौजूद है. या कि चुराई हुई धुन पर बना हुआ गीत, ओ मेरे सपनों के सौदागर. इन गीतों के पुरुष सच की दुनिया में आए नहीं हैं. क्योंकि जब आएंगे तो तू शायर है मैं तेरी शायरी से उठ के गाना फिर से, तेरी हर नज्म तेरा हर गीत है याद मुझे पर आ के ठहर जाएगा.

बहुत से हिंदी गाने सुन कर, बहुत से गानों के बोल देख कर ऐसा नतीजा निकलता है कि हिंदी फिल्मों में वाकई पुरुषों के लिए एकल गीत नहीं लिखे गए हैं. इतने वर्षों के हिंदी फिल्मों के इतने सारे गानों में अगर 10 ढंग के गीत नहीं हैं तो कुछ तो गलत हो रहा है कई सालों से. इस बात पर सोचना इसलिए भी जरूरी है कि बॉलीवुड सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है. हिंदी फिल्में हमारी भाषा को बदलती हैं. अपनी सहज सुलभता के कारण आम लोगों तक पहुंचती हैं. ऐसा कितनी बार हुआ है कि अपनी भावनाएं कह के जताने के लिए लोगों ने गीतों का सहारा लिया है.

बड़ा असर डालता है ये भेदभाव

प्यार करने और जताने में हिंदी फिल्मी गीतों का बहुत बड़ा हिस्सा रहा है. कोई लड़का जब किसी लड़की को देख कर गाना गाता है, ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’ तो वो प्रेम को एक गंतव्य भी देता है. कि यहां से आगे कोई तलाश नहीं करनी, तुम वैसी ही हो जैसी मुझे चाहिए.

पुरुषों पर गीत नहीं होने के बहुत नुकसान हैं. जैसे कि लड़कियों के पास प्रेम का इजहार करने के लिए सही शब्द नहीं नहीं. यह प्रक्रिया आवर्ती है. साइक्लिक. हिंदी फिल्में लड़कियों को लड़कों को देखने की वो निगाह नहीं देतीं कि जो उनके पास होनी चाहिए. ऐसी भाषा या शब्दकोश है ही नहीं जिसमें लड़कियों के प्यार की जगह हो. यह उनके किसी पुरुष को देखने के नज़रिए को भी परिभाषित करता है. हम जिस बराबरी के समाज की कल्पना करते हैं उसमें प्रेम के इजहार का बराबर का मौका लड़की और लड़के दोनों को मिलना चाहिए. यहां जहां लड़कों के पास गहरे, ‘तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है’ से लेकर ‘लड़की ब्यूटीफुल कर गयी चुल्ल’ है. लड़कियों के पास कुछ नहीं है.

लड़की ब्यूटीफुल में लड़का भी लड़की के बारे में गा रहा है तो बदले में लड़की लड़के के बारे में क्यूं नहीं गाए जो खुद के बारे में गए? वो भी तो कह सकती है कि काली शर्ट में लड़के तू हॉट लगता है, तुझे देखती हूं दिल पर जैसे शॉट लगता है, मतलब कुछ भी ऐसे ही. लड़की, तुम हो ऐसी कि ‘चुल्ल’ कर गई हो, तुमको खुद से कहना जरूरी नहीं है, मैं लड़की ब्यूटीफुल कर गई चुल्ल.

दूसरा नुकसान यह है कि लड़कों को शायद कभी पता नहीं चल पाए कि उन्हें किस नजर से देखा जा रहा है, या कि देखा जाना चाहिए. लड़कों की तारीफ के शब्द कहां हैं? या इस तारीफ का रोमांस कहां है? अगर किसी लड़की को किसी लड़के को जताना है कि वो उसे कितना अच्छा लगता है तो कहां हैं उसके पास शब्द? अब वो कविता की किताब पढ़े, शायरी छाने और वहां भी कम ही चीजें मिलें कि जो लड़कों पर ठीक ठीक बैठती हों. कौन सी लड़की परवीन शाकिर का शेर खोज के लाएगी, ‘धनक धनक मिरी पोरों के ख्वाब कर देगा, वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा’, और इतना मुश्किल शेर सुन कर कौन सा लड़का ख़ुश होगा?

किसी लड़की को अगर लड़का पटाना है तो? लड़के ने एकदम ही कातिल किस्म की ब्लैक शर्ट और जीन्स पहनी है, बाल बेपरवाही से बिखरे हैं, चेहरे पर हद दर्जे की मासूमियत है. लड़की तो चाहेगी कि कोई गीत हो जो गुनगुना सके एक पंक्ति अपने हीरो को देख कर. लेकिन हिंदी फिल्में कहती हैं, लड़की हो, तुम्हें शब्दों से माथापच्ची करने की जरूरत नहीं. तुम बस खूबसूरत दिखो, उतना ही काफी है तुम्हारे लिए. कोई जरूरत नहीं रिश्ते में अपनी ओर से दिमाग लगाने की, यह सब लड़कों का काम है, वो गाएंगे तुम्हारे लिए गीत, तुम उनपर फ़िदा होना, बस. इससे ज्यादा करना है तो उनके लिए खाने का कुछ बना कर ले जाओ, उनके लिए रूमाल काढ़ दो. बस.

जब इश्क बराबरी से होता है तो फिर गानों पर लड़कों का ऐसा एकाधिकार क्यों? लड़कियों के पास होने चाहिए उनके किस्म के गीत. लड़कों को भी तो मालूम होना चाहिए किसी लय में डूबा हुआ स्त्री कंठ जब गुनगुनाता है प्रेम में होते हुए तो कैसे आत्मा तक पहुंचता है सुकून. या कि दिल टूटे में कोई औरत कैसे फुफकारती है तो दुनिया को जहन्नुम में झोंक देना चाहती है. कोई लड़की क्यों नहीं गाए कि जब लड़का उसको इंप्रेस करने के लिए तेज मोटरसाइकिल चलाते आ रहा था और मोड़ पर गिरा था तो उसे तकलीफ हुई थी, लेकिन वो हंसी थी ठठा कर उसके भोलेपन और बेवकूफी पर. या कि लड़के की ब्लैक शर्ट कैसे उसे काला जादू लगती है. कि लड़के का डिंपल ऐसा है कि उसे हंसते देख इश्क में गिर जाते हैं, सब या कि चूमना चाहती है उसे, या कि बारिश में भीगना चाहती है उसके साथ. या कि किसी रोड ट्रिप पर भाग जाना चाहती है दुनिया छोड़ कर उसके साथ. यह सब कुछ गुनगुना कर कहना चाहती है लड़की लेकिन वो गीत किसी ने लिखे नहीं हैं.

कुछ नई शुरुआतें हो रही हैं

नई शुरुआतें हो रही हैं लेकिन अभी और भी लड़कियों को आगे आना पड़ेगा. लिरिक्स लिखने पड़ेंगे ताकि कई और लड़कियों को आवाज मिले. जब स्नेहा खनवलकर जैसी म्यूजिक डारेक्टर वोमनिया लिखती है और धुन में रचती हैं तो अनायास ही कई लड़कियों को एक आवाज मिलती है. एक उलाहना देने का तरीका मिलता है. ‘मांगे मुझौंसा जब हाथ सेकनिया’, जैसी चीज महसूसने के बावजूद ऐसा तीखा मीठा उलाहना रचना हर औरत को नहीं आएगा. या कि इसी फिल्म का, सैय्यां काला रे, काले के दोहराव में बहुत सी उपमाएं गढ़ता है, कव्वे से लेकर मन के काला होने तक.

लड़कियों को वो गीत चाहिए जो उनके माडर्न महबूब के जैसा हो. जो उनका खयाल रखे. जो उनके गुनाहों का बराबर का पार्ट्नर हो. जो फेसबुक पर कभी कभी प्यार का इजहार कर सके. तो क्या बॉलीवुड लड़कियों की ये इल्तिजा सुनेगा?

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi