S M L

#MeToo की भी शिकार होती हैं लड़कियां, क्योंकि समाज उन्हें सिर्फ जज ही करना जानता है

हैशटैग चलाने से कुछ नहीं होता कहने वालों को पहले अपने घर में मां, बहन, बीवी के खिलाफ हुए यौन शोषण को पुलिस में रिपोर्ट करना चाहिए

Updated On: Oct 09, 2018 04:13 PM IST

Rimmi Rimmi

0
#MeToo की भी शिकार होती हैं लड़कियां, क्योंकि समाज उन्हें सिर्फ जज ही करना जानता है

#MeToo का दौर चल रहा है. इस हैशटैग के जरिए कई लड़कियां सोशल मीडिया पर अपने खिलाफ हुए हैरेसमेंट, यौन शोषण के मामलों को लोगों के सामने मुखर तरीके से रख रही हैं. इसमें हर वो लड़की शामिल है जिसने कभी न कभी, किसी न किसी तरीके से अपने खिलाफ शोषण को बर्दाश्त किया, झेला और चुप रही. आज वो आवाज उठा रही हैं.

एक्ट्रेस तनुश्री दत्ता ने इस आवाज का आगाज किया. 10 साल पुराने मामले में अपने खिलाफ हुए शोषण के बारे में बोला. तनुश्री की आवाज ने कई लड़कियों के दबे गुस्से को जगाया. आज आलम ये है कि सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी लड़कियां ही नहीं बल्कि हर लड़की ने अपने खिलाफ हुए शोषण के खिलाफ हल्ला बोल दिया है.

अब लड़कियों ने आवाज उठाई तो हमारे पुरुषों को दर्द तो होगा ही. आखिर औरत होकर पुरुष को कठघरे में खड़ा करने की हिम्मत कैसे कर रही हैं! सब उनसे सबूत मांग रहे हैं. #MeToo को एक सोशल मीडिया का प्रोपगंडा बता रहे. कुछ कह रहे हैं कि हैशटैग चलाने से कुछ नहीं होता, अगर इस हैशटैग के तहत् बोलने वाली लड़कियों के साथ 'सच में' कुछ 'गलत' हुआ तो आखिर वो अब तक क्यों चुप थी? वो पुलिस के पास क्यों नहीं जा रही? जब उनके साथ ये सब हुआ था तब उन्हें करियर में क्या क्या 'फायदे' हुए थे? उस लड़की का खुद का कैरेक्टर कैसा है. वो तो लड़कों के साथ ड्रिंक करती है. घूमने जाती है. किसी लड़के से गले मिल लेती है. फलाना ढिमकाना.

तो मेहरबान कद्रदान सुनिए. आज मैं आपको बताती हूं कि हैशटैग चलाने से क्या फायदा हुआ. इस हैशटैग का फायदा ये हुआ कि जबसे मुझे याद है तबसे ‘मैंने यौन शोषण झेला है’ ये बात कहने की हिम्मत अब जुटा पाई. जब मैं पांच साल की बच्ची थी (क्योंकि तभी से शायद बच्चों को याद रहना शुरू होता है) तब मेरे परिवार के लोगों, मेरे पड़ोसी जो परिवार सरीखे थे उन्होंने मेरा यौन शोषण किया था. या जब मैं पंद्रह साल की थी तब हमारे स्कूल बस का कंडक्टर मुझे गलत ढंग से छूता था. या फिर जब 20 साल की उम्र में पहली बार दिल्ली आई थी तब पहली बार बाइक पर सवार दो लड़कों ने मेरे भैया के सामने मेरा शोषण किया था. या आज जब मैं 30 साल की हो चुकी तब भी मुझसे मिलने वाले कई लोग मेरे शोषण का मौका ढूंढते हैं.

harrasment

आजतक क्यों नहीं बोला?

ये वो बातें हैं जो आजतक या तो मैंने अपनी लड़की दोस्तों के साथ अकेले में कभी शेयर की हैं. और इनमें से कई तो आजतक किसी को पता तक नहीं. लेकिन फिर भी आज मैं किसी का नाम नहीं ले रही क्योंकि अब भी मुझ में इतनी हिम्मत नहीं है कि पूरी दुनिया के सामने चीख चीखकर ये कह सकूं कि इस आदमी ने मेरा शोषण किया था.

कारण पता है आपको महानुभवों कि आखिर मैं क्यों नहीं नाम ले सकती? नहीं? तो सुनिए... क्योंकि मुझे पता है, जैसे ही मैं आज उनके खिलाफ बोलूंगी आप सभी एक लाइन से खड़े होकर मुझसे वही सारे पूछने लगेंगे जो तनुश्री दत्ता से पूछ रहे हैं. मुझसे सबूत मांगने लगेंगे. मुझे कहेंगे कि मैंने तब तो उन सभी चीजों के 'मजे' ले लिए पर अब सब सभी से मेरा 'काम' निकल गया तो 'हैरेसमेंट की नौटंकी' कर रही हूं.

आज मैं जिन पर आरोप लगाऊंगी उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा. चार दिन के बाद वो फिर से अपनी जिंदगी में मस्त हो जाएंगे. न उनकी बीवी, न मां, न बेटा न बेटी उनका बहिष्कार करेंगे. या फिर उन्हें रोज ताने देंगे. न ऑफिस के कलिग और न ही ये समाज उन्हेंं दोषी मानेगा.

लेकिन जिस दिन मैंने अपना मुंह खोल दिया उस दिन से मेरा जीवन नर्क हो जाएगा. खुद मेरा पति, मेरे बच्चे, मेरा मायका, मेरा ससुराल मुझे पीड़िता नहीं बल्कि दोषी ठहरा देगा. रोज मुझे ये याद दिलाएगा कि मेरे साथ कुछ गलत नहीं हुआ था बल्कि मैंने इन्वाइट किया था.

आप में से कई मुझसे सहानुभूति दर्शाएंगे. मेरे साथ खड़े होने का दावा करेंगे. लेकिन उनमें से कई वैसे होंगे जो रेप के खिलाफ किसी कैंडल लाइट प्रोटेस्ट में भी सिर्फ लड़कियों को ताड़ने और उन्हें छूने के एकमात्र मकसद से जाते होंगे.

हिम्मत चाहिए सोशल मीडिया पर भी बोलने के लिए

हां, मैंने तब नहीं बोला क्योंकि मेरे में हिम्मत नहीं थी. हां, मैं आज भी किसी का नाम नहीं लिख रही, क्योंकि मुझ में हिम्मत नहीं है. हां, मैं कल भी नहीं बोलूंगी, क्योंकि मुझमें कल भी ये हिम्मत नहीं आएगी.

protest

लेकिन क्या आपको पता है कि हम लड़कियां जो जमीन-आसमान हर जगह बुलंदियों को छू रही हैं, इस मामले में इतनी डरपोक क्यों हो जाती हैं? क्योंकि हमारे पास इतनी ताकत नहीं है कि समाज से अपनी तरक्की के लिए, अपनी आजादी के लिए, अपनी पहचान के लिए तो लड़ ही रही हैं. उसके साथ-साथ अब खुद को 'पवित्र' साबित करने के लिए भी सबूत इकट्ठा करें. खुद को डिफेंड करने में घंटों बर्बाद करें. आपकी गालियों को, आपके नैरेटिव को इग्नोर करने की ताकत लाएं.

आवाज तो उठाई

तनुश्री दत्ता ने जो आवाज उठाई उसके समर्थन में तो कई अभिनेता अभिनेत्रियां खड़े हैं. लेकिन क्या उनमें से एक ने भी उन आरोपियों का बहिष्कार किया? नहीं ना? करेंगे भी नहीं. क्योंकि हम में से हर किसी को पता होता है कि सामने वाले का सच क्या है, पर अपनी जिंदगी में कोई खलल नहीं डालना चाहता. लड़की ने बात कर ली तो उसे अवेलेबल मान लेने वाली इस भीड़ में कई ऐसे हैं जो पर्दे के पीछे से साथ तो देते हैं, पर जरूरत पड़ने पर साथ छोड़ भी जाते हैं.

दस साल बाद ही सही तनुश्री ने आवाज तो उठाई. ...और देखिए, उसके आवाज उठाते ही लोग उसके कैरेक्टर का सर्टिफिकेट जारी करने लगे. उसके 'खत्म' हो चुके करियर की बात करने लगे. उसकी बॉडी शेमिंग होने लगी. अरे महात्मा कम से कम उस लड़की ने बोला तो सही.

हिम्मत है तो अपनी मां, बहन और पत्नी से बैठकर पूछिएगा कि क्या कभी उनके साथ ऐसा हुआ है. अगर हिम्मत हो तो शांति से जवाब सुनिएगा और फिर उसकी पुलिस रिपोर्ट कराकर सबूत दीजिएगा कि आप सच में हिम्मती हैं.

#MeToo भले ही सोशल मीडिया तक सीमित है. लेकिन इसके जरिए कितनी लड़कियों में हिम्मत आई है और वो जमीन पर उतरी हैं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. मैं बस अब इंतजार में हूं कि ये सोशल मीडिया ट्रेंड हमारे गांवों और दूर दराज इलाकों में रहने वाली महिलाओं तक भी पहुंचे और असली हुंकार हो.

वैसे जिसमें शर्म होगी वो यही देखकर चुल्लू भर पानी ढूंढ लेगा कि उसके फ्रेंड लिस्ट में मौजूद अमूमन हर लड़की ने पिछले साल #MeToo का स्टेटस अपडेट किया था. बिना कुछ बोले, बिना कुछ कहे लड़कियां किसी और की कुंठा का दंश झेलती हैं और किस मानसिक तनाव में रहती हैं, ये बताने के लिए ये स्टेटस ही काफी था.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi