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भारत में #MeToo: यौन हिंसा रोकने के लिए जातिवाद और उत्पीड़न की मिलीजुली समस्या पर फोकस करना चाहिए

यह जाति-आधारित अनुबंध गणराज्य की निर्माण सामग्री है- जातिवादी राजनीति, जातिवादी नौकरशाही, और एक जातिवादी न्यायिक प्रणाली. इस सिस्टम में मानवता, न्याय और यहां तक कि आजादी संविधान से नहीं मिलती है, बल्कि जाति पदानुक्रम में स्थान से मिलती है, जहां कोई रहता है

Updated On: Nov 04, 2018 06:33 PM IST

Suchitra Vijayan

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भारत में #MeToo: यौन हिंसा रोकने के लिए जातिवाद और उत्पीड़न की मिलीजुली समस्या पर फोकस करना चाहिए
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उस वक्त मेरी उम्र 12 साल से ज्यादा नहीं थी, जब मैंने पहली बार आउटलुक पत्रिका के एक पुराने अंक में फूलन देवी के बारे में पढ़ा था.

'वो मुझे एक आदमी से दूसरे आदमी को सौंप रहे थे.' 'ये बोल!' श्री राम चिल्लाया. 'उन्हें बताना कि विक्रम के साथ क्या हुआ. बोल, नीच कुतिया! मान ले कि तूने उसे मारा.'

यह फूलन देवी के शब्द थे, अपनी किताब ‘आई, फूलन देवी’ में डाकू से राजनेता बनी फूलन देवी का अपने गैंगरेप का मुंहजुबानी बयान. बाद के हफ्तों में मैंने जो कुछ पढ़ा, उसे महसूस करने की कोशिश में मैं अपने आप में सिमटती गई. अपने में सिमटने से खाली हुई जगह में कोई डर सा भर गया. सेक्सुअल एब्यूज हर जगह है, फिर भी इस बारे में कोई महिलाओं से बात नहीं करता, हम इसे हमेशा सहज रूप से स्वीकार करने के लिए सामाजिकृत हैं. हम इसे महसूस करते हैं, समझते हैं, और इससे पहले कि यह हमें छुए, हम अपनी छठी इंद्री से इसे आसानी से जान जाते हैं. हम वर्गों, ठप्पों और अपेक्षाओं में फिट होने के लिए खुद को परिवर्तित, रूपांतरित और समायोजित कर लेते हैं. तरल पदार्थ की तरह हम अपने ऊपर होने वाले दमन के अनुरूप खुद को ढालना सीख लेते हैं.

एक दशक बाद, उम्र की तीसरी दहाई में मैंने ज्यादातर गोरे दर्शकों के बीच बैठकर फिल्म को देखा. तब तक 37 साल की उम्र में फूलन देवी की गोली मारकर हत्या की जा चुकी थी. विवाद और आलोचनाएं शांत हो चुके थे, और यह फिल्म दुनिया भर में पुरस्कार और प्रशंसा बटोर कर आगे बढ़ चुकी थी. फिल्म के बाद हुए सवाल-जवाब में एक समाजशास्त्री और एक राजनीतिक वैज्ञानिक के सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें एक बार भी 'जाति' शब्द का जिक्र नहीं आया या यह कि भारत के ग्रामीण और शहरी परिदृश्य में हिंसा में जाति की क्या भूमिका होती है.

इसके बजाय इस अभिजात्य सभा में चर्चा के केंद्र में मुद्दा यह था कि क्या, 'हिंसा हिंसा को जन्म देती है?' 'क्या फूलन देवी का उनसे बलात्कार करने वाले पुरुषों की हत्या करने के साथ ही तय हो गया था कि उनका भी एक दिन यही हश्र होगा.' फूलन देवी के बारे में इस कहानी के केंद्र में दो चीजें थीं, बेहमई के गांव में उनसे गैंगरेप और बाद में बदला लेने के लिए उनका 'सबसे बड़े दुष्कृत्य' की साइट पर लौटना. जहां आरोप है कि उन्होंने 22 पुरुषों को एक लाइन में खड़ा किया और गोली मार दी.

फूलन देवी

फूलन देवी

जीवन और व्यक्तित्व के गलत चित्रण को लेकर फिल्म का विरोध किया था

अपने जिंदा रहते फूलन देवी ने उनके जीवन और व्यक्तित्व के गलत चित्रण को लेकर फिल्म का विरोध किया था. उन्होंने कहा कि फिल्म में उन्हें 'हमेशा रोती-धोती महिला के रूप में दिखाया गया, जिसने अपने जीवन में कभी भी कोई फैसला सोच-समझ कर नहीं लिया.' उन्होंने फिल्म पर पाबंदी लगवाने के लिए संघर्ष किया. अरुंधती राय ने 1996 में लिखा था, 'ताकतवर लोगों के लिए प्राइवेट स्क्रीनिंग आयोजित की गई. लेकिन उन्हें नहीं दिखाई गई.' फिल्म रिलीज होने के बाद की चर्चाओं में, किसी ने भी फूलन देवी के जीवित रहते उनके असल जीवन में हुए बलात्कार पर फिल्म बनाने और उनका रोल निभाने, जिसका उन्होंने खुले तौर पर खंडन और विरोध किया था, की नैतिकता या शुचिता पर बहस नहीं की

फूलन देवी बोल रही थीं, लेकिन हमने कभी नहीं सुना

कोई सहमति नहीं दी गई थी, फिर भी शेखर कपूर को लगा कि उन्हें इस कहानी को फिर से सुनाने का अधिकार है. फिल्म में फूलन देवी की भूमिका निभा रही सीमा बिस्वास ने जब शुरुआत में उस दृश्य को लेकर बेचैनी जताई थी तो शेखर कपूर ने उनसे कहा: 'मैं अपमान की गहराई दिखा रहा हूं, यह सबसे बदसूरत लम्हा है... यह ऐसा होना चाहिए जैसे किसी औरत को तेज रफ्तार बस ने कुचल दिया हो, यह इतना वीभत्स होना चाहिए कि इसे देखने वाले लोग फिर कभी इसे नहीं देखना चाहें.'

शेखर कपूर की प्रतिक्रिया और उनकी नजरों ने हर वो गलत चीज को दर्ज किया जो स्त्री, जाति और यौन हिंसा के बारे में हमारी सोच में है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि खामोशी, नकार और उपेक्षा का मेल किस तरह स्त्री की आवाज को अनसुना कर देता है.

महिलाओं के साथ हमेशा बर्बरता की जाती है, और दलित महिलाओं के साथ सिर्फ इसलिए बर्बरता की जाती है क्योंकि उनका अस्तित्व है. शेखर कपूर जो बात भूल जाते हैं कि वो यह है कि जब भी महिलाओं का दमन किया जाता है- तो यह कभी अचानक नहीं होता. क्रूरता से आनंद प्राप्त करना महिलाओं के खिलाफ हिंसा के तकरीबन सभी कृत्यों का प्रेरक तत्व होता है. यह एक ऐसा कृत्य है जो पितृसत्ता का हिस्सा है, एक महिला शरीर समाज की दर्शक दीर्घा भी है, जहां सबसे क्रूर हिंसा का खेल रचा जाता है, और इसे एक सार्वजनिक खेल बना दिया जाता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

लड़की ने दबंग मुदलियार जाति के युवक की छेड़खानी का विरोध किया था 

23 अक्टूबर को तमिलनाडु में 13 वर्षीय दलित बच्ची राजलक्ष्मी का, उसकी मां चिन्नापोन्नू के सामने, सिर काट दिया गया था क्योंकि उसने इलाके की दबंग मुदलियार जाति के 26 वर्षीय कुमार की छेड़खानी का विरोध किया था. 'कुमार एक हंसिया (धारीदार हथियार) के साथ पहुंचा. उसने उनकी जाति को लेकर गालियां दीं. चिन्नापोन्नू ने अपनी बेटी को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसने राजलक्ष्मी का सिर काट दिया. वो राजलक्ष्मी के सिर को लेकर अपने घर गया, जहां उसकी पत्नी सारदा ने इसे कहीं फेंक आने की सलाह दी.'

अखबारों में रिपोर्ट छपी, राजलक्ष्मी की बर्बर हत्या देखी गई लेकिन स्वीकार नहीं की गई, बोली गई लेकिन सुनी नहीं गई. सिंगर चिनमई की #MeToo स्टोरी को तमिलनाडु में खूब तवज्जो मिली, लेकिन राजलक्ष्मी की स्टोरी को नहीं. यहां तक कि #MeToo की खबरों की रिपोर्टिंग भी रसभरे फूहड़ अंदाज में शर्मिंदा करने तक सीमित रह गई है. हत्यारे कुमार को पहले से ही 'मानसिक रूप से अस्थिर शख्स' के रूप में पेश किया जा रहा है. राजलक्ष्मी की मौत के आसपास यह चुप्पी और असत्य इकलौता अपवाद नहीं है. यह केवल हिंसा है जो बार-बार खुद को दोहराती है.

राजलक्ष्मी की मौत के बाद छपी एक तस्वीर में उसकी मां चिन्नापोन्नू और पिता एक धूलभरी सड़क पर खड़े हैं. एक कैमरे की तरफ देखते दोनों थके हुए हैं. चिन्नापोन्नू झुके हुए और कमजोर दिखते हैं. ट्विटर पर चल रहे एक वीडियो में, तमिल पेपर दिनाकरन के पत्रकार चिन्नापोन्नू से उदंडता से पूछते हैं:

'जब पुलिस ने पहले तुमको बुलाया, तो क्या तुम स्टेशन गए थे? तुमने उन्हें क्यों नहीं बताया कि तुम्हारी बेटी के साथ ऐसा हुआ है.' 'तुम आज क्यों बोल रहे हो?'

अभी भी सदमे में दिख रही चिन्नापोन्नू बोलने की कोशिश करती हैं, पिता कहते हैं कि हमने किया था.

पत्रकार कहते हैं: 'नहीं, नहीं.' 'नहीं, नहीं. इसने तब उन्हें छेड़खानी के बारे में नहीं बताया.'

चिन्नापोन्नू रो पड़ने वाली हैं तभी, स्टूडेंट एक्टिविस्ट वालारमथी दखल देती हैं.

बेटी के सिरकटे शरीर को देखकर मां को एक दिन लग गया सामान्य होने में

'जिस दिन यह पुलिस स्टेशन गईं वहां इन्होंने अपनी बेटी के सिरकटे शरीर को देखा... इन्हें एक दिन लग गया सामान्य होने में. अब वो बात कर सकती हैं. अगर यह आपकी बच्ची होती तो आप क्या करते? आप खड़े नहीं रह पाते, आप मर गए होते... अब यह बोल रही हैं, तो इन्हें सुनिए.'

South Indian Girl Child

प्रतीकात्मक (फोटो: रॉयटर्स)

गायत्री स्पिवाक अपने ऐतिहासिक निबंध 'क्या दमित बोल सकते हैं?' में लिखती हैं, 'और दमित महिला हमेशा की तरह खामोश रहेगी.' महिला कभी गूंगी नहीं होती है. वो कभी खामोश नहीं होती है, वो चिल्लाती है, रोती है और बोलती है. उसे खामोश करने का सबसे आसान तरीका यह है कि उससे सबूत मांग लिया जाए कि पहले साबित करे कि वो इंसान है. भले ही वो हिंसा के बारे में बताने की कोशिश कर रही है, लेकिन हम मांग करते हैं कि पहले वो खुद को सुनने के 'लायक' साबित करे.

यह तर्क अपनी सादगी में ही हिंसक है. हम चिन्नापोन्नू या राजलक्ष्मी को उस हिंसा के प्रमाण के रूप में नहीं देखते, जो उनके साथ हुई है. उनके शब्द जो न्याय चाहते हैं, उन्हें परिभाषित करने के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं होते हैं. हम उनकी जिंदगी के जिंदा अनुभव के लिए भी संदर्भ और टिप्पणियों की मांग करते हैं. हम उन्हें एक पूर्ण इंसान के रूप में देखने से इनकार करते हैं. हम सुनने से इनकार करते हैं. जैसा कि एक्टिविस्ट जेसन जरमियास कहते हैं, 'राजलक्ष्मी 13 वर्ष की थी. उसने कहा नहीं, और वो मारी गई क्योंकि वो वयस्क द्वारा किए गए सेक्सुअल अटैक का विरोध कर रही थी. वो बोली, और आदमी ने बदले में उसे उसकी मां के सामने मार डाला.'

स्थानीय एक्टिविस्ट कौसल्या, जिनके पति शंकर को उनके परिवार द्वारा दलित होने के कारण मार डाला गया था, द वायर से बात करते हुए एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए कहती हैं कि यह एक जातीय और यौन अपराध था, एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं है. महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, खासकर दलित महिलाओं के खिलाफ सत्ता को प्रदर्शित करने का सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य साधन बन गई है. उनके खिलाफ हिंसा की घटनाओं को ना सिर्फ सामान्य माना जाता है, बल्कि समुदाय के मानदंडों में पूरी तरह से स्वीकार्य माना जाता है. यहां हिंसा और जाति एक दूसरे से अपरिभाषित रूप से जुड़ गई हैं. राजनीतिक वैज्ञानिक वसुंधरा सिरनेत अपने लेख 'अच्छा कानून, खराब अमल' में 'खाप पंचायत और कंगारू कोर्ट जैसे गैर-संवैधानिक निकायों के निर्णय' पर सवाल उठाती हैं जो महिलाओं के खिलाफ न्यायेत्तर यौन हिंसा को मान्यता देते हैं.

भारतीय राज्य और इसकी सबसे वंचित आबादी के बीच सामाजिक अनुबंध असमान है

भारतीय राज्य और इसकी सबसे वंचित आबादी के बीच सामाजिक अनुबंध असमान है. जमैका के दार्शनिक चार्ल्स मिल इसे 'नस्लीय अनुबंध' के रूप में इंगित करते हैं. चार्ल्स मिल के विश्लेषण को भारत में लागू करने से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि अमेरिका में नस्ल (रेस) की तरह, जाति (कास्ट) भारतीय राज्य का संयोजक सिद्धांत है.

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यह जाति-आधारित अनुबंध गणराज्य की निर्माण सामग्री है- जातिवादी राजनीति, जातिवादी नौकरशाही, और एक जातिवादी न्यायिक प्रणाली. इस सिस्टम में मानवता, न्याय और यहां तक कि आजादी संविधान से नहीं मिलती है, बल्कि जाति पदानुक्रम में स्थान से मिलती है, जहां कोई रहता है.

उसी वीडियो में छात्र एक्टिविस्ट वालारमथी कहती हैं, 'यह हिंसा पीड़ित पर हिंसा है. आप उस मां से कैसे सवाल कर रहे हैं, जिसने अपनी बेटी की क्रूर हत्या देखी है? अगर आपमें पत्रकारीय नैतिकता नहीं है, तो कम से कम आपकी इंसानियत कहां है?'

वास्तव में हमारी इंसानियत कहां है?

(लेखिका बैरिस्टर-एट-लॉ और द पोलिस प्रोजेक्ट की कार्यकारी निदेशक हैं)

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