S M L

मराठवाड़ा डायरी: खेती के बदतर हालात से बढ़ गई है कुंवारे लड़कों की संख्या

महाराष्ट्र के गांवों में खेती की बुरी हालत के चलते अब 35 बरस की उम्र के पार भी लड़के कुंवारे मिलते हैं

Updated On: Aug 25, 2018 09:39 AM IST

Parth MN

0
मराठवाड़ा डायरी: खेती के बदतर हालात से बढ़ गई है कुंवारे लड़कों की संख्या
Loading...

(संपादकीय टिप्पणी: एम एन पार्थ आजकल महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके में घूम रहे हैं. पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया की ओर से उन्हें एक फेलोशिप मिली है, जिसके तहत वे इस इलाके में कृषि संबंधी मुद्दों का वृत्तांत लिख रहे हैं. जैसे-जैसे वे परी यानी पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया के लिए रिपोर्ट देते जाएंगे, हम उन्हें जस का तस फर्स्टपोस्ट के पाठकों के लिए छापते जाएंगे.)

तीन साल के भगीरथ प्रयासों के बाद पंढ़ारीनाथ और कौशल्या शेल्के ने अपने बेटे रंजीत की शादी इस साल फरवरी में तय कर दी थी. 52 बरस के पंढ़ारीनाथ कहते हैं, 'अस्वीकार किए जाने से उपजे अपमान को मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता. जो पहला सवाल लड़की वाले पूछते थे, वो था कि ‘खेती के अलावा खाने-कमाने का आपका और कोई साधन है ?’

26 साल के रंजीत, महाराष्ट्र के उस्मानाबाद ज़िले के गांव खमसवाडी में खेती का काम करते हैं और परिवार के चार एकड़ खेतों में सोयाबीन, ग्राम और ज्वार उगाते हैं. पहले रंजीत ने भी नौकरी की कोशिश की, लेकिन जब सफल नहीं हुए तो खेती करने लगे, जो अब उनके परिवार की कमाई का एकमात्र ज़रिया है.

खेतों पर काम करने वाली उनकी मां कौशल्या कहती हैं, 'किसान से कोई अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता. और अजीब सी बात ये कि किसान खुद ऐसा कर रहे हैं. बेशक उन्हें मोटे ब्याज़ पर उधार लेकर दहेज़ देना पड़े, लेकिन वे बेटी की शादी उसी से करते हैं, जो नौकरी करता हो. लेकिन वे सिर्फ खेती-किसानी पर आधारित परिवारों में रिश्ता नहीं करना चाहते.' नतीजतन जहां गांवों में कम उम्र में शादी हो जाती थी, महाराष्ट्र के इन गांवों में अब 30 बरस की उम्र के पार भी लड़के कुंवारे मिलते हैं.

कर्ज से डूबे परिवार में कोई नहीं ब्याहता

इस साल फरवरी में कौशल्या और पंढारीनाथ ने अपने बेटे रंजीत की शादी जिस लड़की से तय की, वह पास ही के गांव के एक किसान परिवार की पांचवीं बेटी है. कौशल्या कहती हैं, 'अपनी चार बेटियों की शादी करते-करते उन्होंने इतना उधार ले लिया है कि अब वे पांचवी बेटी की शादी के लिए किसी से एक पैसा उधार मांगने लायक नहीं रहे. इसलिए हमने भी उनसे कहा कि हमें आपकी बेटी के सिवाय कुछ नहीं चाहिए. हम हताश थे और उनके पास भी कोई चारा नहीं था. और ये रिश्ता काफी अच्छा साबित हुआ. लेकिन मुझे शंका है कि मेरे छोटे बेटे की शादी शायद ही हो पाए....'

पंढ़ारीनाथ कहते हैं, 'हालांकि हम काफी मुश्किलों से गुज़रे, लेकिन मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं देता क्योंकि अगर मेरी भी बेटी होती, तो शायद मैं भी यही करता. सिर्फ एक किसान ही जानता है कि खेती पर आश्रित परिवार की दिक्कतें क्या होती हैं. फसल अच्छी हुई तो बाज़ार में फसलों के दाम गिर जाते हैं. दाम ऊपर गए, तो मॉनसून दगा दे जाता है. बैंक किसानों को बड़े तिरस्कृत भाव से देखते हैं. लिहाज़ा हर किसान पर कर्ज़ लदा है. आखिर कोई क्यों चाहेगा कि उसकी बेटी कर्ज़ में डूबे किसी परिवार में ब्याही जाए?'

किसानों के लिए बस एक ही चीज निश्चिति है- अनिश्चितता

खमसवाडी गांव से 70 किलोमीटर दूर, बीड ज़िले के अंबेजोगई तालुका में गिरवली गांव की भी तस्वीर यही है. यहां के निवासी दिगंबर झिरमिले कहते हैं, 'मेरी 19 साल की एक बेटी है. दो साल बाद मैं भी उसके लिए कोई लड़का देखना शुरू करूंगा. और मैंने तय किया है कि किसी किसान से अपनी बेटी की शादी नहीं करूंगा.'

दिगंबप झिरमिले

दिगंबप झिरमिले

44 बरस के दिगंबर दो एकड़ की खेती में सोयाबीन उगाते हैं. साथ ही दूसरों के खेतों में बतौर मजदूर काम भी करते हैं. दो लाख का कर्ज़ पहले से ही उनके सिर पर है, लेकिन बेटी की शादी के लिए ज़रूरत हुई तो वे और कर्ज़ लेने की सोच रहे हैं. वे कहते हैं, 'कर्ज़ बढ़ भी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. कम से कम मेरी बेटी को खेती से होने वाली दिक्कतें तो नहीं होंगी. किसी किसान से शादी कर मैं पैसे तो बचा लूंगा, लेकिन बेटी को ताउम्र ग़रीबी में नहीं धकेल सकता. अगर उसका पति 15 हज़ार रुपए महीना भी कमाएगा, तो कम से कम हर महीने इतना पैसा घर में आना तो तय है. लेकिन किसान के घर होते हुए आप ये सारा गणित नहीं लगा सकते, क्योंकि अगर आप किसान हैं, तो बस एक ही बात निश्चित है और वह है अनिश्चितता.'

किसानों के घर अपनी लड़कियों की शादी करने में इस कोताही से गिरवली में संजय आप्टे जैसे शादी कराने वाले एजेंटों के बुरे दिन आ गए हैं. आप्टे कहते हैं, 'बड़ी कोशिशों के बाद हाल ही में मैंने एक 33 साल के लड़के की शादी किसी तरह तय करवाई. मैं उसका नाम आपको नहीं बताउंगा, क्योंकि उसकी उम्र दरअसल 37 साल है.'

छल-प्रपंच करके भी होती है शादी

आप्टे का कहना है शादी के लिए दूसरी तरह के भी छल-प्रपंच इस मामले में खूब होते हैं. उनका कहना है, 'मैंने ऐसे मामले देखे हैं, जिसमे लड़कों ने झूठ बोला कि वे शहर में नौकरी कर रहे हैं और शादी के लिए नौकरी के झूठे प्रमाणपत्र भी दे डाले. शादी के बाद झूठ का पता चलता है. उम्र के बारे में झूठ बोलना तो बेईमानी है, लेकिन नौकरी के बारे में झूठ बोलना तो किसी महिला की ज़िंदगी तबाह कर देने के बराबर है.'

आप्टे कहते हैं कि कुछ मामलों में तो पिछले दो सालों से ऐसे लड़कों के लिए दुल्हनें तलाश कर रहे हैं, जो खेती करने वाले किसान हैं और खेती ही उनके खाने-पीने का ज़रिया है. वे कहते हैं, 'पहले जब दूल्हे खोजे जाते थे तो सवाल पूछा जाता था कि दहेज़ कितना लेंगे या फिर लड़के का परिवार कैसा है. अब सिर्फ एक सवाल पूछा जाता है कि लड़के का जीवनयापन खेती पर ही तो निर्भर नहीं करता?'

राधा शिंदे का अनुभव कुछ ऐसा ही है. तीन साल पहले उनकी शादी अंबेजोगई तालुका के मुडेगांव में एक ऐसे परिवार में हुई, जहां कृषि ही जीवनयापन का आधार था. वे कहती हैं, 'मेरे मां-बाप ने दो साल मेरी शादी खोजी. कोशिश यही थी कि किसी किसान से शादी न की जाए. मेरे पति के परिवार की 18 एकड़ खेती है और मेरे सास-ससुर उसकी देखरेख करते हैं. मेरे पति खेती नहीं करते. शादी होते ही मेरे पति ने लातूर में एक जूलरी की दुकान खोली. मेरे मां-बाप शादी के लिए तभी तैयार हुए थे, जब मेरे होने वाले पति ने उन्हें दुकान खोलने की अपनी योजना पहले बता दी और वे संतुष्ट हो गए. मेरे गांव में कुछ लड़के ऐसे भी हैं, जिनकी शादी मेरे ख्याल से कभी नहीं होगी. खेती के चक्कर में कर्ज़ तो बढ़ा ही, शादी के लिए लगातार रिजेक्ट होते जाने से उनमें कुंठा भी बहुत बढ़ी है.'

हालांकि दुल्हनों की लंबी खोज कई किसान परिवारों में अब भी जारी है, ज़्यादातर लोग इस बारे में खुलकर बोलना नहीं चाहते. जब इस बारे में कोई सवाल करे, तो लड़के झेंप जाते हैं. 26 बरस के संदीप बिदवे, जिनके पास 20 एकड़ खेती है, कहते हैं, 'कोई भी नहीं बताएगा कि वह शादी के लिए कई बार रिजेक्ट हो चुका है, लेकिन सच्चाई यही है.'

संदीप बिदवे (दाएं)

संदीप बिदवे (दाएं)

'खेती से इज्जत नहीं मिलती'

बिदवे खुद भी कुंवारे हैं और कहते हैं, 'खेती से इज़्ज़्त नहीं मिलती. लेकिन मुझे ये मानने में शर्म नहीं आती. विडंबना देखिए कि दस हज़ार महीने की पगार पाने वालों की शादियां हो रही हैं, लेकिन 10 एकड़ खेती के काश्तकार शादी के लिए संघर्ष कर रहे है.'

बिदवे आगे कहते हैं, 'लड़की का पिता पूछता है कि आप काम क्या करते हैं, और जैसे ही उसे जवाब मिलता है कि लड़का खेती करता है, लड़की का पिता कहता है चलो ठीक है, मैं बाद में आपको बताऊंगा. अब अगर उसे कोई बढ़िया रिश्ता नहीं मिलता, तो वह महीनों बाद फिर आता है क्योंकि उनको पता है कि हम अब भी कुंवारे ही बैठे होंगे.'

संजय बिदवे से जब मैं बात कर रहा था, पास के गांव से एक पुलिस वाला आ गया. उसने बताया कि तीन साल पहले जब उसकी शादी हुई थी, तो उसके पिता ने दहेज़ में 15 लाख रुपए की मांग की थी, जो उन्हें मिले भी. उसने बताया, 'मेरे पास तो एक सरकारी नौकरी है. इसलिए शादी बढ़िया हो गई. लेकिन मेरा भाई खेती करता है, और अब जब हम उसकी शादी के लिए रिश्ता ढूंढ़ रहे हैं, आप यकीन नहीं कर सकते कि मेरे पिता के रुख में अब कितना बदलाव आ गया है.'

45 बरस के बाबा साहब जाधव भी रुख में इस बदलाव को सच्चाई मानते हैं. उनके पास भी 6 एकड़ खेत हैं और 27 साल का उनका बेटा अभी कुंवारा है. जाधव कहते हैं, 'उसे शादी के लिए कई बार रिजेक्ट किया गया. कुछ दिन पहले मैं उसे लेकर तालुके में लेकर गया था, जहां शादी के लिए सार्वजनिक तौर पर कई जोड़ों को आपसे में मिलना था, जिससे वे जीवनसाथी चुन सकें. दो लड़कियों से बात करने के बाद ही मैं वापस लौट आया. वहां लड़कियों से पूछा गया कि कैसे लड़के से वे शादी करना पसंद करेंगी. दोनों लड़कियों ने कहा, किसान को छोड़ कर किसी से भी.'

(यह लेख 20 अगस्त, 2018 को People's Archive of Rural India में पब्लिश हुआ था)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi