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कितने प्रकार का होता है फेमिनिज़्म, कौन से फेमिनिस्ट हैं आप?

कोई भी चीज़ एक बार में मुकम्मल नहीं होती. इसी तरह फेमिनिज़्म में भी कई अलग-अलग दौर आए

Updated On: Jun 24, 2018 09:10 AM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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कितने प्रकार का होता है फेमिनिज़्म, कौन से फेमिनिस्ट हैं आप?

कुछ ही दिन पहले क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान ने कहा कि 'फेमिनिज़्म' के चलते मातृत्व का महत्व कम हो रहा है. इसके बाद उनके बयान पर भारत सहित दुनिया भर की महिलाओं की तीखी प्रतिक्रिया आई. इससे पहले भी कई सेलेब्रिटी फेमिनिज़्म से जुड़े बयान दे चुके हैं. इनको लेकर तमाम प्रतिक्रियाएं भी आई हैं.

आलिया भट्ट ने जब कहा था कि वो फेमिनिस्ट नहीं हैं तो, उन्हें भी ट्रोल किया गया था. ताजा रिलीज़ फिल्म 'वीरे दी वेडिंग' में फेमिनिज़्म और लैंगिक समानता होने न होने की भी लंबी बहस चली. इन सबके बीच फेमिनिज़्म को लेकर कई मिथक और धारणाएं भी हैं. मसलन कई लोग पूछते हैं कि क्या कोई पुरुष भी फेमिनिस्ट हो सकता है क्या? या फेमिनिज़्म क्या महिलाओं के सिगरेट-शराब पीने का नाम है, फेमिनिस्ट महिलाएं शादी नहीं करती हैं? सेक्स और पीरियड पर लिखकर ही फेमिनिस्ट बना जा सकता है?

फेमिनिज़्म से जुड़ी बहस में इस तरह की दुविधाएं अक्सर छूट जाती हैं. जैसे भारत में सेक्स एजुकेशन का कोई ढांचा नहीं है, बस एक उम्र के बाद आपको ये ज्ञान प्राप्त हो गया होगा मान लिया जाता है. अगर आपने साहित्य पढ़ा है, सिनेमा और कला में रुचि रखते हैं तो मान लेते हैं कि फेमिनिज़्म के बारे में तो आपको पता ही होगा. मगर फेमिनिज़्म एक 'अंब्रेला टर्म' है. मतलब इस छाते के नीचे काफी कुछ समाया हुआ है. जैसे मुसलमान को सिर्फ मुसलमान कहने से नहीं होता. शिया, सुन्नी, वहाबी और सूफी मुसलमान होते हुए भी एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं. एक ब्राह्मण और एक दलित के हिंदू होने में जमीन-आसमान का अंतर है.

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गौर करिए कि यहां फेमिनिज़्म के लिए धर्म से जुड़े उदाहरण जानबूझ कर दिए गए हैं. सोशल मीडिया की बहस और ट्रोलिंग के बीच फेमिनिज़्म का एक पक्ष किसी धर्म की तरह ही हो चुका है. लोगों ने इससे जुड़ी किताबों को पढ़ा समझा नहीं है, इसकी बुराई करने से इसे मानने वाले आहत हो जाते हैं. इसे न मानने वाले इसके अनुयायियों का बिना जाने समझे ही मजाक उड़ाते हैं. खास तौर पर हिंदी समाज में फेमिनिज़्म को लेकर होने वाली बहस इतनी तीखी है कि अक्सर लोग इससे जुड़े सवाल पूछने से डरते हैं. चलिए फेमिनिज़्म से जुड़े मूल सवालों और मिथकों को समझने की कोशिश करते हैं.

लहर दर लहर आता फेमिनिज़्म

कोई भी चीज़ एक बार में मुकम्मल नहीं होती. इसी तरह फेमिनिज़्म में भी कई अलग-अलग दौर आए. 1837 में फ्रेंच फिलॉस्फर चार्ल्स फोरियर ने सबसे पहले फेमिनिज़्म शब्द का इस्तेमाल किया. हर बार फेमिनिस्ट आंदोलन में महिलाओं ने अलग-अलग मांगे रखीं, आंदोलन किए. इनको वेव यानी लहर कहा गया. चूंकि दुनिया भर के अलग-अलग समाज में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग हैं तो एक ही जगह में अलग-अलग वेव्स चलती दिख सकती हैं.

इन वेव्स में जो मांगें हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि कौन किस वेव का फेमिनिस्ट है. ये भी हो सकता है कि किसी एक वेव के फेमिनिस्ट को दूसरी वेव के फेमिनिस्ट की सारी मांगे पसंद न आएं. या एक वेव के फेमिनिस्ट दूसरी वेव के फेमिनिस्ट को नीची निगाह से देख सकते हैं. लेकिन हर वेव के फेमिनिस्ट फेमिनिस्ट ही हैं. आप सहमत हों न हों.

Sri Lankan women hold up placards during a march against the abuse and violation of women to mark "International Women's Day" in Colombo, Sri Lanka March 5, 2018. REUTERS/Dinuka Liyanawatte - RC1205B609F0

समाजशास्त्रियों के अनुसार फेमिनिज़्म की पहली लहर 1830 से 1920 तक चली. इसमें महिलाओं ने कानूनी और सामाजिक बराबरी की मांग उठाई. दूसरी लहर 1960 में आई जिसमें राजनीतिक समानता की बात उठाई गई. इसके साथ-साथ इसमें जेंडर और सेक्सुअलटी में महिलाओं के प्रति बने हुए दुराग्रहों पर सवाल उठाए. इसके बाद फेमिनिज़्म की तीसरी और सबसे चर्चित लहर आई. ये प्रतिक्रियावादी थी. 1992 में लिखे अपने एक आर्टिकल में रिबेका वॉकर ने कहा कि सारी महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें. पुरुषों के साथ खाना न खाएं, उनके साथ संबंध न बनाएं, जब तक कि महिलाओं को उनके जीवन और शरीर से जुड़े अधिकार न मिले. इसी लेख में पहली बार तीसरी लहर का जिक्र हुआ.

तीसरी लहर में फेमिनिज़्म में कई और चीज़ें शामिल हुईं. मसलन अगर कोई अश्वेत महिला है तो वो किसी श्वेत महिला की तुलना में अधिक प्रताड़ित हो सकती है. जाति, धार्मिक रूढ़िवाद, मजदूर अधिकारों की लड़ाई में भी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई शामिल है.

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तीसरी लहर के फेमिनिज़्म से ही फेमिनिज़्म को फैले वर्तमान विवादों की नींव पड़ी. तीसरी वेव में रैप, पंक और हिप-हॉप के साथ शुरू हुआ. अब राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ने वाली दूसरी लहर की फेमिनिस्ट अपनी लड़कियों को 'बिगड़ने' नहीं देना चाहती थीं. आज के भारत में आपको अक्सर बराबरी के अधिकार बनाम शारीरिक अधिकारों वाले फेमिनिज़्म की बहस होती मिल जाएगी.

समय के साथ तीसरी लहर की फेमिनिस्ट ने रेप, शादी, जन्म देने के अधिकार और ऐबॉर्शन जैसे मुद्दों से लड़ने के लिए सारी बहस को 'वेजाइना' केंद्रित बनाया. 'वेजाइना मोनोलॉग' जैसे अति चर्चित नाटक बने. इस वेव की आलोचना में कहा गया कि ये असल में महज अमेरिकी फेमिनिज़्म है. इसने मुश्किल से मिले राजनीतिक अधिकारों को हल्के में ले लिया. ये सिर्फ जवान लड़कियों तक सीमित है.

चौथी लहर और फेमिनिज़्म से जुड़ी अमरीकी भ्रांतियां

इन तीन लहरों के बाद एक चौथी लहर भी आई. ये 2012 में शुरू हुई और फिलहाल चल रही है. इसमें सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ब्लॉग) के जरिए कैंपेन करने वालों को शामिल किया गया. 2012 का निर्भया कांड से लेकर 2017 का #metoo कैंपेन इसका हिस्सा है.

फेमिनिज़्म को लेकर कई भ्रांतियां हैं. न सिर्फ इसका विरोध करने वालों में, बल्कि खुद को फेमिनिस्ट कहने वालों में. सबसे पहली भ्रांति पश्चिम को लेकर है. फेमिनिज़्म के नाम पर ऐसा लगता है कि इस्लामिक और तीसरी दुनिया के देशों में ही महिलाओं को लेकर अत्याचार हैं. यूरोप और अमेरिका जन्नत हैं. कुछ आंकड़ों पर नजर डालिए.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

यूनाइटेड किंगडम में एक लाख की आबादी पर 36.44 बलात्कार होते हैं. अमेरिका में ये 35.85 है. फ्रांस में ये आंकड़ा 17.13 है. जबकि भारत में 5.7 प्रतिशत.

अमेरिका में मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) दुनिया के किसी भी औद्योगिक देश से कम है. अमेरिका 12 हफ्ते की अनपेड लीव ही देता है. अमेरिका मां बनने पर करियर में काफी पीछे हो जाना आम बात है. 2008 में समान अनुभव और योग्यता वाली महिलाएं मां बनने के बाद वापस आने पर अमेरिका में पुरुषों के 70 प्रतिशत वेतन तक ही पहुंच पाती थीं. भारत में 26 हफ्ते की पेड मैटरनिटी लीव का नियम है. हालांकि इसमें एक समस्या है. कंपनी को सारा खर्च उठाना पड़ता है साथ ही शायद सरकार मानती है कि बच्चे पालने में पुरुषों का कोई योगदान नहीं है. इसलिए पिता बनने पर पुरुष को कोई सुविधा नहीं मिलती.

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अमेरिकी मीडिया ने साथ ही तीसरी वेव के फेमिनिज़्म को लंबे समय से नकारा है. 1980 के दशक के अंत से पोस्ट फेमिनिज़्म शब्द का इस्तेमाल किया गया. 1998 में टाइम मैग्ज़ीन ने 'फेमिनिज़्म इज़ डेड' नाम से कवर स्टोरी की.

पुरुषों के बीच फैले भ्रम

फेमिनिज़्म को लेकर सबसे बड़ा सवाल पूछा जाता है कि क्या कोई आदमी फेमिनिस्ट हो सकता है? इसका जवाब फिर से एक बार धार्मिक उदाहरण से दिया जा सकता है. चोरी करना, किसी को मारना. बेगुनाह को तकलीफ देना आदि गलत है, ये बातें आपको इस्लाम, बौद्ध, हिंदू हर धर्म में मिल जाएंगी. अगर आप ऐसा करते हैं तो आप हिंदू मुसलमान, बौद्ध या ईसाई कुछ भी हो सकते हैं. लेकिन किसी की मदद करने के लिए आपका किसी धर्म को मानना जरूरी नहीं है. इसी तरह अगर आप मानते हैं कि स्त्री पुरुषों को बराबर वेतन मिलना चाहिए, उनको ज़िम्मेदारी देने में जेंडर की असमानता नहीं होनी चाहिए. शादी का अर्थ पत्नी का मालिक बनना नहीं है, धर्म में महिलाओं को लेकर जो रूढ़िवादी बातें लिखीं हैं वो गलत हैं तो आप एक फेमिनिस्ट हैं. अगर आप खुद को फेमिनिस्ट नहीं मानते हैं मगर इन बातों में विश्वास करते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

अलग-अलग तरह के फेमिनिस्ट

वेव के अलावा भी फेमिनिस्ट कई तरह के होते हैं. लिबरल फेमिनिस्ट जेंडर की समानता की बात करते हैं. रेडिकल फेमिनिस्ट मानते हैं कि पितृसत्ता ही हर बुराई की जड़ है. इसे बदलने के लिए पूरे समाज का ढांचा बदलना पड़ेगा. बिना इसके सही बदलाव नहीं आ सकता. रेडिकल फेमिनिस्ट भी कई हिस्सों में बंट जाते हैं. कल्चरल फेमिनिस्ट का मानना है कि महिलाएं पुरुषों से श्रेष्ठ हैं. वो मनोवैज्ञानिक रुप से बेहतर हैं. इसलिए समाज में बेहतर सामंजस्य के लिए मर्दानगी के विचार को पीछे छोड़ना चाहिए.

इकोफेमिनस्ट मानते हैं कि प्रकृति को बर्बाद करने और महिलाओं को दबाने के पीछे एक जैसी मानसिकता काम करती है. सेप्रेटिस्ट फेमिनिस्ट मानते हैं कि पुरुष कभी स्त्री को बराबरी दे ही नहीं सकता है. इसलिए दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं होना चाहिए. वहीं आई फेमिनिस्ट का मानना है कि हर कोई अलग होता है, इसलिए हर किसी को अपना रास्ता चुनने का हक होना चाहिए. इसके अलावा मार्क्सिस्ट फेमिनिस्ट भी हैं. भारत जैसे गुलाम रहे देशों में पोस्ट कोलोनियल फेमेनिस्ट भी हैं, जिन्हें लगता है कि गुलामी के दौर से पहले सब सही था. एशियन अमेरिकन, ब्लैक फेमिनिस्ट भी हैं.

आप पूरे फेमिनिस्ट आंदोलन के किसी भी चरण से खुद को जोड़ें, किसी भी तरह के फेमिनिस्ट हों, तय है कि समाज में पुरुष और महिला में जेंडर स्तर पर बराबरी नहीं है. और किसी भी असमानता को खत्म करने का तरीका उसे पलटना नहीं उसे बराबरी पर लाकर निष्क्रिय करना होता है.

(लेखक स्वतंत्र तौर पर लेखन का कार्य करते हैं)

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