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पौधों से भी मिल सकते हैं विटामिन सप्लीमेंट्स, निरीह जानवरों की हत्या क्यों?

जहां तक संभव हो सके, हमें भोजन सामग्री को उनके मूल रूप में खाना चाहिए. ऐसा करने में कहीं ज्यादा समझदारी है, साथ ही इसमें सेहत का फायदा तो है ही

Maneka Gandhi Maneka Gandhi Updated On: Jan 12, 2018 06:30 PM IST

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पौधों से भी मिल सकते हैं विटामिन सप्लीमेंट्स, निरीह जानवरों की हत्या क्यों?

हर जीवित प्राणि को विटामिन्स की जरूरत होती है. ये सूक्ष्म पोषक-तत्व हैं और ये भोजन के जरिए हासिल होने चाहिए. अगर आप पहले से ही सेहतमंद हैं तो विटामिन की अतिरिक्त खुराक लेने का आपको कोई फायदा नहीं. लेकिन अगर आप में किसी विटामिन की कमी है तो आपको पूरक आहार के तौर पर इसकी जरूरत होगी ताकि आपकी कोशिकाएं और उत्तक(टिश्यू) उचित तरीके से बढ़ सकें.

विटामिन्स शरीर में रसायनिक प्रक्रियाओं को मुमकिन बनाते हैं. इन रसायनिक प्रक्रियाओं के कारण ही अन्य चीजों के साथ-साथ त्वचा, हड्डी तथा मांसपेशियों का निर्माण होता है. अगर आपके शरीर में एक या एक से ज्यादा विटामिन्स की गंभीर कमी है तो आपको इस कमी के कारण रोग लग सकते हैं. विटामिन्स की हल्की सी कमी भी स्थायी नुकसान का कारण बन सकती है. विटामिन्स की कमी के कारण होने वाले कुछ जाने-पहचाने रोगों के नाम हैं- बेरीबेरी, पेलेग्रा, स्कर्वी तथा रिकेट्स.

साल 1910 में जापान के वैज्ञानिक उमातारो सुजुकी ने विटामिन बी 1(थियामिन) की खोज की. यह चावल की भूसी(राइस ब्रैन) में होता है. साल 1913 में विटामिन ए(रेटिनॉल) का पता चला और कॉड लीवर ऑयल को इसकी प्राप्ति का स्रोत माना गया. 1920 और 1948 के बीच बाकी अन्य सारे विटामिन्स भी अलग कर लिए गये. विटामिन बी 12(कोबालामिन) का पता सबसे बाद में चला. इसका स्रोत है- जिगर, अंडा तथा अन्य जंतु-उत्पाद.

उमातारो सुजुकी (फोटो: विकीपीडिया से साभार)

उमातारो सुजुकी (फोटो: विकीपीडिया से साभार)

1930 के दशक में पहली बार व्यावसायिक तौर पर खमीर से निकाले गए विटामिन बी कॉम्प्लेक्स तथा सेमी-सिंथेटिक विटामिन सी सप्लीमेंट टेब्लेट्स की बिक्री शुरू हुई. इसके बाद से आज तक विटामिन्स और मल्टी-विटामिन्स का उपभोग बहुत से परिवारों में आम चलन बन चुका है. अभी तक कुल तेरह विटामिन्स की पहचान हुई है और इनमें से प्रत्येक का शरीर में अलग-अलग काम है. कुछ विटामिन एंटी-ऑक्सिडेन्ट का काम करते हैं तो कुछ, खासकर बी ग्रुप वाले, एन्जाइम्स के काम करने में सहायक होते हैं.

विटामिन्स का वर्गीकरण इस रूप में किया गया है- ए, बी ( जिसमें बी1 थियामिन, बी2 राइबोफल्वेविन, बी3 नियासिन, बी5, बी6-पाइरिडोक्सिन, बी7 बायोटिन, बी9, बी12 कोबालामिन शामिल है), सी, डी, ई तथा के. चूंकि ये पूरक आहार हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं इसलिए यह जानना जरूरी है कि आखिर इन्हें हासिल कहां से किया जाता है. बी ग्रुप में शामिल विटामिन्स की पैकेजिंग पर अलग-अलग नाम जैसे थियामिन, राइबोफल्वेविन, नियासिन, पैन्टोथेनिक एसिड, बायोटिन, विटामिन बी-6, विटामिन बी-12 तथा फोलेट लिखे मिलते हैं.

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भारतीय लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि बहुत से विटामिन्स जानवरों से हासिल होते हैं और इन्हें शाकाहार कत्तई नहीं कहा जा सकता. उत्पादों के ऊपर लिखे ब्यौरे अक्सर भरोसे के काबिल नहीं होते. कानून में कहा गया है कि वस्तुओं का निर्माता जानकारी दे कि उसका उत्पाद किन-किन चीजों को मिलाकर बना है. लेकिन निर्माता के लिए यह बताना जरूरी नहीं कि उत्पाद के निर्माण में लगी चीजें किन स्रोतों से हासिल की गई हैं. सो, बहुत से विटामिन्स सप्लीमेंट्स शाकाहार माने जाने वाले स्रोतों से नहीं बने होते.

आप इन विटामिन्स का उपभोग जारी रखें या ना रखें या आपकी निजी पसंद का मामला है लेकिन आपको इन विटामिन्स के उन तत्वों का पता होना चाहिए जो जानवरों से हासिल किए जाते हैं.

विटामिन्स की टिकिया या कैप्सूल्स में अमूमन एडिटिव्स होते हैं. ये या तो उत्पादन-प्रक्रिया में सहायक होते हैं या फिर शरीर में विटामिन्स के पाचन में मददगार होते हैं. नीचे ऐसे कुछ एडिटिव्स का जिक्र किया जा रहा है-

विटामिन्स सप्लीमेंट्स में धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाने वाला जंतु-तत्व है जिलेटिन. ज्यादातर कैप्सूल्स के खोखे जिलेटिन से बने होते हैं और इसका इस्तेमाल टेब्लेट्स की कोटिंग तथा फिलिंग में भी होता है. जिलेटिन सुअर, गाय तथा बकरी के खुर, पेट तथा अन्य जगहों के उत्तकों(टिश्यू) की परत को उबालकर निकाला जाता है.

विटामिन सप्लीमेंट्स की कोटिंग के फीलर्स तथा लुब्रिकेन्टस् में इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य तत्व हैं मैग्निशियम स्टियरेट तथा कैप्रिलिक एसिड. मैग्निशियम स्टियरेट स्टियरिक एसिड से निकाला जाता है. स्टियरिक एसिड एक वसीय अम्ल है और यह सुअर, मुर्ग, गाय, मछली, दूध तथा मक्खन में होता है. कैप्रिलिक एसिड बकरी, गाय तथा भेड़ के दूध से हासिल होता है.

आकर्षक दिखने के लिए बहुत से टैब्लेट्स को रंगीन बनाया जाता है. ऐसे अनेक रंग जंतुओं से हासिल उत्पादों से बनाए जाते हैं. खाद्य-पदार्थों को लाल बनाने के लिए अक्सर एक डाइ या कह लें रंग का इस्तेमाल होता है. यह डाइ कारमाइन से बनता है जो झींगुर सरीखे एक कीड़े की मृत देह से हासिल किया जाता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

विटामिन डी के निर्माण में लैनोलिन का इस्तेमाल होता है. यह भी जानवरों से हासिल होता है. जिन जानवरों से ऊन मिलता है उन्हीं से लैनोलिन हासिल किया जाता है. इसमें चूंकि छुपे तौर पर मर्करी मौजूद होता है, सो यह खतरनाक हो सकता है. सिवार(एल्गी) से भी विटामिन डी3 बनाई जाती है, सो शाकाहारी लोगों के लिए यह एक विकल्प हो सकता है. या फिर अच्छा है कि विटामिन डी3 लेने की जगह आप कुछ देर सूरज की रोशनी में खड़े रहें.

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एक और प्रचलित स्रोत कॉड ऑयल लीवर है. यह विटामिन ए तथा विटामिन डी के स्रोत के रूप में इस्तेमाल होता है. कॉड फिश के लीवर से हासिल तेल से इसे निकाला जाता है. विटामिन बी 12(कोबालामिन) भेड़ के मांस, वील, बीफ, टर्की, मछली के अंडे, केकड़े के मांस आदि से बनाया जाता है. इसी तरह विटामिन बी2, बी3, बी5, बी6 तथा बी7 भी बनाए जाते हैं.

ओमेगा-3 सप्लीमेंटस् के निर्माण में मछली, मछली के तेल, अंडे, मांस आदि से बने उत्पादों का व्यवहार होता है.

विटामिन्स के पोषक-तत्वों के पाचन-अवशोषण के लिए उनमें डियोडेनम का इस्तेमाल होता है. यह गाय और सुअर की आंत से निकाला जाता है.

पाचन क्रिया में मददगार एन्जाइम के निर्माण में लाइपेज का इस्तेमाल होता है. यह भेड़ और बछड़े की जीभ से निकाला जाता है. पाचन-क्रिया में मददगार एन्जाइम के तौर पर कभी-कभी पेप्सिन का भी व्यवहार होता है जो सुअर के पेट की ऊपरी परत से निकाला जाता है. कुछ विटामिन सप्लीमेंट्स में कैल्शियम के स्रोत के तौर पर बोन मील का इस्तेमाल होता है. यह दरअसल जानवरों की हड्डी का चूरा होता है.

कैल्शियम सप्लीमेंट्स के तौर पर इस्तेमाल होने वाले टैब्लेट्स में ग्लिसरीन होता है जिसे सोया या फिर पाम(ताड़ या खजूर जैसे वृक्ष के उत्पाद) से हासिल किया जा सकता है लेकिन ऐसा ना करके ग्लिसरीन के स्रोत के रूप में अक्सर जंतुओं के वसा का इस्तेमाल होता है. कोलेकैल्सिफेरोल सभी विटामिन्स सप्लीमेंट्स में इस्तेमाल होता है. इसे भेड़ के ऊन से निकाला जाता है.

उन लोगों की बात पर कान देने की जरूरत नहीं जो आपको बताते हैं कि कुछ विटामिन सिर्फ मांस या दुग्ध-उत्पाद से ही हासिल हो सकते हैं. ऐसा कोई विटामिन नहीं जो सिर्फ मांसाहार की श्रेणी में गिने जाने वाले भोजन से ही मिलता हो. हर विटामिन का वैकल्पिक वनस्पति स्रोत मौजूद है.

जिलेटिन का विकल्प शाक-सब्जियों के सेल्युलोज कैप हो सकता है. टैब्लेट्स की कोटिंग में फिलर्स तथा लुब्रिकेन्ट्स के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टियरेट्स को जंतुओं की जगह पाम ऑयल से हासिल किया जा सकता है. नारियल या पाम-ऑयल जैसे वनस्पित-स्रोत का इस्तेमाल कैप्रिलिक एसिड हासिल करने में किया जा सकता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

यीस्ट(खमीर) से निकाला हुआ एर्गोस्टेरॉल, सिवार तथा धूप में कुछ देर तक खड़े रहना विटामिन डी के वैकल्पिक स्रोत में शामिल है. सोया से सायनोकोबालामिन हासिल होता है. इसका इस्तेमाल विटामिन बी12 के निर्माण में हो सकता है. कीवीफ्रूट के बीज का तेल, चिया का तेल, अंजीर का तेल, तीसी तथा ब्लैक रेस्पबेरी ओमेगा-3 के अच्छे स्रोत हैं. कैरोटिन से विटामिन ए बनाया जा सकता है.

पाचन-क्रिया में मददगार एन्जाइम्स के निर्माण में तेलहन और खाद्यान्न से प्राप्त लाइपेज का इस्तेमाल हो सकता है. इसके तरीके मौजूद हैं. कैल्शियम के लिए जानवरों की हड्डियों का चूरा इस्तेमाल होता है. इसकी जगह शाकाहार की श्रेणी में शुमार ढेर सारी वनस्पितियों जैसे कैल्शियम कार्बोनेट, गोभी और सरसों के पत्ते, सोया, ब्रोकली, पालक, चुकन्दर, वेजिटेबल कम्पोस्ट, घास की लुगदी, डोलोमाइट तथा चिकनी मिट्टी का व्यवहार हो सकता है.

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वनस्पतियों पर आधारित ये चीजें मौजूद होने के बावजूद स्वास्थ्य-वर्धक दवाओं के मोटे मुनाफे वाले उद्योग में जंतु-आधारित उत्पादों का इस्तेमाल होता है क्योंकि उन्हें कसाईखाने(स्लॉटरहाउस) से आसानी से हासिल किया जा सकता है और यह सस्ता भी होता है.

पेड़-पौधों के अतिरिक्त बाजार में बिक्री के लिए मौजूद तकरीबन सारे विटामिन सप्लीमेंट सिथेंटिक विटामिन से बनाए जा सकते हैं. सिंथेटिक रूप से बनाए विटामिन तथा पेड़-पौधों अथवा जंतु-स्रोतों से बनाए विटामिन में कोई रसायनिक अन्तर नहीं होता. सिंथेटिक उत्पादन ज्यादा लोकप्रिय होता जा रहा है. ऐसे विटामिन्स टैब्लेट्स बनाना आसान है और जंतु-उत्पादों पर आधारित विटामिन की तुलना में इनकी कीमत भी कम होती है.

विटामिन सप्लीमेंट्स में पेड़-पौधों पर आधारित उत्पादों का व्यवहार हो, इसके लिए शोध और अनुसंधान में और ज्यादा रकम लगाने की जरूरत है. विटामिन सप्लीमेंट्स बनाने में गैरजरूरी हिंसक तौर-तरीकों का इस्तेमाल बंद हो, इसके लिए हमें एक वैकल्पिक राह निकालनी होगी. अगर पेड़-पौधों पर आधारित विटामिन सप्लीमेंट की मांग उपभोक्ताओं में बढ़े तो स्वास्थ्यवर्धक दवाओं का निर्माण करने वाले उद्योग उस दिशा में सोचेंगे.

मल्टी-विटामिन्स के बहुत से ब्रांड जंतुओं पर आधारित हैं या फिर उनमें जंतु-उत्पादों का इस्तेमाल होता है. ऐसे कुछ मल्टी-विटामिन्स ब्रांड हैं : इनलाइफ मल्टीविटामिन, सेंट्रम, हर्बलाइफ, हेल्थविट, मसल फार्म आर्मर वी, रिवाइटल, यूनिविटा, एम्वे न्यूट्रालाइट, ऑप्टीमेन, मसल टेक प्लेटेनियम मल्टी विटामिन आदि. इन्हें तैयार करने वाली कंपनियों से आपको सवाल पूछने चाहिए.

विटामिन सप्लीमेंट से सेहत में इजाफा नहीं होता, ना ही इनसे बीमारी का निवारण होता है. विटामिन सप्लीमेंट सिर्फ शरीर में पैदा हुई अपनी कमी की भरपाई करते हैं. जहां तक संभव हो सके, हमें भोजन सामग्री को उनके मूल रूप में खाना चाहिए. ऐसा करने में कहीं ज्यादा समझदारी है, साथ ही इसमें सेहत का फायदा तो है ही. आखिर जो चीजें भोजन से हासिल हो रही हैं उन्हें कोई टैब्लेट में भरकर क्यों खाए?

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