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ना कभी मंटो मर सकता है और ना उसके किरदार

नंदिता दास की फिल्म के बहाने बीसवीं सदी के सबसे बड़े उर्दू अफसाना निगार मंटो की खूब चर्चा हो रही है. लेकिन यह चर्चा भला कम कब थी?

Updated On: Oct 01, 2018 09:52 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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ना कभी मंटो मर सकता है और ना उसके किरदार

वह एक नॉर्मल वर्किंग डे था. इसलिए मुंबई के उस थिएटर में भीड़ बहुत कम थी. फिल्म मंटो खत्म होनेवाली थी. क्लाइमेक्स से ठीक पहले पुराने एक्टर विनोद नागपाल ने एक बूढ़े सिख के गेटअप में स्क्रीन पर एंट्री ली. मेरे साथ वाली सीट पर बैठी लड़की अपनी सहेली को देखकर चिल्लाई-देख-देख आ गया टोबा टेक सिंह.

मैंने हैरानी से नज़रें घुमाईं. लड़की की उम्र बेहद कम थी. मुश्किल से 20-21 साल. सहेली भी उसी उम्र की रही होगी. वेशभूषा से दोनों पूरी तरह महानगरीय लग रही थीं. एक लेखक की जिंदगी पर बनी फिल्म में कोई किरदार स्क्रीन पर आते ही पहचान लिया जाए तो इसके क्या मायने हैं? क्या हमारा समाज साहित्यिक रूप से बहुत जागरूक है? नहीं पहचान इसलिए लिया गया क्योंकि किरदार टोबा टेक सिंह था और उसे रचने वाले का नाम सअादत हसन मंटो है.

टोबा टेक सिंह अमर है. उसे गढ़ने वाला मंटो बहुत सारे दर्द, गम, गुरबत और रंज लिए सिर्फ 42 साल की उम्र में इस दुनिया से कूच कर गया. लेकिन अपने पीछे छोड़ गया अफसानों का बेशकीमती खजाना. सैकड़ों कहानियां, संस्मरण, रेडियो नाटक और बहुत कुछ. अदब के जिन मोतियों को आज दुनिया सहेजने में जुटी है, उन्हे कभी सस्ता, बाजारू और गैर-अदबी या असाहित्यिक करार दिया गया था. लेकिन वो सब गुजरे कल की बातें हैं. जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है, मंटो के आशिक दुनिया भर में बढ़ते जा रहे हैं.

बेशक नंदिता दास की नई फिल्म के ज़रिए बहुत से लोगों ने मंटो का नाम पहली बार सुना हो. लेकिन सच यह है कि उर्दू नहीं बल्कि मंटो भारतीय उप-महाद्वीप की किसी भाषा में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में एक हैं. अगर इस बात में आपको कोई शक हो तो अपनी यादाश्त से मंटो की किसी कहानी का नाम सोचिए और उसे गूगल पर टाइप कीजिए. रिजल्ट में आपको उस कहानी के प्रिंट, ऑडियो और वीडियो यानी हर तरह के वर्जन मिल जाएंगे. यह लोकप्रियता किसी और लेखक को नसीब नहीं हुई है.

`हिंदुस्तानी मंटो’ और `पाकिस्तानी मंटो’

जब नंदिता दास की फिल्म रिलीज़ हुई तो मेरे दिमाग़ में सबसे पहले यह सवाल आया कि आखिर मंटो की अति-नाटकीय जिंदगी और उनके जादुई रचना संसार को सिर्फ 1 घंटा और 52 मिनट में किस तरह बांधा जा सकता है? मंटो और उसके किरदार एक-दूसरे से अलग नही हैं. वह जिन किरदारों के अफसाने सुनाता था, उन्हीं किरदारों के साथ उठता-बैठता और उनके बीच जीता था. वह एक ऐसा राइटर था, जिसने अपनी जिंदगी का स्क्रीन ही प्ले ही नहीं बल्कि डायलॉग तक लिख छोड़ा था. फिर कहानी सुनाने के लिए डायरेक्टर अलग क्या करे?

नंदिता दास की फिल्म में ऐसी तमाम दुविधाएं नज़र आती हैं. मंटो के पावरपैक्ड वन लाइनर, अपने उपर लगे आरोपों के दमदार जवाब, इस्मत चुगताई और कृष्ण चंदर जैसे समकालीनों के साथ हुई यादगार बहसें, अशोक कुमार और श्याम जैसे फिल्मी दोस्तों से जुड़े संस्मरण. सब कुछ तो छोड़ गया है, मंटो. अंग्रेजी में कहें तो नंदिता दास के लिए यह फिल्म एक तरह से `प्रॉब्लम ऑफ प्लेंटी’ थी. मसला यह नहीं था कि क्या दिखाएं बल्कि सवाल यह था कि क्या छोड़ें.

कई लोगों ने फिल्म को सराहा है तो दूसरी तरफ मंटो के बहुत से दीवानों को इससे निराशा हुई है. उन्हें लगता है कि जिस तरह मंटो का सफर अचानक खत्म हो गया उसी तरह फिल्म भी अधूरेपन का एक एहसास लिए खत्म हो गई. लेकिन मैं नंदिता दास को दोष नहीं देना चाहता. मंटो की जिंदगी ही ऐसी थी. शायद कोई और भी बनाता तब भी 1 घंटे 52 मिनट की फिल्म में यही होता.

नंदिता दास से पहले पाकिस्तानी अभिनेता और निर्देशक समरद खोसट मंटो पर साढ़े तीन घंटे लंबी फिल्म बना चुके हैं. प्रोडक्शन क्वालिटी, डायरेक्शन और एक्टिंग के लिहाज से यह फिल्म नंदिता दास की `मंटो’ के मुकाबले काफी कमज़ोर है. मगर पाकिस्तानी फिल्म में मंटो की जिंदगी के बहुत से अनोखे और अनसुने किस्से मौजूद हैं. इसके बावजूद आप यह दावा नहीं कर सकते कि वह मंटों की पूरी जिंदगी या उनके रचना संसार को समेट पाती है. सच तो यह है कि ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है.

मंटो की उथल-पुथल भरी जिंदगी और बिलबिलाते, कराहते, चीखते और कभी-कभी मुस्कुराते किरदारों से भरे उसके रचना संसार को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहला हिस्सा भारत विभाजन से पहले का है. उस दौर के लेखन ने मंटो को एक ऐसे राइटर के तौर पर पहचान दी जो समाज और इंसानी जेहन के उस हिस्से को देखने की हिम्मत कर सकता था, जो पहले कभी किसी ने नहीं की.

वल्गर और इरोटिक नहीं सिर्फ मानवीय

यौन मनोविज्ञान, वर्जना और कुंठाएं सब लिखने वाली बातें नहीं हैं. कहानियों की शक्ल में तो बिल्कुल भी नहीं. मंटो ने इस धारणा को ध्वस्त किया. बू से लेकर काली सलवार तक दर्जनों ऐसी कहानियां हैं, जो उस जमाने के लोगों को हजम नहीं हुईं. नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश इंडिया में मंटो के खिलाफ अश्लीलता के कई मुकदमे चले.

सच कहा जाए तो बदनामी ने मंटो को बड़ा नाम दिया. यह बदनामी ताउम्र मंटो के साथ चिपकी रही और इसने मौत के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ा. अगर टीनेज बच्चे आज भी मंटो के लिटरेचर की तरफ आकर्षित होते हैं तो उसका एक बड़ा कारण यह है कि उन्हें ऐसा रौशनदान दिखाई देता है, जिसके पीछे एक बहुत अलग दुनिया छिपी हो सकती है. लेकिन एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद धीरे-धीरे मंटो के बारे में राय बदलनी शुरू हो जाती है. यह समझ में आता है कि मंटो एक ऐसी दुनिया में ले जाता है, जहां इंसानियत से बड़ी चीज़ कुछ नहीं है. इंसान जैसा होता है, उसे उसी रूप में स्वीकार करना मंटो के लेखन का एक उज्ज्वल पक्ष है.

किशोर मन की यौन जिज्ञासा, अधेड़ मन की कामनाएं और कुंठाएं, जिस्मानी होकर भी जिस्म से परे मर्द और औरत के रिश्ते की जटिलताएं, मंटो ने आम आदमी की जुबान में बहुत कुछ ऐसा कहा जो अब तक अनकहा था और मंटो के बाद भी अनकहा रहा. सेक्स, मंटो के लिए कोई ऐसी चीज़ नहीं था, जिसके बारे में अकेले में बात की जाए. मंटो के क्लास और जेंडर डिसकोर्स भी इसके साथ-साथ चलते हैं.

`उपर नीचे और दरम्यान’ मंटो की एक ऐसी कहानी थी, जो उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में लिखी. कहानी एक इज्ज़तदार बुजुर्ग दंपत्ति की यौनेच्छाओं को लेकर है. उनके बीच बहुत लंबे समय से शारीरिक संबंध नहीं थे. वे चाहते हैं कि जिस्मानी रिश्ता फिर से बहाल हो. घर में रहने वाले नौकर-नौकरानियों को यह बात पता है और वे इस पर चटखारे लेते हैं. कहानी की आखिरी लाइन है.

समाज में जो ऊपर है, उसमें दम नहीं, जो दरम्यान है, उसके हालात तंग हैं और जो नीचे है, उसमें दम है, लेकिन चारपाई नहीं.

दिलचस्प बात यह है कि लाहौर के एक बड़े सियासदां ने इसे अपनी जिंदगी की कहानी माना और मंटो को सबक सिखाने के लिए पुलिस से लेकर वकीलों तक की फौज खड़ी कर दी. लेकिन आखिरकार जज ने 25 रुपए के हर्जाने के साथ मंटो को बरी कर दिया.

अस्मत बेचने को मजबूर औरतों की कहानियां मंटों के रचना संसार में हर जगह बिखरी पड़ी हैं. लेकिन इनमें भी बहुत अलग-अलग शेड्स हैं. बाजारू औरत सिर्फ एक वेश्या नहीं है, उसका अपना एक वजूद है. कहीं वह सुंगधी है तो कहीं सुल्ताना है. सबकी अपनी-अपनी कहानियां हैं. मंटो ने एक जगह लिखा है-मेरी हमदर्दी हर उस औरत के साथ है जो बिकना तो नहीं चाहती लेकिन दुनिया उसे खरीद चुकी होती है.

वह दौर उर्दू अदब में वर्जनाओं के टूटने का था. मंटो की समकालीन इस्मत चुगताई लेस्बियन संबंधों पर आधारित लिहाफ जैसी विवादास्पद कहानी लिख चुकी थीं. कृष्ण चंदर की कई रचनाओं में सेक्स का जिक्र काफी विस्तार से था. वल्गर या इरोटिक इन तीनों में कोई नहीं था. लेकिन मंटो में कुछ ऐसा था, जो उन्हे कृशन चंदर और इस्मत से काफी अलग करता था.

पागल समय का पागल लेखक

1947 से लेकर 1955 तक मंटो की जिंदगी के आखिरी आठ साल उसकी रचनाधर्मिता के हिसाब से सबसे बेशकीमती साल साबित हुए. लेकिन मंटो ने कभी नहीं चाहा होगा कि ऐसा हो. वह विश्व इतिहास का एक भयानक दौर था. द्वितीय विश्वयुद्ध की विभिषिका थमी नहीं कि भारतीय उप-महाद्वीप जलने लगा. धार्मिक आधार पर अलग पाकिस्तान की मांग ने ज़ोर पकड़ा और भयंकर हिंसा शुरू हो गई. दंगों में करीब दस लाख लोग मारे गए.

मंटो इतिहास के इस बदनसीब दौर का सिर्फ गवाह नहीं था बल्कि खुद एक पीड़ित था. अपने शहर बंबई से उसे रवानगी डालनी पड़ी और वो उस लाहौर में पहुंचा जो हिंदुओं और सिखों के कत्ल-ए-आम के बाद पूरी तरह बर्बाद हो चुका था. मंटो के आखिरी दिनों की सारी कहानियां बंटवारे के इसी दर्द को बयान करती हैं. हर कहानी बताती है कि इंसान किस तरह पागल और कितना वहशी हो चुका था. उस दौर के माहौल का बयान चार लाइन की कहानी हलाल और झटका मिलती है.

मैने उसकी गर्दन पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसे हलाल कर दिया.

ए तुमने क्या किया?

क्यों?

उसे हलाल क्यों किया?

मज़ा आता है इस तरह

मज़ा आता है के बच्चे तुझे झटका करना चाहिए था, इस तरह

और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया.

बतौर लेखक मंटो हमेशा औरतों को लेकर संवेदनशील रहा. सांप्रदायिक हिंसा का सबसे बड़ा शिकार औरतें बनीं. मंटो की दो कहानियां `खोल दो’ और `ठंडा गोश्त’ इसी विषय पर लिखी गई हैं. कलेजा चीर देनेवाला क्लाइमेक्स मंटो की शैली की सबसे बड़ी पहचान था, जो इन दोनों कहानियों में मौजूद है. पाकिस्तान में इन दोनों कहानियों को अश्लील मानकर मंटो पर मुकदमा चलाया गया. ना तो किरदार मंटो से अलग थे, ना मंटो अपने किरादरो से अलग. उसे हमेशा लगता था कि मतलबी राजनेता और मूर्ख आलोचक बिना कहानी को समझे उसकी अभियक्ति की आजादी उससे छीनने पर तुले हैं. मंटो ने एक जगह लिखा था-

मेरा ज़मीर बागी हो गया है. मैं इसे सुलाना चाहता हूं लेकिन सोता ही नहीं है. आंखें खोलकर जिद्दी बच्चे की तरह मुस्कुराता रहता है.

मंटो का ज़मीर हमेशा जागता रहा. जागते ज़मीर ने उसे पागल बना दिया. दिमाग़ी हालत बिगड़ने पर उसे कई बार पागलखाने भेजा गया. महान कहानी `टोबा टेक सिंह’ मंटो के पागलखाने के अनुभव का ही नतीजा थी.

इस लंबी कहानी का सार यह है कि पागलखाने में कैद एक सिख पागल को जबरदस्ती भारत भेजा रहा है. उस पागल ने कहा कि मुझे ना हिंदुस्तान में रहना है, ना पाकिस्तान में, मुझे तो अपने गांव टोबा टेक सिंह में ही रहना. वह इतनी बार अपने गांव का नाम रटता था कि बाकी पागलों ने उसका नाम ही टोबा टेक सिंह रख दिया. उस बूढ़े सिख को ज़बरदस्ती बॉर्डर के उस पार धकेला जाता है. लेकिन वह जाने से इनकार कर देता है और उसकी मौत हो जाती है. कहानी के आखिर में मंटो ने लिखा है- धारदार तारों के इस तरफ हिंदुस्तान, धारदार तारों के उस तरफ पाकिस्तान. जिसका कोई नाम नहीं, वहां टोबा टेक सिंह पड़ा था.

यह कहानी जितनी टोबा टेक सिंह है, उतनी ही मंटो की अपनी भी है. बंटवारे ने उसके पूरे वजूद को तक्सीम कर दिया. बंबई वह भूल नहीं पाया और बदरंग हो चुके लाहौर को पूरी तरह अपना नहीं पाया.

झक्की, शराबखोर और खुद्दार मंटो

एक आम इंसान की तरह मंटो भी कई तरह मानवीय दुर्बलताओं का शिकार था. तमाम कोशिशों के बावजूद वह एक जिम्मेदार पति नहीं बन पाया. मंटो चेन स्मोकर था. शराबखोरी की लत ऐसी थी कि रॉयल्टी के पैसे की भी पी जाया करता था. उसने अपनी कमियों पर कभी पर्दा नहीं डाला. इन कामियों से लड़ता रहा, यह अलग बात है कि जीत नहीं पाया.

मंटो को एक सिटिंग में कहानी खत्म करने की आदत थी. वह मैगजीन के दफ्तर में जाता, सादा कागज मांगता और हाथ के हाथ कहानी लिख मारता. मेहनाता ना मिलने या किसी और तरह झिक-झिक होने पर कई बार अपनी कहानियां अपने हाथों से फाड़ देता. शराबखोर और झक्की ही नहीं बल्कि आले दर्जे का खुद्दार भी था मंटो. अपने अफसाने उसने आम जुबान में लिखे लेकिन असल में वह आला दर्जे का इंटलेक्चुल था. नेहरू के नाम पाकिस्तान से लिखी गई चिट्ठियां किसी लिटररी मास्टर पीस से कम नहीं हैं.

पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में अंकल सैम के नाम ख़त सीरीज़ से मंटो के लेख छपा करते थे. उनमें अमेरिकी नीतियों की जमकर बखिया उधेड़ी जाती थी. मंटो ने हमेशा कठमुल्लों का मज़ाक उड़ाया. तथाकथित प्रगतिशील लोगो की भी ख़बर ली और इसी चक्कर में बेशुमार दुश्मन बनाए. पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव राइटर्स ने मंटो का बायकॉट तक किया.

बदहाली में लिवर सिरोसिस और पागलपन के दौरों से जूझते हुए सिर्फ 42 साल की उम्र में भारतीय उप-महाद्वीप के इस विलक्षण लेखक ने 1955 में आखिरी सांस ली. इस बदनाम लेखक की कद्र दुनिया को बहुत देर से समझ में आई. जिस पाकिस्तान में मंटो की कलम को क़ैद करने की कोशिश की गई, वहीं उसके सम्मान में बाद में डाक टिकट जारी हुआ. इतना ही नहीं 2012 में जन्मशती के मौके पर सर्वोच्च नागरिक सम्मान इम्तियाज़-ए-पाकिस्तान से नवाजा गया. 2018 में बीबीसी ने `टोबा टेक सिंह’ को दुनिया की 100 बेहतरीन कहानियों की सूची में जगह दी.

वैसे अगर यह सब नहीं होता, तब भी मंटो हमेशा मंटो ही रहता. मंटो को समझना हो तो उसकी रचनाओं से समझिए और वो बात पढ़िए जो उसने अपने बारे में कही थी-

मैं तहजीब और सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी. मैं इसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता. इसलिए कि यह मेरा काम नहीं, दर्जियों का है. लोग मुझे स्याह कलम कहते हैं. लेकिन मैं तख्ता स्याह पर काली चॉक से नहीं लिखता बल्कि सफेद चॉक इस्तेमाल करता हूं, ताकि तख्ता स्याह का कालापन और नुमाया हो जाए.

 

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