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कैसे छपी थी ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ की लेखिका मन्नू भंडारी की पहली कहानी

मशहूर हिंदी साहित्यकार मन्नू भंडारी के जन्मदिन पर खास

FP Staff Updated On: Apr 03, 2018 12:07 PM IST

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कैसे छपी थी ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ की लेखिका मन्नू भंडारी की पहली कहानी

1947 में जिस वक्त हिंदुस्तान पाकिस्तान अलग हो रहे थे. उसी समय एक और विस्थापन हुआ. हिंदी साहित्य की जानी मानी लेखिका मन्नू भंडारी को अजमेर छोड़कर कलकत्ता जाना पड़ा. उस वक्त उनकी उम्र करीब 16 साल थी. यूं तो मन्नू भंडारी का बचपन मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बसे गांव भानपुरा में बीता था. पिता जी इंदौर से आकर अजमेर में बस गए थे. लिहाजा मन्नू भंडारी भी वहीं रहीं लेकिन नियति ने उन्हें कलकत्ता पहुंचाया.

एक वक्त पर मन्नू भंडारी के पिता सुखसंपत राय भंडारी इंदौर के नामी गिरामी और पैसे वाले लोगों में थे, लेकिन स्थितियां कुछ ऐसी खराब हुईं कि उन्हें भी पूरे परिवार के साथ तमाम संघर्षों को सामना करना पड़ा. घर में पांच बच्चे थे. मन्नू सबसे छोटी थीं. इन चुनौतियों के बाद भी बच्चों में किसी किस्म का भेदभाव नहीं किया गया. बचपन में मन्नू भंडारी जब अपनी बहन के साथ स्कूल जा रही थीं तो एक बार कुछ लोगों ने उन्हें छेड़ दिया. ये वो दौर था जब ऐसी घटनाओं से लड़कियों को बचाने के लिए लोग स्कूल जाना ही बंद करा देते थे. लेकिन मन्नू भंडारी के पिता ने तय किया कि अब उनके बच्चे बस से स्कूल जाएंगे. इस तरह पढ़ाई चलती रही.

मन्नू सबसे छोटी थीं इसलिए कम उम्र में शादी की पारंपरिक सोच से भी वो बच गईं. इन सारी परिस्थितियों के बीच ही मन्नू भंडारी में एक ऐसी लेखिका का जन्म हुआ जो बाद में नई कहानी की सशक्त कहानीकार बनीं.

मन्नू भंडारी का पढ़ने-लिखने में दिल नहीं लगता था. खेलकूद का उन्हें शौक नहीं था. संगीत में दिलचस्पी नहीं थी. किसी बात में मन लगता था तो वो था रंगमंच. कुछ नाटक उन्होंने स्कूल में किए भी थे. खैर, कलकत्ता पहुंचने के बाद उन्हें प्राइवेट बीए और एमए करना पड़ा. इसे संयोग कहिए या किस्मत एमए पूरा होते ही मन्नू भंडारी को एक स्कूल में हिंदी पढ़ाने की नौकरी मिल गई. मन्नू अब बीस की उम्र पार कर चुकी थीं. हिंदी पढ़ाने के इस दौर में उन्हें कहानियों और उपन्यास पढ़ने का शौक लगा. यहीं से शायद वो बीज उनके अंदर पड़े जिसकी बदौलत जिस विधा में उन्होंने नाम कमाया वो लेखन ही था.

'क्यों नहीं लिख सकती' की सोच के चलते लिखी पहली कहानी

मन्नू भंडारी के रचनाकर्म पर बात करें इससे पहले उनकी पहली कहानी पर आते हैं. पहली कहानी सिर्फ इस भरोसे के साथ लिखी गई थी कि वो कहानी क्यों नहीं लिख सकती हैं. तब दूर-दूर तक ये ख्याल नहीं था कि ये कहानी साहित्य की दुनिया में उनके कदमों को बहुत दूर तक ले जाएगी. मन्नू भंडारी की पहली कहानी इलाहाबाद से भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका में छपी. पत्रिका में कहानी के छपने की खुशी इस बात से और बढ़ गई कि भैरव प्रसाद गुप्त ने मन्नू भंडारी को चिट्ठी भी लिखी. उस चिट्ठी में उन्होंने मन्नू भंडारी के लेखन की तारीफ करते हुए उन्हें और रचनाएं भेजने को कहा. इसके बाद की कहानी इतिहास में दर्ज है.

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उम्र का अगला दशक मन्नू भंडारी के पहले उपन्यास ‘एक इंच मुस्कान’ का था, जिसमें राजेंद्र यादव उनके सहलेखक थे. राजेंद्र यादव मन्नू भंडारी के जीवनसाथी भी रहे. इस किताब के प्रकाशन से कुछ ही समय पहले उन दोनों का विवाह हुआ था. ये प्रकाशक का ही आग्रह था कि दोनों मिलकर एक किताब लिखें. खैर, बाद में राजेंद्र यादव के साथ जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव का सामना मन्नू भंडारी ने किया.

उसके प्रसंगों पर भी चर्चा करेंगे लेकिन पहने मन्नू भंडारी का रचनाकर्म. जो सत्तर के दशक में अपनी ऊचाईयों तक पहुंचा. 70 के दशक में ही मन्नू भंडारी ने ‘आपका बंटी’ लिखी, दशक के खत्म होने से पहले पहले ‘महाभोज’ आई. इन दोनों ही कृतियों को मन्नू भंडारी के लेखकीय जीवन की सबसे प्रचलित कृतियों में गिना गया. इन कृतियों ने मन्नू भंडारी को हिंदी साहित्य के बड़े लेखकों में शुमार किया. आपका बंटी एक दंपत्ति के बिगड़ते संबंधों का उनके बच्चे के नजरिए से लेखा-जोखा था और महाभोज हिंदुस्तानी अफसरशाही पर करारा वार.

mannu bhandari

कहानियों पर फिल्में भी बनीं

तमाम बड़े हिंदी फिल्मकारों ने उनकी कहानियों पर फिल्में बनाईं. जिसमें बासु चटर्जी की फिल्म रजनीगंधा शामिल हैं जो ‘यही सच है’ शीर्षक की कहानी पर आधारित थी. इसके अलावा बासु चटर्जी ने मन्नू भंडारी की कुछ और कहानियों पर भी फिल्में बनाईं. फिल्म तो ‘आपका बंटी’ पर भी बनी लेकिन वो विवादित रही. मन्नू भंडारी ने उस फिल्म के निर्माताओं पर अपनी कहानी के प्लॉट के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाया. मामला अदालत में भी गया. यही सच है के अलावा तीसरा आदमी, नकली हीरे, इनकम टैक्स और नींद, रानी मां का चबूतरा जैसी कहानियां बहुचर्चित रहीं. मन्नू भंडारी की कहानियों के महिला किरदार सशक्त थे. ‘अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी’ की सुपचिरित छवि मन्नू भंडारी की कहानियों में ध्वस्त हुई.

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पति राजेंद्र यादव के साथ रिश्ते

ये भी तकदीर ही थी कि अपने व्यक्तिगत जीवन में मन्नू भंडारी को तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा. वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव से उन्होंने विवाह किया. राजेंद्र यादव के पास उन दिनों आय का कोई नियमित साधन नहीं था. वो कभी कलकत्ता रहते थे तो कभी दिल्ली. मन्नू भंडारी कलकत्ता इसलिए नहीं छोड़ रही थीं क्योंकि वहां उनके पास एक नौकरी थी. बाद में जब मन्नू भंडारी को दिल्ली के मिरांडा हाउस में नौकरी मिली तो वक्त बदलने की बजाए बिगड़ता चला गया. राजेंद्र यादव के साथ उनके संबंध खराब होते चले गए. जिन संबंधों की शुरूआत कलकत्ता के एक स्कूल के लाइब्रेरी के लिए साथ मिलकर किताब छांटने से हुई थी, वो टूट गए.

मन्नू भंडारी ने कई बार ये बात कही कि राजेंद्र यादव उनके साथ रिश्तों को लेकर अनदेखी करते थे. उन्होंने अपनी बेटी को अकेले पाला. बावजूद इसके जब कभी राजेंद्र यादव बीमार होते थे तो मन्नू भंडारी उनसे मिलने जाया करती थीं. 2013 में राजेंद्र यादव का निधन हो गया. उनके निधन से पहले उनके निजी संबंधों को लेकर तमाम विवाद भी हुए. इससे अलग एक गैर विवादित रचनाकार के तौर पर मन्नू भंडारी की पहचान आज भी कायम हैं. अब बुर्जुग हो चुकी मन्नू भंडारी का रचनाकर्म तो रुक चुका है लेकिन उनकी रचनाओं की स्वीकार्यता और लोकप्रियता हमेशा कायम रहेगी.

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