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जिंदगी के दर्द में बनी एंबुलेंस ड्राइवर, छत से कूदकर बचाई थी 'इज्जत'

दिन में मरीजों और रात में शव ले जाने वाली मंजीत कौर की हिम्मत की दाद देनी चाहिए

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Mar 04, 2018 09:30 AM IST

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जिंदगी के दर्द में बनी एंबुलेंस ड्राइवर, छत से कूदकर बचाई थी 'इज्जत'

44 साल की मनजीत कौर के जीवन में महिला सशक्तिकरण की बातें सिर्फ ढकोसला और ढकोसला भर लगती हैं. वजह- बकौल मंजीत कौर, 'मैने पेट पालने के लिए घरों में झाड़ू-पोछा (नौकरानी) का काम किया. बाद में महिला एंबुलेंस ड्राइवर बनी. अब रात में सड़क पर मिले जख्मी लोगों को और हादसों में मरने वालों की लाशें ढोती हूं और दिन में अपनी बदकिस्मत 'जिंदगी' ढो रही हूं. मेरी जिंदगी में ‘महिला सशक्तिकरण’ फरेब से ज्यादा कुछ नहीं है.'

बचपन की ‘रानी’ से आज की बेबस मंजीत तक

बचपन में घर-खानदान में ‘रानी’ नाम से पुकारी जाने वाली और वक्त के थपेड़ों से जूझती आज की महिला एंबुलेंस ड्राइवर मंजीत कौर का जन्म 3 अक्टूबर 1978 को गांव मंडी मोड़, जिला कपूरथला, पंजाब में किसान परिवार में हुआ था. बीमारी से परेशान पिता हीरा सिंह ने कुंवारपात्र उतारने के लिए 15 साल की उम्र में शराबी-कबाबी से शादी करके पिता की जिम्मेदारी पूरी कर के बेटी के हाथ पीले करने की रस्म निभा ली. इसके कुछ महीने बाद ही सन् 1998 में पिता हीरा सिंह दुनिया से कूच कर गये. कुछ साल बाद सन् 2004 में बीमारी के चलते मां राज कौर भी साथ छोड़कर दुनिया से चली गईं. मां-बाप का साया सिर से हटते ही फले-फूले परिवार में भी रानी ‘अनाथ’ हो गई.

खून के रिश्ते ही जब ‘खून’ के प्यासे हो गये

manjeet kaur women ambulance driver

कहते हैं कि, जिस स्त्री के बेटा हो, पति की मौत के बाद भी वो खुद को विधवा नहीं समझती. और जिस बहन के भाई हो, वह बहन भी पति की मौत के बाद खुद को विधवा नहीं मानती. मनजीत कौर बताती हैं कि, मेरे साथ सब कुछ इसके उलट हुआ. दो भाई और तीन बहनों में मैं सबसे छोटी हूं. एक भाई इंग्लैंड में कई साल पहले जाकर रहने लगा. दूसरा पंजाब में ही खेती-किसानी करता. सब बहनें अपनी घर-गृहस्थी में खुश हैं.

मुझे पति शराबी-कबाबी मिला. ससुराल (रेल कोच फैक्टरी कपूरथला के पास स्थित गांव भुलाना, पंजाब) पहुंची तो वहां जेठ और ननद दिमागी रुप से कमजोर मिले. भाई चाहते थे कि मैं अपना इकलौता बेटा और शराबी पति को छोड़कर मायके में उनके पास जाकर रहने लगूं. मेरे दिल को यह बात गवारा नहीं हुई. लिहाजा मां-बाप की पुश्तैनी जमीन को लेकर अदालतों में भाइयों से मुकदमेबाजी शुरु हो गई. इन कलियुगी भाइयों की शक्लें अब कोर्ट-कचहरी में और मुकदमों की फाइलों में ही देखती हूं...पूरे 9 साल से...न कि किसी राखी या भैया दूज के मौके पर.

शराबी पति ने बेच दिये घर के बर्तन और चारपाई

सुना पढ़ा था कि, हिंदुस्तानी सभ्यता में किसी विवाहित महिला के लिए पति उसका परमेश्वर होता है. मांग का सिंदूर पति के जिंदा रहने तक ही रहता है. पति की जिंदगी-मौत से ही स्त्री के वैधव्य और सुहाग की डोर जुड़ी होती है. मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. एक दिन पति ने घर के सब बर्तन और चारपाई शराब के लिए पैसे जुटाने की उम्मीद में बेच दिये. मजबूर थी... खुद को पतिव्रता साबित करने की गलतफहमी पाले बैठी थी. चुप्पी लगा गई. इज्जत और परिवार बचाने की खातिर.

छत से कूदकर बचाई इज्जत, पति ने किया था 200 रुपये में सौदा

manjeet kaur women ambulance driver (1)

एक दिन पति ने महज 200 रुपए की खातिर दो आदमियों को मकान में घुसा दिया. वो दोनों मेरी ‘आबरु’ के सौदागर थे. मकान की छत से पीछे मौजूद मैदान में कूदकर ‘इज्जत’ बचाई. अब तक दो बेटियों की मौत हो चुकी थी. एक अदद बेटा और मैं ही बची थी. कहने को दो भाई और तीन बहने भी थीं. मगर खून के इतने रिश्तों की मौजूदगी में भी मैं ‘अनाथ’ हो चुकी थी. बेटे और खुद की जिंदगी बचाने के लिए घरों में चौका-बर्तन-झाड़ू-पोंछा शुरु कर दिया. बुरी नजरों के साये की जद में आने से तब भी नहीं बच सकी. हर कोई मजबूत लंबी-चौड़ी कद-काठी वाली मनजीत कौर में मर्द कौम सिर्फ और सिर्फ एक खूबसूरत मांसल देह देखती... वक्त के थपेडों से जूझती एक बेदाग मगर बेबस कल की रानी और आज की मंजीत के दिल में समाया दर्द किसी को दिखाई नहीं दिया.

गठीले बदन पर मर्दों की गंदी नजरों ने एंबुलेंस ड्राइवर बनाया

किसान की बेटी थी. गरीबी के चलते स्कूल का मुंह भले कभी न देख पाई... हां ट्रैक्टर आदि गांव में रहते हुए खूब चलाया. थोड़ी-बहुत खेती-किसानी की भी नॉलेज थी. सोचा क्यों न एंबुलेंस ड्राइवर बन जाऊं! न कंपटीशन का झंझट न दांव पर होगी इज्जत. ड्राइविंग लाइसेंस बन गया तो, किराये की एंबुलेंस चलाने लगी. शुरुआती दौर में जलंधर की सड़कों पर एंबुलेंस लेकर निकली. तो शहर के कुछ लोग मुझ पर हंसे. कुछ, एक महिला को एंबुलेंस ड्राइव करते देखकर सड़क किनारे खड़े होने लगे. कई अस्पतालों में मरीज के तीमारदारों ने महिला एंबुलेंस ड्राइवर समझकर अपने मरीजों/घायलों को मेरी एंबुलेंस में भिजवाना ही गंवारा नहीं किया. जलंधर शहर के कई अस्पतालों ने महिला एंबुलेंस ड्राइवर समझकर दरवाजे पर भटकने तक नहीं दिया.

एक्सीडेंट जिसने मुझे ‘जिंदा-लाश’ बनने से बचा लिया

manjeet kaur women ambulance driver (4)

एक दिन कंट्रोल रुम से रात के वक्त एक्सीडेंट की कॉल आई. बड़ी ‘वेंटीलेटर-एंबुलेंस’ लेकर रात को ही अकेली नकोदर पहुंच गई. एक लड़का, एक बुजुर्ग और एक महिला खून से लथपथ मौके पर मिले. स्पॉट पर पता चला कि, खून से लथपथ उन लोगों में देश के मशहूर हास्य अभिनेता जसपाल भट्टी, उनका बेटा और पुत्र वधू थे. बेटा-बहू को इलाज के लिए लुधियाना के अस्पताल में दाखिल कराया. जसपाल भट्टी को गंभीर हालत में लेकर जलंधर पहुंची. बकौल मंजीत कौर, जलंधर में जसपाल भट्टी को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. अगले दिन मैं पोस्टमॉर्टम के बाद जसपाल भट्टी साहब की लाश लेकर चंडीगढ़ पहुंची. चंडीगढ़ में जसपाल भट्टी की लाश लेकर पहुंची तो, वहां मौजूद नेता-मंत्री-संतरी-आमजन की भीड़ ने बीते कल की गुमनाम और बदकिस्मत मनजीत कौर को चंद लम्हों में ‘वीआईपी महिला एंबुलेंस ड्राइवर ’ बना दिया.

‘महिला-दिवस’ पर मीडिया को याद आती है मंजीत

manjeet kaur women ambulance driver (2)

बकौल, मंजीत कौर, ‘अपनी एंबुलेंस खरीदने के लिए रकम नहीं है. जलंधर की रामा मंडी में स्थित एक अस्पताल की एंबुलेंस चलाती हूं. नाइट ड्यूटी करती हूं. रात भर ज़ख्मी इंसानों को और लाशों को ढोती हूं और दिन में जिंदगी ढो रही हूं. भाईयों से कोर्ट-कचहरी में मुकदमेबाजी झेलती हूं. दिल्ली हो या पंजाब या फिर देश के और किसी दूर-दराज हिस्से का मीडिया. महिला दिवस के आसपास हर मीडिया/ रिपोर्टर मंजीत की तलाश में निकल पड़ता है. एक अदद देश की महिला एंबुलेंस ड्राइवर मंजीत कौर की ‘चटपटी और एक्सक्लूसिव-खबर’ हासिल करने की उम्मीद पाले.’

खुद ही जला रही हूं भाईयों के बनाये ‘लाक्षागृह’

जब से महिला एंबुलेंस ड्राइवर के रुप में शोहरत मिली है, तब से दुश्मनों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. कोर्ट-कचहरी में मुकदमेबाजी झेल रहे भाईयों ने 16 साल के मेरे इकलौते बेटे पर एक महिला से बलात्कार का आरोप लगवा दिया. मगर कुछ बिगड़ा नहीं. उसके बाद एक एंबुलेंस ड्राइवर को एक लाख में ठेका दिया गया इस बात का कि, वो मेरे साथ पहले हम-बिस्तर हो. फिर मेरी ब्लू-फिल्म/ फोटो बनाकर मेरे भाईयों तक पहुंचा दे. इसमें भी दुश्मनों को मुंह की खानी पड़ी. क्योंकि मंजीत कौर देखने में जितने लंबी-चौड़ी है, उससे ज्यादा वो खुद को मजबूत भी बनाकर रखती है.

मुर्दों’ से नहीं साहब ‘जिंदा इंसानों’ से डर लगता है

सूनसान रातों को वीरान इलाकों में अकेले ही एंबुलेंस लेकर जाना. एंबुलेंस में रक्त-रंजित घायलों और लाशों को लाते, ले जाते डर नहीं लगता? पूछने पर मंजीत बड़ी साफगोई से बताती है..डर लाशों से और वीरानी से नहीं लगता है सर. डर लगता है जिंदा इंसानों से. जैसे मेरे सगे भाई. जो आज मेरी जान के दुश्मन बने हुए हैं. मुर्दे तो वैसे ही बेजान है उनसे भला क्या डर? रात में पुलिस वाले की गर्दन काटने को कुल्हाड़ी उठा ली.

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जब तक डर कर रही ‘डरती’ रही. जब डर के भीतर घुस गई तो डर, मुझसे डरने लगा. जब डर की बात चली है तो, एक किस्सा सुनाती हूं. दिल्ली के चार-पांच लड़कों की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. आधी रात को उनमें से कुछ लड़कों की लाश लेकर जलंधर से मुंगेरिया जा रही थी. एक पुलिस गाड़ी मेरी एंबुलेंस के पीछे और दूसरी पुलिस गाड़ी एंबुलेंस के आगे चल रही थी. मेरे साथ एंबुलेंस में चल रहे पंजाब पुलिस के एक हवलदार-सिपाही ने छेड़खानी शुरु कर दी. मैंने एंबुलेंस हाईवे किनारे लगाई. एंबुलेंस में रखी कुल्हाड़ी उठाई और उस पुलिस वाले की गर्दन को चाक करने के इरादे से चला दी, मगर बाकी पुलिस वालों ने मुझे काबू कर लिया. मेरे उस असली रुप को देखकर बाकी पुलिसकर्मियों ने हाथ-पैर जोड़े. मिन्नतें कीं और लाशें गन्तव्य तक पहुंचाने की गुजारिश की. इंसानियत के नाते मैं मैने उन लाशों को फिर अकेले ही उस रात मुंगेरियाँ पहुंचाया.

उस एक थप्पड़ का इंतकाम बाकी है अभी

दौलत आज नहीं है कल आ जायेगी. आज माल-असबाब जो है वो कल खतम हो जायेगा. दौलत से सब कुछ खरीदा जा सकता है, सिवाये इंसान की जिंदगी और इज्जत के. जैसे किसी दार्शनिक के से विचारों की मालकिन मंजीत के दिल में एक आग भी धधक रही है. और वो आग है उस थप्पड़ की जो, कभी उसके सामने उसके सगे भाई ने मंजीत की मां के मुंह पर मारा था. बकौल मंजीत- ‘आज नहीं तो कल...मां के गाल पर मारे गये उस थप्पड़ का इंतकाम लेने की तमन्ना जरुर है. उस थप्पड़ का इंतकाम ले पाऊंगी या नहीं और कब यह सब भविष्य और ईश्वर की मर्जी पर छोड़ा हुआ है.’

(लेखक अपराध मामलों से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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