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अगर कोई जानवर घाव से कराहता दिखे तो उसकी सुध लीजिए

नजर रखिएगा और घाव से परेशान कोई जानवर सड़क पर दिखे तो जरूर ही उसकी सुध लीजिएगा.

Updated On: Dec 13, 2018 09:51 AM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

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अगर कोई जानवर घाव से कराहता दिखे तो उसकी सुध लीजिए

पी’पल्स फॉर एनिमल्स मैसूर के कार्यकर्ताओं को एक ऐसा घोड़ा दिखा जिसका सिर आधा गल चुका था. संस्थाओं के कार्यकर्ताओं ने इस घोड़े का उपचार कराया, देख-भाल की. घोड़े की जान बच गई, उपचार कामयाब रहा लेकिन बात सिर्फ किसी एक घोड़े या जानवर तक सीमित नहीं. ऐसे लाखों पशु हैं जिनके शरीर में परजीवी किटाणु बहुत गहरे तक प्रवेश कर चुके होते हैं. सो, कोई और विकल्प मौजूद ना देखकर मजबूरी में उन्हें मौत की नींद सुला देने का ही रास्ता बचता है.

मनुष्य की तुलना में जानवरों को कहीं ज्यादा दर्द झेलना पड़ता है- लेकिन उनके सामने इसके सिवाय और चारा भी क्या है? उन्हें उपचार के लिए डॉक्टर नहीं मिलते. जानवर बीमार पड़ जाए तो ज्यादातर लोग उन्हें त्याग देने का विकल्प अपनाते हैं.

आवारा और त्याग दिये गये पशु तीन तरह के किटाणुओं के शिकार बनते हैं और ये किटाणु उनके लिए घातक साबित होते हैं. इन किटाणुओं के नाम हैं : डिस्टेम्पर, पार्वो तथा मैग्गोट्स.

आपने गौर किया होगा कि कुछ कुत्तों की पीठ पर बहुत गहरे तक छेद बने होते हैं. आपने ऐसी गाय भी देखी होगी जिसके पेट में घाव बन चुका होता है. आपकी नजर कभी ना कभी ऐसे गधे पर गई होगी जिसके गर्दन पर बहता हुआ घाव हो.  ये सारे घाव मैग्गोट्स के कारण बनते हैं. दिल्ली में हमने जो पशुशाला बनवाई है उसमें रोजाना इस तरह के घाव वाले दर्जनों पशु आते हैं. लोग पशुओं के शरीर पर बने घाव को इस हद तक बढ़ने के लिए छोड़ देते हैं- यह सोचकर दिल दुख से भर उठता है.

(तस्वीर प्रतीकात्मक है)

(तस्वीर प्रतीकात्मक है)

जरा कल्पना कीजिए कि आपके शरीर को मांस खाने वाली मक्खियों ने डंस लिया है, उनका लार्वा आपकी चमड़ी पर बने घाव में पसर रहा है और यह शरीर में उस हद तक घुस गया है कि शरीर भीतर से खोखला हुआ जा रहा है. फिर जब सड़-गल जाने के कारण आपके शरीर से बदबू आने लगी है तो लोग आपको दूर भगाने के लिए आप पर पत्थर फेंक रहे हैं.

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मेरी पशुशाला में एक घोड़ा आया था- उसके सिर पर तकरीबन मुट्ठी के आकार जितना छेद बना हुआ था. घोड़े के दिमाग का अंदरुनी हिस्सा दिख रहा था. हमने उस घोड़े का नाम आगे चलकर बाली रखा. बाली हमें एक उजाड़ इमारत के आगे पड़ा मिला था. वह मौत की कगार पर था. उसके कान के नजदीक परभक्षी कीटों ने अंडे जने थे और मैग्गोट्स चमड़ी को काटते हुए शरीर के अंदर तक घुस गये थे. बाली जब पशुशाला पहुंचा तब उसके भीतर से जीवन की आस तकरीबन खत्म हो चुकी थी लेकिन हमने हार नहीं मानी. उपचार शुरू हुआ और तीन महीने के भीतर दिल्ली की हमारी पशुशाला में बाली एकदम चंगा हो गया.

मय्यासिस(Myiasis) पशुओं को लगने वाला एक सामान्य रोग है. इसमें कीट, कीटों के लार्वा और मैग्गोट्स के कारण पशु की चमड़ी पर घाव बन जाते हैं और घाव संक्रमण के कारण बढ़ने लगता है. यह रोग ज्यादातर छुट्टा घूमने वाले पशुओं को लगता है. आखिर क्या वजह है जो घाव करने वाले कीट पशुओं की चमड़ी पर अंडे जनते हैं और जब भी ऐसा होता है तो इसका क्या असर सामने आता है?

बात सिर्फ कुत्ते, बिल्ली, गाय, घोड़े, भेड़ अथवा बकरी सरीखे पालतू जानवरों तक सीमित नहीं- किसी भी पशु के शरीर पर बना घाव अगर बिना उपचार के छोड़ दिया जाय तो उसकी तरफ कीट आकर्षित होते हैं. वातावरण में नमी और गर्मी हो तो घाव के समीप कीट के अंडे देने के चार घंटे के भीतर उसमें से लार्वा निकल आते हैं. लार्वा जानवर के मांस को खाना शुरु करता है. कमजोर और पंगु पशु सबसे आसान शिकार बनते हैं. पशु के शरीर पर कोई भी बहता हुआ घाव हो या उसके शरीर पर मल-मूत्र के कारण नमी बरकरार हो तो ऐसी जगह को कीट अंडा जनने के लिए चुन लेते हैं.

क्या यह रोग सिर्फ आवारा पशुओं का लगता है? ना, इस रोग की चपेट में बहुत से पालतू जानवर आ सकते हैं. पालनहार हर मौसम में अपने पालतू पशुओं को खुले में जंजीर से बांधकर रखते हैं, वे पालतू पशुओं के शरीर पर लगे मल-मूत्र की परत को साफ करने का खास ख्याल नहीं रखते, खाना भी पशुओं को कम ही देते हैं. बंधा हुआ यह पशु बोरियत में अपने ही शरीर पर दांत से घाव कर लेता है, जंजीर के कारण भी गर्दन पर घाव बन जाते हैं और ऐसे में मैग्गोट्स हमला बोल देते हैं. घाव जब बहुत गहराई तक चला जाता है और उसमें से बदबू आने लगती है तब जाकर पशु के पालनहारों को होश आता है कि कहीं उपचार कराना पड़ेगा. कुछ लोग सचमुच ही चाहते हैं कि पशु का उपचार हो जबकि कुछ लोग उपचार कराने के लिए कतार में लगते हैं और फिर मौका देखकर चुपके से कतार से खिसक लेते हैं. ये लोग पशु को हमेशा के लिए छोड़ जाते हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर इमेज)

मैग्गोट्स लगे घाव की पहचान आप भी कर सकते हैं और उसका उपचार भी कर सकते हैं. आइए, जानते हैं कैसे ?

मैग्गोट्स लगे घाव को आसानी से पहचाना जा सकता है. देखिए कि किसी जानवर के शरीर पर कोई ऐसा घाव तो नहीं जिस खुला छोड़ दिया गया है. ऐसे घाव से एक खास तरह की बदबू आती है. अगर आप बारीकी से गौर करेंगे तो दिखेगा कि घाव से उजले रंग के कीड़े निकल रहे हैं. मैंने ये भी देखा है कि कुत्ते के पंजे के नाखूनों और उसके पैर के निचले हिस्से में भी कभी-कभी मैग्गोट्स के कारण घाव बने होते हैं. ऐसे घाव पूंछ तथा सिर पर भी होते हैं. पैर के नाखूनों और तलवे या फिर पूंछ के घावों पर अक्सर लोगों की नजर नहीं जाती. अगर आपको दिखे कि पशु के शरीर के किसी खास हिस्से पर मक्खियां मंडरा रही हैं तो वहां जरूर ही घाव होगा. कोशिश कीजिए कि पशु के शरीर के इस हिस्से पर मक्खियों के अंडे जनने से पहले ही आप उपचार करा लें.

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मैग्गोट्स के कारण संक्रमित हुए घाव का उपचार कराना बेहद सरल है; हां, पूरी तरह से ठीक होने में 1 से 3 महीने का वक्त लग सकता है. घाव कितनी जल्दी भरेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैग्गोट्स ने घाव में किस गहराई तक धावा बोला है. पशु-चिकित्सक घाव में क्लोरोफार्म डालकर उपचार की शुरुआत करते हैं. वे कुछ देर को इंतजार करते हैं और फिर एक-एक करके मैग्गोट्स(कीड़े) को घाव से निकालते हैं. चूंकि हमारी पशुशाला में ऐसे मामले सैकड़ों की तादाद में आते हैं सो हम मैग्गोट्स को मारने के लिए क्लोरोफार्म और टर्पेटाइन के मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं.

मिश्रण दोनों की बराबर मात्रा लेकर तैयार किया जाता है. घाव कुत्ते सरीखे छोटे जानवर का हो तो चिकित्सक सफाई के लिए एंटीसेप्टिक का इस्तेमाल करते हैं इसके बाद मैग्गोट्स को घाव से निकाला जाता है. फिर घाव पर लोरेक्सजेन या मैग्गोसाइड नाम की दवा लगाई जाती है. ये दवा मैग्गोट्स को मारने के लिए खास तौर पर तैयार की गई है. घाव की सफाई और मैग्गोट्स-मारक दवा को लगाने के बाद चिकित्सक घाव में रुई के फाहे भरते हैं और उसे एक पट्टी(बैंडेज) से बांध देते हैं.

ध्यान रहे कि पट्टी अच्छी तरह बंधी हो ताकि घाव एयरटाइट रहे. घाव के एयरटाइट होने का फायदा यह है कि अगर कोई मैग्गोट्स घाव के अंदर रह भी गया हो तो वो ऑक्सीजन ना मिलने के कारण भीतर ही मर जाएगा. पशु-चिकित्सक देखते हैं कि घाव कितना गंभीर है और इसी के आधार पर निर्णय करते हैं कि बैंडेज दिन में दो बार बदलना है या फिर एक बार. हां, बैंडेज जब भी खोला जाता है- ध्यान देना होता है कि उसमें कोई मैग्गोट्स ना मौजूद हो. अगर मैग्गोट्स मौजूद दिखें तो उन्हें निकाला जाता है.

सहायक उपचार के तौर पर अगर जिंकोलैक का इस्तेमाल किया जाय तो घाव तेजी से भरता है. पशु-चिकित्सक सल्फर रेंज के एंटीबायोटिक्स या फिर उत्तकों(टिश्यूज) के ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एमोक्सिलिन भी दवा के तौर पर दे सकते हैं. घाव भरना शुरू हो जाता है तो हम अस्पताल में बीटाडीन और फ्यूरासीन का इस्तेमाल करते हैं ताकि घाव तेजी से ठीक हो.

बाली को ठीक होने में तीन महीने लगे. उसकी लगातार देखभाल की गई सो वह चंद सौभाग्यशाली पशुओं में गिना जायेगा जिन्हें देखभाल हासिल हो पाती है. बाली फिर से एक शानदार घोड़े के रूप में दौड़ सका- जैसा कि किसी भी घोड़े का स्वभाव होता है.

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जानवर दुख-तकलीफ में होते हैं तो जल्दी ही हार मान लेते हैं. अपने को किसी अंधेरे एकांत कोने में छुपाते रहते हैं. दुर्भाग्य कहिए कि ऐसी जगहें लार्वा के पनपने के एतबार से बहुत सहायक सिद्ध होती हैं, लार्वा के तेजी से पनपने के कारण घाव का सड़ना भी तेजी से होता है और जानवर की मौत हो जाती है. अगर आपको सड़क पर कभी ऐसा जानवर दिखे जिसके शरीर पर घाव हों तो मेरी पशुशाला से जरूर संपर्क कीजिए. आपके ऐसा करने से उस निरीह जानवर की जान बचेगी और मांस खाते मैग्गोट्स से उसे छुटकारा मिलेगा- उसके दुख-तकलीफ के दिन कम होंगे.

आखिर में एक बात यह कि मैग्गोट्स से संक्रमित घाव देखने में भले वीभत्स लगें लेकिन उनका उपचार बहुत आसान है- बेहद साधारण किस्म की दवाइयों से ऐसे घाव का उपचार संभव है. सो, नजर रखिएगा और घाव से परेशान कोई जानवर सड़क पर दिखे तो जरूर ही उसकी सुध लीजिएगा.

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