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Birthday Special: अपनी ही जिंदगी पर हर एंगल से कैमरा चलाने वाला निर्देशक

महेश भट्ट अपने बारे में कुछ भी छिपाते नहीं चाहे वो मामला फिल्मों का हो, राजनीतिक हो या फिर पर्सनल

Updated On: Sep 20, 2017 11:08 AM IST

Arun Tiwari Arun Tiwari
सीनियर वेब प्रॉड्यूसर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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Birthday Special: अपनी ही जिंदगी पर हर एंगल से कैमरा चलाने वाला निर्देशक

सिनेमा के शौकीन अक्सर निर्देशकों की तारीफ इस बात के लिए करते हैं कि उनके कैमरे का एंगल का शानदार रहा. कोई भी फिल्म रिव्यू पढ़िए. रिव्यू करने वाला जरूर एक बार इस बात का जिक्र करता है कि निर्देशक ने कैमरे पर बेहतरीन काम किया है. लेकिन भारतीय फिल्म निर्देशकों में महेश भट्ट शायद इकलौते ऐसे निर्देशक होंगे जिन्होंने कैमरा अपनी तरफ ही मोड़ लिया.

सिनेमा की दुनिया मीडिया की तमाम खोजी पत्रकारिता के बावजूद भी सेलिब्रेटीज की जिंदगी के कई पहलुओं से लोग नावाकिफ ही रह जाते हैं. पर्सनल और प्रोफेशनल के बीज डिफरेंस रखने वाले इन सेलिब्रेटीज से बिल्कुल अलग हैं महेश भट्ट.

महेश भट्ट अपने बारे में कुछ भी छिपाते नहीं चाहे वो मामला फिल्मों का हो, राजनीतिक हो या फिर पर्सनल. वो ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने सिर्फ बोलकर ही नहीं बल्कि फिल्में बनाकर भी अपनी जिंदगी और व्यक्तित्व से जुड़े तमाम पहलुओं को लोगों के सामने रखा है. उनकी फिल्म अर्थ, सारांश, जख्म जनम और लेखक के तौर पर वो लम्हे उन्हीं की जिंदगी कहानी बताती हैं.

Rekha Alia Mahesh

कहा जाता है कोई निर्देशक अपने आस-पास घट रही घटनाओं से ही प्लॉट उठाता है लेकिन महेश भट्ट ने इससे भी दो कदम आगे बढ़कर अपनी जिंदगी को ही केंद्रबिंदु बना दिया. माना जाता है कि ऐसा करने के पीछे उनकी अपनी निजी जिंदगी के कटु अनुभव मुख्य वजह थे. एक अमीर गुजराती ब्राह्मण पिता और मुस्लिम मां की औलाद महेश भट्ट ने बचपन से जवानी तक जिन अनुभवों को जिया उन्हें पर्दे पर उतारने से कभी हिचके नहीं.

अपनी जिंदगी में बेहद स्ट्रगल से पैठ बनाने वाले महेश भट्ट ने इसी वजह से बड़ी संख्या में स्ट्रगलर्स को मौका दिया. पिछले तीन दशक के दौरान इंडस्ट्री में शायद सबसे बेहतरीन कलाकारों को महेश भट्ट ने ही मौका दिया. हर बात बेलाग-बेलौस तरीके से कहने की आदत रखने वाले महेश भट्ट को बयानों से कंट्रोवर्सी पैदा करने के लिए जाना भी जाता है.

नब्बे के दशक में अपनी बेटी पूजा भट्ट के बारे में दिया उनका 'एक बयान' आज भी खबरों में आ ही जाता है. ठीक ऐसा ही राजनीतिक विचारों को लेकर भी है. महेश भट्ट मुखर रूप से कांग्रेस के समर्थक हैं और 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को वोट न देने की अपील भी कर चुके हैं.

महेश भट्ट की इस मुखरता के पीछे उन दो लोगों का भी बड़ा हाथ है जिन्हें वो अपना गुरु मानते रहे. सत्तर के दशक में जब महेश भट्ट स्ट्रगल कर ही रहे थे तो उस दौरान वो ओशो के फैन थे. उनसे काफी प्रभावित थे. उसके बाद वो यूजी कृष्णमूर्ति से जुड़े. कृष्णमूर्ति के बारे में तो उन्होंने कहा था कि अगर उनका नाम मेरे नाम से हटा लीजिए तो मैं कुछ भी नहीं हूं.

(यूजी कृष्णमूर्ति का साक्षात्कार लेते महेश भट्ट)

ओशो और यूजी कृष्णमूर्ति दोनों ही आम फिलॉसफर या संत नहीं थे. ये दोनों ही अपनी रैशनैलिटी के लिए जाने जाते थे. इन दोनों का स्पष्ट प्रभाव महेश भट्ट के व्यक्तित्व पर दिखाई देता है. यही वजह है कि महेश भट्ट देश-विदेश से जुड़े लगभग हर मुद्दे पर बेबाक राय रखते हैं. हर बात को रैशनैलिटी से काटते हैं. समाज में उपजती हर बुराई पर कुठाराघात करते हैं चाहे मामला फिल्मों से जुड़ा हो या न जुड़ा हो. कई बार वो पॉलिटकली करेक्ट नहीं होते हैं. लेकिन महेश तो महेश हैं, वो जिंदगी यूं ही जीते हैं.

आज 69 वर्ष के पूरे हो रहे महेश भट्ट को इंडस्ट्री में 45 सालों से ज्यादा बीत चुके हैं. ऑफबीट और पॉपुलर, दोनों ही तरह के सिनेमा में महेश भट्ट ने 'बाहरी' होने के बावजूद अपना सिक्का चलाया है. वो भी अपनी शर्तों पर. अपने बारे में लोगों को सबकुछ बताते हुए. चाहे उसके लिए कितनी भी आलोचनाएं क्यों न झेलनी पड़े. लोग सफलताएं पाते हैं लेकिन महेश भट्ट के अंदाज में सफलता पाना कम लोगों को नसीब होता है.

वो शतायु हों उन्हें आने वाले कई और सालों में स्वस्थ जीवन की हमारी बधाई...

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