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क्या फर्क पड़ता है यदि गांधी ने मरते समय ‘हे राम’ कहा था या नहीं

अंतिम समय में बापू के 'हे राम' कहने न कहने को लेकर कई दावे हैं

Updated On: Oct 02, 2017 12:14 PM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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क्या फर्क पड़ता है यदि गांधी ने मरते समय ‘हे राम’ कहा था या नहीं

महात्मा गांधी अक्सर कहा करते थे कि ‘मेरी इच्छा है कि जब मैं मरूं तो मेरे लबों पर राम का नाम रहे.’ पर अलग-अलग लोगों के इस पर अलग दावे हैं. वैसे गांधी के जीवन में राम की महत्ता इतनी ज्यादा थी कि अंत समय में राम नाम दोहराने या न दोहराने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

यह बात गांधी जी के निजी सचिव रहे वी.कल्याणम् ने एक बार कही थी. महात्मा गांधी ने गुजरात के कांग्रेसी नेता जय सुखलाल हाथी को भी लिखा था कि मैं चाहता हूं कि राम नाम के उच्चारण के साथ ही मैं प्राण त्यागूं.

जिसका पूरा जीवन ही राम मय हो, वह अंतिम समय में यदि राम नाम नहीं कह सका तो उससे क्या फर्क पड़ता है? याद रहे कि गांधी अक्सर राम भजन करते थे. वे इस देश के लिए राम राज की कल्पना किया करते थे. उनकी साप्ताहिक पत्रिका का नाम भी ‘हरिजन’ ही था. राम का एक नाम हरि भी है.

वी.कल्याणम् के अनुसार बापू ने मरते समय ‘हे राम’ नहीं कहा था. मगर गांधी जी के प्रपौत्र तुषार गांधी के अनुसार कल्याणम् की बात गलत है. गांधी हत्याकांड मुकदमे के एक गवाह सरदार गुरू वचन सिंह ने 30 अगस्त 1948 को अदालत को बताया था कि गोली लगने के बाद बापू ने ‘हे राम’ कहा था.

तुषार गांधी के अनुसार दरअसल जो लोग बापू को हिंदू विरोधी साबित करना चाहते थे, उन्हीं का यह प्रचार रहा है कि गांधी ने ‘हे राम’ नहीं कहा. गांधी जी के हत्यारे ने तो इसी आधार पर उनकी हत्या की कि गांधी हिंदू विरोधी थे. यदि ‘हे राम’ वाली बात साबित हो जाती है तो हत्यारे का वह तर्क ध्वस्त हो जाएगा.

हत्या के समय आभा और मनु बापू के साथ थीं. आभा की गोद में बापू ने अंतिम सांस ली थी. आभा के अनुसार बापू ने ‘हे राम’ कहा था. न सिर्फ एक बार बल्कि बापू हे राम कुछ समय तक दुहराते रहे.

तुषार गांधी के अनुसार कल्याणम् को तो गांधी हत्याकांड का गवाह तक नहीं बनाया गया था. घटनास्थल पर मौजूद अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदू’ के संवाददाता के अनुसार गोलियां लगने के 15 मिनट बाद तक बापू जीवित रहे थे.

और भी लोग हैं जिनका बयान अलग है

उस दिन ऑल इंडिया रेडियो के रिपोर्टर केडी मदान भी घटना स्थल पर मौजूद थे. गांधी जी की प्रार्थना सभा को ‘कवर’ करने मदान बिड़ला भवन रोज जाते थे. मदान ने कुछ साल पहले बताया था कि मैंने तो ‘हे राम’ कहते नहीं सुना था.

साथ ही मदान ने यह भी कहा कि ‘पर यह एक लेजेंड यानी किंवदंती है, इसे लेजेंड ही रहने दिया जाए.’

कई साल पहले बुजुर्ग पत्रकार देवदत्त से नई दिल्ली में इन पंक्तियों के लेखक की मुलाकात हुई थी. बापू की हत्या के दिन वे भी एक पत्रकार के रूप में वहां मौजूद थे. दिवंगत देवदत्त जी स्पष्टवादी और निर्भीक पत्रकार थे. उन्होंने मुझे बताया था कि गांधी ने ‘हे राम’ नहीं कहा था.

इस संबंध में सबसे बड़ी बात कही थी एक अंग्रेजी न्यूज एजेंसी के रिपोर्टर ने. बाद में वे पी.टी.आई.के ब्यूरो चीफ बन कर पटना आए थे. उन्होंने भी देवदत्त जी वाली बात दुहराई. उनकी खबर के जरिए ही ‘हे राम’ वाली बात दुनिया भर में पहली बार प्रसारित हुई थी. याद रहे कि अपनी एजेंसी की ओर से उन्होंने गांधी जी की हत्या की खबर की रिपोर्टिंग की थी. उन्होंने पटना में भी यह बात दुहराई थी कि गांधी ने ‘हे राम’ नहीं कहा था.

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