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बापू 125 साल तक क्यों जीवित रहना चाहते थे?

गांधी के बारे में एक बात मशहूर है कि वह अक्सर कहा करते थे कि मैं सवा सौ साल जीना चाहता हूं

Updated On: Jan 30, 2018 10:37 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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बापू 125 साल तक क्यों जीवित रहना चाहते थे?

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर को हुआ था और उनकी हत्या 30 जनवरी को हुई थी. यूएन की पहल पर 2 अक्टूबर को पूरी दुनिया में अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है. भारत में 2 अक्टूबर अब स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जाता है. शुचिता से गांधी का गहरा नाता है. इसलिए स्वच्छता को गांधी से जोड़े जाने पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, लेकिन गांधी के जीवन का असली संदेश अहिंसा है.

गांधीजी के जीवन से जुड़ी एक और अहम तारीख 30 जनवरी है. बंटवारे के बाद लुटे-पिटे भारतीय उप-महाद्वीप में वे शांति की स्थापना के लिए अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे थे, जब 30 जनवरी को उनकी हत्या की गई. 30 जनवरी के मायने हम सबके के लिए शायद 2 अक्टूबर से भी ज्यादा हैं, खासकर एक ऐसे समय जब चारों तरफ हिंसा है. खानपान और धार्मिक पहचान हिंसा का कारण बन रही है. 'मेरा तिरंगा और तेरा तिरंगा' जैसे सवाल पर सड़क पर खून बहाया जा रहा है. ऐसे में यह याद करना जरूरी है कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में गांधी ने क्या किया था?

गांधी के आखिरी दिन

गांधी पर लिखी गई चर्चित किताबों में डी.जी.तेंदुलकर की आठ खंडों वाली 'महात्मा—लाइफ ऑफ मोहन दास करमचंद गांधी' शामिल है. इस किताब के अंतिम खंड में गांधी के जीवन के आखिरी दिनों का विस्तृत वर्णन है. बंटवारे के ठीक पहले सांप्रादायिक हिंसा के राष्ट्रव्यापी उभार ने गांधी को अंदर से तोड़ दिया था. गांधी के बारे में एक बात मशहूर है कि वह अक्सर कहा करते थे कि मैं सवा सौ साल जीना चाहता हूं. लेकिन बंगाल से लेकर दिल्ली और पंजाब तक फैली हिंसा ने उन्हें गहरी निराशा में धकेल दिया था. हत्या के कुछ महीने पहले आखिरी जन्मदिन पर एक विदेशी प्रशंसक की चिट्टी का जवाब देते हुए उन्होंने लिखा था- मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का आह्वान करता हूं कि वह मुझे आंसुओं की उस घाटी से दूर बहुत दूर ले जाए जिसका नाम अब भारत है.

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लेकिन इस निराशा के बावजूद गांधी कभी डिप्रेशन में नहीं गए. वे हर बार इससे बाहर निकले क्योंकि वे जानते थे कि उनकी भूमिका अभी खत्म हुई है. गांधी के जीवन के आखिरी डेढ़-दो साल एक ऐसी महागाथा हैं, जिसमें एक बूढ़ा और निहत्था आदमी लाखों दंगाइयों से अकेला लड़ रहा था. लड़ ही नहीं रहा था बल्कि उनसे संवाद कर रहा था, उन्हें समझा रहा था. हृदय परिवर्तन गांधीवादी दर्शन का आधार है. गांधी ने जीवन के आखिरी दिनों में खून के प्यासे अनगिनत लोगों का जिस तरह हृदय परिवर्तन किया, शायद वह उनके लंबे जीवन का सबसे सुंदर आख्यान है.

कलकत्ता और नोआखली में शांति स्थापना

16 अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन का एलान किया. इसके बाद से अविभाजित भारत के अलग-अलग हिस्सों में खून-खराबा शुरू हो गया. सांप्रदायिक हिंसा का सबसे भयानक रूप बंगाल में देखने को मिला. कलकत्ता में हजारों लोग मौत के घाट उतार दिए गए. कलकत्ता में हिंदू आबादी बहुसंख्यक थी और जाहिर है, हिंसा के ज्यादा बड़े शिकार यहां मुसलमान थे. नफरत के माहौल मे गांधी ने कलकत्ता में डेरा डाला.

नोआखली की कहानी कलकत्ता से अलग थी. वह इलाका पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में था, जहां छोटी हिंदू आबादी बहुसंख्यक मुसलमानों से घिरी थी. दंगाइयों के सिर पर खून सवार था. अक्टूबर 1946 में गांधी नोआखली पहुंचे. वहां भी गांधी का स्वागत इसी तरह हुआ जैसा कलकत्ता में हुआ. हिंसा पर उतारू कलकत्ता के लोगों ने गांधी को मुस्लिम परस्त कहा था तो नोआखली में मुसलमान दंगाइयों की भीड़ ने उन्हे हिंदुओं का एजेंट बताया और तुरंत चले जाने को कहा लेकिन गांधी ने जवाब दिया कि मैं यहां मैं अपनी मर्जी से आया हूं और जब शांति स्थापित नहीं हो जाती मैं यहां से नहीं जाउंगा.

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गांधी की लड़ाई घृणा की प्रवृत्ति से थी, घृणा करने वालों से नहीं. 1946 और उसके बाद 1947 का लगभग पूरा साल गांधी ने इसी घृणा से लड़ते हुए गुजारा. बंटवारे के करीब आते ही हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत की खाई और गहरी होती चली गई. ऐसे में गांधी का काम और मुश्किल होता चला गया. दिल्ली में आजादी का जश्न और `कलकत्ता में गांधी वापस जाओ’ के नारे

गांधी अपने आपको अराजक कहते थे. राजनीतिक आधार पर सीमाओं के विभाजन को उन्होंने हमेशा कृत्रिम माना. ऐसे में यह कहना कि भारत का विभाजन गांधी की इच्छा या उनकी वजह से हुआ एक ऐसी नादानी है, जिस पर केवल तरस खाया जा सकता है. गांधी धर्म के आधार पर देश के विभाजन और चारों तरफ मची मारकाट से इस कदर दुखी थे कि उन्होने 15 अगस्त के समारोह में शामिल न होने का निर्णय लिया. 9 अगस्त को गांधी कलकत्ता पहुंचे और वहां से उनका इरादा एक बार फिर नोआखली जाने का था.

नोआखली पाकिस्तान का हिस्सा बनने वाला था. जाहिर है, गांधी की चिंता वहां रहे गए अल्पसंख्यक हिंदुओं को लेकर थी. सुरक्षा कारणों से शुभचिंतकों ने बापू को आगे जाने से रोक लिया. गांधी ने कोलकाता की एक मुस्लिम बस्ती मियांबाग के करीब डेरा डाला. उनके मन में उम्मीद जगी कि अगर कलकत्ता में शांति कायम हो गई तो इसका अच्छा असर नोआखली पर भी पड़ेगा और हिंसा रुक जाएगी. पाकिस्तान से विस्थापितों की भीड़ लगातार भारत आ रही थी और एक बहुत बड़ा तबका ऐसा था, जो गांधी को इसका दोषी मान रहा था.

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कलकत्ता में बिना किसी खास सुरक्षा के गांधी रुके थे. वहां उपद्रवियों और दंगा पीड़ितों की भीड़ लगातार 'गांधी वापस जाओ' के नारे लगा रही थी. ऐसे में शांति स्थापना के लिए गांधी ने 1 सितंबर से अपना अनशन शुरू किया. यह उनकी नैतिक शक्ति थी कि बदहाल, गुस्से की शिकार और सांप्रादायिक हिंसा में अपने को खो चुके लोगो ने तीन दिन के भीतर हिंसा छोड़ दी. हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोगों ने बापू के सामने हथियार डाल दिए. इस घटना के बाद भारत के वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने कहा-पंजाब में जो काम 50 हजार की सेना नहीं कर पाई, वह मोहनदास करमचंद गांधी नाम वाले वन मैन आर्मी ने कर कर दिखाया. इस वनमैन आर्मी के सामने मैं अपना शीश झुकाता हूं.

अधूरी रह गई पाकिस्तान यात्रा

गांधी का इरादा बंगाल से निकलकर पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) जाने का था. वे चाहते थे कि वहां से हिंदुओं का पलायन रुके. वे पाकिस्तान मुसलमानों को समझाना चाहते थे कि हिंसा छोड़ दे लेकिन कलकत्ता से दिल्ली लौटते ही गांधी को यह अंदाजा हो गया कि अब वे आगे नहीं जा पाएंगे. दिल्ली में हालात जरूरत से ज्यादा खराब थे. पाकिस्तान से आ रहे हिंदू और सिख शरणार्थी बेहद बुरी हालत में थे. उनकी नाराजगी चरम पर थी और उन्होंने दिल्ली में जगह-जगह मुसलमानों पर हमले शुरू कर दिए थे. गांधी यह समझ चुके थे कि अब दिल्ली में शांति स्थापना के अलावा कोई और प्राथमिकता नहीं हो सकती है.

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अपनी प्रार्थना सभाओं मे बापू लगातार लोगों से संवाद करते थे. इनमें बहुत से ऐसे लोग भी थे जो गांधी से नफरत करते थे. एक बार प्रार्थना सभा में किसी ने उनपर 'मुस्लिम परस्त' होने का इल्जाम लगाया. इस पर गांधी ने कहा कि मैं भारत में मुस्लिम परस्त हूं और पाकिस्तान में हिंदू परस्त हूं.

कोशिश लगातार जारी रही लेकिन दिल्ली में शांति की स्थापना अब भी दूर की कौड़ी थी. उपद्रवियों की भीड़ ने मुसलमानों के घरों के साथ कुछ प्रार्थना स्थलों पर भी कब्जा कर लिया था, जिनमें महरौली की मशहूर दरगाह भी शामिल थी. ऐसे में गांधी ने शांति स्थापना के लिए अपना अंतिम अस्त्र इस्तेमाल किया और वह था अनशन.

बापू का आखिरी उपवास

13 जनवरी 1948 को गांधी ने उपवास शुरू किया. यह उनके जीवन का आखिरी उपवास था. उन्माद भरे माहौल में एक अकेले बूढ़े और निहत्थे आदमी की नैतिक शक्ति एक बार फिर काम कर गई. कब्जा किए गए पूजा स्थलों के खाली किए जाने की खबरें आने लगीं. 17 जनवरी को हिंदू, मुसलमान और सिख जैसे धार्मिक समूहों के नेताओं ने राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को एक साझा ज्ञापन सौंपा, जिसमें वादा किया गया कि ये समुदाय शांति बनाए रखेंगे और मिल-जुलकर रहेंगे.

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इसके बाद गांधी सिर्फ 13 दिन और जीवित रहे. जिस नफरत के खिलाफ वे लड़ते रहे उसी नफरत ने 30 जनवरी की प्रार्थना सभा में उनकी जान ले ली. गांधी और जीवित रहते तो क्या करते? उनका इरादा पाकिस्तान में शांति स्थापना का था, ताकि अल्पसंख्यक हिंदू निडर होकर रह सके. वे 125 साल जीवित रहना चाहते थे. भारतीय उपमहाद्वीप के लोगो में अंदर तक पैठी हिंसा को देखकर यही लगता है कि बापू अगर 125 साल जीवित रह गए होते तब भी उनका काम खत्म नहीं होता.

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